Saturday, March 9, 2024

Vedic युग फर्जी गप्प, मनगढंत कहानियाँ, पुरातात्विक प्रमाण कहाँ? पुरोहिती में एकजातीय वर्चस्व तोड़ें

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सनातनी ब्रम्हाणी गप्प के फैलाव, विश्वास में खोजबीन की मानसिकता का अभाव एक कारण, किसी पद्धति या परम्परा के न मानने से किसी अनहोनी की आशंका निराधार, सोच और तथ्यों का दायरा बढ़ाना जरूरी, भारतीय इतिहास में कितना सच कितना फर्जी

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https://youtu.be/ATNNn9jhsRo?si=GS6RqAd7ZI4pRg0q

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1. ज्यादातर सामाजिक बदलावों के कार्यक्रम गोल गोल घूमते हैं। यह जरूरी है कि यह मिशन अपने लक्ष्य तक पहुँचे


2. आदरणीय राजेश मोहन चौधरी पेशे से वकील हैं। वकील साहब सागर, मप्र से हैं। परिवार के लोग स्वन्त्रता आंदोलन से जुड़े रहे हैं। सामाजिक कार्यों से  पिछले 90 सालों से यानी 4 पीढ़ियों से ये लोग जुड़े हुए हैं।


3. आपका शुरुआती दायरा आपकी जाति आपका समाज होता है। बाहर निकलने से सोच और लोगों का दायरा बढ़ता है। इसको सोच के दायरा बढ़ने घटने के अलावा आपके दायरे का आपके पूर्वाग्रह पर असर से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए


4. यहाँ आप दूसरों के पूर्वाग्रह और जान बूझकर या अनजाने लगातार उनके प्रोपेगंडा का खेल देख सकते हैं। अपने भोलेपन में कैसे लोग सामने वाले के फर्जी बकवास को यहीं की संस्कृति और असली इतिहास मान बैठते हैं, देखा जा सकता है। राणा प्रताप का  80 किलो का भाला, 250 किलो का अन्य सामान वगैरह हास्यास्पद बात पर भी यकीन करना आसान है


5. ज्यादातर इतिहास वेदों और पुराणों के फ्रेम में रहकर लिखा गया है। इस संकुचित सोच के दायरे का कारण यह है कि किसान कामगार जातियों द्वारा लिखने का इतिहास अँग्रेजों द्वारा वेद, पुराण, गीता, भक्ति काल जैसे गल्प साहित्य लिखने और कलकत्ता से तथा बाद में गीता प्रेस से छपने के बाद शुरू हुआ


6. न तो किसी एक व्यक्ति से करोड़ों की आबादी वाला कोई समुदाय पैदा हो सकता है और न ही कछुए से मनुष्य पैदा हो सकता है। कुर्मी ही नही 3300 अन्य जातियाँ राम का वंशज बन रही हैं। स्पष्ट है कि यह सब ट्रेंड सनातनी कथाओं के मार्केट में आने के बाद का है। यह भी स्पष्ट है कि उस समय के नए नए शिक्षित लोग लिखित प्रोपेगंडा को सत्य मानकर उसी के दायरे में रहकर सोचते थे


7. कबीले/जनजातियों के टोटेम होते हैं। इन टोटेम के आधार पर समुदाय का नाम पड़ने की एक संभावना है।


8. किसान जातियाँ सिंधु घाटी की सभ्यता मूल की है। 1700 से 1500 BCE के बीच सिंधु नगरों का विनाश होता है। इसके बाद एक गैप/अंधकार युग आता है, जो 600 BCE छठी शताब्दी ई0पू0 तक चलता है। इसमे इतिहासकारों को कुछ खास नही मिला तो इस गैप में फर्जी तरीके से वैदिक युग घुसेड़ दिया, जिसका कहीं कोई पुरातात्विक साक्ष्य नही मिलता, केवल गपोड कहानियाँ मिलती हैं। 

किसी भी सभ्यता या युग का धरती के भीतर खुदाई में प्रमाण मिलते हैं। नगर या घरों के अवशेष मिलते हैं। यदि राजे महाराजे हों तो उनकी इमारतें, सिक्के, ताम्रपत्र, अनुदानपत्र, शिलालेख मिलते हैं। पर बीच के इस कालखण्ड में तथाकथित वैदिक युग का ऐसा कुछ भी नही मिलता है।

600 BCE छठी शताब्दी ई0पू0 में 16 महाजनपद हुआ करते थे। कुछ गणतांत्रिक थे, कुछ राजतांत्रिक। इन्हीं में से एक कुरु को लेकर महाभारत की कहानी चिपकायी हुई है। 

इन गणतंत्रों में हमारा इतिहास मिल जाएगा। पर 12वीं शताब्दी 1200 CE तक जातियों के नाम नही थे। वंशों और कबीलों के नाम थे। यानी लोग तो थे, पर वर्त्तमान नामों से उन्हें नही खोजा जा सकता।

ज्यादातर हमलोग वर्ण व्यवस्था वालों के दृष्टिकोण से इतिहास देखते, लिखते हैं। यदि बिंदुओं को तलाशा जाए, दृष्टिकोण बदला जाए, point of reference बदले जाए तो चीजें दिखने लगेंगी।


9. अपने बीच के चन्हकुआ लोग वर्ण व्यवस्था के गप्पों को तिल का ताड बनाकर बोलते हैं। रामदेव जी ने हिंदुओं की संस्कृति को 1 अरब 96 करोड़ 11 लाख वर्ष पुराना बता दिया। उन्होंने तो दुसरे की बोली बोल दी, पर, इस प्रक्रिया में दो बातें हुईं। एक तो उनका चेहरा धार्मिक मामलों में अभी तक फेंस पर बैठे लोगों को प्रकट रूप से हिन्दू बनाने में इस्तेमाल किया गया और दूसरा यह विषय relevant बना।

उतने समय पहले तो सभ्यता क्या, एक कोशिकीय जीव का रहना भी संभव नही था। 60 लाख वर्ष पहले एक कोशिकीय जीव अस्तित्व में आये। आधुनिक सीधा खड़ा हो सकने वाला मानव 1 लाख 60 हजार पहले आये। सभ्यताएँ अपने अनगढ़ रूप में भारत मे पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर लगभग 3000 BCE यानी लगभग 5000 साल से हैं। इसी से इनके गप्प की गहराई का अंदाजा लगा लीजिये।

पृथ्वी पर अबतक 10 प्रकार के आधुनिक मानवों से मिलते जुलते मानवों के अवशेष खोजे जा चुके हैं। भारतीय, चीनी, अँग्रेज, रेड इंडियंस ये सभी अलग अलग दिखते हैं। जलवायु, खानपान परिवर्त्तन के कारण हुई अनुकूलन से यह सब हुआ। ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों में निएंडरथल मानवों का डीएनए है। अब इसमें न कोई अलौकिक शक्ति और न राम, कृष्ण, ब्रम्हा की बात आती है।

सभ्यता का विकास दुनिया के अनेक कोनों में अलग अलग समयों में धीरे धीरे हुआ।

इजिप्ट, मेसोपोटामिया आदि की सभ्यता में धर्म स्पष्ट है, लेकिन सिंधु घाटी की सभ्यता में लोग प्रकृतिपूजक थे, श्रमण सभ्यता संस्कृति के थे। सिंधु घाटी की सभ्यता में राम, कृष्ण, गणेश, दुर्गा, हनुमान, ब्रम्हा, विष्णु, महेश कोई नही मिलेगा। वस्तुओं में कोई जानी पहचानी आकृति देखने की स्वाभाविक मानसिकता के कारण एक मूर्त्ति में कुछ लोग पहले जैन तीर्थंकर तो कुछ लोग शिव देख रहे हैं।

छठी शताब्दी ई0पू0 में बुद्ध का साहित्य लगभग 65 सम्प्रदाय और जैन धर्म का साहित्य 365 सम्प्रदाय की बात कर रहा है। पर, इन दोनों में कहीं भी वैदिक सम्प्रदाय का नाम नही आया है। तीन मुख्य सम्प्रदाय थे, जैन, बुद्ध और आजीवक। इनके पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं। भारत के अलग अलग भागों और समयों में अनेकों सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। पर, इनमे से किसी मे राम, कृष्ण, हनुमान काली, दुर्गा नही मिले हैं।


10. जैन, बौद्ध मुर्त्तिपूजक नही थे। समय के साथ बाहर से आये लोग अपनी आस्थाओं का, संस्कृति का, भाषा का, देवी देवताओं का समावेश करते चलते हैं। 30 ई0 से आये कुषाण लोग बुद्ध की मूर्त्ति पूजा शुरू करते हैं। यहीं से मूर्त्ति पूजा, कर्मकाण्डों आदि की शुरुवात होती है। साड़ी, सिंदूर, लूँगी, अक्षत आदि आपको भारतीय संस्कृति लगती होगी, पर 200 ई0 तक की शुंग काल की मूर्त्तियों में आपको साड़ी नही मिलेगी।

अब रामायण में सीता साड़ी पहने दिखाई जाती है तो यह घटना कितनी पुरानी हो सकती हैं?

परम्पराएँ, रीति रिवाज बदलते हैं। किसी का ये दावा की सनातन अति प्राचीन है या ये पहनावे, रीति रिवाज, पूजा-संस्कार पद्धति इसके मानक हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। आज की पद्धतियाँ, पहनावे, रिवाज टीवी सीरियलों के माध्यम से बाजार के अनुरूप गढ़े जा रहे हैं। बाजारवाद वर्ण व्यवस्था की पहचान है।


11. अपनी शादी में चौधरी साहब ने तीन संकल्प लिए। 

- जन्मपत्री नही मिलवाऊंगा

-  ब्राम्हण पुरोहित से शादी नही करवाऊंगा

- मेरी शादी तिथि मुहूर्त्त के हिसाब से नही होगी

आज 22 साल से चौधरी साहब का वैवाहिक जीवन बाकी लोगों जैसा ही आम है। तात्पर्य यह कि किसी खास परम्परा या पद्धति को न मानने से किसी अनहोनी की आशंका निराधार है। अतः यह मिशन पुरोहिती के दशा दिशा को सुधारने का अति उत्तम काम कर रहा है। इस क्षेत्र में एक जाति का वर्चस्व समाप्त करना अनेकों समस्यायों का समाधान है।

~ आदरणीय राजेश मोहन चौधरी, वकील, इतिहासकार,समाजसेवी


*यूट्यूब पर पिछले बैठकों में विचारकों, समाजसुधारकों और संस्कारकों के उद्बोधन सुनने के लिए क्लिक करें* https://youtube.com/playlist?list=PL1ap5oFZycBOqlpUODvamqrjLhd9hrJTh&si=veH7DHAwTfZglOrz




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