सरकारों की अदूरदर्शिता तथा किसानों के साथ पक्षपात, बुलेटिन - 1
प्रत्येक वर्ष गर्मियों में किसानों के फसलों में आग लग जाती है। इसी साल अप्रैल, 2026 में बिहार के गया जिला में 1000 बीघा, पटना जिला में 300 बीघा और रोहतास जिला में 500 बीघा गेहूँ में आग लगी है। 5-10 बीघा की घटनाएँ तो अनगिनत है। इसके ठीक एक सप्ताह पहले अकेले बक्सर और आसपास के क्षेत्रों में लगभग 700 आगलगी की घटनाएँ हुई हैं। बहुत सारी ऐसी घटनाएँ तो दर्ज भी नहीं हो पातीं। किसानों की एकमात्र पूँजी फसल है। इसी से साल भर का अनाज, बच्चों का फीस, डॉक्टर का फीस और दवा तथा बाकी खर्चों का इंतेजाम होता है। किसी साल फसल मार खा जाती है तो किसानों की हालत खराब हो जाती है। कर्जा-उधार का सहारा लेना पड़ता है। सोचिए जरा, उन परिवारों के बारे में, जिनकी खड़ी फसलें आग लगने से बर्बाद हो जाती हैं। वह परिवार आपका भी हो सकता है। दुर्घटना पूछ कर नहीं आती है।
ये आग कभी बिजली के तारों से(65% मामलों में), कभी हार्वेस्टर, थ्रेसर जैसे कृषि संयंत्रों से, कभी व्यक्तिगत गलती से आग लग सकती हैं। गर्मी के मौसम में जब फसल पक कर ठनठनाया रहता है, बाकी घास-पौधे भी सूखे रहते हैं, जमीन में नमी और बधार में पानी गायब रहता है तो ऐसी दुर्घटनाओं के लिए एकदम अनुकूल माहौल रहता है। दमकल दूर कहीं जिला मुख्यालय से आना रहता है। ऐसे में आग बुझाने का तुरंत उपाय कुछ भी नहीं होता है। लोग झाड़ियों से, डंडों से, संभवतः बाल्टी से पानी डालकर आग बुझाने की कोशिश करते हैं। पर, इनसे बहुत छोटी आग ही बुझाई जा सकती है। छोटी आग तभी संभव है, जब लोग समय रहते आग लगने की घटना जान जायें और हवा का बहाव तेज न हो। दुर्भाग्यवश गर्मी में हवा अक्सर तेज रहता है तथा लोग समय से जान नहीं पाते हैं।
बिहार में, आग से 33% से अधिक क्षति होने पर ही एक छोटी सी राशि का मुआवजा मिलता है। सिंचित क्षेत्रों के लिए 4250/- प्रति बीघा और असिंचित क्षेत्रों के लिए 2125/- मुआवजा है। तुलनात्मक रूप से पंजाब में 25% से अधिक क्षति होने पर 6175/- और 75% से अधिक क्षति होने पर 12350/- प्रति बीघा है। कोढ़ में खाज यह कि खेती का लागत खर्च हर साल बढ़ रहा है, लेकिन क्षतिपूर्ति शायद दशकों में बढ़ता है। इस छोटी सी राशि के लिए भी किसानों को एड़ियाँ रगड़नी पड़ती हैं। उचित यह होता कि क्षति के हिसाब से फसल का लागत मूल्य (MSP ही लागत मूल्य है) मिलता। जैसे - इस साल बिहार में गेहूँ का MSP 2585/- प्रति क्विंटल है। एक बीघा में करीब 10 क्विंटल गेहूँ पैदावार होता है। इस हिसाब से 100% क्षति होने पर 25850/- या क्षति प्रतिशत के हिसाब से मुआवजा मिलना चाहिए।
वर्त्तमान में, खेत में खड़े होकर किसान द्वारा फ़ोटो खिंचवाकर क्षतिपूर्ति का आवेदन डालने का प्रावधान समाप्त कर जनप्रतिनिधियों के शपथ पत्र पर आवेदन डालने का नियम है। आज चुनावी प्रक्रिया की देन है कि जनप्रतिनिधि मुँह ताककर लोगों का काम करते हैं या ऐसे कामों में हाथ डालने से डरते हैं या हिचकिचाते हैं कि अधिकारी सब बात नहीं सुनता है। जबकि आकस्मिक बैठक बुलाकर इस उद्देश्य का प्रस्ताव पारित करना उनके अधिकार में है। प्रस्ताव का समर्थन या विरोध उनके जैसे ही दूसरे जनप्रतिनिधियों को करना होता है। BDO, DDC जैसे सरकारी अधिकारी ऐसी बैठकों में सचिव की हैसियत से रहते हैं, जिनका काम है, पारित प्रस्तावों को दर्ज कर संबंधित विभागों में फाईल बढ़ाना। पर, अपने इन अधिकारों से अधिकांश जनप्रतिनिधि या तो अवगत नहीं हैं या मानसिक रूप से कमजोर होने के कारण अपने क्षेत्र के लोगों की बात अपने बैठकों में ढंग से नहीं रख पाते हैं, सरकारी अधिकारियों के सामने रखना तो दूर की बात है। जनप्रतिनिधियों का अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी या संविधान प्रदत्त अधिकारों को इस्तेमाल न कर पाने की मानसिक कमजोरी लोकतंत्र को उत्तरोत्तर खोखला कर रही है। इनलोगों को चुनते समय आमजन ऐसी बातों को ध्यान में नहीं रख पाते हैं।
गैर रैयतों की पहचान का पुख्ता उपाय न होने के कारण वर्त्तमान में लाभ खेत मालिकों को मिलता है। ऐसे में वे आवेदन डालना भी उचित नहीं समझते।
उपरोक्त सभी समस्यायों का भुगतान किसानों को व्यक्तिगत हानि सहकर करना पड़ता है। बाकी लोग अपने पर आफत न जानकर अपने काम में लग जाते हैं। लेकिन जैसा ऊपर कहा गया है, ऐसी दुर्घटना किसी के साथ हो सकती है।
अतः यह जरूरी है कि -1. सरकार क्षति का मुआवजा बढ़ाकर फसल के लागत मूल्य के बराबर करे तथा 33% जैसी सीमा हटाकर क्षति प्रतिशत के हिसाब से रैयतों एवं गैर रैयतों को मुआवजा दे
2. गैर रैयतों की पहचान के लिए उन्हें खेत मालिकों से एक कागज पर खाता-प्लॉट दर्जकर हस्ताक्षर करवाने के लिए हर साल प्रोत्साहित किया जाए। यह बहुत बड़ा मुद्दा है
3. जनप्रतिनिधियों द्वारा मुँहदेखी की समस्या देखते हुए मुआवजे के आवेदन के लिए फोटो खींचकर डालने का प्रावधान भी विकल्प हो
4. बिजली से क्षति होने पर, बिजली विभाग तथा पंचायत स्तर का कोई एक जनप्रतिनिधि वाला विशेषज्ञ समिति द्वारा जाँच कर आवेदन देने के, न कि जाँच रिपोर्ट के दिन से, 14 दिनों के अंदर मुआवजा दिया जाए। इस समय सीमा में जाँच रिपोर्ट के अभाव में आवेदक का दावा सही मानकर भुगतान कर दिया जाए
5. हार्वेस्टर, थ्रेसर, बेलर जैसे कृषि संयंत्रों के साथ अग्निशामक यंत्र रखना कानूनी रूप से अनिवार्य हो तथा सभी वार्डों को भी यह यंत्र सरकार द्वारा दिया जाए और उपयोग का हर साल प्रशिक्षण भी दिया जाए
6. आमजनता जनप्रतिनिधियों को चुनते समय उनके मानसिक स्तर तथा उनके जनकार्य के पहल को ध्यान में रखें
7. गर्मी मौसम के शुरुवात में ही हर स्तर के जनप्रतिनिधियों को उनके क्षेत्र में आगलगी होने पर सरकार को सूचित करने और मुआवजा के लिए पहल करने के लिए नोटिस जारी कर प्रोत्साहित किया जाए।
~राहुल पटेल, ग्रामीण संघ एवं रामाशंकर सरकार, किसान महासंघ
.jpeg)
