#समाज #आदिकिसान
मेरी समझ से साधारणतः इसका मतलब होता है कि किसी कार्य को करने का तरीका reproducible नही है, मान्यता आधारित है, एक ही व्यक्ति का हरबार और व्यक्ति व्यक्ति का भी तरीका अलग हो सकता है, परिणाम बदल सकता है। यह एक तरह से अँधेरे में काम करने जैसा है, जहाँ आप एक आशा से कोई चीज करते हैं, पर लक्ष्य की संभावना तय नही है। इसे आप ज्यादातर पॉजिटिव सोच के रूप में परिभाषित करते हैं। पर, यह उसी तरह से है कि रास्ते मे चलने पर सोना गिरा हुआ मिल सकता है तो आप अब रोज पैदल 40 km इस आशा में चलते हैं कि शायद किसी दिन सोना मिल जाये। यह ज्यादातर मामलों में बेवकूफी है।
इसका उल्टा है प्लानिंग करके कोई काम करना। संभावना तय करना। इसमे कार्य को करने के लिए जरूरी घटकों का आप मोटा मोटी अनुमान लगा लेते हैं।
दिल के विषयों में आप कोई अनुमान नही लगाते हैं। चीजें सामने आती जाती हैं, आप अव्यवस्थित तरीके से समाधान का प्रयास करते जाते हैं।
दोनो विधियों का अपना अपना महत्व है। कुछ अवसरों पर प्लानिंग संभव नही होता है। पर, यह तय है कि दिल के विषयों में प्लानिंग की अपेक्षा असफलता की संभावना ज्यादा रहती है। कटु अनुभव भी ज्यादा होते हैं।
पोस्ट लिखने के लगभग आधे घंटे के बाद fb पर 'दिल का विषय है' के एकदम फिट केस मिले।
जरा Balendu Goswami का दुखड़ा पढ़िए.....
"मेरे मित्र Girijesh Tiwari जी ने मेरी दस साल पुरानी एक पोस्ट शेयर करी. जिसके कि कुछ अंश अब असत्य साबित हो चुके हैं. (वह पोस्ट मैं नीचे कमेंट में पेस्ट करूँगा)
कल्पना करें, कैसा लगता होगा जब अपने ही दावे गलत साबित हो जाएँ और मिथ्या गर्व टूट जाएँ! मैं भी आजकल अक्सर कुछ ऐसा ही महसूस करता हूँ.
मैंने गिरिजेश जी को ये जवाब दिया:
आदरणीय गिरिजेश जी, इस पोस्ट को शेयर करने के लिए धन्यवाद। परन्तु दस साल पहले लिखी मेरी इस पोस्ट की कुछ बातें असत्य साबित हो चुकीं हैं.
बाप और भाई द्वारा विश्वासघात के बारे में ......
यहाँ एक बात और भी मैं जोड़ना चाहुंगा कि मैंने जर्मनी स्थित हमारी चैरिटी संस्था से भी इस्तीफ़ा दे दिया था क्यों कि वहाँ बच्चों के लिए भेजे जाने वाले दान के पैसे का दुरूपयोग हो रहा था. मेरा कोई कंट्रोल नहीं रहा मुझे चैरिटी की कोई रिपोर्ट नहीं मिल रही थी इसलिए मैं कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था उस दान के पैसे की जो पूरी दुनिया से मेरे सहृदय मित्र बच्चों के नाम पर पैसा भेजते थे. इसके उलट मेरे कुछ दानदाता दोस्त जब यहाँ से हमारे वृन्दावन के आश्रम में गए तो उन्होंने जो खबर दी वह चौंकाने वाली थी. उन्होंने बताया कि कैसे उनका दिया हुआ दान का पैसा आश्रम में शराब, जुआ और अय्याशियों में खर्च हो रहा है.
दोस्तों मैंने सार्वजनिक रूप यह सब लिखने का निर्णय इसलिए किया क्यों कि भारत में अब कोई भी ऐसा नहीं रहा जिसे मैं अपना कह सकूँ। मुझे बहुत प्यार मिला है यहाँ आपका और अब मुझे आपका नैतिक सहयोग चाहिए।
फिर से बाप और भाई द्वारा विश्वासघात के बारे में ......
"
इस केस में धार्मिक भावना को इन्होंने मानवीय भावना समझ कर अपने छवि को बरकरार रखने के लिए वृंदावन के किसी आश्रम को दान दिया और दिलवाया। पर, ऐसे लाखों कवियों को अंत मे केवल कड़वा अनुभव ही हासिल होता है।
इसलिए ज्यादातर परिस्थितियों में हमलोगों को दोनो का मिक्स अपनाना चाहिए। प्लानिंग थोड़ा ज्यादा, दिल का विषय थोड़ा कम।
समता, बंधुता, न्याय की बात आज 70 वर्षों के बाद भी इसीलिए हो रही है कि यह प्लानिंग के बजाए दिल का विषय बना हुआ है। यह लगभग हर क्षेत्र में हमारे विकास में बाधक है। यह काव्यात्मक भावना है। ऐसे लोगों को manipulate करना आसान है। धूर्त्त लोग ऐसे लोगों का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं। जब धोखाधड़ी का पता चलता है, तो ऐसे लोग शोषण और भेदभाव का रोना रोते हैं, पर अगला कदम फिर से दिल का विषय बना लेते हैं।
इसपर हमसभी को गौर करना चाहिए।
~ राहुल पटेल
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