Sunday, April 21, 2024

धर्म, पाखण्ड में उलझाना नही, उसके माध्यम से सामान और सेवा बेचना लक्ष्य

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#समाज 

समस्या की सही व्याख्या सही समाधान सुनिश्चित करता है।


किसी धर्म को उसके निश्चित विधि विधान, पण्डित की आवश्यकता, पूजा पाठ के खास सामानों की आवश्यकता, tenets आदि से परिभाषित किया जाता है। बाकी लोकाचार, लोगों की जीवन शैली, बोल चाल, सामाजिक समझ पहले भी थी, हमेशा रहेगी। इनमे धर्म का कोई योगदान नही है। स्पष्टतः लोगों पर ट्रेड रूट की कहानियाँ थोपकर स्थानीय संस्कृति को हाइजैक किया गया है तथा अलग अलग धर्मों का नाम दिया गया है। यह विभिन्न ट्रेड रूट में पड़ने वाले सभी देशों के साथ किया गया है। 


वर्त्तमान स्थिति यह है कि लोग समझते हैं और धर्मगुरु उन्हें समझाते हैं कि लोकाचार, जीवन शैली आदि उन्हें धर्म ने दिया। सुधारवादी लोग अपने अपने धर्म के सामाजिक दुष्प्रभाव से तंग आकर धार्मिक ग्रंथों, उसके tenets, विधि विधान में सुधार चाहते हैं या विरोध करते हैं। स्पष्टतः ये लोग उस धर्म के सीमा के अंदर रहकर ही सोच पाते हैं। उन्हें यह दिखना चाहिए कि जो चीज शुरू से ही नही थी और उसके होने से समस्या हो रही है तो उसमें आप सुधार क्यों चाहते हैं? उसको सिरे से त्यागने की जरूरत है।


जैसे रामचरितमानस का शुद्र वाला वर्णन। उसके विरोध का मतलब है कि आप मानते हैं कि राम था, रामचरितमानस आपका इतिहास है, आप शुद्र थे और अब स्वयं को इस विशेषण से दुखी पाते हैं तो रामचरितमानस का विरोध कर रहे हैं। मजेदार बात है कि स्वयं को शुद्र कहना छोड़ भी नही रहे हैं। क्योंकि इससे आपके शोषित होने का प्रमाण समाप्त हो जाएगा, जो कि कभी आप थे ही नही। इसका यह भी मतलब है कि वर्ण व्यवस्था को आप तथ्य मानते हैं और बाकी तीन वर्णों को शुद्र से ऊपर मानते हैं। तो फिर आपके साथ शुद्रोचित व्यवहार होना ही चाहिए। 


दूसरा उदाहरण है कि यदि आप मुस्लिम नही है तो क्या आप उस धर्म मे गलतियाँ निकालने के लिए कुरान पढ़ते हैं? उसमें यदि गैर मुस्लिमों को किसी गलत शब्द से नवाजा गया हो तो आप उसपर चर्चा चलाते फिरते हैं? यदि नही तो फिर इस मामले में अपनी ऊर्जा बेकार की चीज पर लगाने का क्या मतलब है?


लोग अनेकों प्लेटफार्म से पाखण्ड, पंडित के फीस, विधि विधान बनाकर विधिवत पूजा कराने के नाम पर पूजा पाठ के सामानों पर किये गए खर्च आदि का विरोध करते हैं। पर, कुछ अन्य लोग यह तर्क रखते हैं कि आप एक प्रयोजन में इन चीजों पर कुल खर्च का 10% खर्च करते हैं। बाकी 90% खर्च DJ, रिसोर्ट, वीडियोग्राफी, ब्यूटी पार्लर आदि दिखावे पर करते हैं, जिससे कोई लाभ नही है, तो दोष इस 10% को क्यों देना है? यह बात सही भी है, तो गड़बड़ कहाँ पर है?


गौर से देखा जाए तो पहले पाखण्ड, पंडित के फीस, पूजा पाठ के सामानों पर खर्च आदि ही मुख्य खर्चे थे, बाकी कोई खर्च नही था और ये खर्च ही लोगों पर भारी पड़ते थे। अब वर्त्तमान में दूसरे प्रकार के खर्चे हावी हो गए हैं। दोनो में समानता यही है कि आपको उपभोक्ता बनाया जाता रहा है। व्यापारियों ब्राम्हणों का गठजोड़ पहले भी आपके पॉकेट से पैसे निकालने का उपाय सोचता था, आज भी यही कर रहा है। ध्यान देने की बात है कि ये दोनों लोग परजीवी हैं। इस तरह से विधि विधानों में सुधार, किसी दूसरे विधा जैसे अर्जक संघ को अपना लेना आदि बहुत प्रभावकारी सिद्ध नही हो रहा है। क्योंकि समस्या की जड़ आपकी यह समझ कीआपको धर्म मे उलझाना नही है, बल्कि धर्म के नाम पर आपको सामान और पण्डित के रूप में अपनी सेवा बेचना है। धर्म की सारी कहानी विधानों, इनको जोड़ने वाली कड़ियों आदि के इर्द गिर्द घूमती हैं। फिर इसके समाजिक राजनीतिक फायदे भी हैं, जो अंततः उनके आर्थिक फायदे का पॉजिटिव फीड बनता है।


तो धर्म और उस पर आधारित सामानों के हमलोग इतने बड़े उपभोक्ता बने कैसे? क्या यह षड्यंत्र था या कमी हमीलोगों में है? क्या हमलोगों में ही उपभोक्तावादी संस्कृति कूट कूट कर भरी है? 


तो नही! 

पहला यह कि ब्राम्हण व्यापारियों के गठजोड़ की एकदम सपाट रणनीति यह रही है कि चीजों को आसानी से सर्वत्र, सर्वव्यापी रूप से उपलब्ध कराई जाए, आपकी आसान पहुँच में हों। यह षड्यंत्र नही है, यह अपनी चीजों को बेचने की अदम्य लालसा है। यह उद्यमिता नही है। अर्थव्यवस्था का प्राइमरी सेक्टर उद्यमिता हैं, बाकी पके पकाए पूड़ी को जोड़ियाना है।


दूसरा यह कि कोई भी आसानी से हो सकने वाला काम करेगा, जिसमे अपना मेहनत बचता हो। आप आसानी से पैसा कमाना चाहते हैं तो mycircle, ludo, शेयर मार्केट, ऑनलाइन लाटरी आदि फलफूल रहे हैं। आप आसानी से खाना चाहते हैं तो lays, कुरकुरे, आटा, तेल, चीनी, मसाले, मिक्सी, ग्राइंडर आदि की बिक्री बढ़ रही है। खेतों में फ़र्टिलाइज़र, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर; घरों में फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर; स्वर्ग जाने के उपाय; कार्यालयों में घूस, पैरवी आदि इसी आसान मानसिकता (easy mentality) के परिचायक हैं। आपका काम आसानी से हो जाये, पहले हो जाये, बाकियों से अच्छा हो जाये, उपभोक्तावाद के अलावा यह सब होड़ पैदा करता है। पर यह होड़ कालिदास की तरह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, क्योंकि व्यक्तिगत स्तर पर आप भले जीतते हुए दिखते हैं,  सामूहिक स्तर पर आप एक लंबे समयांतराल में हारते हैं। आपकी हर तरह की पूँजी उन परजीवियों की ओर धीरे धीरे खिसकती है। किसानों की दुर्दशा यही है। कभी दक्षिणा देने वाला, कई तरह के परजीवियों को पनाह देने वाला, अनाज से सोना खरीदने वाला किसान आज 5 किलो राशन, आरक्षण, जातीय जनगणना, व्यवस्थागत भेदभाव की लड़ाई उन्हीं शरणार्थियों से लड़ता है, माँगता है। परजीवियों की पूँजी कभी किसानों की ही थी। एकतरह से हम यह भी कह सकते हैं कि किसान इन परजीवियों के लिए मुफ्त या बहुत सस्ते श्रम में अनजाने तौर पर काम कर रहा है। अतः इस आसान मानसिकता, इस होड़ पर रोक लगनी चाहिए। उपरोक्त बहुत सी चीजों को आप इस्तेमाल करना जारी रख सकते हैं, पर आपको रुपये की अर्थव्यवस्था समझनी चाहिए और यथासंभव दूरी बनानी चाहिए। #avoidpapermoney पर किसी दूसरे पोस्ट में।

~राहुल पटेल

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