Wednesday, April 29, 2026

फसलों में आगलगी की समस्या और समाधान

सरकारों की अदूरदर्शिता तथा किसानों के साथ पक्षपात, बुलेटिन - 1



प्रत्येक वर्ष गर्मियों में किसानों के फसलों में आग लग जाती है। इसी साल अप्रैल, 2026 में बिहार के गया जिला में 1000 बीघा, पटना जिला में 300 बीघा और रोहतास जिला में 500 बीघा गेहूँ में आग लगी है। 5-10 बीघा की घटनाएँ तो अनगिनत है। इसके ठीक एक सप्ताह पहले अकेले बक्सर और आसपास के क्षेत्रों में लगभग 700 आगलगी की घटनाएँ हुई हैं। बहुत सारी ऐसी घटनाएँ तो दर्ज भी नहीं हो पातीं। किसानों की एकमात्र पूँजी फसल है। इसी से साल भर का अनाज, बच्चों का फीस, डॉक्टर का फीस और दवा तथा बाकी खर्चों का इंतेजाम होता है। किसी साल फसल मार खा जाती है तो किसानों की हालत खराब हो जाती है। कर्जा-उधार का सहारा लेना पड़ता है। सोचिए जरा, उन परिवारों के बारे में, जिनकी खड़ी फसलें आग लगने से बर्बाद हो जाती हैं। वह परिवार आपका भी हो सकता है। दुर्घटना पूछ कर नहीं आती है।

ये आग कभी बिजली के तारों से(65% मामलों में), कभी हार्वेस्टर, थ्रेसर जैसे कृषि संयंत्रों से, कभी व्यक्तिगत गलती से आग लग सकती हैं। गर्मी के मौसम में जब फसल पक कर ठनठनाया रहता है, बाकी घास-पौधे भी सूखे रहते हैं, जमीन में नमी और बधार में पानी गायब रहता है तो ऐसी दुर्घटनाओं के लिए एकदम अनुकूल माहौल रहता है। दमकल दूर कहीं जिला मुख्यालय से आना रहता है। ऐसे में आग बुझाने का तुरंत उपाय कुछ भी नहीं होता है। लोग झाड़ियों से, डंडों से, संभवतः बाल्टी से पानी डालकर आग बुझाने की कोशिश करते हैं। पर, इनसे बहुत छोटी आग ही बुझाई जा सकती है। छोटी आग तभी संभव है, जब लोग समय रहते आग लगने की घटना जान जायें और हवा का बहाव तेज न हो। दुर्भाग्यवश गर्मी में हवा अक्सर तेज रहता है तथा लोग समय से जान नहीं पाते हैं।

बिहार में, आग से 33% से अधिक क्षति होने पर ही एक छोटी सी राशि का मुआवजा मिलता है। सिंचित क्षेत्रों के लिए 4250/- प्रति बीघा और असिंचित क्षेत्रों के लिए 2125/- मुआवजा है। तुलनात्मक रूप से पंजाब में 25% से अधिक क्षति होने पर 6175/- और 75% से अधिक क्षति होने पर 12350/- प्रति बीघा है। कोढ़ में खाज यह कि खेती का लागत खर्च हर साल बढ़ रहा है, लेकिन क्षतिपूर्ति शायद दशकों में बढ़ता है। इस छोटी सी राशि के लिए भी किसानों को एड़ियाँ रगड़नी पड़ती हैं। उचित यह होता कि क्षति के हिसाब से फसल का लागत मूल्य (MSP ही लागत मूल्य है) मिलता। जैसे - इस साल बिहार में गेहूँ का MSP 2585/- प्रति क्विंटल है। एक बीघा में करीब 10 क्विंटल गेहूँ पैदावार होता है। इस हिसाब से 100% क्षति होने पर 25850/- या क्षति प्रतिशत के हिसाब से मुआवजा मिलना चाहिए।

वर्त्तमान में, खेत में खड़े होकर किसान द्वारा फ़ोटो खिंचवाकर क्षतिपूर्ति का आवेदन डालने का प्रावधान समाप्त कर जनप्रतिनिधियों के शपथ पत्र पर आवेदन डालने का नियम है। आज चुनावी प्रक्रिया की देन है कि जनप्रतिनिधि मुँह ताककर लोगों का काम करते हैं या ऐसे कामों में हाथ डालने से डरते हैं या हिचकिचाते हैं कि अधिकारी सब बात नहीं सुनता है। जबकि आकस्मिक बैठक बुलाकर इस उद्देश्य का प्रस्ताव पारित करना उनके अधिकार में है। प्रस्ताव का समर्थन या विरोध उनके जैसे ही दूसरे जनप्रतिनिधियों को करना होता है। BDO, DDC जैसे सरकारी अधिकारी ऐसी बैठकों में सचिव की हैसियत से रहते हैं, जिनका काम है, पारित प्रस्तावों को दर्ज कर संबंधित विभागों में फाईल बढ़ाना। पर, अपने इन अधिकारों से अधिकांश जनप्रतिनिधि या तो अवगत नहीं हैं या मानसिक रूप से कमजोर होने के कारण अपने क्षेत्र के लोगों की बात अपने बैठकों में ढंग से नहीं रख पाते हैं, सरकारी अधिकारियों के सामने रखना तो दूर की बात है। जनप्रतिनिधियों का अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी या संविधान प्रदत्त अधिकारों को इस्तेमाल न कर पाने की मानसिक कमजोरी लोकतंत्र को उत्तरोत्तर खोखला कर रही है। इनलोगों को चुनते समय आमजन ऐसी बातों को ध्यान में नहीं रख पाते हैं।

गैर रैयतों की पहचान का पुख्ता उपाय न होने के कारण वर्त्तमान में लाभ खेत मालिकों को मिलता है। ऐसे में वे आवेदन डालना भी उचित नहीं समझते।

उपरोक्त सभी समस्यायों का भुगतान किसानों को व्यक्तिगत हानि सहकर करना पड़ता है। बाकी लोग अपने पर आफत न जानकर अपने काम में लग जाते हैं। लेकिन जैसा ऊपर कहा गया है, ऐसी दुर्घटना किसी के साथ हो सकती है।

अतः यह जरूरी है कि -
1. सरकार क्षति का मुआवजा बढ़ाकर फसल के लागत मूल्य के बराबर करे तथा 33% जैसी सीमा हटाकर क्षति प्रतिशत के हिसाब से रैयतों एवं गैर रैयतों को मुआवजा दे
2. गैर रैयतों की पहचान के लिए उन्हें खेत मालिकों से एक कागज पर खाता-प्लॉट दर्जकर हस्ताक्षर करवाने के लिए हर साल प्रोत्साहित किया जाए। यह बहुत बड़ा मुद्दा है
3. जनप्रतिनिधियों द्वारा मुँहदेखी की समस्या देखते हुए मुआवजे के आवेदन के लिए फोटो खींचकर डालने का प्रावधान भी विकल्प हो
4. बिजली से क्षति होने पर, बिजली विभाग तथा पंचायत स्तर का कोई एक जनप्रतिनिधि वाला विशेषज्ञ समिति द्वारा जाँच कर आवेदन देने के, न कि जाँच रिपोर्ट के दिन से, 14 दिनों के अंदर मुआवजा दिया जाए। इस समय सीमा में जाँच रिपोर्ट के अभाव में आवेदक का दावा सही मानकर भुगतान कर दिया जाए
5. हार्वेस्टर, थ्रेसर, बेलर जैसे कृषि संयंत्रों  के साथ अग्निशामक यंत्र रखना कानूनी रूप से अनिवार्य हो तथा सभी वार्डों को भी यह यंत्र सरकार द्वारा दिया जाए और उपयोग का हर साल प्रशिक्षण भी दिया जाए
6. आमजनता जनप्रतिनिधियों को चुनते समय उनके मानसिक स्तर तथा उनके जनकार्य के पहल को ध्यान में रखें
7. गर्मी मौसम के शुरुवात में ही हर स्तर के जनप्रतिनिधियों को उनके क्षेत्र में आगलगी होने पर सरकार को सूचित करने और मुआवजा के लिए पहल करने के लिए नोटिस जारी कर प्रोत्साहित किया जाए।

~राहुल पटेल, ग्रामीण संघ एवं रामाशंकर सरकार, किसान महासंघ

Thursday, February 5, 2026

दृष्टिकोणों की विविधता

 3 जुलाई 2021 को फेसबुक पर लिखा लेख पुनर्प्रसारित

https://www.facebook.com/share/p/1bc9ojCXWB/


संलग्न फ़ोटो एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में आया था। परिवार मे इसको दिखाके हमलोग खूब हँसे। हंसते हंसते आंखों से आँसू आ गए। फिर मैंने इसको अन्य व्हाट्सएप्प ग्रुप में शेयर किया। अधिकांश से कोई प्रतिक्रिया नही मिली। तीन ग्रुप में "यह सब क्या है" जैसी लोगों की प्रतिक्रिया थी। यानी किसी को भी यह मजेदार नही लगी या फिर मेरे अभी तक के छवि के कारण लोगों को इसका मतलब समझ नही आया, जिसको out of context मुहावरे से भी समझा जा सकता है। हालाँकि शेयर करने का उद्देश्य मजे लेना ही था, पर, यह फ़ोटो हँसाने के अलावा और भी बहुत कुछ कहता है।


आप देख सकते हैं कि कैसे पहले कबूतर के उदाहरण से पैटर्न समझा गया है कि बाकी अक्षर में बूतर लगाना चाहिए और फिर ख से खबूतर आदि हो गया है। आप हँस सकते हैं, क्योंकि आप अब जान गए हैं कि ख से खरहा आदि होना चाहिए था। आप लिखने वाले पर हँसे इसलिए कि आपको यह बचकाना लगा और आगे की पढ़ाई के लिए यह गलत है भी। 


पर, क्या आपने नोटिस किया कि दोनों दृष्टिकोण सही हैं। कई मामलों में आगे की गतिविधियों के लिए आप पिछले गतिविधि से पैटर्न ही तो ढूँढते हैं और यह भी वही चीज था। अनेकों मामलों में हमारा दृष्टिकोण एक से ज्यादा हो, ऐसा विरला ही है। 


यह स्थिति हमारे लिए सही भी है और गलत भी है। सही इस मायने में कि हमारे सीखने की प्रक्रिया को यह एक stable/स्थायी दिशा देता है। गलत इस मायने में कि दृष्टिकोणों की विविधता में कमी के कारण नई चीजों में सफलता का प्रतिशत बहुत कम रहता है।


यह सब मैं अपने पढ़ाने और पढ़ने के अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ। अगर आप सोचते हैं कि इस फोटो में जो किया गया है, यह सोच सामान्य नही है तो आप गलतफहमी में है। यह सोच बहुत ही सामान्य है और दैनिक जीवन मे आप भी इस मानसिकता का खूब प्रयोग करते हैं। कई बार मैं झुँझलाहट में अपने विद्यार्थियों को इस तरह की गलतियों पर झिडकता हूँ कि  "आपको 4 x 3 = 12 बता दिया जाएगा और फिर 5 x 6 पूछा जाएगा तो भी आप 12 ही कहेंगे? आपको गुना का प्रोसेस बताया जा रहा है न कि दो संख्यायों का गुना 12 होता है यह बताया जा रहा है?" कुछ लोगों के लिए मैं यहाँ पर स्पष्ट कर दूँ विद्यार्थियों द्वारा की गई गलती क, ख, ग या फिर 4 x 3 वाली नही होती, बल्कि गणित, विज्ञान के विषयों में कोई एक चीज बताने पर वे अन्य चीजों में भी वही बताई चीज को इस्तेमाल करने लगते हैं। यानी वे पैटर्न ढूँढते हैं। और इस पर मैं क्रोधित होकर ऊपर वाली झिड़की देता हूँ। तो आप समझ गए होंगे कि यह सामान्य है और किसी चीज को देखने का एक और दृष्टिकोण है।


हाइस्कूल में पढ़ने के दौरान एक बार भूगोल शिक्षक नक्शे पर उत्तर दक्षिण समझा रहे थे। नही समझ पाने की सजा चुतर पर दो बेंत लगा कर टेबल पर उत्तर की ओर मुँह करके लेटा कर दी गयी। मैं समझ नही पाया कि नक़्शे में उत्तर ऊपर की ओर ही क्यों है, जबकि उत्तर, पूर्व, पश्चिम तो ऊपर नीचे होता नही है। शिक्षक मेरे दृष्टिकोण को समझ नही पाए पर उसका खामियाजा भी मुझे ही भुगतना पड़ा। अब मुझे लगता है कि बहुत बार शिक्षक अलग अलग दृष्टिकोणों को समझते और विद्यार्थियों को उस हिसाब से बताते तो शिक्षा से अरुचि की आम समस्या हल की जा सकती थी।


एक बार बचपन मे मैं अपने मौसी के यहाँ गया था। बहन ने टोका की मैंने मोजा उल्टा पहन रखा है। मैं बार बार कभी उनकी ओर, कभी मोजे की ओर देख रहा था कि मोजे तो सही पहन रखे हैं। उल्टा का मतलब मोजे inside out पहनना, पर मैंने ठीक ही पहना था। मेरे आश्चर्य पर बाकी लोग बहुत हँसे। कुछ देर में उन्होंने बताया कि मैंने बाया वाला दाहिने में और दाहिने वाला बाएं में पहन रखा है। यह भी उल्टा ही हुआ। वस्तुतः शब्दों का टोटा होना हमारे भाषा की कमी है। हँसने वालों से चूक हुई कि वो मेरा दृष्टिकोण नही देख पाए और मुझसे चूक हुई कि मैं उनका दृष्टिकोण नही देख पाया।


इन उदाहरणों से अब आपको समझ मे आना चाहिए कि दृष्टिकोणों की विविधता को हमलोगों को स्वीकार करने की, बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इसके उलट वाले को ही लकीर का फ़क़ीर कहा जाता है। आप लोगों को out of box का मतलब भी समझ मे आना चाहिए कि क्यों context सेट हो जाने पर आप tunnel vision के शिकार हो जाते हैं।


फोटो के मजे लीजिए।



Tuesday, September 9, 2025

किचन गार्डन का भारतीय संस्कृति में कांसेप्ट और इसका आर्थिक महत्व

झारखण्ड जाने के क्रम में वासुदेव उर्फ चेतलाल महतो, मैं और कृष्णा महतो। ये दोनों कुड़मी हैं। साथ में एक मुंडा भी थे। पता चला कि कृष्णा जी विंग कमांडर ज्ञानेंद्र सिंह के गाँव के हैं और एच. एन. सिंह को भी दोनों जानते हैं और JLKM पार्टी से जुड़े हैं। बात जनजातियों के रीति रिवाज पर उभरी। चेतलाल महतो ने कुड़मियों के किचन गार्डन के कांसेप्ट को समझाया। उनके अनुसार प्रत्येक कुड़मी परिवार में एक छोटा सा प्लाट रहेगा, जिसमें मुनगा/सहजन/drumstick, कुंदरू का लत्तर, प्याज, लहसुन, बकरी, मुर्गियाँ आदि जरूर रहेंगे। अन्य शाक सब्जी भी मौसम के अनुसार उगाए जाते हैं। कुँवा भी रहता है। यह सालों भर उनकी जरूरतों को पूरा करता है। वस्तुतः यह बिहार में भी कुर्मियों के खड़ के रूप में रहता था। कृष्णा जी ने बताया कि उनकी मैडम को 30 सालों से इन चीजों के लिए बाजार नहीं जाना पड़ा। पर, ये चीजें बिहार में बँटवारों के कारण समाप्त हो रही हैं। खेतों में मुख्यतः धान और गेहूँ उपजाया जाता है। जिससे बाकी सारी चीजें जैसे दाल, मसाला, तोरी, तीसी, प्याज, लहसुन, माँस, दूध सब खरीदना पड़ रहा है। यदि आप नेट क्रेता और नेट विक्रेता के नफे नुकसान को समझते हैं तो आप समझ सकते हैं कि कैसे किसान जातियाँ धीरे धीरे नुकसान में जा रही हैं। जो शादी, इलाज या पढ़ाई के दैरान खेत बेचने के रूप में दिखाई पड़ता है। खेती में यंत्रों की मदद लेना भी किसानों को नेट क्रेता हीं बनाता है। सरकार द्वारा लाये गए मुख्यतः इन दोनों फसलों के उन्नत बीज, खाद, कीटनाशक से अधिक उपज यानी हरित क्रांति की देन है किसान जातियाँ इन दोनों फसलों के चक्कर मे पड़ीं। किसानों के लिए ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर मे पड़ना इन्हीं दोनों फसलों को अपनाना हुआ। इनकी अधिकता ने इनके मार्किट prices क्रैश कराए। दलहन तेलहन से हाथ खींचने के पीछे कुछ हाथ वन्य जीवों का रहा। यह सरकारी नीतियों का परिणाम था। उपरोक्त दोनों फसलों का मार्किट में दाम एमएसपी द्वारा निर्धारित होना सरकारी नीतियों का परिणाम है। 6% फसलों का एमएसपी पर सरकारी खरीद एक क्रिमिनालिटी है। जब सरकार स्वयं कहती है कि एमएसपी वह मूल्य है, जिसके नीचे फसलों की खरीद घाटे का सौदा है तो सरकार न केवल 6%  फसलों को बिना लाभ दिए किसानों से खरीद रही है, वरन बाकी 94% फसलों के लिए मार्किट रेट तय कर रही है, जो एमएसपी से लगभग मामलों में नीचे ही रहती है।

आप समझ सकते हैं कि किसानी घाटे का सौदा क्यों है? और किचन गार्डन का कांसेप्ट किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्यों है? आपके पास जमीन नहीं है, छत पर उगाईये। हर वो उपाय कीजिये जिससे बाजार पर आपकी निर्भरता कम होती हो या कम से कम लेन देन में बीच में मुद्रा न आती हो। मुद्रा की पिवोटिंग हमलोगों के लिए अभिशाप है।



Friday, August 22, 2025

प्लिनी द एल्डर के भारतीय विवरण की विसंगतियाँ

Book 6, chap 19 (17) ― The nation's of Scythia and the countries on the eastern ocean 

"He adds also, that under the direction of Pompey, it was ascertained that it is seven days' journey from India to the river Icarus, in the country of the Bactri, which discharges itself into the Oxus, and that the merchandize of India being conveyed from it through the Caspian Sea into the Cyrus, may be brought by land to Phasis in Pontus, in five days at most. There are numerous islands throughout the whole of the Caspian sea: the only one that is well known is that of Tazata."


Analysis:-

1. "The question of finding a route between the Oxus valley and India has been of concern historically. A direct route crosses extremely high mountain passes in the Hindu Kush and isolated areas like Kafiristan. Some in Britain feared that the Empire of Russia, which at the time wielded great influence over the Oxus area, would overcome these obstacles and find a suitable route through which to invade British India – but this never came to pass.[29]"

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Amu_Darya

2. "A direct trade route from Kashmir through the historical region of Bactria (modern-day northern Afghanistan and surrounding areas) did not exist in the way one might imagine, as Kashmir's primary connections to Central Asia were over high Himalayan passes, notably via the <Karakoram and <Zoji La passes to Ladakh and then towards Yarkand, not directly through the geographical region of Bactria. However, Kashmir was a key node on the larger Silk Road network, which extended into Central Asia and regions beyond, including areas that were once part of Bactria. Goods from Central Asia, such as Bukharan silks and Russian-made cottons, would enter Kashmiri markets via this extended network, while Kashmiri goods like textiles were sent eastwards along the Silk Road."

The only tributary on left bank is Panj. River Icarus is unknown. From above two, it shall be clear that it is not possible even now to cross merchandise from india to river oxus, forget about it being done in 7 days.


Tuesday, August 12, 2025

भारत में गाय का इतिहास

 #समाज #आदिकिसान #गाय

गाय हमारी माता है, हमको कुछ नही आता है



कूड़ा कचरा, गू खाने वाला अधीर, ढीढ़ार, अविवेकी जानवर भी, हम अवर्णों (जाति व्यवस्था वाले लोग) द्वारा पूजा जाता है


जावा मूल के इस जानवर का मूत भी, हिंदुओं (वर्ण व्यवस्था वाले लोग) द्वारा माथे लगाया जाता है


बैल जिनका बाप है, मूल उनका थाईलैंड के पास है


हम अवर्णों के लिए, गाय एक जानवर मात्र है।


~कवि अंजान


"However, little is known about Asian cattle, which are predominantly Bos indicus. Recently, a worldwide study of bovines including Asian Bos indicus breeds from India, Pakistan, China and Indonesia showed evidence of Bos javanicus ancestry that contributes to Asian bovine diversity (Decker et al., 2014). However, no one has yet investigated the ancestry of Thai cattle, and the domestication of bovine in Southeast Asia is poorly understood (Larson & Fuller, 2014). Therefore, to address this question, further study of Asian Bos indicus breeds is needed.


Cattle native to Thailand (excluding recently introduced European breeds) have Bos indicus traits, including the distinctive dorsal hump."


https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4627918/


पहली बार 4 मई, 2023 में फेसबुक पर प्रकाशित

https://www.facebook.com/share/p/17Apicdiaw/


वस्तुतः गाय अफ्रीकी मूल की हैं। विश्व व्यापार के 6 ईस्ट और 6 वेस्ट इंडिया कंपनियों के अभियानों के दौरान यूरोपियन कोलोनियल शक्तियों ने अपनी भूख मिटाने के लिए गाय को सबसे सुलभ और पौष्टिक संसाधन के रूप में अपनाया। देश में गाय इन कोलोनियल शक्तियों की देन हैं। इनका इतिहास भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में इतना ही पुराना है। पर, यूरोपियन के साथ साथ घूम रहे ब्राह्मणों की ब्राह्मणी संस्कृति की देन है कि हमारे लोग इसे पूज्यनीय, इसके लिए जान देने, गौसेवा जैसी भावनाओं से ओतप्रोत हैं। इसमें देवी देवताओं का वास (ऊँटों, हाथियों में भी अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों में) सिल्क ट्रेड रूट की कहानियाँ हैं और धर्म-धंधा के साँठ गाँठ की द्योतक हैं।

~ राहुल पटेल

Monday, August 4, 2025

भारत में मूर्त्ति बनाने वाले लोग कौन?

#आदिकिसान #lookeast #adikisan

पुराने मंदिरों या किसी ऐतिहासिक स्थलों पर मूर्त्तियों का पाया जाना, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में मूर्त्तियों का सर्वथा अभाव और मूर्त्ति बनाने वालों का सर्वथा अभाव यह बताता है कि मूर्त्ति वाले लोग दूसरे लोग थे। जो भी धार्मिकता है, लोग पहले मिट्टी के पिंड या प्राकृतिक रूप से मिले गोल मटोल पत्थरों और पिछले 50 वर्षों में तस्वीरों से ही काम चलाते रहे हैं। यही कारण है कि आपको शोखा बाबा या ऐसे ही कोई कुल या ग्राम देवता हर गाँव, हर घर में मिल जाएंगे। बाद में बहुतायत में शिव, हनुमान का पूजन शुरू हुआ। 'बाद में' का सबूत ग्राम देवताओं की अपेक्षा इनकी संख्या में काफी कमी है। शिव का प्रचलन बौद्धों के मनौती स्तूपों से आई है। हनुमान का प्रचलन भी बौद्ध कथाओं के किसी पात्र से आई है। लेकिन आपको आज भी राम, श्याम, विष्णु, सीता, पपीता की मूर्त्ति या मंदिर 50 km के दायरे में भी कम ही दिखते हैं। पिछले कुछ सौ सालों में इनके बारे में लोगों ने केवल रामलीला, भजन, पोथियों, बाद में टीवी धारावाहिकों आदि के माध्यम से ही सुना और बोलना सीखा। जो सीधा सबूत है कि ये पिछले कुछ सौ वर्षों में भारतीय भौगोलिक क्षेत्रों में आये।

यहाँ दो चीजें ध्यान देने लायक है-
1. मूर्त्ति की संस्कृति का अभाव
2. किसी देवी देवता के पूजा स्थल की सर्वव्यापकता

~राहुल पटेल

Wednesday, July 30, 2025

भारत में पंडित कहाँ से?

#adikisan #lookeast #आदिकिसान 

दर्ज़ी का काम एक बहुत बड़ा आर्ट है। 

भारत में इस आर्ट को मुसलमानों ने अपने उरूज पर पहुँचाया।  'सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा...' लिखने वाले कवि अल्लामा इक़बाल जो कश्मीरी पंडित थे, उनके वालिद भी दर्ज़ी का काम किया करते थे।

काश्मीर में पंडित कहाँ से आये? 'सारे जहाँ से अच्छा...' कविता में इक़बाल लिखते हैं:-

"ऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ को

उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा"

ये लोग चटगाँव पोर्ट से आने वाले पूरबिया लोग थे। इंडोनेशिया आपकी नजर में मुस्लिम देश होगा, पर, वे गणेश, रामायण आदि को अपनी संस्कृति मानते हैं। हिन्दू मुस्लिम आप जैसे 200 साल पुराने हिंदुओं के लिए भावनात्मक बातें होंगी, उनके लिए इन दोनों में तारतम्यता है। ये पंडित बंगाल से चलकर कश्मीर तक कैसे चले गए? द ग्रेट त्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे के दौरान भारतीय भौगोलिक क्षेत्रों में अँग्रेजों को वैसे लोगों की जरूरत थी जो स्वयं ही रूटलेस हों। अँग्रेज ऐसे लोगों को स्थानीय जासूस, कुली, नौकर, खानसामा, कर्मचारी यानी हर तरह से रोजगार देते थे। स्थानीय कबीले अँग्रेजों के मनमाफिक नहीं थे। इसतरह से दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आये ये लोग अँग्रेजों के साथ पूरे भारत में फैले। जो जाति समूह पूरे देश में हर जगह हर गाँव में मिलते हैं, वे सभी दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आये लोग हैं। अन्य कबीलाई बिरादरियाँ पॉकेट्स में मिलती है।

काश्मीर से पंडितों को भगाए जाने, इनको केन्द्र सरकार द्वारा वापस काश्मीर में बसने का विकल्प देने पर भी इनका वहाँ वापस न जाना इनके वहाँ के बाशिंदा नहीं होने की ओर इशारा करता है। इन्हें रुपया से मतलब है। काश्मीर से भागकर आने के बाद पंडितों द्वारा चालित सरकार ने इन्हें दिल्ली में शरणार्थी के तौर पर बसाया। तर्क यह था कि ये लोग काश्मीर वापस चले जायेंगे। लेकिन दिल्ली से बाकी लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाकर वापस भेजा जा रहा है, वैसा बर्त्ताव काश्मीरी पंडितों के साथ नहीं किया जा सकता। ये दामाद हैं। ये जिस तरह से दिल्ली के जमीन और व्यवसाय पर काबिज हो गए हैं, छोड़कर वापस काश्मीर वापस भी नहीं जायेंगे। अब तो सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए काश्मीर के रियल एस्टेट में भी इनका हिस्सा है।

खैर आपका ध्यान काश्मीरी पंडितों की ओर दिलाना नहीं था, पंडितों के मूल देश की ओर दिलाना था। हाँ, इनमें हर रंग रूप, कद काठी के लोग मिलना यह बताता है कि जब एक समूह दूसरे समूह(अँग्रेज) के साथ पराश्रित की तरह रहता आया हो तो डिक्शनरी चाइल्ड वाली परिस्थिति पैदा होना लाजिमी है।


~ राहुल पटेल