भतीजा की बाइक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। बनारस में मैं साथ में तीन दिन था। मैं अपनी माँ के साथ भैया के यहाँ उसीके दसही पर जा रहा था। ट्रेन 7:40 पर सुबह में था। मैंने माँ को पहले ही घर से भेज दिया। स्वयं मैं कुछ कर रहा था, सो पीछे से झटपट काम निपटा के मैं भी निकल गया। मेरे घर से स्टेशन तेज चलने पर 12 मिनट के रास्ते पर था। माँ 25 मिनट पहले निकली थीं। मैं 20 मिनट पहले निकला था। रास्ते में कुछ दूसरी गलियों में भी ढूँढा कि अभी यहीं तो नहीं है। फोन उठा नहीं रहीं थीं। कुछ मिनट बर्बाद करने के बाद सड़क पर खड़े एक परिचित दिख गए। उन्होंने बताया कि आपकी माँ आगे निकल गयी हैं। मैं स्टेशन तेजी से पहुँचा। सामने ट्रेन अब खुलने के लिए हॉर्न मार रही थी। मैं इधर उधर देखा, माँ कहीं नजर न आ रहीं थीं। दुबारा फ़ोन किया तो उन्होंने इसबार उठा लिया। बात करते हुए मैंने नजर उठा कर देखा वो अभी आ रहीं थीं। अंदर से मुझे खीझ होने लगी। मैं उनकी ओर लपका। अभी भी 100 m दूर थीं। सीढ़ी चढ़ना और उतरना था और उसके बाद भी 50 m चलना था। उनके पास पहुँचते ही ट्रेन दूसरी बार हॉर्न दी और चल दी।
इतने पर मैं अपनी माँ पर झल्लाने लगा। 'आपको घर से आने में आधे घंटे लग गए। आपको छोड़ दिया जाए तो आप तो एक घंटा ले लेंगी। बताईये! आपके चलते ट्रेन छूट गया। अब क्या किया जाए? ऐसे कहीं जाना हो तो फटाक से चली जायेंगी। जब जल्दी चलना था तो टूँगुर टूँगुर चल रहीं हैं। अब बस से जाना पड़ेगा। अगला ट्रेन 10:15 बजे है। बताईये! कितना भाड़ा लग जायेगा। चलिए अब घर चलिए।'
मैं आपे से बाहर हो रहा था। माँ ने कहा, 'अब इतना ही चला जा रहा है तो मैं क्या करूँ!'
मैं थोड़ा झिझका। लेकिन खीझ बना हुआ था। मैंने पूछा, 'आप फ़ोन क्यों नहीं उठा रही थीं?'
उन्होंने कहा, 'थैली के अंदर था तो नहीं सुनाई पड़ा।' निश्चित रूप से भीड़ भाड़ वाले इलाके में नहीं सुनाई पड़ा होगा, क्योंकि स्टेशन रोड में उन्होंने फ़ोन उठाया था।
कुछ दूर घर की तरफ चलने के बाद मैं फिर से उबल पड़ा। 'छोड़िए! अब घर नहीं जायेंगे। आप आने जाने में ही एक-डेढ़ घंटा लगा दीजियेगा। कोई फायदा नहीं है। चलिए प्लेटफार्म पर ही बैठ के हमलोग अगले ट्रेन का इन्तजार करेंगे।'
स्पष्ट रूप से बस का महँगा किराया मेरे दिमाग में नाच रहा था और माँ को मजा चखाने की भी इक्छा थी। सो, हमदोनों बतौर सजा स्टेशन पर चले आये और ढ़ाई घंटे इन्तजार किये। उस इन्तजार के अंतिम क्षणों में जब मैंने अपने कमर दर्द की शिकायत की तो माँ ने धीरे से कहा कि उनको भी चोट लगे कमर के हिस्से में दर्द हो रहा है।
खैर ट्रेन आयी और हमलोग अपने गंतव्य पर चले गए।
मैं जानता हूँ कि ऐसा आपके साथ भी होता है। कई बार अक्सर! परिस्थिति और लोग अलग हो सकते हैं। जैसे कि आपके घर में कोई अतिथि आ जाये और उसे ठहरने की आवश्यकता पड़े, जिससे आपके दैनिक गतिविधि में लगातार खलल पड़ता हो या आपके परिवार में अचानक कोई बीमार पड़ जाए या कोई अन्य परिस्थिति पैदा हो जाये और उसी समय आप ऑफिस या किसी काम से घर से निकल रहे हों और पहले से ही टेंशन में हों या अपने/किसी बच्चे को, किसी कस्टमर को, किसी परिजन आदि को कुछ समझाने की
लगातार कोशिश कर रहे हों, पर, वो नहीं समझ पा रहा हो आदि आदि।
इन सभी में एक बात यह रहती है कि हम सामने वाले के दृष्टिकोण को समझे बिना अपने दृष्टिकोण को थोपने की कोशिश करते हैं, जिसकी असफलता खीझ पैदा करती है। यहीं अँग्रेजी कहावत एकदम फिट बैठती है, 'Putting oneself into other's shoes.' हालाँकि यह अस्वाभाविक बात है। आखिर दूसरों की समझ, दृष्टिकोण को परखने में प्रयास लगाना पड़ता है और हमलोग चीजों को सहजता से करने के लिए या सहज बनाने के लिए बने हैं। स्वभावतः कोई भी अपने तरीके से ही सोचेगा और करेगा या करवाएगा। यह 'ease of doing' हमारे दैनिक जीवन में सर्वव्यापी है। इतना ज्यादा कि इसका इस्तेमाल कर हमारा आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक शोषण किया जाता है, यह बात हमारे समझ में नहीं आ पाती। पर, मैंने अपनी माँ के ढलती उम्र के चलते उनके स्टेशन पहुँचने में देरी लगने के बारे में सोचने के बजाय स्वयं के द्वारा लगने वाले समय के बारे में सोचा था और थोड़ा अतिरिक्त समय दिया था। पर, उतने समय में भी माँ के स्टेशन न पहुँच पाने के कारण मैं गुस्से में था। यानी माँ मेरी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरी थीं। तो दूसरी बात यह रहती है कि हमलोग जो दूसरों से अपेक्षाएँ पाल लेते हैं, उनका पूरा नहीं होना खीझ का कारण बनता है। हर मामले में हमारी अपेक्षाएँ गलत हों, ऐसा नहीं है। जैसे बच्चे को गलत राह से हटाने की कोशिश का आशातीत परिणाम गलत नहीं है। पर अपेक्षा पूरी न होने की असफलता खीझ तो पैदा करती है। यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि हमें उनसे यह अपेक्षा नहीं पालना चाहिए। पर, यह समझ पैदा करना कि सामने वाला हमारी अपेक्षाओं पर खरा नहीं भी उतर सकता है और कोई दूसरा तीसरा उपाय किया जाए या परिस्थिति को यूँ ही छोड़ दिया जाए, काफी राहत भरा हो सकता है। यह अपेक्षा पूरी न होने की असफलता को सम्मानित रूप से स्वीकार करने का एक अवसर देता है। तीसरी बात यह रहती है कि सामने वाले से कोई बात किये बिना हमलोग स्वयं से कुछ मान लेते हैं, assume कर लेते हैं और बाद में स्वयं के गलत साबित होने पर खीझ होता है। सामने वाला पर इसके लिए गुस्सा केवल अपनी गलती
ये दोनों बातें हमलोग अमल में लाते हों या न लाते हों, पर, सामान्य रूप से हम सभी जानते हैं। लेकिन मैं यह भी सोच रहा था कि मेरे दिमाग में थोड़ी सी देर होने के कारण ट्रेन के छूट जाने यानी समय के हाथ से फिसल जाने की बात जो मूलतः मेरे गुस्सा का कारण बनी, ये कहाँ से आई? हमारे यहाँ किसी अतिथि के ठहर जाने या आने की वजह से हमारे दिनचर्या की तारतम्यता टूटने पर समय खराब होने की सोच,