Tuesday, March 26, 2024

'दिल का विषय है'

 #समाज #आदिकिसान

मेरी समझ से साधारणतः इसका मतलब होता है कि किसी कार्य को करने का तरीका reproducible नही है, मान्यता आधारित है, एक ही व्यक्ति का हरबार और व्यक्ति व्यक्ति का भी तरीका अलग हो सकता है, परिणाम बदल सकता है। यह एक तरह से अँधेरे में काम करने जैसा है, जहाँ आप एक आशा से कोई चीज करते हैं, पर लक्ष्य की संभावना तय नही है। इसे आप ज्यादातर पॉजिटिव सोच के रूप में परिभाषित करते हैं। पर, यह उसी तरह से है कि रास्ते मे चलने पर सोना गिरा हुआ मिल सकता है तो आप अब रोज पैदल 40 km इस आशा में चलते हैं कि शायद किसी दिन सोना मिल जाये। यह ज्यादातर मामलों में बेवकूफी है।


इसका उल्टा है प्लानिंग करके कोई काम करना। संभावना तय करना। इसमे कार्य को करने के लिए जरूरी घटकों का आप मोटा मोटी अनुमान लगा लेते हैं।

दिल के विषयों में आप कोई अनुमान नही लगाते हैं। चीजें सामने आती जाती हैं, आप अव्यवस्थित तरीके से समाधान का प्रयास करते जाते हैं।

दोनो विधियों का अपना अपना महत्व है। कुछ अवसरों पर प्लानिंग संभव नही होता है। पर, यह तय है कि दिल के विषयों में प्लानिंग की अपेक्षा असफलता की संभावना ज्यादा रहती है। कटु अनुभव भी ज्यादा होते हैं।

पोस्ट लिखने के लगभग आधे घंटे के बाद fb पर 'दिल का विषय है' के एकदम फिट केस मिले।

जरा Balendu Goswami का दुखड़ा पढ़िए.....

"मेरे मित्र Girijesh Tiwari जी ने मेरी दस साल पुरानी एक पोस्ट शेयर करी. जिसके कि कुछ अंश अब असत्य साबित हो चुके हैं. (वह पोस्ट मैं नीचे कमेंट में पेस्ट करूँगा)

कल्पना करें, कैसा लगता होगा जब अपने ही दावे गलत साबित हो जाएँ और मिथ्या गर्व टूट जाएँ! मैं भी आजकल अक्सर कुछ ऐसा ही महसूस करता हूँ.

मैंने गिरिजेश जी को ये जवाब दिया:

आदरणीय गिरिजेश जी, इस पोस्ट को शेयर करने के लिए धन्यवाद। परन्तु दस साल पहले लिखी मेरी इस पोस्ट की कुछ बातें असत्य साबित हो चुकीं हैं.

बाप और भाई द्वारा विश्वासघात के बारे में ......

यहाँ एक बात और भी मैं जोड़ना चाहुंगा कि मैंने जर्मनी स्थित हमारी चैरिटी संस्था से भी इस्तीफ़ा दे दिया था क्यों कि वहाँ बच्चों के लिए भेजे जाने वाले दान के पैसे का दुरूपयोग हो रहा था. मेरा कोई कंट्रोल नहीं रहा मुझे चैरिटी की कोई रिपोर्ट नहीं मिल रही थी इसलिए मैं कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था उस दान के पैसे की जो पूरी दुनिया से मेरे सहृदय मित्र बच्चों के नाम पर पैसा भेजते थे. इसके उलट मेरे कुछ दानदाता दोस्त जब यहाँ से हमारे वृन्दावन के आश्रम में गए तो उन्होंने जो खबर दी वह चौंकाने वाली थी. उन्होंने बताया कि कैसे उनका दिया हुआ दान का पैसा आश्रम में शराब, जुआ और अय्याशियों में खर्च हो रहा है.

दोस्तों मैंने सार्वजनिक रूप यह सब लिखने का निर्णय इसलिए किया क्यों कि भारत में अब कोई भी ऐसा नहीं रहा जिसे मैं अपना कह सकूँ। मुझे बहुत प्यार मिला है यहाँ आपका और अब मुझे आपका नैतिक सहयोग चाहिए।

फिर से बाप और भाई द्वारा विश्वासघात के बारे में ......
"

इस केस में धार्मिक भावना को इन्होंने मानवीय भावना समझ कर अपने छवि को बरकरार रखने के लिए वृंदावन के किसी आश्रम को दान दिया और दिलवाया। पर, ऐसे लाखों कवियों को अंत मे केवल कड़वा अनुभव ही हासिल होता है।

इसलिए ज्यादातर परिस्थितियों में हमलोगों को दोनो का मिक्स अपनाना चाहिए। प्लानिंग थोड़ा ज्यादा, दिल का विषय थोड़ा कम।

समता, बंधुता, न्याय की बात आज 70 वर्षों के बाद भी इसीलिए हो रही है कि यह प्लानिंग के बजाए दिल का विषय बना हुआ है। यह लगभग हर क्षेत्र में हमारे विकास में बाधक है। यह काव्यात्मक भावना है। ऐसे लोगों को manipulate करना आसान है। धूर्त्त लोग ऐसे लोगों का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं। जब धोखाधड़ी का पता चलता है, तो ऐसे लोग शोषण और भेदभाव का रोना रोते हैं, पर अगला कदम फिर से दिल का विषय बना लेते हैं।

इसपर हमसभी को गौर करना चाहिए।

~ राहुल पटेल
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Monday, March 18, 2024

सिंदूर खेला

 #आदिकिसान #लुक_ईस्ट #समाज #adikisan #lookeast

हिंदुओं की शादी बिना सिंदूर के नही मानी जायेगी। तो, सिंदूर अति प्राचीन होना चाहिए। मनुस्मृति, अथर्ववेद, महाभारत, मेहरगढ़ की खुदाई, आदि शंकराचार्य के साहित्य, रसजलनिधि, गर्ग संहिता, सुश्रुत संहिता, चरकसंहिता, पुराणों में जैसे विष्णुधर्मोत्तर पुराण, गरुण पुराण, पद्म पुराण, अग्नि पुराण, स्कन्द पुराण, देवी भागवत पुराण, लिंग पुराण आदि में इनका वर्णन है।

https://www.wisdomlib.org/index.php?type=search&division=text&input=Sindura%2C+Sind%C5%ABra%2C+Simdura%2C+Si%E1%B9%83d%C5%ABra%2C+Si%E1%B9%83dura%2C+Sind%C5%ABram%2C+Sind%C5%ABra%E1%B9%83%2C+Sind%C5%ABra%E1%B8%A5%2C+Sinduras%2C+Sind%C5%ABras%2C+Simduras%2C+Si%E1%B9%83d%C5%ABras%2C+Si%E1%B9%83duras




तो, बताईये कि आज केमिकल वाले सिंदूर के पहले सिंदूर किस चीज का था? 


इसपर कुछ लोग सिंदूर के पेड़ की बात करते हैं, जिसका भारत मे फैलाव नगण्य है। दक्षिणी अमेरिकी मूल का यह पौधा Bixe Ornella स्पैनिश व्यापारियों द्वारा 17वीं शताब्दी में वहाँ से दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों में लाया गया था, जहाँ यह आज भी कमर्शियल स्तर पर उगाया जाता है। पूरे दुनिया मे इसका इस्तेमाल सिंदूर के रूप में नही हुआ। तो, भारत मे यह सिंदूर पाउडर के रूप में आया हो, संभव नही है। चूँकि भारत मे यह पेड़ पाया ही नही जाता तो इससे सिंदूर उत्पादन की भी कोई संभावना नही है। इसे हर घर मे व्यक्तिगत स्तर पर लगाकर इस्तेमाल की बात भी संभव नही है। ऐसा होता तो भारत भर में यह पाया जाता और सिंदूर आजतक के इतिहास में लोगों ने मेलों से खरीदकर ही लगाया है यानी यह व्यापार के माध्यम से ही इस देश मे आता रहा है।


ज्ञात हो कि पहले किराना दुकान और सड़कें नही थीं। व्यापार का एकमात्र तरीका मेला था। फिर इन मेलों में किन चीजों के सिंदूर बिकते थे?





सिनेबार/Cinnabar/HgS



यह खनिज पत्थरों के रूप में ओलेमिक सभ्यता, चीन के लगभग 1500 BCE से तथा स्पेन में रोमनों के समय से किया जाता रहा है। यह चित्रकारी, पॉटरी (मुख्यतः चीन), कपड़ा रँगने में लाल पिगमेंट्स के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, पर, सिंदूर के रूप में पति के दीर्घायु कामना वाली मान्यता पूर्णतः भारतीय उपमहाद्वीप का ईजाद है। इस धरती पर सिंदूर को खपाने(चटगाँव से पेशावर वाला व्यापारिक रास्ता यूरोपियन व्यापर का सबसे अंतिम फेज था) के लिए इसे बजाय किसी धार्मिकता से जोड़ने के(अभी धर्मों का जोर भारत मे पकड़ा न था) पति के दीर्घायु कामना वाली भावना से जोड़ा गया। किसने जोड़ा के पहले प्रश्न है, किसने लाकर माल भारत मे खपाना चाहा तो उत्तर है अँग्रेज व्यापारियों ने। स्वाभाविक है कि सबसे पहले उनके साथ आये सेवकों ने इसका सेवन किया। कालांतर में धर्म से सिंदूर का जुड़ाव इतना ही हो सका कि देवियों को भी सिंदूर लगाया जाने लगा। यह मजेदार भी है, क्योंकि देवी जो मनुष्यों से बहुत ऊपर की चीज होनी चाहिए थीं, उनके पतियों यानी देवताओं के दीर्घायु कामना के लिए सवर्ण औरतों ने देवियों पर(मूर्त्तियों पर) सिंदूर लगाना या चढ़ाना शुरू किया क्योंकि उनके अपने हाथ कार्यरत तो है नही। यह अत्यंत हास्यास्पद है।

















भारत मे 1978 के रिपोर्ट में जियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने यह कहा है कि भारत मे यह नही पाया जाता। इसके चीन और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आने का उल्लेख वाग्भट्टाचार्य के पुस्तक रसरत्नसामुख्य में है। इसके पाकिस्तान के दर्दीस्तान से भी आयातित होने का उल्लेख है। पर, इसको भारत मे कहीं भी दरद नाम से नही जाना जाता है। पूरे भारत मे यह सिंदूर, उसके cognate और वरमिलन(शायद ही) नाम के अलावा किसी दूसरे नाम से नही जाना जाता है। भारत मे सिंदूर खेला या सिंदूर का फैलाव आप बंगाल से पाते हैं। भारत मे यूरोपियन व्यापारियों के साथ यह बंगाल की तरफ से 200 साल पहले यानी 19वीं शताब्दी में प्रवेश किया। यानी वाग्भट्टाचार्य के नाम से समय मे पीछे जाकर यह सब गपोड लिखा गया है। इसतरह से भारत मे अपने शुरुआती दौर से ही सिंदूर पारा/mercury के रासायनिक रूप में इस्तेमाल हुआ है। बंगाल में भी इसका प्रभाव सबसे ज्यादा वर्ण व्यवस्था वाली जातियों यानी हिंदुओं तथा लूँगी वाले मुस्लिमों(लूँगी इंडोनेशिया का पहनावा है) में देखा जा सकता है, जो इन दोनों के बाहरी होने का सबूत है। बंगाल और पूर्वी समुद्र तटीय क्षेत्रों से जैसे जैसे आप दूर जाते हैं, सिंदूर का प्रयोग आप कम या नही देखते हैं। आजकल यह भखरा सिंदूर के नाम से बिकता है। बाकी सिंदूर अब HgS न होकर महज लाल pigment हैं।








सासाराम, बिहार के हिंदी के प्रो0 राजेन्द्र प्रसाद इसी विषय पर बताते हैं कि सिंदूर का इतिहास भारत मे अति प्राचीन है। देखिए https://youtu.be/6mclAOcJfTI?si=3sjPzWoJ4caFyCrU 

इसके पक्ष में वे कहते हैं कि पूरे भारत मे इस पदार्थ के लिए सभी भाषाओं में सिंदूर शब्द का ही इस्तेमाल होता है। भाषाविद के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहे राजेन्द्र बाबू का यह कथन उनके भाषाविद की तरह सोचने पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। सभी भाषाओं में स्थानीय चीजों के लिए अपने शब्द होते हैं। यदि कोई चीज व्यापारियों द्वारा एक बड़े भूभाग में फैलाई गई हैं तो उसका नाम उस पूरे क्षेत्र में व्यापारियों द्वारा दिया गया नाम होगा। जैसे सिंदूर की ही तरह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का मूल 'लेमो'/lemon इस देश मे मुगल और अँग्रेज व्यापारियों द्वारा लाया गया है और लेमो के cognate लेम्बो, लिम्बु, निम्बू, ए'लेमु'कायी, 'निमा'कायी(कायी का मतलब हरी सब्जी/फल)आदि नामों से जाना जाता है। यही नही अँग्रेजी में भी lemon लेमो का ही cognate है। अनेकों महाद्वीपों के अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में lemon को लेमो के cognate से ही पुकारा जाता है। ऐसा इसलिए कि यूरोपियन व्यापारियों के माध्यम से यह दुनिया के अनेकों कोनों में पहुँचा और इसलिए नाम भी हर जगह समान है।


चाय के साथ भी यही बात है।


स्पष्ट है कि सिंदूर शब्द के समरूपता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत मे यह अपेक्षाकृत अत्यंत नई चीज है। संस्कृत और पाली जैसी नई भाषाओं का तो कहना ही क्या, जिनका अपना कोई बोली क्षेत्र ही नही है और इसलिए इनके भाषा कहे जाने पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह है, इनमे इनको सिंदूर क्यों नही कहा जायेगा?

आगे राजेन्द्र बाबू किसी थाइलैंडी भोलानाथ तिवारी की इलाहाबाद से अँग्रेजों के समय मे छपी शब्दकोश 'वृहत पर्यायवाची कोष' का हवाला देते हुए कहते हैं कि सिंदूर के अनेकों पर्यायवाचियों में नाग शब्द जुड़ा हुआ है। यह इसकी भारत भूमि पर प्राचीनता का एक और सबूत है।





उक्त कोष की पर्यायवचियाँ- अरुण, अरुणपराग, गणेशभूषण, नागगर्भ, नागज, नागरक्त, नागरेणु, नागसम्भव, भालदर्शन, रंगज, रक्त, रक्तचुर्ण, रक्तबालुक, रक्तबालुका, रक्तशासन, वीर, वीररज, शिव, शोण, संध्यारुण, श्रृंगारभूषण, सिंदूर, सेंदुर, सोमंतक, सीसज, सीसोपधातु, सींदुर, सेनुर, सोहाग, सौभाग्य, सौभाग्यचिन्ह

आप देख सकते हैं कि इनमे से सिंदूर, सेनुर जैसे cognate को छोड़कर किसी भी दूसरे शब्दल का इस्तेमाल इस पदार्थ के लिए पूरे भारत मे कहीं नही होता। अरुण, अरुणपराग, रंगज, रक्त, रक्तचूर्ण, रक्तबालुक, रक्तबालुका, वीर, वीररज, रक्तशासन, संध्यारुण तो स्पष्टतः लेखक की अपनी कल्पना मालूम पड़ती है। शिव, सोहाग, सौभाग्यचिन्ह, सौभाग्य आदि tounge in cheek वाली बात है, काव्यात्मक भावनाएँ हैं। सीसज और सीसोपधातु(सीसा/लेड/lead) इस वास्तविकता को बयां करता है कि लेखक को यह पता था कि यह हमेशा से रासायनिक रूप में इस्तेमाल होता रहा है। पर, लेखक को लेड और मरकरी में अंतर नही पता होना यह बयां करता है कि ये दोनों पर्यायवाची मनगढ़ंत हैं। ऊपर, भारत मे इसके वनस्पति से न आने से तथा भारत मे इस रसायन के सन 1978 तक न मिलने का साक्ष्य दिया जा चुका है। रह गयी बात इसके पर्यायवाचियों में नाग शब्द जुड़े होने की, तो, ये सारे पर्यायवाची भोलानाथ के दिमाग की कल्पना में इसलिए संभव हुआ कि उसकी प्रजाति दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से ही भारत मे अँग्रेजों और मुगलों के साथ सेवक के रूप में प्रवेश की है। नागवंशीय लोग मूलतः ऑस्ट्रोनेशियन लोग हैं, जिनका उद्गम ताइवान माना जाता है। इसलिए उसे लगा होगा कि सिंदूर नागों की देन है तो नागज, नागगर्भ। जो कि चीन से आयात के क्रम में नागों के हाथ लगी और बहुत बाद में भारत मे आयी। लेखक की कपोल कल्पना का सबसे बड़ा सबूत है कि उसे दक्षिण भारतीय भाषाओं में वरमिलन भी कहते हैं का अंदाजा ही नही है, नही तो वह उन्हें भी पर्यायवाचियों के लिस्ट में शामिल जरूर करता।

राजेन्द्र बाबू को ये नाग वाले पर्यायवाची ही क्यों लुभाते हैं, अन्य पर्यायवाचियों की उन्होंने क्यों कोई बात नही की तो उनके अब तक के सारे कथन, लेखनी देखिए। उनके दिमाग मे यह कहीं से भर गया है कि नागवंशीय मूलतः भारतीय हैं। पूरा मूलनिवासी समाज नागवंशीय है। नागवंशीय लोग पूरे भारत मे हैं। ये मोहनजोदड़ो में भी थे, हड़प्पा में भी थे। मतलब नाग ही नाग, जो कि सच्चाई से कोसो दूर है। 

सिनेबार/मरक्यूरिक सल्फाइड चीन से पहले दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में आया है और सबसे अंत मे भारत मे आया है। मरक्यूरिक सल्फाइड के चीनी नाम चेनशा/शेनशा(शा - sand, धूल, धुर) से ही सेंधुर, सेंदुर, सेनुर, सिंदूर cognate आये हैं और यूरोपियन शब्द सिनेबार आया है।


https://www.zo.uni-heidelberg.de/sinologie/research/mining-sw/minerals/mercury_cinnabar.htm

अलकेमिस्ट/कीमियागर(नाम हिंदी लग सकता है, लेकिन कीमिया, केमिस्ट, केमिकल, केमिस्ट्री के chemia एक ही हैं। इसका हिंदी नाम 'रसायन' chin-yeh के yeh यानि हर्बल जूस से गढ़ा हुआ है) की शुरुवात चीन से हुई है और सिनेबार को दवा के रूप में(खासकर सोना के साथ मिलाकर 'chin-tan') दिर्घायु और बाद में अमरता के लिए प्रयोग में लाया जाता था। खून को जीवनदायिनी समझने के कारण सिनेबार के लाल रंग से इसको खून बढ़ाने वाला समझा गया।  chin-yeh फुकीन भाषा में कीमिया हो गया। जो ईरान के लाल रंग के जीवनदायिनी कीमिया खजूरों के नाम का स्रोत है। और, फिर ग्रीक में 200 BC में  kimia/chemia(Alchemy) हुआ। इसतरह से  Alchemy का जन्मस्थल चीन है। सिनेबार के बारे में इजिप्ट अनजान था। यहाँ सोना को आयु बढ़ाने वाले दवा के रूप में कभी प्रयोग नहीं किया गया। दीर्घायु वाली किसी दवा का कोई कांसेप्ट न था और न ही कोई साधु सन्यासी का, जो ऐसे किसी दवा के फेरे में होते। अतः alchemy के जन्मस्थल के रूप में इजिप्ट के दावे में कोई दम नही है। विस्तृत विवरण 1987 मे  छपे Indian Journal of History of Sciences,` 22(1) : 63-70 (1987) के लेख "History of Cinnabar as drug, The natural substance and the synthetic product" शोध पत्र में देखा जा सकता है। दीर्घायु वाले इस कांसेप्ट को आगे बढ़ाते हुए chin-tan भारत मे मकरध्वज के रूप में जाना गया। मकर (एक मगरमच्छ सह मछली) दीर्घायु और वंश बढ़ाने वाला इन्डोनेशियाई देवता है। यानी मकरध्वज शब्द भी ऑस्ट्रोनेशियन है। आप चीन से नागों की धरती दक्षिण पूर्वी एशियाई देश और वहाँ से भारत में सिनेबार को आया देख सकते हैं। साथ ही यह भी देख सकते हैं कि इसके प्रयोगकर्त्ता भी नागों की धरती से भारत मे आये। समयकाल मे अंतर हो सकता है।


https://www.thefreelibrary.com/Chinese+cinnabar.-a0128330233

चीन में सिनेबार के और भी उपयोगों के दुर्लभ सबूत मिले हैं। 



"Researchers found the remains of a woman over 2,000 years old in northwest China with red-dyed teeth thanks to the use of cinnabar, a mineral composed of mercury sulfide. This is the first documented case in history where this material has been used to pigment teeth, leading experts to nickname the woman the Red Princess of the Silk Road.

The discovery was made in the Shengjindian cemetery, located in the Turpan Basin, a key region along the Silk Road. The young woman, aged between 20 and 25, was buried alongside three other individuals in a tomb dating from the period between 202 BC and 8 AD, during the Han Dynasty.

......

One of the most intriguing aspects of the discovery is the origin of the cinnabar. The Turpan Basin is not rich in this mineral, suggesting it must have been imported from other regions. In ancient times, the main sources of cinnabar were located in the southwest of China, in provinces such as Hunan and Sichuan, as well as in Europe, particularly in the famous Almadén mine in Spain....."

https://www.labrujulaverde.com/en/2025/02/the-red-princess-of-the-silk-road-the-only-person-in-ancient-times-with-teeth-dyed-with-cinnabar/

तो, भारत मे सिंदूर के इस 200 साल के अति प्राचीन इतिहास से आप हिन्दू धर्म और उसके ग्रंथों के अति प्राचीनता का अनुमान लगा सकते हैं। 

आप यह भी देख सकते हैं कि सिंदूर किस प्रकार चीनी और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के माल यूरोप ले जाने के क्रम में कुछ हिस्सा भारत मे खपाने की ओर इशारा करता है। अन्य माल थे, सूखा नारियल, मसाले, सूखा मेवा, अगरबत्ती, धूप, धार्मिक किताबें, कंठी माला, सुपारी, चंदन, लोहे के बने सामान आदि। ये माल मेला के माध्यम से खपाया जाता था, जो कालांतर में किरण के दुकान के रूप में उभरा है। आप यह भी देख सकते हैं कि क्यों हिन्दू धर्म ईसाई, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, सिख की तरह नही है, जिनमे एक प्रवर्त्तक या गुरुओं की श्रृंखला पाई जाती है। बल्कि ये set of practices हैं, जो व्यापारियों ने माल खपाने के लिए, आमजन में ब्राम्हण वर्ग की मदद से शतकों में अनेकानेक नए नए धार्मिक सामाजिक परंपराएं गढ़ीं। इन set of practices को हिन्दू धर्म की संज्ञा देकर जनमानस की भावनाओं को हाइजैक कर लिया गया है। 

तो, अब उपाय यह है कि:-

1. स्वयं को हिन्दू कहना मानना छोड़ दें और हिन्दू का मतलब केवल बाभन, मारवाड़ी, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ से लगाये

2. आपकी भावनाओं का केन्द्रीकरण कैसे किया जा रहा है, इसपर चर्चा करें

2. उन सारे धार्मिक सामाजिक set of practices को पहचाने, जिनमे उपयोग होने वाले सामान आपके स्थानीय क्षेत्र की है हैं नही और उनके बारे में आपस मे चर्चा करें कि कैसे व्यापारी अपने लाभ के लिए आपको गैर जरूरी चीजें आजतक बेचते आये हैं।


~ राहुल पटेल

https://www.facebook.com/share/73tfvnSrXHbDR55g/?mibextid=oFDknk



Saturday, March 9, 2024

Vedic युग फर्जी गप्प, मनगढंत कहानियाँ, पुरातात्विक प्रमाण कहाँ? पुरोहिती में एकजातीय वर्चस्व तोड़ें

 #लाइक_शेयर_और_सब्सक्राइब_ज़रूर_करें

सनातनी ब्रम्हाणी गप्प के फैलाव, विश्वास में खोजबीन की मानसिकता का अभाव एक कारण, किसी पद्धति या परम्परा के न मानने से किसी अनहोनी की आशंका निराधार, सोच और तथ्यों का दायरा बढ़ाना जरूरी, भारतीय इतिहास में कितना सच कितना फर्जी

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https://youtu.be/ATNNn9jhsRo?si=GS6RqAd7ZI4pRg0q

*पूरा पढ़ें, शेयर करें*


1. ज्यादातर सामाजिक बदलावों के कार्यक्रम गोल गोल घूमते हैं। यह जरूरी है कि यह मिशन अपने लक्ष्य तक पहुँचे


2. आदरणीय राजेश मोहन चौधरी पेशे से वकील हैं। वकील साहब सागर, मप्र से हैं। परिवार के लोग स्वन्त्रता आंदोलन से जुड़े रहे हैं। सामाजिक कार्यों से  पिछले 90 सालों से यानी 4 पीढ़ियों से ये लोग जुड़े हुए हैं।


3. आपका शुरुआती दायरा आपकी जाति आपका समाज होता है। बाहर निकलने से सोच और लोगों का दायरा बढ़ता है। इसको सोच के दायरा बढ़ने घटने के अलावा आपके दायरे का आपके पूर्वाग्रह पर असर से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए


4. यहाँ आप दूसरों के पूर्वाग्रह और जान बूझकर या अनजाने लगातार उनके प्रोपेगंडा का खेल देख सकते हैं। अपने भोलेपन में कैसे लोग सामने वाले के फर्जी बकवास को यहीं की संस्कृति और असली इतिहास मान बैठते हैं, देखा जा सकता है। राणा प्रताप का  80 किलो का भाला, 250 किलो का अन्य सामान वगैरह हास्यास्पद बात पर भी यकीन करना आसान है


5. ज्यादातर इतिहास वेदों और पुराणों के फ्रेम में रहकर लिखा गया है। इस संकुचित सोच के दायरे का कारण यह है कि किसान कामगार जातियों द्वारा लिखने का इतिहास अँग्रेजों द्वारा वेद, पुराण, गीता, भक्ति काल जैसे गल्प साहित्य लिखने और कलकत्ता से तथा बाद में गीता प्रेस से छपने के बाद शुरू हुआ


6. न तो किसी एक व्यक्ति से करोड़ों की आबादी वाला कोई समुदाय पैदा हो सकता है और न ही कछुए से मनुष्य पैदा हो सकता है। कुर्मी ही नही 3300 अन्य जातियाँ राम का वंशज बन रही हैं। स्पष्ट है कि यह सब ट्रेंड सनातनी कथाओं के मार्केट में आने के बाद का है। यह भी स्पष्ट है कि उस समय के नए नए शिक्षित लोग लिखित प्रोपेगंडा को सत्य मानकर उसी के दायरे में रहकर सोचते थे


7. कबीले/जनजातियों के टोटेम होते हैं। इन टोटेम के आधार पर समुदाय का नाम पड़ने की एक संभावना है।


8. किसान जातियाँ सिंधु घाटी की सभ्यता मूल की है। 1700 से 1500 BCE के बीच सिंधु नगरों का विनाश होता है। इसके बाद एक गैप/अंधकार युग आता है, जो 600 BCE छठी शताब्दी ई0पू0 तक चलता है। इसमे इतिहासकारों को कुछ खास नही मिला तो इस गैप में फर्जी तरीके से वैदिक युग घुसेड़ दिया, जिसका कहीं कोई पुरातात्विक साक्ष्य नही मिलता, केवल गपोड कहानियाँ मिलती हैं। 

किसी भी सभ्यता या युग का धरती के भीतर खुदाई में प्रमाण मिलते हैं। नगर या घरों के अवशेष मिलते हैं। यदि राजे महाराजे हों तो उनकी इमारतें, सिक्के, ताम्रपत्र, अनुदानपत्र, शिलालेख मिलते हैं। पर बीच के इस कालखण्ड में तथाकथित वैदिक युग का ऐसा कुछ भी नही मिलता है।

600 BCE छठी शताब्दी ई0पू0 में 16 महाजनपद हुआ करते थे। कुछ गणतांत्रिक थे, कुछ राजतांत्रिक। इन्हीं में से एक कुरु को लेकर महाभारत की कहानी चिपकायी हुई है। 

इन गणतंत्रों में हमारा इतिहास मिल जाएगा। पर 12वीं शताब्दी 1200 CE तक जातियों के नाम नही थे। वंशों और कबीलों के नाम थे। यानी लोग तो थे, पर वर्त्तमान नामों से उन्हें नही खोजा जा सकता।

ज्यादातर हमलोग वर्ण व्यवस्था वालों के दृष्टिकोण से इतिहास देखते, लिखते हैं। यदि बिंदुओं को तलाशा जाए, दृष्टिकोण बदला जाए, point of reference बदले जाए तो चीजें दिखने लगेंगी।


9. अपने बीच के चन्हकुआ लोग वर्ण व्यवस्था के गप्पों को तिल का ताड बनाकर बोलते हैं। रामदेव जी ने हिंदुओं की संस्कृति को 1 अरब 96 करोड़ 11 लाख वर्ष पुराना बता दिया। उन्होंने तो दुसरे की बोली बोल दी, पर, इस प्रक्रिया में दो बातें हुईं। एक तो उनका चेहरा धार्मिक मामलों में अभी तक फेंस पर बैठे लोगों को प्रकट रूप से हिन्दू बनाने में इस्तेमाल किया गया और दूसरा यह विषय relevant बना।

उतने समय पहले तो सभ्यता क्या, एक कोशिकीय जीव का रहना भी संभव नही था। 60 लाख वर्ष पहले एक कोशिकीय जीव अस्तित्व में आये। आधुनिक सीधा खड़ा हो सकने वाला मानव 1 लाख 60 हजार पहले आये। सभ्यताएँ अपने अनगढ़ रूप में भारत मे पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर लगभग 3000 BCE यानी लगभग 5000 साल से हैं। इसी से इनके गप्प की गहराई का अंदाजा लगा लीजिये।

पृथ्वी पर अबतक 10 प्रकार के आधुनिक मानवों से मिलते जुलते मानवों के अवशेष खोजे जा चुके हैं। भारतीय, चीनी, अँग्रेज, रेड इंडियंस ये सभी अलग अलग दिखते हैं। जलवायु, खानपान परिवर्त्तन के कारण हुई अनुकूलन से यह सब हुआ। ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों में निएंडरथल मानवों का डीएनए है। अब इसमें न कोई अलौकिक शक्ति और न राम, कृष्ण, ब्रम्हा की बात आती है।

सभ्यता का विकास दुनिया के अनेक कोनों में अलग अलग समयों में धीरे धीरे हुआ।

इजिप्ट, मेसोपोटामिया आदि की सभ्यता में धर्म स्पष्ट है, लेकिन सिंधु घाटी की सभ्यता में लोग प्रकृतिपूजक थे, श्रमण सभ्यता संस्कृति के थे। सिंधु घाटी की सभ्यता में राम, कृष्ण, गणेश, दुर्गा, हनुमान, ब्रम्हा, विष्णु, महेश कोई नही मिलेगा। वस्तुओं में कोई जानी पहचानी आकृति देखने की स्वाभाविक मानसिकता के कारण एक मूर्त्ति में कुछ लोग पहले जैन तीर्थंकर तो कुछ लोग शिव देख रहे हैं।

छठी शताब्दी ई0पू0 में बुद्ध का साहित्य लगभग 65 सम्प्रदाय और जैन धर्म का साहित्य 365 सम्प्रदाय की बात कर रहा है। पर, इन दोनों में कहीं भी वैदिक सम्प्रदाय का नाम नही आया है। तीन मुख्य सम्प्रदाय थे, जैन, बुद्ध और आजीवक। इनके पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं। भारत के अलग अलग भागों और समयों में अनेकों सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। पर, इनमे से किसी मे राम, कृष्ण, हनुमान काली, दुर्गा नही मिले हैं।


10. जैन, बौद्ध मुर्त्तिपूजक नही थे। समय के साथ बाहर से आये लोग अपनी आस्थाओं का, संस्कृति का, भाषा का, देवी देवताओं का समावेश करते चलते हैं। 30 ई0 से आये कुषाण लोग बुद्ध की मूर्त्ति पूजा शुरू करते हैं। यहीं से मूर्त्ति पूजा, कर्मकाण्डों आदि की शुरुवात होती है। साड़ी, सिंदूर, लूँगी, अक्षत आदि आपको भारतीय संस्कृति लगती होगी, पर 200 ई0 तक की शुंग काल की मूर्त्तियों में आपको साड़ी नही मिलेगी।

अब रामायण में सीता साड़ी पहने दिखाई जाती है तो यह घटना कितनी पुरानी हो सकती हैं?

परम्पराएँ, रीति रिवाज बदलते हैं। किसी का ये दावा की सनातन अति प्राचीन है या ये पहनावे, रीति रिवाज, पूजा-संस्कार पद्धति इसके मानक हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। आज की पद्धतियाँ, पहनावे, रिवाज टीवी सीरियलों के माध्यम से बाजार के अनुरूप गढ़े जा रहे हैं। बाजारवाद वर्ण व्यवस्था की पहचान है।


11. अपनी शादी में चौधरी साहब ने तीन संकल्प लिए। 

- जन्मपत्री नही मिलवाऊंगा

-  ब्राम्हण पुरोहित से शादी नही करवाऊंगा

- मेरी शादी तिथि मुहूर्त्त के हिसाब से नही होगी

आज 22 साल से चौधरी साहब का वैवाहिक जीवन बाकी लोगों जैसा ही आम है। तात्पर्य यह कि किसी खास परम्परा या पद्धति को न मानने से किसी अनहोनी की आशंका निराधार है। अतः यह मिशन पुरोहिती के दशा दिशा को सुधारने का अति उत्तम काम कर रहा है। इस क्षेत्र में एक जाति का वर्चस्व समाप्त करना अनेकों समस्यायों का समाधान है।

~ आदरणीय राजेश मोहन चौधरी, वकील, इतिहासकार,समाजसेवी


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