Thursday, November 30, 2023

Saturday, November 25, 2023

जय किसान जय जोहार

संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर 3 दिन (26, 27,28 nov) के धरना, प्रदर्शन के लिए गर्दनीबाग, पटना,  बिहार की ओर कूच करते हुए


Friday, November 24, 2023

पराली का सच, प्राथमिकता और आर्थिक निर्णय

फसलों (मुख्यतः धान, गेहूँ) की कटाई के बाद बचे अवशेष को पराली या पलहारी या पुआल कहते हैं। किसानों द्वारा इसे बड़ी मात्रा में खेतों में ही जलाना आज भारत मे चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकारें, विशेषज्ञ इस प्रैक्टिस को खलनायक घोषित कर रहे हैं। वे इसे वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारक मान रहे हैं। वे किसानों को इस प्रैक्टिस से विमुख करने के लिए मीडिया के माध्यम से तरह तरह के तर्क परोस रहे हैं जैसे मिट्टी की उर्वरकता में कमी, वायु प्रदूषण से होने वाली समस्याओं को गिनाना आदि। कोरोना के समय में रोहतास, बिहार के जिलाधिकारी ने एक बार एक सेल्स मैन वाला सरकारी नजरिया पेश करते हुए कहा कि वह पराली जलाने से हानि और नही जलाने से लाभ पर एक एक घंटा तक बोल सकता है। सरकारें पराली जलाने से रोकने के लिए किसानों को सामाजिक तौर पर बहुत बड़ा विलेन बताने, उनके ही बच्चों की नजरों में विद्यालयों में शपथ जैसे हथकंडे अपनाकर उनकी बेईज्जती करने, जेल में बंद करने, जुर्माना लगाने, अनुदान बंद करने, निगरानी रखने के लिए सैटेलाइट और अन्य महँगे तकनीक का इस्तेमाल करने, पराली नही जलाने के लिए अरबों की लागत से बहुत बड़े स्तर पर प्रचार करवाने आदि जैसे हरसंभव प्रयास कर रही है।  10 दिसंबर, 2015 को NGT ने राजस्थान, हरियाणा, यूपी और पंजाब में पराली जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया। पराली जलाना अब IPC, सेक्शन 188 और Air and Pollution Control Act, 1981 के तहत कानूनन अपराध है। अधिकतम 5 साल जेल या 1 करोड़ रुपया तक के जुर्माना का प्रावधान है। स्पष्ट है कि सरकारें पराली को वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों में से मानती है, जिसे रोकना सबसे आसान है, किसानों को भयभीत कर दो और किसानों को स्वयं भी इससे घाटा है। अतः पराली पर लगाम लगाने के लिए सरकारें कड़े कदम उठाने के लिए भी तैयार है। तो, यदि किसान वायु प्रदूषण और मिट्टी की बर्बादी जैसी चीजों के अलावा सरकारी धमकियों की गंभीरता समझते हुए भी पराली जलाना जारी रखे हुए है तो इस पर थोड़ा गहराई से सोचने की आवश्यकता है।

 

पराली समस्या बनने से पूर्व की व्यवस्था

खेती पहले भी होती थी। तो, यह पहले कैसे एक समस्या नही थी, जो अब बन गयी है? हरित क्रांति के पूर्व में मुख्यतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था थी। गाँवों में निजी स्तर का पशुपालन था। ट्रैक्टर का चलन नही था। बैल और हल से कृषि कार्य किये जाते थे। हाथ से कटाई होती थी। लोग पुआल सहित फसल को खलिहान में लाते थे। दवरी से अन्न और पुआल को अलग किया जाता था। पुआल को पशुओं को खाने के लिए दे दिया जाता था। अधिकांश किसानों के घर मे बैलों के अलावा गाय, भैंस भी रहते थे। जो परिवार के पोषण के लिए दूध और खरीद बेच से आय के स्रोत बने हुए थे। इस पुआल से इन पशुओं के लिए सालों भर के लिए भोजन की व्यवस्था हो जाती थी। यानी पशु रखना बोझ नही पूँजी था। परिवार अभी अभी बँटना शुरू हुए थे। रुपये की अर्थव्यवस्था ने अभी इतनी गहरी जड़ें नही जमाई थीं। इसलिए अधिकांश लोगों के पास पशु और पुआल रखने के लिए पर्याप्त जगह था। लोग गाँव छोड़कर अभी कमाने के लिए बहुत कम बाहर निकले थे, तो खेती और पशुपालन के लिए परिवार में लोग थे। उर्वरक, पटवन की व्यवस्था, कीटनाशक, नए प्रकार के बीज आदि का इस्तेमाल अभी जोर नही पकड़ा था। इसलिए प्रति एकड़ धान, गेहूँ के उत्पादन भी कम ही होता था, तो पराली भी अपेक्षाकृत कम था। यही नही धान और गेहूँ के अलावा अभी मोटे अनाज का भी अच्छा खासा उत्पादन हो रहा था। यह भी पराली के कम उत्पादन का कारण था। इसतरह से व्यक्तिगत स्तर पर पराली का उत्पादन और निपटान दोनों हो जाता था। पर समय बीतता गया और परिस्थिति बदलती गयी।

 

पराली के समस्या बनने के विभिन्न कारक

हरित क्रांति

अभी तक सरकारें पराली की समस्या को सामाजिक समस्या के रूप में देख रही थीं, परअब धीरे धीरे सरकारों और विशेषज्ञों को समझ मे आने लगा है कि यह एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है और यह समस्या सरकारों की अपनी देन है हाथ और हल जैसे परंपरागत तरीके से कृषि कार्य मे उत्पादन क्षमता कम होने तथा समय ज्यादा लगने के कारण, हरित क्रांति के अंतर्गत सरकार द्वारा अनुदान के रूप में कृषि संयंत्रों को बढ़ावा दिया गया। हार्वेस्टर उसी नीति का देन है और पराली हार्वेस्टर का देन है। फसल कटाई के समय, ये संयंत्र पराली खेतों में ही छोड़ देते हैं, जिससे निपटने के लिए 80 के मशीनीकरण बढ़ने के दशक में स्वयं सरकार ने ही इन्हें खेतों में जलाना, किसानों को उपाय के रूप में बताया था। हार्वेस्टर का उपयोग बढ़ता गया, पराली की समस्या विकराल होती गयी। आज उसी उपाय को लेकर किसान और सरकारें आमने सामने हैं।

कृषि की उत्पादकता

पर, किसान इस पराली को हाथ से या मशीन से बटोरकर घर भी तो ले जा सकते थे। यह बात तत्कालीन सरकारों को क्या नही सुझा या बात कुछ और थी? हरित क्रांति की ही देन उर्वरक, कीटनाशक, नए बीज तथा पटवन की अपेक्षाकृत अच्छी व्यवस्था ने प्रति एकड़ फसलों का उत्पादन 3-4 गुणा बढ़ा दिया। 1950-51 में 6.68 क्विंटल प्रति एकड़ से धान का उत्पादन 2014-15 में 23.90 क्विंटल प्रति एकड़ हो गया। यह इसी दौरान 20.58 मिलियन टन से लगभग 5 गुणा बढ़कर 104.86 मिलियन टन हो गया। धान की रोपाई क्षेत्र में भी वृद्धि हुई। इस दौरान रोपाई क्षेत्र 30.81 मिलियन हेक्टेयर से 1.42 गुणा बढ़कर 43.86 मिलियन हेक्टेयर हो गया। आँकड़े nfsm.gov.in से लिये गए हैं। इसीप्रकार 1950-51 में गेहूँ के 6.46 मिलियन टन से लगभग 15 गुणा बढ़कर 2011-12 में यह 94.88 मिलियन टन हो गया। इस दौरान 6.63 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से लगभग 5 गुणा बढ़कर 31.40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया। रोपाई क्षेत्र 9.75 मिलियन हेक्टेयर से 3 गुणा बढ़कर 30 मिलियन हेक्टेयर हो गया। ये आँकड़े farmer.gov.in से लिये गए हैं। यह सब हरित क्रांति के लक्ष्यों में से था

पराली वाले अनाजों पर मुख्य फोकस और बाजार की माँग

बाजार में मोटे अनाजों की माँग खत्म हो गयी। गाँव स्तर पर गेहूँ, धान को छोड़कर अन्य फसलों की खरीद बिक्री का कोई सुचारू तंत्र नही बन पाया। फसल कितना भी खराब हो, दाम कितना भी गिरे, इन दो फसलों में किसानों को कुछ कुछ मिल ही जाता है, यानी अन्य फसलों की तुलना में इनकी खेती कम रिस्की है। तो गेहूँ, धान ने अन्य फसलों की जगह ले ली। 2000–01 से 2010–11 के बीच मात्र दस सालों में ही मोटे अनाज की रोपाई क्षेत्र में 2.6 मिलियन हेक्टेयर की कमी आयी थी। RBI के "Handbook of Statistics on Indian Economy" के आँकड़ों के अनुसार 1950-70 के बीच मोटे अनाजों की रोपाई क्षेत्र 48 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 2019 में लगभग आधा 22 मिलियन हेक्टेयर हो गयी। इस दौरान धान की रोपाई क्षेत्र लगभग 30.81 से लगभग 47 मिलियन हेक्टेयर हो गया और गेहूँ का 9.75 से बढ़कर लगभग 30 मिलियन हेक्टेयर हो गया। अनेकों अध्ययनों (Pingali et al. 2017, Aditya et al., 2017; Roy, 2017; Eliazer Nelson et al., 2019) का भी निष्कर्ष लगभग वही है कि हरित क्रांति के दौरान धान, गेहूँ के उत्पादन को मिशन मोड में चलाया गया। इन फसलों की सरकारी खरीद, वितरण तथा मार्केटिंग ने लोगों के खाने की आदतें बदलीं। बाजार ने इस ट्रेंड को पकड़ा। हरित क्रांति के कुछ ही वर्षों के बाद चावल गेहूँ बेचना अन्य फसलों की तुलना में अत्यन्त आसान हो गया। यही नही, अन्य फसलों जैसे दलहन, तेलहन, मसाला, गन्ना आदि बाजार में कठिनाई से बिकने वाली फसलों की सिकुड़ती बुवाई ने गाँवों में वैमनस्य पैदा किया। यह ताबूत में अंतिम कील साबित हुआ।स्थानीय बाजार में बाहर से बहुतायत में आये इन खाद्य पदार्थों को खरीदना उपजाने के तुलना में ज्यादा सुलभ हो गया। इन सबका नतीजा यह रहा कि धान और गेहूँ प्रमुख फसल हो गए 

चित्र 1 देखें।

चित्र 1

वन्य जीव

यही नही आज अनेकों राज्यों मे वन्य पशुओं से तंग आकर किसान फसलों में विविधता कम कर दिए हैं। विविधता की स्थिति में वन्य पशु रुचिकर फसलों पर स्वभावतः चोट करते हैं, पर, इससे कुछ किसान अन्यों की अपेक्षा ज्यादा हानि सहते हैं। इसके उपाय के रूप में सभी किसान एक ही तरह का फसल बोने की कोशिश करते हैं, ताकि वन्य जीवों द्वारा भेदभाव की गुंजाइश कम हो। यह भी कारण है कि गेहूँ, धान अन्य फसलों की जगह ले चुके हैं।

इन सब कारणों से ये दोनों फसल पिछले 30-40 सालों में धीरे धीरे मुख्य फसल के रूप में उभरे और साथ मे पराली का उत्पादन भी कई गुणा बढ़ा। यह आज 350 मिलियन टन है, जो कुल पराली का 70% है।

पराली की खपत

पर, इन परालियों को पशुओं को क्यों नही खिलाया जा रहा? एक नजर जरा पशुपालन के ट्रेंड पर डालिये। गाँव देहातों में निजी स्तर का पशुपालन एकदम घटा है। रुपये की इस अर्थव्यवस्था ने व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया है। परिवार बिखरते जा रहे हैं। बँटवारा से पशु रखने और उनके लिए सालों भर का भूसा पवटा रखने की कौन कहे स्वयं के रहने के लिए ही पर्याप्त कमरे नही है। लोगों को बँटवारे में दालान तक मे रहना पड़ रहा है। अत्यंत छोटे परिवारों में एक ही वयस्क पुरुष के गाँव मे बचे रहने से भी लोग पशुपालन छोड़ रहे हैं। केवल खेती के समय उपस्थित रहकर बाकी समय शहर पकड़ना भी एक आम प्रैक्टिस हो गयी है। बच्चों के बालिग होने पर अभिभावक की कोशिश रहती है कि वह कहीं बाहर कमाने के लिए जाए। खेती में कुछ रखा नही है यानी मेहनत की तुलना में आय नही है या फिर इसको ऐसे सोच सकते हैं कि जब कुछ लोगों का जीवन स्तर ऊँचा दिख रहा है तो वे ही जहालत में क्यों रहे! इसतरह से पशुपालन के लिए घरों में पुरुष उपलब्धता में भारी कमी आने से निजी स्तर का पशुपालन घटा है। पर, पशुपालन के आँकड़े बता रहे हैं कि पशुपालन पहले से कुछ प्रतिशत बढ़ा है। पराली के मुख्य उपभोक्ता पशुओं(bovine population) की संख्या 1951 में 198.7 मिलियन से 2019 में 302.3 मिलियन यानी लगभग 1.5 गुणा (50%) बढ़ा है (देखें चित्र 2) गाय पालन घटा है, भैंस  पालन बढ़ा है (देखें चित्र 3) स्रोत: (https://www.nddb.coop/information/stats/pop)

ऐसा इसलिए कि संगठित पशुपालन डेयरी फार्म के रूप में बढ़ा है। इस हिसाब से कम से कम पशुओं की संख्या के हिसाब से पराली का उपभोग कुछ प्रतिशत बढ़ना ही चाहिए था। पर, हो उल्टा रहा है, क्योंकि इन डेयरी फार्मों में, फैक्ट्री में बने पशु आहार पराली की जगह ले रहे हैं।

चित्र 2

चित्र 3

पराली समस्या के कारकों का निष्कर्ष

इस तरह से सरकारी नीतियों के कारण पराली का उत्पादन जहाँ कई गुणा बढ़ा है, वहीं उसका उपभोग घटा है। सरकारें स्वयं चाहती है कि किसान ज्यादा उपजाएँ। किसान भी चाहते हैं कि ज्यादा उपजाएँ। पर, हर बार फसल कटाई के बाद खेतों में पराली का ढेर लगना प्रत्येक किसान के लिए एक विकराल समस्या बन चुका है। किसानों के व्यक्तिगत स्तर पर इतनी बड़ी मात्रा में पराली से निपटने का, उन्हें जलाने के सिवाय, कोई दूसरा सस्ता उपाय फिलहाल नजर नही रहा है। सस्ता इसलिए कि फसलों के उचित मूल्य मिलने से किसानी घाटे में चल रही है। पिछले 30-40 सालों में गाँवों से खेती छोड़कर 10000 से 15000/- की मामूली नौकरी के लिए शहरों में पलायन, किसानों द्वारा आत्महत्या, कृषि ऋण माफ करने की आवश्यकता आदि से स्पष्ट है कि किसानों की बदहाली के लिए सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं। सरकारें फसलों का उचित मूल्य नही दे रही हैं ना ही दिलवा पा रही हैं, रोजगार सृजित नही कर पा रही हैं, सरकारी विभागों में दस बार दौड़ने और बिना पैसे के कोई काम नही होने का कुछ उपाय नही कर पा रही हैं और इस तरह की बहुत सारी छोटी बड़ी कमियों के कारण किसान बदहाल होता जा रहा है। ऐसे में किसान पराली ठिकाने लगाने का खर्च वहन करना नही चाहता। सुप्रीम कोर्ट किसानों के इस आर्थिक निर्णय को अच्छे से समझती है और इसीसे 100/- प्रति क्विंटल पराली को ठिकाने लगाने का मुआवजा देने का तीन राज्य की सरकारों को उसने निर्देश भी दिया था। वो ऐसा समझती है कि किसानों को सिर्फ प्रोत्साहित ही किया जा सकता है। ऐसे में कोई भी उपाय, जिसमे अपनी जेब से कुछ जाना ही हो, किसानों को और घाटे में डालता है और इसलिए उनके लिए संभव नहीं है। दूसरा कोई उपाय निकलना किसानों के व्यक्तिगत वश की बात भी नही है। अतः समाधान उपलब्ध कराने के बजाय सरकारों द्वारा किसानों को तरह से तरह प्रताड़ित करना दर्शाता है कि उनके पास स्वयं कोई समाधान नही है और वे वो चीजें कर रही हैं, जो हमेशा से जानती हैं और उनके लिए सबसे आसान है, यानी दण्डात्मक कार्रवाई।

जिस तरह से सरकारें पराली को जलाने के बजाय कहीं ठिकाने लगाने या मिट्टी में मिला देने के फायदे गिना रही हैं तो इसका मतलब कि सरकारों को समझ मे नही रहा है कि जिस चीज में किसान को फायदा दिखाई पड़ेगा उसको अपनाने के लिए चिरौरी करने की आवश्यकता नही है आखिर ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, उर्वरक, कीटनाशक, नए बीज के लिए सरकार ने प्रचार में करोड़ों खर्च नही किये थे। किसान को खूब समझ मे आता है, ये सरकारी अधिकारी है जिनको कम समझ मे आता है।

 

फौरी तौर पर पराली ठिकाने लगाने के विकल्प

सबसे पहले पराली ठिकाने लगाने के फौरी विकल्पों के बारे में थोड़ा चर्चा किया जाए। ये हैं, अवशेषों को बटोरकर कहीं ठिकाना लगाना, टुकड़े कर मिट्टी में मिलाना या जलाना है।

1.  बटोरकर कही ठिकाना लगाने के लिए अभी कोई प्रोटोकॉल नही है कि कैसे बटोरा जाए, बटोरकर रखने के लिए उतना जगह कहाँ से आये, उसके साथ क्या किया जाए, इसमे लगे पैसे को कौन वहन करे

2.     टुकड़े कर मिट्टी में मिलाने के लिए हैप्पी सीडर तथा सुपर सीडर बाजार में उपलब्ध हैं। सरकार उसपर अनुदान भी देती है। अनुदान की कहानी यह है कि खरीफ के बीज का अनुदान राशि जो 3000-4000/- जैसा मामूली रकम है, 9 महीने होने को आये, अभी तक नही मिला है। ट्रैक्टर अनुदान 2 साल होने को आया, अभी तक नही मिला है। किसान की हालत वैसे ही खस्ती है। वह हजार रुपये जैसी मामूली रकम भी इतने लंबे समय के लिए लगाने के लिए तैयार नही है। अनुदान को लेकर किसानों के बीच सरकार की साख बहुत ही खराब है। दूसरा कि यदि कोई लेकर भाड़े में चलाए तो उसका भाड़ा कौन भरेगा? पर, उससे भी गंभीर यह बात है कि मिट्टी में इसतरह से मिला देने से वे तुरंत सड़ते गलते नही, जबकि अगली फसल कुछ ही दिनों में और कभी कभी तो अगले ही दिन बोना रहता है तो खेत की तैयारी में बाधा होती है।

3.  जलाना बहुत आसान है। सड़कों, अयस्क उत्खनन, बिजली, पटवन के लिए बांध बनाने के लिए जंगल साफ करना, आर्थिक विकास के नाम पर उद्योग धंधों से वायु और जल प्रदूषण होने देना, जिस प्रकार सरकार का आर्थिक निर्णय है, उसी प्रकार पराली जलाना किसानों का आर्थिक निणय है। यदि विकास के नाम पर पर्यावरण को हो रहे क्षति को पर्यावरण समीक्षा से बाहर रखा जा रहा है तो प्रदूषण के एक आंशिक कारक के लिए किसानों को सब्सिडी रोकने, शर्मसार करने, जेल तक भेजने की बात सरासर अन्याय है, सरकारों की बदमाशी है

कोरोना के लौकडाउन में केंद्र सरकार का विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कायम करना देखिए:

1. 12 मार्च 2020 को Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEF&CC) द्वारा 2006 के Environment Impact Assessment (EIA) के नोटिफिकेशन के जगह पर नया नोटिफिकेशन लाया गया। इसके अनुसार environmental क्लीयरेंस लेना आसान हो जाएगा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह होगा कि अब पब्लिक कंसल्टेशन की जरूरत नही होगी, यानी वहाँ की जनता उस प्रोजेक्ट के पक्ष में है कि नही, यह जानने की कोई जरूरत नही

2.     National Board for Wildlife (NBWL) ने 11 राज्यों के बहुत सारे प्रोजेक्ट्स को क्लीयरेंस दे दिया। इनमें नागपुर मुम्बई सुपर हाईवे है, जिसमे 32000 पेड़ काटने हैं, गोआ में एक हाईवे है जो मोल्लेम वन्य जीवन अभ्यारण्य (Mollem Wildlife Sanctuary) से होकर गुजरेगा, असम के देहिंग पटकई हाथी अभ्यारण्य (Dehing Patkai Elephant Reserve) का कोयला उत्खनन है, मध्यप्रदेश और तेलंगाना का रेलवे पुल है, जो कवल बाघ अभ्यारण्य (Kawal tiger corridor) से गुजरेगा

3.     उत्तराखंड वन विभाग ने 2021 के कुम्भ मेला के लिए राजाजी नेशनल पार्क और नरेंद्र नगर वन प्रक्षेत्र का 788 हेक्टेयर संरक्षित वन की जमीन कुम्भ मेला समिति को देने की पेशकश की है।  यह राजाजी नेशनल पार्क, जो एक बाघ अभ्यारण्य है, का नॉन फारेस्ट उपयोग Wildlife (Protection) Act, 1972 और the Forest (Conservation) Act, 1980 के खिलाफ है। अक्टूबर 2019 में MoEF&CC ने असंरक्षित वन का बिना सरकार के अनुमति के अधिक से अधिक 2 सप्ताह तक इस्तेमाल करने की अनुमति दी है। लेकिन इस केस में एक संरक्षित वन, नौ महीने के लिए, कुम्भ मेला समिति द्वारा इस्तेमाल किया जाना है

4.     MoEF&CC ने 23 अप्रैल को अरुणाचल प्रदेश में स्थित एतालिन जल विद्युत परियोजना  को मंजूरी दी (Etalin Hydro Electric Project)

इन सभी में लाखों में पेड़ काटे जाएंगे, वन्य जीवों के क्षेत्र कम होने से वे जंगलों से बाहर आएंगे और लोगों द्वारा मारे जाएंगे। तो आप देख सकते हैं कि मनुष्य का हमेशा से चला रहा स्वार्थ और प्रकृति को बचाने की नई पहल के बीच खींचातानी कैसे चल रहा है। ऊपर वाले सारे सरकार के आर्थिक निर्णय है और किसानों के पराली जलाने के आर्थिक निर्णय से किसी भी तरह भिन्न नही है।

 

पराली से वायु प्रदूषण कितना विकराल

PM2.5

अब हमलोग यह देखेंगे कि पराली से वायुप्रदूषण को जितना विकट बताया जा रहा है, वह कितना विकट है। सरकार का यह मानना की पराली जलाना वायु प्रदूषण का एक बड़ा वजह है और इसके समाप्त होने से वायु प्रदूषण बहुत कम हो जायेगा, का आंकड़ों से विश्लेषण किया जाए। मुद्दा दिल्ली के गहराती वायु प्रदूषण की समस्या को लेकर शुरू हुआ था। दिल्ली और केंद्र सरकार वायु प्रदूषण का समाधान होते देख पूरा का पूरा ठिकरा किसानों पर फोड़ना चाहता था और हर साल आंकड़े पेश किए जाने लगे। खासकर PM2.5 (particulate matter) को एक बहुत बड़ा विलेन बताया जाने लगा। वायु प्रदूषण में दिसंबर, जनवरी में आई तेजी को पराली का परिणाम बताया जाने लगा। पर बिना अन्य कारकों जैसे उद्योगों, वाहनों, कचरा जलाने को अलग किये यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जाना चाहिए था कि पराली ही इसका कारक है। जब कोरोना के चलते दिल्ली लौकडाउन में था, तो कचरा जलाने को छोड़कर अन्य कारक नगण्य थे, लेकिन पराली फिर भी जलाया गया। इस समय वायु प्रदूषण के आंकड़ों से काफी हद तक सही पता चलेगा कि पराली जलाना कितना खतरनाक है। आप नीचे के ग्राफ में देख सकते है कि किसी भी साल जुलाई, अगस्त, सितंबर महीनों में दिल्ली में सबसे कम प्रदूषण रहता है। उस समय वर्षा का मौसम होने के चलते वायु में PM2.5 धूल जाते हैं और प्रदूषण कम हो जाता है। आप यह भी देख सकते हैं कि यह औसतन लगभग 100 के स्तर तक जाता है। उस समय कही पराली भी नही जलाया जाता, यानी इतना PM2.5 तो दिल्ली में रहता ही है। इसके बाद प्रदूषण बढ़ना शुरू होता है और दिसंबर में उच्चतम स्तर पर जाता है। इसके जिम्मेदार कुहासे है जो वायु के धूलकण, PM2.5 आदि को देर तक हवा में रखते हैं। इसके बाद प्रदूषण का स्तर गिरना शुरू होता है और मई में एक छोटा उछाल लेता है, जो कि गर्मियों में  धूल की आंधियों की देन है। याद रहे कि जनवरी में पराली जलाया जाता है। इसलिए दिसंबर और जनवरी के आसपास प्रदूषण में बढ़ोत्तरी को पराली का देन बताकर सरकार आम नागरिक को करोड़ों खर्च कर गुमराह कर रही है। आप देख सकते हैं कि अप्रैल महीने में प्रदूषण में कितना अंतर (सामान्यतः 190 - 2020 में 115=75) है। स्पष्टतः अप्रैल में यह 75 पॉइंट गाड़ियों, कल कारखानों, सड़कों से उड़े धूल आदि के कारण रहते हैं। आप इस अप्रैल के PM2.5 के स्तर (115) का दिल्ली के न्यूनतम स्तर (100) से भी तुलना कर सकते हैं। यदि पराली को छोड़कर  बाकी प्रदूषण 190-100=90 को पूरा प्रदूषण मान लीजिये तो 15÷90*100=17% PM2.5 पराली और कचरा जलाने से आया है और 83% दिल्ली का बाकी प्रदूषण है। माना जा सकता है कि 50% वायु प्रदूषण दिल्ली का कचरा जलाने से आया है, तो, लगभग 9% वायु प्रदूषण पराली जलाने से आया।

पर बात इतनी ही नही है। बिना समय के पहलू को जोड़े, यह आंकड़ा, सही बात प्रकाश में नही लाएगा। पराली साल में दो बार जलाया जाता है। जबकि दिल्ली का अपना प्रदूषण सालों भर का है, जो कुहासे, आंधियां, वर्षा के कारण ज्यादा या कम गंभीर होते रहता है। अप्रैल ऐसा महीना है, जब प्रकृति प्रदूषण के गंभीरता को प्रभावित नही के बराबर करता है। ऐसे में हरेक महीने का केवल पराली के कारण PM2.5 का स्तर 9%÷12=0.75% बैठता है आप देख सकते हैं कि किस तरह से प्रदूषण के 0.75% जैसे नगण्य कारक को लाखों करोड़ों खर्चकर प्रदूषण का मुख्य कारक बताया जा रहा है और 99.25% के लिए कुछ नही किया जा रहा है। मुझे एक कहावत याद आती है, सोनवा दहाइल जाए, कोयला पर छापा परे 

चित्र 4 देखें (आकंड़ों का स्रोत:https://aqicn.org/data-platform/register/  आनंद विहार दिल्ली के लिए)


चित्र 4

अन्य गैसें

अनेकों शोधों से यह सामने आया है कि 1000 किलो पराली जलाने से 1428 किलो CO2, 52 किलो CO, 11 किलो  CH4, 2 किलो SO2 और अन्य गैसें अत्यंत कम मात्रा में निकलती हैं। तुलनात्मक रूप से भारत मे 1000 किलो डीजल से 3153 किलो, पेट्रोल से 3122 किलो, कोयला से 2460 किलो CO2 निकलता है।

"Mohammad et al. (2020) reported that 63 mt of burning residue produce 90 mt of carbon dioxide, 3.3 mt of carbon monoxide, and 0.7 mt of methane."

Source: https://iiss.icar.gov.in/eMagazine/v6i2/11.pdf

"The approximate CO2 emission per litre of diesel fuel burning is 2.68kg, and for petrol it is around 2.31kg. LPG produces around 1.51kg per litre."

Source: https://iopscience.iop.org/article/10.1088/1757-899X/1080/1/012003/pdf

एक सवाल: कार्बन डाइऑक्साइड एक ग्रीनहाउस गैस है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है। क्या पृथ्वी के सारे जीवों को इससे समस्या है या कुछ जीव इसके बढ़ने से और ज्यादा फल फूल रहे हैं? वे कौन से जीव हैं?

उत्तर: पेड़ पौधे

सरकारें पुराने और बड़े जंगलों को विकास के नाम पर काट रही हैं और दोष दे रही हैं 0.75% वाले प्रदूषक को।

कार्बन उत्सर्जन की जवाबदेही

यदि फिर भी सरकार अपनी जिद्द पर अड़ी रहना चाहती हैं तो वैज्ञानिक तरीके से कार्बन ट्रेडिंग के तौर पर प्रदूषण के भागीदारी के अनुसार दंड तय किया जाए आप पाएंगे कि बहुत सारे सरकारी विभाग और कंपनियां या तो जेल के सलाखों के पीछे होंगे या जुर्माना भर रहे होंगे, जबकि कार्बन नेगेटिव किसानों को 10 महीने नेट हरियाली बढ़ाने के लिए पुरस्कृत किया जाएगा।

यही नही, वायु प्रदूषण की विकरालता शहरीकरण के साथ साथ बढ़ती जाती है। जितना बड़ा शहर, उतना विकराल वायु प्रदूषण। यह तो गाँवों की समस्या है, देन। शहरों के वायु प्रदूषण का 99.25% उनकी अपनी देन है, तो गाँवों को विलेन बताना व्यवस्था द्वारा शहरी जनता को समस्या के मूल से भटकाना है और सरकार का अत्याचार है।

मिट्टी को कितनी क्षति

उपरोक्त बिहार सरकार के विज्ञापन में निम्न बातें कहीं जा रही हैं:-
1. जैविक कार्बन जल कर नष्ट हो जाता है
2. सूक्ष्म जीवाणु और केंचुआ जल कर मर जाते हैं
3. जमीन के पोषक तत्व जल कर नष्ट हो जाते हैं
4. जमीन में नाइट्रोजन की कमी हो जाती है
5. बाकी बिंदुओं में वायु प्रदूषण के बारे में कहा गया है, जिसकी विकरालता हमलोग पहले ही देख चुके हैं

जैविक कार्बन सड़ गल रहे वनस्पतियों और अन्य जीवों से आता है। यह ह्यूमस भी कहलाता है और काली मिट्टी इसी की देन है। जले हुए पराली से यह बढ़ता ही है। कम तीव्रता और अत्यंत अल्प समय की पराली की आग मिट्टी का तापमान इतना नही बढ़ा पाती कि कुछ सेंटीमीटर नीचे के सूक्ष्म जीव और केंचुआ मर जाये। सतह पर के जीव जरूर मर जाते हैं। पर, सूक्ष्म जीवों के पनपने में कोई समय नही लगता। वास्तव में जलाने के कुछ समय बाद उनकी जनसंख्या में कुछ बढ़ोतरी ही हो जाती है। कारण है अतिरिक्त पोषक तत्वों का उपलब्ध होना। साबुन या किसी स्टरलाइजर से कोई सतह जैसे हाथ साफ करिए और उनके फिर से वापस आने में कोई खास समय नही लगता। कुछ सूक्ष्म जीवों के जीवन चक्र में अंतर हो सकता है। एक पौधा तरह तरह के पोषक तत्वों से बना है। जिनमे से अधिकांश उड़नशील नही हैं। जलाने पर ये कैसे नष्ट हो जायेंगे? वे राख में ही रहते हैं।

अब जरा इस रिसर्च पेपर "Effect of Rice Straw and Stubble Burning on Soil Physicochemical Properties and Bacterial Communities in Central Thailand" के एब्सट्रेक्ट और परिणामों पर नजर डालिए (पूरा यहाँ पढ़ा जा सकता है https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC10135879/)।
"Rice straw and stubble burning is widely practiced to clear fields for new crops. However, questions remain about the effects of fire on soil bacterial communities and soil properties in paddy fields. Here, five adjacent farmed fields were investigated in central Thailand to assess changes in soil bacterial communities and soil properties after burning. Samples of soil prior to burning, immediately after burning, and 1 year after burning were obtained from depths of 0 to 5 cm. The results showed that the pH, electrical conductivity, NH4-N, total nitrogen, and soil nutrients (available P, K, Ca, and Mg) significantly increased immediately after burning due to an increased ash content in the soil, whereas NO3-N decreased significantly. However, these values returned to the initial values. Chloroflexi were the dominant bacteria, followed by Actinobacteria and Proteobacteria. At 1 year after burning, Chloroflexi abundance decreased remarkably, whereas Actinobacteria, Proteobacteria, Verrucomicrobia, and Gemmatimonadetes abundances significantly increased. Bacillus, HSB OF53-F07, Conexibacter, and Acidothermus abundances increased immediately after burning, but were lower 1 year after burning. These bacteria may be highly resistant to heat, but grow slowly. Anaeromyxobacter and Candidatus Udaeobacter dominated 1 year after burning, most likely because of their rapid growth and the fact that they occupy areas with increased soil nutrient levels after fires. Amidase, cellulase, and chitinase levels increased with increased organic matter levels, whereas β-glucosidase, chitinase, and urease levels positively correlated with the soil total nitrogen level. Although clay and soil moisture strongly correlated with the soil bacterial community’s composition, negative correlations were found for β-glucosidase, chitinase, and urease. In this study, rice straw and standing stubble were burnt under high soil moisture and within a very short time, suggesting that the fire was not severe enough to raise the soil temperature and change the soil microbial community immediately after burning. However, changes in soil properties due to ash significantly increased the diversity indices, which was noticeable 1 year after burning."







समाधान

सही पूछिये तो पराली जलाना आमजन के लिए कोई समस्या नही है। फिर भी यदि समाधान निकाला जा सकता है तो निकालने में हर्ज नही है, आखिर किसानों को भी इससे आर्थिक रूप से फायदा होगा। कोई भी समाधान हो, समय के पहलू को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। फसल के कटनी के एक- डेढ़ महीने (बिहार में कहीं कहीं तो 5 दिन) के बाद किसान अगले फसल की तैयारी शुरू कर देता है। यानी बस इतना ही समय है, पराली को उसके स्रोत के पास ठिकाने लगाने का। वहाँ से कहीं अलग ले जाकर ठिकाने लगाने के लिए अगले फसल की कटाई तक का लगभग 4-5 महीने का समय उपलब्ध रहेगा। 

निम्न समाधान प्रस्तावित हैं:-

1.  किसानों को प्रताड़ित करने के बजाय, उनपर इस समस्या के समाधान की जिम्मेदारी डालने के बजाय सरकार खुद खेतों से पराली उठा ले जाये या

2.   उद्यमियों को हर पंचायत के लिए 100% अनुदान पर बायो डाइजेस्टर दिलवाए। ये उद्यमी किसानों से पराली खरीदें और उसका खाद और गैस/बिजली बनाकर बेचे या पराली से कोई अन्य चीज बनाने पर सरकार शोध करे और उद्यमियों के हवाले करे

सरकार के कामों की समीक्षा करने पर ऐसा लगता है कि वहां तो कोई गहराई से सोचने वाला है ना ही कोई सही से प्राथमिकता का क्रम तय करने वाला है। यह पराली ही नही हर काम मे, योजना में दिखता है। इनमें जो करोड़ो रूपये बर्बाद होते हैं वह जनता का ही है। जनता को निश्चित रूप से व्यवस्था बदलने की जरूरत है। इसके अलावा सरकारी निर्णयों में मीडिया का हाथ देखना है तो पढ़िए (https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2885243528234998&id=100002481383786)  इन किसान विरोधी सरकारों को अंग्रेजों के तरह केवल कर वसूलने, नही तो कोड़ा बरसाने की नीति के बजाय सकारात्मक कदम उठाना चाहिए और किसान संगठनों को निश्चित रूप से बातचीत में शामिल करना चाहिए।

29 अप्रैल, 2020 के मेरे लेख पर आधारित

https://www.facebook.com/100000342646130/posts/pfbid02AyrEwkJBhhqZF47YLoXAfWZCS4mEW8py11Usm82F57mfcxNNmduRFNxAbsU1fecil/?mibextid=Nif5oz

~ ई0 राहुल पटेल, IITR

परिचय:- पूर्व सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल, किसान नेता, उद्यमी, लेखक, विचारक

संयोजक, ग्रामीण संघ एवं पटेल बुद्धिजीवी संघ, 8610136135