#आदिकिसान #समाज #concepts
कुछ दिनों के लिए मुझे इतिहासकारों(शिक्षा या प्रोफेशन से नही, पर उनमे से कुछ लोग इतिहास पर एक से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं) के एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में रहने का मौका मिला। ग्रुप का उद्देश्य था कि इतिहास को नए सिरे से लिखना।
नही! यह सनातनियों का ग्रुप नही था। जिसके वो सदस्य, जिनका काम केवल गंदे नाली से बॉल निकालने भर का रहता है, सबसे ज्यादा हल्ला करते हैं, कभी कभी क्रिमिनालिटी के हद तक।
ग्रुप अभी नया नया बना था। मैं सब भूतकाल में लिख रहा हूँ, क्योंकि ग्रुप से बाहर आ गया हूँ। ग्रुप अभी है और उम्मीद है कि यह एकाध सदी तक रहेगा।
*उस ग्रुप के मेरे अनुभवों के माध्यम से मैं सोचने के कुछ तरीको पर प्रकाश डालना चाहता हूँ:-*
1. एक सदस्य(शायद अध्यक्ष या संचालक या संयोजक घोषित किये गए थे, मुझे ठीक से याद नही। मैं इस लेख के प्रसंग में संयोजक कह लेता हूँ) ने समय को कालखण्ड में बाँटकर इतिहास लिखने का ब्लूप्रिंट तैयार किया। जिनमे से से कुछ राजा लोगों के कालखण्ड भी शामिल थे। मैंने वेबिनार में आपत्ति जताई कि जब इतिहास में क्या हुआ है, क्या नही, यह हमलोग नए सिरे से खोजने निकले हैं तो ग्रुप में यह आप अपनी तरफ से पूर्वाग्रह क्यों डाल रहे हैं? आपके ऐसा करने से बाकी सदस्य निश्चित रूप से इसी दिशा में सोचना शुरू कर देंगे। उचित यह होता कि पहले ऐसे ही विमर्श हो और जो इतिहास की नई तस्वीर उभर कर आये, उसको कालखण्ड में बाँटा जाए या जैसे करना हो किया जाए। पर, वे पूरे ग्रुप को वेबिनार में भी और बाद में व्हाट्सएप्प ग्रुप में भी एक से ज्यादा बार समझाते रहे कि कितनी मेहनत से उन्होंने यह कालखण्ड तैयार किया है और यह ब्लूप्रिंट कोई थोपा नही जा रहा है। इसको बदला जा सकता है।
मैं अपनी बात रख रहा था कि ऐसा नही होता है। जब एकबार आप एक खाका खींच देंगे तो ऐसा तभी होगा कि कोई कुछ अलग सोच पाये, जब कोई विषय वस्तु पर एकदम 180० अलग नजरिया रखता हो। अधिकांशतः उसी में थोड़ा बहुत आगे पीछे करके समूह उसी दिशा में आगे बढ़ेगा। खैर बात बनी नही।
यह अत्यंत स्वाभाविक है कि किसी समस्या का समाधान करने के लिए हमलोग एक मानसिक सीमा(mental boundary) तय करते हैं(यहीं से thinking out of the box आया है), क्योंकि बिना इसके चीजें लिक्विड स्टेट में रहती हैं, जो असहजता और भटकाव पैदा करती हैं। यह बात अलग है कि समस्या सीमा से बाहर हो या आंशिक रूप से ही अंदर हो तो समाधान के सही होने पर ग्रहण लग जाता है। यह भी स्वाभाविक है कि दुर्लभ अपवाद के साथ अधिकांश लोग किसी चीज के मौलिक पड़ताल में आलसी होते हैं। यदि कोई जानकारी उन्हें कहीं से मिलती हो तो उसे लेना आसान है, बनिस्पत कि स्वयं ही पहल किया जाए। इन दोनों स्वभाव के चलते इसकी संभावना अत्यंत कम हो जाती है कि सुझाये गए ब्लूप्रिंट से कुछ अलग हो। यह Nudge करना हुआ। आखिर संयोजक महोदय पर वर्गीकरण का compulsion तो नही था। वे चाहते तो ऐसा नही भी कर सकते थे। एक अन्य सदस्य ने महज सुझाव ही तो दिया था(Nudge किया था) और वे स्वयं को इस हद तक समय के कालखण्ड तय करने के लिए जिम्मेवार मानने लगें कि बजाय यह सोचने के कि इसकी जरूरत थी भी कि नही, वे अपने महती प्रयास को समूह के सामने बार बार लाते रहे। यह वही Nudge है, जब देश की जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम के लिए संजय गाँधी के उपाय बदनाम होने लगे तो WHO ने भारत सरकार को ऐसे हिटलरी उपायों के बजाय लोगों को उस दिशा में Nudge करने के लिए सर्वव्यापी 'हम दो, हमारे दो' का नारा, अखबारों, tv चैनेलों पर इसपर विचार विमर्श के कार्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया, जिसका अत्यंत व्यापक प्रभाव पड़ा। लोगों ने सहजता से स्वीकार भी किया। भारत के स्थानीय जनता को चाहे वो कोई भी रीति रिवाज,संस्कृति अपनाते हो, उनको स्वयं को हिन्दू के खाँचे में वर्गीकृत करने के लिए अँग्रेजों के समय से आजतक Nudge ही किया जा रहा है। नतीजा हम सबके सामने है अब हमारी वाली पीढ़ी यह तर्क देती है कि तुम यदि हिन्दू नही हो तो फार्म में धर्म वाले कॉलम में क्या भरते हो? वे यह सोचते ही नही कि यह कॉलम ही Nudge है। वे यह नोटिस नही करते कि यह अनिवार्य कॉलम नही होता और न ही इस सूचना को सरकार कहीं रिकॉर्ड करती है। पूरा बहुजनवाद इसी Nudge पर खड़ा है कि तुम जब ब्राम्हण, वैश्य, क्षत्रिय नही हो तो तुम क्या हो? तुम शुद्र हो। गोया स्वयं को एक काल्पनिक वर्ण के खाँचे में रखना जरूरी है, क्योंकि यह हिंदुओं के धार्मिक किताबों में है। स्पष्ट है कि बहुजनवाद के प्रवर्तक स्वयं हिंदुओं के ठेकेदार हैं और किसान कामगार जातियों को, जो पिछले 100-200 सालों से ही हिन्दू बने हैं, शुद्र या क्षत्रिय के झमेले में डालकर उससे बाहर सोचने से रोक रहे हैं। हर तरह का प्रोपेगंडा Nudge है। यह आपके जीवन मे सर्वव्यापी है। इसे पहचानने की जरूरत है।
इसप्रकार से संयोजक महोदय जाने अनजाने समूह को Nudge कर रहे थे। जोकि भारत मे राजा सैनिक वाले कथानक/narrative को पहले से ही होना मानकर चलना है। यह पूर्वाग्रह है। पूर्वाग्रह क्या होता है और यह कैसे सोच को प्रभावित करता है। यह अपने आप मे ही विशद विषय है। इसके अलावा यह comprehension की भी समस्या थी
2. वेबिनार के अगले दिन, ग्रुप में इसी संदर्भ में एक सदस्य ने इसपर टिप्पणी की कि ब्लूप्रिंट पर आपत्ति करनेवाला यदि अपना ब्लूप्रिंट नही देता तो वह अपरिपक्व और अव्यवहारिक व्यक्ति है, जो कि मैं था। वे वेबिनार में शामिल नही थे। इसलिए वे यह नही जानते थे कि मैंने यह कहा था कि अभी कुछ समय तक ऐसे ही विमर्श चलने दीजिये और कालांतर में जो समझ उभरेगी तो हमलोग कोई खाँचा पर काम करेंगे। यही वैकल्पिक ब्लूप्रिंट था। यह सब न जानते हुए भी उन्होंने टिप्पणी की। यह एक स्वाभाविक चीज है जो हम सभी गाहे बगाहे स्वयं करते हैं या इसका सामना करते हैं। यदि कोई बात रखी जायेगी और श्रोता को मौका मिले तो वह अपनी समझ जरूर प्रस्तुत करेगा। वह इसका compulsion महसूस करता है। जबकि बिना संदर्भ के उस बात को सही से समझने की संभावना नही भी हो सकती है। आपका कोई दोस्त कुछ समस्या बताये तो आप प्रतिक्रिया जरूर देते हैं। जबकि प्रतिक्रिया के pre-mature होने की संभावना है। ब्याही बेटी यदि माँ से अपने परिवार की कोई बात कहे तो माँ उसको जरूर कोई उपाय सुझाएगी, जो कि बहुत बार उटपटांग हो जाता है और नए परिवार में केतु अनुभव पैदा करता है। शिकायत करने वाला तो मामले को अपने तरीके से बताएगा ही। पूरा न्यायतंत्र इसी पर कायम है कि दोनों पक्षो को सुना जाए और बातों को तौल कर न्याय किया जाए। यही प्रतिक्रिया है कि 'बिना माँगे सलाह' या किसी बीमारी का नुस्खा या वैसे भी किसी समस्या का समाधान पूरी दुनिया मे आसानी से उपलब्ध है। यह परिस्थिति के अनुसार सही गलत हो सकता है। इसे पहचानने की जरूरत है
3. इस वाकये से भी मजेदार बात यह थी कि कुछ दूसरे सदस्य जो वेबिनार में शामिल थे वे भी मुझसे वैकल्पिक ब्लूप्रिंट की माँग कर रहे थे अन्यथा विवाद न बढ़ाने का सलाह दे रहे थे। मेरे स्पष्ट रूप से विकल्प देने के बावजूद उनके मन मे ब्लूप्रिंट की जो छवि बनी हुई थी, मेरा विकल्प उसके अनुरूप न होने के कारण वे इसको comprehend नही कर पाए। यह selective approach पूर्वाग्रहों के कारण आता है। जहाँ आपको सामने लिखी/कही बात भी सुनाई नही पड़ती। मेरे एक बड़े भाई सेवानिवृत प्रधानाध्यापक हैं। मैंने कई बार यह नोटिस किया था कि कुछ पढ़ना हो तो कुछ शब्दों को miss कर देते थे और कुछ शब्दों के जगह अपने शब्द लगाकर पढ़ते थे। एकदिन मैंने उनको यह बात बताई तो वे नाराज हो गए और कहने लगे कि नजर कमजोर होने के कारण ऐसा हो रहा है। मैंने उन्हें समझाया कि अगर ऐसा होता तो उन्हें सभी शब्दों में कठिनाईयाँ होतीं। selective क्यों? वे खासकर संबंधवाचक शब्दों में ज्यादा गलतियाँ करते थे। मेरा कहना था कि बात दरअसल यह है कि वाक्य पढ़ते समय आपके दिमाग मे है कि आगे ऐसा शब्द आएगा(अपेक्षा, पूर्वाग्रह) और वहाँ पर कुछ दूसरा शब्द आने के बावजूद आप अपनी reality गढ़ रहे हैं। इसपर वे और नाराज हो गए। तो, पूर्वाग्रह के कारण comprehension में selective approach से समस्या को पहचानने की जरूरत है
4. क्रमशः ग्रुप में एक सदस्य ने समसवारों पर एक लेख लिखा। जिसमे उन्होंने खत्तीय, राजा सैनिक, कुर्मियों के नदी किनारे ही बसना आदि 11 शब्द/शब्दावली प्रयोग किये, जिसको मैंने उद्धरित करते हुए लिखा कि इन सभी पर विमर्श करना चाहूँगा, लेकिन अनेकों दिन लग सकते हैं। मैंने यह भी कहा कि हमलोगों को सुनी सुनाई बातों/साहित्य या इतिहास की किताबों, जो कि 99% मामलों में महज मूल किताब की नकल रहती हैं, से सीधे सीधे quote करने के बजाय अनेकों भिन्न स्रोतों से पड़ताल करने चाहिए। क्या सही हो सकता है और किस चीज के मनगढ़ंत होने की संभावना है, इसपर विचार कर ही शब्दों/कथानकों को अपनाना चाहिए। उन स्रोतों का सहारा लेने की मजबूरी यह है कि हमलोग समय मे पीछे नही लौट सकते।
मेरा मानना है कि हरेक गैर सामान्य शब्द/शब्दावली का महत्व है। वह किसी कथानक को ध्वस्त कर सकता है या आगे बढ़ा सकता है तो नए सिरे से इतिहास लिखने वाले ऐसे ग्रुप में इस चीज का महत्व और भी बढ़ जाता है कि आप हर गैर सामान्य शब्द को नाप तौल कर लिखें और challange किये जाने पर उनको साक्ष्यों से प्रमाणित करें। होना यह चाहिए।
पर, मेरी बात पर ये सदस्य अत्यंत ही क्रोधित हुए। उनका कहना था कि उनका लेख उनके अपने विचार थे। कहीं किसी किताब से नही लिया गया था। मैं उनकी मौलिकता पर सवाल खड़ा कर रहा हूँ और मुझे माफी माँगनी चाहिए और भी अन्य क्रोधित बातें।
विमर्श को दिशा देने के लिए मैंने खत्तीय, जिसका अर्थ वे खेत का मालिक बता रहे थे, पर उनके मौलिक विचार जानने चाहे। वे और क्रोधित हुए। तो मैंने चंद वाक्यों में अपना विचार रखा कि खत्तीय क्षत्रिय से कैसे आया है और दिखाया कि इसीतरह से वे भी अपने मौलिक विचार रख सकते थे। पर अब इतना ही बता दें कि खत्तीय पर आपके विचार मौलिक थे या नही। मेरा अभिप्राय स्पष्ट था कि सभी किसी न किसी स्रोत/स्रोतों से ही जानकारियाँ इकट्ठा करते हैं। पर, उसके बाद केवल अच्छा लगने या नवीनता के आधार पर शब्द को अपनाया गया या उसपर विचार किया गया कि कही गयी बात असत्य भी हो सकती है? यह परिस्थिति पहचानने की जरूरत है।
ये सदस्य भी एक बार कहे कि आप कहाँ 11 बिंदुओं पर विमर्श कर रहे हैं। जबकि मैंने कहा था कि इसमें कईएक दिन लगेंगे(comprehension की समस्या)। मेरे मौलिकता वाले बात का जवाब उन्होंने कहीं से खत्तीय का पाली में परिभाषा उठाकर दिया, जिसमें 2 परिभाषा थे और दोनों खत्तीय को क्षत्रिय बता रहे थे। स्पष्ट रूप से उन्होंने खत्तीय का अर्थ खेत का मालिक कहीं और से लिया था और अब हड़बड़ी में कुछ अलग प्रमाण दिखा रहे थे। यहाँ पर उन्हें यह सहजता से स्वीकारना चाहिए था की उनके द्वारा ग्यारहों शब्द/शब्दावली कहीं से उठाए गए थे, जिससे वे किसी तरह से सहमत तो थे, पर, उन्होनें उसके सही गलत का कोई चिंतन नही किया था। ये बात वे कभी नही स्वीकारेंगे और सामान्यतः कोई नही स्वीकारेगा। हर बात पर अपना चिंतन न होना सामान्यतः स्वीकार्य भी है। यदि हर चीज को संदेह के घेरे में लेकर चला जाये तो हरबार शून्य से शुरू करना पड़ेगा और मनुष्य primitive stage में चला जाएगा। पर, यह एक sweeping statement है। जब ग्रुप इतिहास को नए सिरे से लिखना चाहता है तो इस criticality की अति आवश्यकता है। यह इतिहास के वर्त्तमान कथानकों में insight दे सकता है। हरेक संज्ञा, विशेषण आदि की पड़ताल इतिहास की समझ मे एक नया ट्विस्ट ला सकता है। इन दोनों को भी पहचानने की जरूरत है
5. अब तक मैं अपने प्रति ग्रुप में लोगों की असहजता महसूस करने लगा था। कुछ लोग स्थिति को सँभालने के लिए प्रयास करने लगे थे। एक सदस्य ने कहा कि ग्रुप के बजाय जब आमने सामने बैठक होगी तो विमर्श करना ज्यादा अच्छा होगा। written से verbal communication ज्यादा अच्छा होता है। मैंने कहा कि ऐसा नही है। दोनों के अपने pros cons हैं। verbal में कम समय मे ज्यादा बात रख सकते हैं, पर कौन कौन सी बात कही गयी, जिनपर प्रतिक्रिया देनी है, याद नही रखा जा सकता। जब बात हर शब्द/शब्दावली को तौलने की है तो written ज्यादा बेहतर है। यह पहचानने की जरूरत है।
खैर मेरी यह बात ग्रुप में बन गए माहौल को सुधारने में कहीं से भी उपयोगी नही था, क्योंकि एक और सदस्य की बात काट दी गयी थी। यहाँ पर आप यह देख सकते हैं कि मैं भी प्रतिक्रिया देने वाले सामान्य प्रवृति का शिकार था। मैं यह समझ रहा था और मुझे अलग से फ़ोन करके समझाया भी जा रहा था। पर मैं गलत या सही इस बात पर अड़ गया था कि इस बार जो इतिहास लिखा जाए तो वह अत्यंत ही competitive हो और उसमें शब्दों को हल्के में न इस्तेमाल किया जाए। सदस्य भी इतने competitive हों कि कही गयी बात को साक्ष्यों से corroborate करें, सहजता से challange स्वीकार करें
5. एक अन्य सदस्य बीच बीच मे अगड़ा पिछड़ा की मानसिकता का रोना रो रहे थे कि पिछड़ों की मण्डली में ऐसा ही होता है। आपस मे ही लड़ने लगते हैं। मैंने लिखा कि तथाकथित अगड़े अँग्रेजों से नजदीकी के कारण जमीन जायदाद, सोच और सामाजिक पूँजी में समृद्ध है। पर, यह विरासत धूमिल हो रही है। जैसे जैसे तथाकथित पिछड़े इन सभी मामलों में समृद्ध हो रहे हैं, अगड़ों के मेरिट की पोल पट्टी खुल रही है। ews आरक्षण ने तो स्थिति एकदम स्पष्ट कर दिया है। इनमे यदि काबिलियत होती तो भारत ही नही विश्व मे अनेकों क्षेत्रों में इनका डंक बज रहा होता। भारतीय समाज मे जो बकलोली है, इन्हीं के द्वारा फैलाई गयी है। यह इनका षड्यंत्र नही है, बल्कि ये इतना ही सोच सकते हैं।
यदि किसी को लगता है कि हमारे अगड़ा पिछड़ा का कारण materialistic न होकर हमारी सोच-विचार की अक्षमता है तो फिर हमें पिछड़ा रहना ही चाहिए। यह पहचानने की जरूरत है
6. इसके कुछ समय बाद एक सदस्य ने ग्रुप में लिखा कि 0 ad से 1000 ad (या शायद 1100 ad) तक कोई commercial खेती नही थी। लोग अपने लिए उपजाते थे। उसके बाद राजा सैनिकों का समय आया और वे लोगों से कर वसूलने लगे। इसपर मैंने लिखा कि आप एकदम सही बोल रहे हैं। आखिर सिंचाई के साधन तो थे नही कि व्यापक पैमाने पर खेती किया जाए। चारों ओर जंगल थे। लोगों की आवश्यकताएँ अत्यंत सीमित थीं। अपने लिए उपजाते थे। बेचते किसको। कोई बाजार भी नही था। हरेक गाँव/ कबीलाई समूह अपने आप मे स्वतंत्र आर्थिक इकाई था। पर 1850 के लगभग जब अँग्रेजों ने सिंचाई के लिए नहरो की उपयोगिता देखी और ग्राहक वे स्वयं थे तो जंगल साफ होने लगे, लोगों का समूह परिवार सहित नए क्षेत्रों में जाने लगा।
फिर राजा, प्रजा और सैनिक का अस्तित्व आप सैनिकों को दिए जाने वाले वेतन, मुद्रा, मुद्रा की धातु, उसका निष्कर्षण, परिष्करण, मुद्रा को खर्च करने के लिए बाजार, स्वयं को राजा कहें कि महाराजा कि जमींदार यह सब तय कैसे होता था या कौन करता था (और बातें भूल गया हूँ) आदि के आधार पर समझाइए।
इसके जवाब में उन्होंने कहा कि 15वीं शताब्दी से राजा, सैनिक, कर वसूलने वाली बात शुरू हुई। मैं ठीक से पढ़ा नही कि उन्होंने अपने दोनों मैसेज delete कर दिए। साथ मे उन्होंने यह कहा कि मैं दोनो मैसेज हटा रहा हूँ, आमने सामने के बैठक में देखेंगे। ये पाँचवें व्यक्ति थे।
निश्चित रूप से अब सिर के ऊपर से पानी गुजर रहा होगा तभी संयोजक महोदय ने यह कहा कि इस ग्रुप में कुछ सदस्य ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। यह अपमानजनक मालूम पड़ा। हालाँकि इस ग्रुप में ऐसा करने वाले ये तीसरे ऐसे व्यक्ति थें। मैंने पाया कि अधिकांश सदस्यों की समझ stable हो गयी है और मुझे इसे unstable नही बनाना चाहिए। इसलिए 2 सप्ताह की इन वार्ताओं के अंदर ही मैंने विदा ले लिया।
~राहुल पटेल
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