#समाज #आदिकिसान #पोल_खोल
कल एक बौद्धिक व्हाट्सएप्प ग्रुप में चर्चा शुरू हुई कुछ सदस्यों द्वारा कुछ अन्य सदस्यों के धार्मिक पोस्टों पर आपत्ति से। एक सदस्य ने तंज कसा कि इस ग्रुप का सारा ऊर्जा धर्म, पाखंड के विरोध में लगता है। उनकी शिकायत थी कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सम्मान के मुद्दों पर बात होनी चाहिए।
ऊपर से यह बात जँचती है, सो, एक अन्य सदस्य ने चर्चा पर तंज कस दिया कि इस ग्रुप में "कौन ज्यादा बुद्धिजीवी है" की होड़ मची रहती है। इस सदस्य ने तुरंत ही संसद में one nation one election का बिल पास होने पर दुख जताया कि देखिए हमलोग धर्म, पाखंड पर चर्चा कर रहे हैं और उधर यह क्या हो गया।
कुछ ही देर में BPSC अभ्यर्थियों द्वारा कुछ सच्चाई रखने की बात की। कल रात में DM रोहतास ने msp गारंटी कानून तथा सोन नदी पर कदवन जलाशय की माँग कर रहे किसानों का टेंट उखड़वा दिया। दिल्ली बॉर्डर पर पिछले किसान आंदोलन को वादा कर तुड़वाने में सफल भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन फिर से तेजी पकड़ रहा है। आज सुबह एक बड़े भाई पेंशनर समाज के कल के बैठक की बात बताने लगे कि कैसे बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट के पेंशन से संबंधित आदेश को लागू नही कर रही है। उनके पहले, मोबाइल पर न्यूज़ देखते समय मैंने पढ़ा कि देश मे ओबीसी स्कॉलरशिप कैसे साल साल भर से लटका है और ओबीसी विद्यार्थी इससे कितना प्रभावित हैं। ओबीसी बैकलॉग वैकेन्सी, ews, ओबीसी एससी एसटी का आरक्षण, चुनावी धांधली, उद्योगपतियों का अरबों का कर्जा माफी, सरकारी विभागों में घूस, काम का न होना, सुप्रीम कोर्ट का फैसला कि मस्जिद में जय श्री राम का जयकारा लगाने में कोई बुराई नही, मस्जिदों की खुदाई, पुरातत्व विभाग द्वारा पत्थरों की भी कार्बन डेटिंग, विभिन्न सरकारी पदों पर केवल मिश्रा, तिवारी, राजपूत, बनिया की भर्त्ती, लेटरल एंट्री मतलब मुद्दों का न तो ठिकाना है, न नए मुद्दों के खड़ा होने की दर कम हो रही है।
ध्यान देने की बात यह है कि इन विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाले ओबीसी, एससी एसटी लोगों/संगठनों को अनेकों लोग पैसा दे रहे हैं, अनेकों लोग लाठियाँ खा रहे हैं, अनेकों की जाने जा रही हैं, समय और श्रम तो जा ही रहा है, अनेकों प्लेटफार्म से रात दिन चर्चा होती है, खूब कोसा जाता है, पर मुद्दों का अंत नही हो रहा है। सौ में से एक का हल निकल नही रहा, तबतक सौ और नए पैदा हो रहे हैं। वे अंतहीन हैं, अंतहीन रूप से लगातार पैदा हो रहे हैं, किये जा रहे हैं। यानी तू डाल डाल, सरकार और व्यवस्था पात पात। इन दोनो पर पूर्ण नियंत्रण कुछ ही जातियों का है।
स्पष्ट है ये मुद्दे बाकियों के हित मे हैं, केवल ओबीसी, एससी, एसटी के लिए परेशानी हैं। तो, हर मुद्दों के पीछे भागने के बजाय यह बताईये कि ये पैदा ही क्यों हो रहे हैं? जवाब है, संस्कृति। जबतक आप स्वयं को हिन्दू/सनातनी/ब्राम्हणी संस्कृति का समझेंगे तबतक आप उनको चुनते रहेंगे, उनको पैसा देते रहेंगे, उनकी बात मानते रहेंगे, स्वाभाविक रूप से उनके द्वारा अपने हित मे बनाये गए नीतियों,नियमों को कोसते रहेंगे, विरोधों में अपने संसाधन लुटाते रहेंगे, लेकिन घुमाफिराकर उसी संस्कृति को ढोते रहेंगे। अतः जरूरत है सांस्कृतिक परिवर्त्तन की। आप समूह मे या अकेले स्वयं को गैर हिन्दू घोषित करना शुरू कीजिए। उनके लिखे किताबों, इतिहासों, न्यूज़ को देखना सुनना बंद कीजिए। उनसे उपकृत होना और उपकार करना बंद कीजिए।
~राहुल पटेल
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