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पुराने मंदिरों या किसी ऐतिहासिक स्थलों पर मूर्त्तियों का पाया जाना, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में मूर्त्तियों का सर्वथा अभाव और मूर्त्ति बनाने वालों का सर्वथा अभाव यह बताता है कि मूर्त्ति वाले लोग दूसरे लोग थे। जो भी धार्मिकता है, लोग पहले मिट्टी के पिंड या प्राकृतिक रूप से मिले गोल मटोल पत्थरों और पिछले 50 वर्षों में तस्वीरों से ही काम चलाते रहे हैं। यही कारण है कि आपको शोखा बाबा या ऐसे ही कोई कुल या ग्राम देवता हर गाँव, हर घर में मिल जाएंगे। बाद में बहुतायत में शिव, हनुमान का पूजन शुरू हुआ। 'बाद में' का सबूत ग्राम देवताओं की अपेक्षा इनकी संख्या में काफी कमी है। शिव का प्रचलन बौद्धों के मनौती स्तूपों से आई है। हनुमान का प्रचलन भी बौद्ध कथाओं के किसी पात्र से आई है। लेकिन आपको आज भी राम, श्याम, विष्णु, सीता, पपीता की मूर्त्ति या मंदिर 50 km के दायरे में भी कम ही दिखते हैं। पिछले कुछ सौ सालों में इनके बारे में लोगों ने केवल रामलीला, भजन, पोथियों, बाद में टीवी धारावाहिकों आदि के माध्यम से ही सुना और बोलना सीखा। जो सीधा सबूत है कि ये पिछले कुछ सौ वर्षों में भारतीय भौगोलिक क्षेत्रों में आये।
यहाँ दो चीजें ध्यान देने लायक है-
1. मूर्त्ति की संस्कृति का अभाव
2. किसी देवी देवता के पूजा स्थल की सर्वव्यापकता
~राहुल पटेल
2 comments:
Right and true
बिल्कुल सही। जनता सिर्फ बहती हुई धारा के साथ चल रही है। इतिहास के प्रति जागरूकता का अभाव है।
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