Wednesday, April 9, 2025

चीन vs अमेरिका और allied देशों का ट्रेड वॉर

#आदिकिसान #समाज #विश्वव्यापार

यह economic times में छपा लेख चीन के एक्सपोर्ट में सुनामी की बात कर रहा है। इसके कुछ समय पहले से डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किए ट्रेड वॉर (टैरिफ बैरियर) के बारे में सुना होगा। लगातार न्यूज़ यह है कि अमेरिका के ट्रेड डेफिसिट की भरपाई के लिए ट्रम्प ने DOGE का गठन किया, जिसने अनेकों उपायों में टैरिफ बैरियर भी सुझाया। आपने यह भी सुना होगा कि कैसे एलोन मस्क DOGE की अतितिक्त जिम्मेदारी से परेशान हैं और यह भी सुना होगा कि कैसे यूरोपियन देश और कनाडा यानी अमेरिका के ally भी इस ट्रेड वॉर से परेशान हैं। 


पर, आप ध्यान दीजियेगा तो चीन के साथ ट्रेड वॉर के पैंतरेबाजी के न्यूज़ में allied देशों की पैंतरेबाजी उस स्तर की नही है। या फिर यों कहिए कि allied देशों की परेशानी पुतला/scarecrow ज्यादा लग रहा है।


ये सब देखते हुए, मेरा निष्कर्ष यह है कि विकसित देशों को चीन के मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में इजाफा के बारे में पहले से जानकारी हो चुकी थी, न्यूज़ भले ट्रेड वॉर के बाद पब्लिक किया जा रहा है। चीन के इस बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका और allied देशों की ट्रेड वॉर एक आर्थिक रणनीति है। आखिर इसके पहले भी ट्रेड डेफिसिट अमेरिका के लिए मुद्दा रहा है, पर, वहाँ के अर्थशास्त्री इसमे कुछ भी परेशानी नही देखते हैं। तो अब क्या हुआ था, जो अमेरिका ने अकेले पानी मे हलचल मचाना शुरू किया। एकबात स्पष्ट है कि अमेरिका के इस पहलकदमी का नतीजा यह हुआ है कि दुनिया के बाकी देश (अमेरिका और allied देशों के अलावा) भी इन टैरिफ बैरियर के प्रति सजग हुए हैं और अपनी अपनी व्यापारिक नीतियों में फेरबदल करने लगे हैं। भले इन देशों के प्रयास अभी अमेरिका केंद्रित है, लेकिन कल गए चीन के मालों से अपने उत्पादन इकाईयों को बचाने के लिए इस टैरिफ बैरियर को एक उपाय के रूप में सोच सकते हैं। यदि अमेरिका ऐसा न करता तो सारे देश इस मामले को व्यक्तिगत स्तर से हैंडल करते और कमोबेश चीन के सामने घुटने टेकने ही नतीजा होता, लेकिन अमेरिका के इस प्रयास ने टैरिफ को उपाय के रूप में इस्तेमाल की एक सामूहिक चेतना लायी है, जो चीन के लिए अत्यंत अहितकारी साबित हो सकती है, जो अंततः अमेरिका को दुनिया के टॉप पर बनाये रखने में मददगार होगा। इसका सबसे बड़ा फायदा डॉलर की प्रभुता है। इसके ठीक पहले रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान डॉलर के समानांतर रूस, चीन, ईरान ब्लॉक ने एक नई करेंसी व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश की थी, जो नाकाम कर दिया गया। यह सर्वविदित है कि रुपये की इस अर्थव्यवस्था का मायाजाल का तोता डॉलर की वैश्विक प्रभुता है। 


कुल मिलाकर यदि बात ऐसी ही है तो निश्चित रूप से चीन ने ऐसी परिस्थिति की कल्पना पहले से की होगी और हमलोगों को और भी दोनों तरफ से पैंतरे देखने को मिलेंगे। जिसमे चीन की तरफ से मुख्यतः विकासशील देशों जैसे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अनेकों अफ्रीकन, लैटिन अमेरिकन देशों के बाजार में अपनी पकड़ बढ़ाई जाएगी और ट्रेड वॉर का मैदान अमेरिका या चीन के बजाय उपरोक्त देशों के बाजार होंगे। हालाँकि ऐसा नही है कि ऐसा न्यूज़ नही आ रहा है कि कैसे दुनिया के अनेकों देशों में चीन बहुत बड़े स्तर का सड़कों, खदानों, विमान-जहाज पत्तनों(ports), सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर आदि में पूँजी तथा तकनीकी निवेश कर रहा है और अमेरिका और allied देश इसका कूटनीति स्तर पर विरोध कर रहे हैं। शायद उस विरोध का असर न दिखाई देने के कारण तथा चीन के प्रयासों में बढ़ोत्तरी होते जाने के कारण अगला कदम टैरिफ बैरियर हो और यदि यह भी अप्रभावकारी सिद्ध हुआ तो हाल ही में एक वीडियो सामने आया है, जिसमे एक अमेरिकन अन्य देशों में चीन के बढ़ते बाजार के प्रभाव को अमेरिका के अन्य देशों में 500+ ठिकानों के सामने कुछ नही बता रहा है। उसका तात्पर्य यह था कि चीन को जितना कूदना है, कूदने दीजिये, हम जब चाहेंगे सैन्य ताकत से उसे समेट देंगे। अमेरिकी रणनीतिकारों का मत बहुत भिन्न नही भी हो सकता है। वे किसी देश मे लोकतंत्र और उस देश के हितों की चीन से रक्षा के नाम पर युद्ध भी छेड़ सकते हैं। आखिर उन्होंने ऐसा पहली बार नही किया है।


दुर्भाग्यवश ऐसे विकासशील पिछड़े देशों की श्रेणी में भारत भी है और इस ट्रेड वॉर का परिणाम भारत मे भले युद्ध के रूप में न दिखाई दे, वस्तुओं के दामों के रूप में जरूर दिखाई दे सकता है।


~राहुल पटेल


https://m.economictimes.com/small-biz/trade/exports/insights/the-tsunami-is-coming-chinas-global-exports-are-just-getting-started/amp_articleshow/120082999.cms


https://www.facebook.com/share/p/1DqvpJckth/