Tuesday, January 16, 2024

बुद्धिजीवियों के वार्त्तालाप की गुणवत्ता 1

एक रिसर्चर और एक प्रोफेसर साहब से व्हाट्सएप्प ग्रुप में मेरे साथ वार्त्तालाप देखिए। दोनो व्यक्ति बुद्धिजीवी हैं। 


आप रिसर्च पेपर देख सकते हैं, जो कह रहा है कि गाय भारत मूल की ही नही है। 

आप रिसर्चर साहब की बात स्वयं देख सकते हैं कि वे कह रहे हैं अनेकों भाषा बोलियों वाले पूरे देश मे नर को सांड ही कहते हैं। स्पष्ट है कि शब्द विदेशज है। यदि पाली साहित्य में वर्णित है तो पाली भी गाय वाले क्षेत्र की ही हुई।

पर, वार्त्तालाप की गुणवत्ता देखिए। मुझे रिसर्चर साहब की योग्यता के वजन से चुप कराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ऐसे विषयों पर गहन चिंतन की आवश्यकता नही है। साथ मे सामाजिक चेतना और सामूहिक हित की बात की जा रही है। अब इन्हें कौन बताये की ये दोनों चीजें फर्जी इतिहास के कथानक/narrative की बंधक हैं। नही तो लोगों के जै श्री राम करने में, आरएसएस  के एजेंडे से, भाजपा के इतिहास पुनर्लेखन से क्या दिक्कत है? उनको करने दीजिए, आप केवल सामाजिक चेतना और सामूहिक हित की बात कीजिये। पर, कौन सी चेतना और कैसा हित? ऐसे में आपको एक ही सलाह है, आप अपने पेट के लिए जो कर रहे हैं, उसमे पूर्णरूपेण लगे रहिये।

वार्त्तालाप देखिए

रिसर्चर का दावा:-


उसपर मेरा जवाब:-



उसपर रिसर्चर साहब के बचाव में प्रोफेसर साहब का बचाव:-


Thursday, January 11, 2024

मिशन की दशा और दिशा, क्यों जुड़ें?, #PPSM, 61वीं P2 (आपके अपने) पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन

 


https://youtu.be/vcc-3SA-yto?si=NTI2ZeZmRrCL2eIW

चौरसिया लोगों का मूल स्थान

पंकज चौरसिया जी की उनकी जातिगत संस्कृति की बात एकदम सही हैं और अत्यंत महत्वपूर्ण है।


हालाँकि उन्हें दुख हो या खुशी, पर सही तथ्य जानना और प्रसारित करना समाज में वर्ण व्यवस्था वाले लोगों द्वारा फैलाये अनेकों समस्यायों को दूर करता है। यह हमें जानना चाहिए कि पान का origin और distribution इंडोनेशिया, कंबोडिया, विएतनाम आदि क्षेत्र है और ये लोग उसी क्षेत्र से आये हुए लोग हैं। यानी ये लोग भी अनेकों आदिवासी समूहों तथा अन्य जातियों और वर्ण व्यवस्था वाले लोगों की तरह ही पुरवईया है। इन्होनें जो भी भौगोलिक,राजाओं, लिपि के नाम गिनाए,सारे के सारे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के हैं। 


पर, मैं इनको आश्वस्त करता हूँ कि #आदिकिसान किसानों, कबिलाईओं के साथ कामगारों की भी लड़ाईयाँ लड़ता है। इसे वर्ण व्यवस्था वालों के झूठ को  पर्दाफाश करना है और उनकी सामाजिक पूँजी/social capital को ध्वस्त करना है।


धैर्य से अंत तक मेरी खोज देखिए https://youtu.be/lCl4g5RzMw8?si=vMysW2PccuIWvLCk


पंकज जी की असली पोस्ट👇

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid02vXumyd1fBPT9Hp4tzEf4EKz5N5qacLLtmtQtggzSLEMHzRi9ikyrj8EmteapFQxCl&id=100003532226025&mibextid=Nif5oz

बचपन से मैं अपने घर में प्रत्येक सोमावर को शिव को दूध चढाते हुए पला बढ़ा हूँ, घर के द्वारे पे शिव का मंदिर है, घर में सभी शिव के भक्त हैं, और मैं भी 2017 तक शिव का भक्त रहा हूँ, इसके बाद भक्ति में कमी आई। प्रत्येक वर्ष घर और गाँव में नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता आ रहा है, चना इस दिन का मुख्य पकवान होता है जिसको अवधी भाषा में “घुघरी” कहा जाता है. सवाल करने पे हमेशा यही उत्तर दिया जाता है कि हम नागवंशी है इसलिए यह त्यौहार मनाते हैं, लेकिन मैं कभी इस जावब से संतुष्ट नहीं हो सका क्योंकि कोई लिखित सबूत नहीं दे पाता था? यह सवाल बचपन से बना रहा है और आज भी बना है, लखनऊ आने के बाद मैंने इस विषय पर खोजना शुरू किया लेकिन ज्यादा कुछ हाथ नहीं लग पाया सिवाय गूगल ब्लाक के। जैसा कि मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि हमारे समुदाय के लोग पान की खेती, या उसको बेचने का काम करते हैं। हमारे घर में भी बचपन में मेंरे पिता यही काम करते थे। अगर हम इसके कीवर्ड को समझने का प्रयास करे तो हो सकता थोडी स्थिति साफ़ हो सके। पान को ताम्बूल नाग्वेली संस्कृत में कहा जाता है जिसका अर्थ पान ही होता है। यह Piperaceae species का है, जिसकी खेती परम्परिक रूप से भारत और श्रीलंका में होती है। अंग्रेजी में इसे Betel कहा जाता है जो पुर्तगाली शब्द है लेकिन यह शब्द तमिल और मलयालम भाषा से लिया गया है। दूसरा सवाल है कि तमोली पान की खेती करते हैं,  पान जिसका शुद्ध हिंदी नाम ताम्बूल है, ताम्बूल से तमोली कैसे हुआ? तीसरा सवाल है पान को संस्कृत में नाग्वेली कहा जाता है जिसका अर्थ है पान तो नाग और नाग्वेली एक दुसरे से कैसे जुड़े है?  क्योंकि जहां पर पान की खेती होती है, वहां पर सांप बहुत अधिक पाए जाते हैं ,  इस फसल में सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है जिससे वह स्थान अधिक ठंडा होता है तथा इसके भीट में खुश्बू भी अधिक होती है, इसलिए भी सांप के अधिक पाए जाने का एक कारण यह भी है। चौथा सवाल है कि मेरे समुदाय के अधिकतर लोग शिव के उपासक क्यों हैं? इस सवाल का अक्सर जवाब मुझे यही मिला कि शिव के गले में सांप है, और वह उसकी रक्षा करते हैं इसलिए हम सब शिव के भक्त हैं।  अब अगर आप गौर करे तो कुछ आपको सामान्य- सा लगेगा वह है- ताम्बूल मूलतः तमिल और मलयालम भाषा से लिया गया है, दूसरा है तमिल और तमोली दोनों शब्द एक दुसरे से मिलते - जुलते शब्द हैं, नाग्वेली और मेरे समुदाय में नागवंशी व नाग टाईटल लिखना, और शिव के गले में नाग का रहना और तमोली को शिव का भक्त होना संयोग कैसे हो सकता है? यदि हम डॉक्टर आम्बेडकर की बात मान लें कि दास ही नाग हैं और नाग ही द्रविण हैं और द्रविण दक्षिण भारत में अधिकांश रूप में हैं और ताम्बूल शब्द भी तमिल और मलयालम से लिया गया है, तो सारी चीजें और उसके पीछे के लॉजिक संयोग मात्र तो नहीं हो सकता है, अवश्य इसके पीछे अन्य कारण है जो एक दुसरे से बिलकुल जुड़े हुए हैं, जो एंथ्रोपोलॉजी, समाजशात्र और इतिहास का विषय है और इस पर गहन शोध की आवश्यकता है तथा शब्दों की उत्पत्ति और उसके  अर्थ को जानने के लिए भाषा वैज्ञानिक की भी आवश्यकता है। यह अंतिम बात नहीं है और न ही मेरे तर्क अंतिम है।

संस्कृति और इतिहास का एक अपना महत्व होता है, जो लोगों को जोड़ने का काम करता है। भारत एक ऐसा ही देश है जहां पर विभिन्न समुदाय और संस्कृति को मानने वाले लोग रहते हैं। एक ऐसी ही संस्कृति और सभ्यता है नागवंश की, जो विगत कुछ वर्षों से मुखर होकर सामने आ रही है, विगत कुछ वर्षों से भारत में छोटी-छोटी जातियों ने इतिहास और धार्मिक गर्न्थों से अपना नायक तलाशना शुरू किया हैं क्योंकि ये ऐसी जातियां है, जो भारत की सामाजिक सरंचना में तो हजारों सालो से उपेक्षित रहीं हैं लेकिन इनके नाम पर राजनीति और रहनुमाई करने वालों ने भी इनको और भी उपेक्षित करने का काम किया है।

मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं हूँ, लेकिन बचपन से जिज्ञासु प्रवृत्ति और विज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण विषय की जड़ में जाने की काफी रूचि रखता हूँ, एक ऐसा ही सवाल जिसके उत्तर की तलाश मुझे 2013 से हैं लेकिन उसका जवाब पूर्ण रूप से आज 2020 में भी नहीं मिल सका है।  

मैं जिस समुदाय से ताल्लुक रखता हूँ उस समुदाय का नाम है- तमोली, जिसे सामाजिक विज्ञान के विश्वकोश में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे- बरई, तमोली, तम्बोली,नागवंशी, कुमावट, संडिल्य, महतो, चौऋषि, कश्यप, मोदी, आदि नामों से  जाना जाता है। इनका पैतृक कार्य पान की खेती  करना और उसे बेचना है, जो अधिकांश पिछड़ी जाति - वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं, पश्चिम बंगाल को छोड़कर। अधिकांश लोग इन्हें बनिया वर्ग का मानते हैं क्योंकि यह कार्य लगभग व्यवसाय जैसा ही है, मुझे भी मेरे कई मित्र सवर्ण ही समझते हैं। अधिकांश लोग अपने आपको नागवंश से जोड़कर देखते हैं। विगत कुछ वर्षों से यह प्रचलन तेजी से बढ़ा है, जो नागपंचमी को चौरसिया दिवस के रूप में मनाने का काम शुरू किया गया है। कई मिथक भी हैं, लेकिन मैं मिथकों से थोड़ा हटकर इतिहास के हवाले से इसे समझाने का प्रयास करूँगा।

सबसे पहली किताब है आम्बेडकर कि जो वाल्यूम संख्या-14 अछूत कौन थे और कैसे बने, के पेज संख्या 57-71 में लिखा है-   प्राचीन इतिहास के विद्यार्थी जब अतीत की मीमांसा करते हैं तो चार नाम प्रायः मिलते हैं आर्य, द्रविड़, दास और नाग।  इन नामों का क्या अर्थ है?  इस प्रश्न पर कभी विचार नहीं किया गया।  क्या यह आर्य, द्रविण, दास और नाग चार विभिन्न प्रजातियों के 4 नाम है या एक ही प्रजाति के भिन्न-भिन्न चार नाम है। सामान्यत: मान्यता है कि ये चार भिन्न नस्लें हैं।  अगर आर्यों से शुरू करें तो ये एक जाति के लोग नहीं हैं, ये दो हिस्सों में बंटे थे, एक को ऋग्वेदीय और दुसरे को अथर्ववेदीय कह सकते हैं। इनमे सांस्कृतिक भिन्नताएं भी हैं। ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे और अथर्ववेदीय आर्य जादू टोने में विश्वाश करते थे। इनकी पुराण कथाएं भी काफी भिन्न हैं, ऋग्वेदीय आर्य प्रलय और मनु से सृष्टि की उत्पत्ति में विश्वास करते थे जबकि अथर्ववेदीय आर्य “पतन” में विश्वास नहीं करते थे। वे मानते थे कि उनकी नस्ल ब्रह्मा या प्रजापति से उत्पन्न हुई है। ऋग्वेदीय आर्यों ने ब्राम्हण सूत्र तथा आरण्यकों की रचना की है और अथर्ववेदीय आर्य ने उपनिषदों की रचना की है।यह वैचारिक संघर्ष इतना बड़ा था कि ऋग्वेदीय आर्यों ने चिरकाल तक अथर्ववेद को पवित्र वाङ्मय नहीं माना और न ही उपनिषदों को। जब उन्होंने उपनिषदों को स्वीकार भी किया तो उन्हें वेदांत कहा। आजकल वेदांत शब्द का अर्थ वेद का सार लिया जाने लगा है, किंतु उसका प्राचीन अर्थ रहा है, वेद के अंत में, वेद की सीमा के बाहर। वे इसके अध्ययन को प्रतिकूल अध्ययन मानते थे।  

यह नहीं मालूम होता है कि यह दोनों एक ही थे या अलग-अलग। वैदिक साहित्य में इन्हें दास नाम दिया गया,  क्यों दिया गया यह मालूम नहीं चलता है। नागों के राजा का नाम राजा दाहक था इसलिए आर्यों ने नागों के राजा के नाम पर सभी नागों को एक ही सामान्य नाम से कहना शुरू कर दिया हो। अब दूसरा सवाल उठता है कि नाग कौन थे? निसंदेह वह अनार्य ही थे, वैदिक साहित्य को ध्यान से देखने से उसमें एक विसंगति और द्वैत की भावना,  दो तरह की संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच उहापोह की भावना साफ तौर पर दिखाई देती है।  ऋग्वेद में हमारा परिचय आर्य देवता इंद्र के शत्रु अहि वृत्त (सांप देवता) से होता है।  पीछे चल कर यह सांप देवता नाग नाम से प्रसिद्ध हुआ किंतु आरंभिक वैदिक साहित्य में नाग और नाम दृष्टिगोचर नहीं होता और जब यह शतपथ ब्राह्मण में पहली बार आता है, तो यह स्पष्ट नहीं होता है कि नाग का मतलब एक बड़ा सांप है या एक बड़ा हाथी है। लेकिन इससे अहिव्रत का स्वरूप नहीं छिपता क्योंकि ऋग्वेद में उसका स्वरूप सदैव पानी में या उसके चारों ओर छिपे तथा आकाश और पृथ्वी के जल पर समान रूप से अधिकार किए हुए सांप का है। ऋग्वेद में नागों का नाम आने से यह स्पष्ट है कि नाग एक बहुत ही प्राचीन पुरुष थे। यह भी स्मरणीय है कि नाग न तो आदिवासी ही थे और न ही असभ्य थे। इतिहास नागों और राजकीय परिवारों के बीच निकट वैवाहिक संबंधों का भी साक्षी है।  कदंब-नरेश कृष्ण वर्मा के देवगिरी शिलालेख के अनुसार कदंब कुल का नागों से संबंध था। नवी शताब्दी के राजकोट के दान पत्र में अश्वत्थामा नाम के, एक नागकन्या के साथ विवाह का उल्लेख है।  उन्हीं की संतान स्कंद शिष्य ने  पल्लव वंश की स्थापना की। नवीं शताब्दी के ही एक दूसरे पल्लव शिला-लेख के अनुसार वीर-कूर्च पल्लव वंश का राजा था।  इसी शिलालेख में उल्लेख है कि उसने एक नाग कन्या से विवाह किया था और उसे राज्य चिन्ह मिला था।  वाकाटक नरेश प्रवरसेन के पुत्र गौतमी-पुत्र का भारवि नरेश भवनाग की पुत्री के साथ विवाह करने की एक घटना है। नाग सांस्कृतिक विकास की ऊंची अवस्था को तो प्राप्त थे ही इतिहास से यह भी प्रकट होता है कि वह देश के एक बड़े भूभाग पर राज भी करते थे। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि महाराष्ट्र नागों का क्षेत्र है यहां के लोग और यहां के राजा नाग थे। तीसरी और चौथी शताब्दी के प्रारंभ में उत्तरी भारत में भी अनेक नाग नरेशों का शासन रहा है।  यह बात पुराणों, प्राचीन सिक्कों और लेखों से सिद्ध होती है।  विदिशा, चंपावती, पद्मावती और मथुरा का विशेष उल्लेख मिलता है. नवीं शताब्दी में नागों ने विशेष रूप से मध्य भारत में दूसरी बार फिर अपना प्रभुत्व जमाया, इसके कुछ समय बाद बंगाल के शिलालेखों में भी नागों का उल्लेख मिलता हैं। ऐसे ही एक दुर्गाचरण नाग है जो रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे और स्वामी विवेकानंद उन्हें आपना गुरु मानते थे, दुर्गाचरण नाग ब्रिटिश भारत में जन्मे थे लेकिन उनकी मौत बंगलादेश में हुई, आज भी उनके नाम से एक मंदिर है, जहां पर उन्हें आदर के साथ पूजा जाता है।

डॉक्टर आम्बेडकर ने अपने गंभीर अध्ययन के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि दास वे है जो नाग हैं और नाग वे हैं जो द्रविण हैं। डॉक्टर आम्बेडकर का कहना है कि दक्षिण के लोगों को द्रविण शब्द का विशेष प्रयोग करने से यह नहीं भूलना चाहिए कि नाग और द्रविण एक ही हैं। वे एक ही प्रजाति हैं। उत्तर के नागों ने अपनी मातृभाषा तमिल को छोड़कर संस्कृत को अपना लिया जबकि दक्षिण के नाग अपनी मातृभाषा तमिल बोलते रहे और उससे चिपटे रहे और उन्होंने आर्यों की संस्कृत भाषा को नहीं अपनाया।

विशेष धन्यवाद विकास भैया को जो रात 11 बजे इस मुद्दे पर लिखने के उत्साहित किया, और अमित शाश्वत को भी धन्यवाद जिन्होंने रात 1 बजे इस मुद्दे पे चर्चा की और ज्ञानवर्धन किया ।      

सभी देशवासियों को नागपंचमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!!


       - पंकज चौरसिया

Tuesday, January 9, 2024

अपने समाज के पुरोहित अपनाने के लाभ, #PPSM, 61वीं P1 (आपके अपने) पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन

यदि किसी भी विधा के कोई पुरोहित अपने प्रैक्टिस का, कोई लेखक अपनी किताबों का, कोई हॉस्पिटल, कोई प्रतिष्ठान आदि इन वीडियोज पर अपना प्रचार करवाना चाहते हों तो कृपया 8610136135 पर संपर्क करें। 


इसमे यूट्यूब के प्रचारतंत्र से आपके मनचाहे क्षेत्र में, मनचाहे समय के लिए,मनचाहे बजट पर, पूरे वीडियो की अवधि के लिए प्रचार होगा।