Thursday, April 25, 2024

जेनेरिक दवायें....जनहित में जारी

 #समाज #स्वास्थ्य 

1. जेनेरिक दवायें क्या होती है?

उ0- लगभग 20 साल के पेटेंट की समाप्ति के बाद, आगे कुछ भी खर्च किए बिना, जेनेरिक नाम रखने की शर्त पर, ब्रांडेड दवा के फार्मूले की ही दवा, कोई भी कंपनी बना सकती है।

           तो ब्रांडेड और जेनेरिक दवा के फार्मूले में कोई अंतर नहीं होता। उनके प्रभाव, डोज, साइड इफेक्ट में कोई अंतर नहीं होता। इनको बनाने में सरकार से लाइसेंस, गुणवत्ता जांच, Essential Drug Criteria आदि से ब्रांडेड दवाओं की तरह ही इनको गुजरना पड़ता है।


2. जेनेरिक दवायें इतनी सस्ती क्यों होती हैं?

उ0- एक नई ब्रांडेड दवा को बनाने में रिसर्च और कई साल के अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है। उसको मार्केट में चलाने में डॉक्टर, MR, दवा विक्रेता आदि का भारी कमीशन सेट करना पड़ता है। इन सब खर्चों को रिकवर करने के लिए, सरकार पेटेंट के रूप में, कंपनी को उत्पादन वितरण का एकाधिकार का 20 साल का समय देती है। 

          इसके ऊपर कंपनी भारी मुनाफा कमाना चाहती है। यदि दवा अपनी तरह का अकेला है तब तो कंपनी मनचाहा दाम रखती है। 

        ब्रांडेड दवा के उत्पादन और वितरण पर 20 साल का यह एकाधिकार उनके महँगा होने का मूल कारण है। इस समयावधि के बाद जेनेरिक नाम से यही दवाईयाँ केवल लागत खर्चे पर बिकती हैं। मार्केट बना बनाया मिल जाता है। वितरण भी अनेकों कंपनियों का संयुक्त रूप से होता है। मार्जिन अत्यंत कम रहता है। इसलिए ये दवाईयाँ अत्यंत सस्ती रहती हैं।


जैसे-

- ब्रांडेड B काम्प्लेक्स दवा 2-35/-, जेनेरिक 10 पैसा

- ब्रांडेड पेरासिटामोल 500 2.50/-, जेनेरिक 10 पैसा

- ब्रांडेड सेटरीजिन 5/-, जेनेरिक 20 पैसा

- ब्रांडेड सिप्रोफ्लॉकसेसिन 7-12/-, जेनेरिक 1.50/-


3. जेनेरिक दवाईयाँ डॉक्टर नही लिखते, बहुत कम दवा विक्रेता ये दवायें रखते हैं, ऐसा क्यों?

उ0- अत्यंत कम मार्जिन होने के कारण दवा विक्रेता इनको बेचने में लाभ नही देखते। डॉक्टर को कोई कमीशन नही मिलता। 

      पर, आप अपने डॉक्टर को जेनेरिक दवायें लिखने या कॉम्बिनेशन लिखने के लिए कह सकते हैं, जिसको आप जेनेरिक दवा के प्रमाणिक विक्रेता से अत्यंत सस्ते दाम पर प्राप्त कर सकते हैं।

4. जेनेरिक दवाओं के बारे में काफी शिकायत भी है। ऐसा क्यों?

उ0- जेनेरिक दवाओं के नाम पर कुछ unceritified और unregulated कंपनियाँ भी दवाईयाँ बनाती हैं। अनेकों दवा विक्रेता ज्यादा मार्जिन के लिए इन कंपनियों का भी माल बेचते हैं।

इसके अलावा जेनेरिक दवाओं पर एमआरपी ब्रांडेड दवाओं की तरह लिखा रहता है, पर, ये 80% तक के छूट के इरादे से मार्केट में उतारी जाती हैं। इस कारण से दवा विक्रेता(खासकर ग्रामीण क्षेत्र में) को 10-80% के बीच कुछ भी छूट पर बेचने का मौका मिल जाता है। जानकारी के अभाव में ग्राहक कभी 30%, कभी 50% भी छूट पाकर दुकानदार को धन्यवाद ही देता है। जबकि 80% तक छूट मिल सकता था। इससे इन दवाओं की विश्वसनीयता में कमी आती है। यही कारण है कि zeelab जैसी कंपनियाँ अब दाम कम करके ही प्रिंट करती है।

इसके उल्टा जेनेरिक दवायें भारत सरकार स्वयं पीएम जन औषधालयों से बेचती है। टाटा कंपनी इस क्षेत्र में है। WHO के अनुसार अभी जेनेरिक दवाओं का मार्केट मात्र 10-12% है। इनका उपयोग कर दवाओं पर वैश्विक रूप से 70% खर्च कम किया जा सकता है। WHO स्वयं इनकी अनुशंसा करता है। 

      जरूरत है, सही दवा विक्रेता के पहचान की। ये दवा विक्रेता जेनेरिक के नाम पर किसी भी कंपनी का माल नही बेचते हैं, बल्कि केवल सर्टिफाइड कंपनियों का ही माल बेचते हैं।

~राहुल पटेल



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