Tuesday, September 17, 2024

सदी के महान विभूति लोक संस्कृति के संरक्षक, कविराज, किसान भूषण आदरणीय पद्मश्री बाबूलाल दाहिया सर

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देश के जीती जागती, सदी के महान विभूति लोक संस्कृति के संरक्षक, कविराज, किसान भूषण आदरणीय पद्मश्री बाबूलाल दाहिया सर का जीवनवृत/biography; पुरोहिती, ईश्वर की अवधारणा, सही इतिहास के समझ की जरूरत पर जबरदस्त विश्लेषण के साथ बेबाक टिप्पणी
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1. सतना जिला मुख्यालय, मप्र0 से 18 किलोमीटर दूर उचेहरा तहसील के अंतर्गत छोटे से गांव पिथौराबाद में रहने वाले 81 वर्षीय(वर्ष 2024 तक) किसान पद्मश्री बाबूलाल दाहिया लोगों के लिए एक मिसाल हैं
देश के जीती जागती, सदी के महान विभूति लोक संस्कृति के संरक्षक, कविराज, किसान भूषण आदरणीय पद्मश्री बाबूलाल दाहिया सर का जीवनवृत/Biography:-
बाबूलाल दाहिया
ग्राम - पो. पिथौराबाद
जिला- सतना  (मप्र), भारत

विभिन्न शासकीय एवं अशासकीय संस्थानों से सम्बद्धता -
1- छः वर्षो तक आकाश वाणी रीवा के सलाहकार समिति सदस्य
2- तीन वर्ष तक आदिवासी लोककला परिषद भोपाल के सदस्य
3- तीन वर्ष तक मध्य प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड के सलाहकार समिति सदस्य
4- बसामन मामा चयन समिति सदस्य
5-  माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल के परामर्श सदस्य
6- कृषि विद्यान केंद्र मझगवां जिला सतना के सलाहकार समिति सदस्य
7- तीन वर्ष तक प्रलेस सतना के महा सचिव
8- दो वर्ष तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन सतना इकाई के अध्यक्ष

प्रकाशित पुस्तकें -
1- विन्ध्य केर माटी ( बघेली काब्य संकलन)
2- पसीना हमरे बद है (  बघेली काब्य संकलन)
3- सयानन केर थाती ( बघेली मुहावरे ,लोकोक्तियों, पहेलियों एवं कहावतों का संयुक्त संकलन)
4- जनपदीय लोक कथाए
5- जनपदीय संस्कार गीत
6- जनपदीय खेल गीत
7- जनपदीय पहेलियाँ
8- जनपदीय आख्यान
9- जनपदीय मुहावरे एवं लोकोक्तियां
10- बघेली कविता के जेष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि
11- मैं और मेरा गांव
12- बगरो बसंत है  (निबंध संग्रह)

प्रकाशनाधीन -
1- बघेली शब्दकोष
2- बघेलखण्ड के व्यंजन
3- कृषि आश्रित समाज के भूले बिसरे उपकरण
4- हमारे परम्परागत देसी अनाज
5- कोल जनजाति का विविध सांस्कृतिक सर्वेक्षण
6- खैरवार जन जाति का विविध  सांस्कृतिक सर्वेक्षण
7- दाहिया के दोहे

इसके अतिरिक्त -
- आकाश वाणी दूर दर्शन से कविताएं कहानियां एवं वार्ताएं प्रसारित
- Aps विश्वविद्यालय रीवा के बी .ए. फाइनल कोर्स में बघेली कविताएं सम्लित।
- अनेक राष्ट्रीय मंचों में काब्य पाठ।
- अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित।
- 10 वर्षों तक ( का कही का, न कही ) देशबन्धु समाचार पत्र में बघेली स्तम्भ लेखन

साहित्य क्षेत्र में पुरस्कार एवं सम्मान -
1- मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन (युवा कहानी लेखन पुरस्कार)
2- मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ( युवा नाटक लेखन पुरस्कार)
3- प्रगतिशील लेखक संघ सतना  का प्रथम (कहानी लेखन पुरस्कार)
4- लोक भाषा बिकास परिषद तिवनी रीवा का श्री बैजनाथ पाण्डेय बैजू सम्मान
5- मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन जिला इकाई सतना का (सैफू सम्मान)
6- मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल का (साहित्यकार सम्मान)
7- बघेली लोकभाषा बिकास परिषद रीवा का (शम्भु द्विवेदी काकू सम्मान)

साहित्य क्षेत्र से अलग सम्मान एवं पुरस्कार -
1- महाराष्ट्र सरकार का (कृषि वसंत सम्मान)
2- मध्यप्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड भोपाल का (जैव विविधता पुरस्कार)
3- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण चेन्नई का (राष्ट्रीय जैव विविधता पुरस्कार)
4- भारत सरकार का (पद्मश्री पुरस्कार)

पद्मश्री बाबूलाल दाहिया के देश समाज को योगदान:-
  a. 200 प्रकार की धानों के साथ अनेक प्रकार के अन्य अनाजों के बीजों का बीज बैंक में संरक्षण
  b. हर वर्ष छोटे छोटे भूखण्डों में संरक्षण हेतु 200 प्रकार की धान, 20 प्रकार के गेहूँ तथा मोटे अनाजों की खेती
  c. वृक्षारोपण अभियान और पर्यावरणविद
  d. बघेली साहित्य और संस्कृति के संरक्षक, कवि, भाषाविद
  e. कृषि आश्रित समाज के भूले विसरे उपकरणों का संग्रहालय जिसमें 300 के आसपास कृषि उपकरण, बर्तन आदि संग्रहीत
जैसे:- झउआ,गोबरहा झउआ, छन्नी टोपरिया, ढोलिया, टुकनी, ढेरइया, बंसा, घोटा,झांपी, झपलइया, दौरी,छिटबा, बेलहरा, बिजना, कुड़वारा, झलिया, झाला
मिट्टी: हडिय़ा, तेलइया,पइना, मरका, मरकी,डहर, घड़ा, घइला, तरछी, डबुला दोहनी, मेटिया, ताई, नाद, दपकी,दिया, चुकड़ी, कलसा, तेलहड़ा, डबलुइया, करब,नगडिय़ा की कूड़, चिलम, हुक्का और गुल्लक
काष्ठ: हल, जुआ, बैैलगाड़ी, नाडी, खटिया, मचिया, मचबा, मचेड़ी, कोनइता की पारी, चकिया की पारी, चकरिया, चकिया के बेट, चौकी, पीढ़ा, ढोलकी के बारंग, बेलना, घर का छप्पर, तखत, कुआं की ढिकुरी, थामहा, केमार, दरवाजे का चउकठ, खूंटी, खुरपी का बेंट, कुदारी का बेंट, फरुहा का बेंट, कुल्हाड़ी का बेंट, हंसिया का बेंट, पाटी, बोड़की, परछी के खम्भे, पांचा, खरिया की कोइली, मोगरी, कठउता, कठउती, कुरुआ, पइला, कुरई, मूसल, ढेरा, कुरइली
लौह: हंसिया, खुरपी, कुदारी, फरुहा, सबरी, सब्बल, कुल्हाड़ी, कुल्हाड़ा, कुंडा, ताला- चाबी, बसूला, रोखना, करछुली, चिमटा, डोल, कराही, हल की कुसिया, कील, कांटा, झंझरिया, छन्ना, तवा, गड़ास, गड़ासा, बरछी-भाला, तलवार, खुरपा, बल्लम, पासु, अमकटना, सरोता, बड़ा सरोत, पलउहा हंसिया, मूसल की साम, कजरउटा, अखइनी, रोखना, बसूला, रमदा, गिरमिट, रांपी, फरहा एवं परी
पत्थर: लोढिय़ा, कांडी, जेतबा, कुडिय़ा, चकिया, पथरी, लोढ़बा, चौकी, खल, होड़सा, कठौती
धातु: लोटा, थाली, कटोरा-कटोरी, बंटुआ, गिलास, हांडा, परात, भुजंगी, कलसा, तबेलिया, पीतल का लोटा, गंजा, पीतल की छोटी डोलची, घण्टी, कोपरी, पीकदान, कांसे का एक लैंप भी, फूलदान, पईना, पानदान, पील की बड़ी डोलची (डोंगा), फूल के खोरवा, बटलोह, पीतल के गघरा, पीतल के दौरी
चमड़ा : बैल की घण्टी व घुघ, जुएं में बैल के नधने के लिए जोतावर, बीज बोने के लिए ढोलिया की चर्म पट्टी, खेती से जुड़े कार्य हेतु लोहार की धौकनी, किसानों के केश कर्तक, नाई के छुरा की धार परताने के लिए चर्म पट्टिका, चर्म चरण पादुका, मसक, छोटे-छोटे बछड़े के गले में बांधने वाली ताबीज, चमौधी
सन अम्बारी एवं बैलों के बाल से बनी सामग्री: मुस्का, गोफना, खरिया, रस्सी नारा, गेरमा, तरसा का रस्सा, भारकस, मोहरा, गडाइन, कांस की सुमडेरी
महिलाओं द्वारा निर्मित: कुठला, कुठली, कुठुलिया, पेउला, गोरसी, सइरी
(सामग्रियों के नाम बघेलखण्ड की आम बोलचाल में प्रचलन के आधार पर हैं) 

2. उन साहित्यों में तरह तरह के अन्नों आदि का जिक्र आने से इनके मन मे उनके बीजों के तथा बाद में कृषि से जुड़े उपकरणों के संग्रह और संरक्षण की भावना भी आई
3. किसान विरोधी तत्कालीन मप्र0 सरकार के सम्मान को बाबू लाल दाहिया ने ठुकरा दिया था
4. रीवा विश्वविद्यालय, मप्र0 के BA फाइनल के कोर्स में इनकी बघेली कविताएँ चलती हैं
5. जनजातीय संग्रहालय बोली विकास एकेडमी, भोपाल, मप्र0 ने बघेली मुहावरे, लोकोक्तियाँ, कहावतें, लोकगीत, लोककथाएँ आदि के संकलन का इनको जिम्मेवारी दिया
6. अधिकांश कहावतें, लोककथाएँ परम्परागत अनाजों पर हैं
7. 70 के दशक में भारत मे आये हरित क्रांति ने परम्परागत अनाजों को खत्म कर दिया
8. परम्परागत अनाजों में अनुकूलन से पानी की आवश्यकता कम होती है और बुवाई में देरी के बावजूद समय पर पकता है
9. सात शिल्पकार जातियों वाला गाँव आत्मनिर्भर था। पुरानी कृषि में गाँव के सात उद्यमियों का बड़ा योगदान रहा है। ये हैं लोहार, बढ़ई, शिल्पकार, वंशकार, चर्मकार, कुंभकार और महिला। इनके द्वारा ही कृषि उपयोग की कई चीजें बनाई जाती थी
10. प्राकृतिक रूप से कोई भी जन्तु विकट स्थिति आने पर डटकर सामना करेगा, पर किसी भगवान का सुमिरन नही करेगा। स्पष्टतः मनुष्य ने खुद भगवान बना लिया है या यों कहें कि मनुष्यों के बीच से कुछ समुदायों या लोगों ने ऐसा किया है और बाकी बस उलझे हुए हैं
11. ईश्वर की अवधारणा का होना और पुरोहितवाद अलग अलग चीजें हैं। यह हो सकता है कि ईश्वर की अवधारणा वाली भावना को भुनाने के लिए कुछ खास प्रकार के लोग ईश्वर को खुश करने का ठेका ले लिए। या यह हो सकता है कि ये खास प्रकार के लोग अपने गढ़े ईश्वर को दूसरों को थमा उनका दोहन करने लगे। पुरोहितवाद स्पष्टतः सांस्कृतिक, उससे सामाजिक और अंततः आर्थिक शोषण का जरिया है, जबकि केवल ईश्वर की अवधारणा में ऐसी समस्या नही है। वर्त्तमान सामाजिक परिस्थिति में एकमात्र हल है, समाज को अपने बीच से #PPSM प्रशिक्षित पुरोहित देना
12. अलग अलग क्षेत्रों में विकसित धर्म और पूजा पद्धति वहाँ के भौगोलिक क्षेत्रों, स्थानीय संसाधनों के अनुसार हैं। यहाँ आप यह ध्यान दे सकते हैं, आप स्वयं को जिस धर्म का मानते हैं, क्या उसमे यह समस्या है? कहीं वह बाहर की थोपी हुई तो नही?
13. धर्म रूपी संगठन कहने के लिए तो सबके लिए है, पर ये संगठन भी अनेकों हैं और अपना अपना प्रभुत्व जमाना चाहते हैं। यही नही, एक ही संगठन के अंदर भी सब कुछ ठीक ठाक नही है। किसी धर्म के सदस्यों के कुछ समूह बाकी सदस्यों के हित के बिना पर सामाजिक, आर्थिक लाभ पाते हैं, जो शोषण है और सामाजिक विकृतियाँ पैदा करता है। इनमे से एक भी समस्या आदिवासियों के ईश्वर की अवधारणा में नही है, न उनका धर्म जैसा कोई संगठन है। ऐसे संगठन सदा कुछ खास लोगों को ही लाभान्वित करते हैं और इनका चोला उतारकर फेंक देना चाहिए
14. पौराणिक कथाएँ सबूतों पर नही, मान्यता पर टिकी हुई हैं और मिथ्या हैं
15. वेद, पुराण, महाभारत, रामायण की कहानियाँ तर्क की कसौटी पर नही कसी जा सकती। इनमे चमत्कार भरे पड़े हैं और किसी व्यक्ति के सम्यक विकास में बाधक काव्यात्मक भावनाओं से भरे पड़े हैं
16. हमको किसी क्षेत्र के प्रस्तावित इतिहास के झूठा या सत्य होने का प्रमाण उसमे वर्णित भूगोल, वनस्पति, जानवर, रीतिरिवाज, पहनावा, भाषा के स्थानीय या बाहरी होने से भी मिलता है
17. पुरोहितगिरी के पहले सत्य इतिहास को जानना भी जरूरी है
18. आदरणीय बाबूलाल दाहिया सर का परिवार 3 पीढ़ियों से पूजा पाठ, ईश्वर की अवधारणा से मुक्त है
19. पर बाहर से आई बहुएँ पूजा पाठ, व्रत, ईश्वर की सामान्य अवधारणा से बाहर नही हैं तो हमलोग उन्हें करने देते हैं। यह सामाजिक संरचना की समझ है
20. एक वो भगवान हैं जो कहते हैं कि मुझको न मानो, पहले अपने बुद्धि के कसौटी पर कसो, तब मानो। एक दूसरे भगवान है जो कहते हैं, जो है, मैं ही हूँ। मुझ को ही मानो। अहम से भरे पड़े हैं
21. हमारे पुरोहितों को सही इतिहास जानने की जरूरत है
22. एक ही घटना पर एक भाग्यवादी/ईश्वरवादी/अध्यात्मवादी और एक भौतिकवादी का नजरिया

*देखिए* https://youtu.be/wn_urhIWI54?si=pkpzaSV_Pyl1F9LE


*यूट्यूब पर पिछले बैठकों में विचारकों, समाजसुधारकों और संस्कारकों के उद्बोधन सुनने के लिए क्लिक करें* https://youtube.com/@ppsmission?si=U302DJ0rZ5zotmNZ

Friday, September 13, 2024

भ्रामक इतिहास में मुद्रा की व्यवस्था

#आदिकिसान #adikisan #समाज  #पोलखोल
1975 में सासाराम, बिहार में लकड़ी की चौकी(पलंग की ही तरह लेकिन बिना डिज़ाइन के लकड़ी के पटरा से बना) 50/- में मिलती थी। मेरे यहाँ 70/-की आयी तो देखनिहार आते थे, कैसी चौकी है भाई!

समझ सकते हैं कि लोगों के पास मुद्रा कितनी थी। पर, हमारे इतिहासकार लिखते हैं कि 200 साल या उससे पहले राजा होते थे, जो लाखों की संख्या में सैनिक रखते थे(कृष्ण के पास तो अक्षौहिणी सेना यानी 18 लाख की सेना थी) और वे अपने सैनिकों को सोने चाँदी की मुद्रा में वेतन देते थे। और फिर उनके हथियार, कवच, जानवर आदि के लिए जो पूरी अर्थव्यवस्था बनी होगी तो उनको भी मुद्रा में भुगतान करना होता होगा। देश की आबादी ही दहाई करोड़ से कम थी। उसमे भी किसी एक राजा के राज्य में कुछ दहाई लाख या इकाई करोड़ में जनसंख्या होती होगी। उसमें भी एक सैनिक या अन्य सेवा देने वाले के परिवार में उस समय के संयुक्त परिवार के हिसाब से 10 लोग और वर्त्तमान के एकल परिवार के हिसाब से 4 लोग मान लें तो पूरे देश मे इकाई करोड़ के आसपास परिवार थे या एक राज्य में लाख या कम ही परिवार थे और सबके पास उस समय के हिसाब से भी अत्यंत महँगे धातु की मुद्राएँ होतीं थीं।

दूसरे सबूतों को भी देखें तो कुछ कुछ परिवारों(अत्यंत ही नगण्य संख्या में) में आपको धातु की मुद्राएँ खासकर चाँदी की विक्टोरियन मुद्राएँ एक या ज्यादा घड़े में मिलती थी। मेरे यहाँ भी दो घड़े थे। ये दो पीढ़ी पहले तक जमीन में दबी मिलती थीं। क्यों? बस एक ही कारण है, मुद्राएँ पुरखों ने मुगलों, अँग्रेजों के कारिंदों यानी राजा, महाराजा, जमींदार आदि से किसी एवज में स्वीकारी थीं। मेरे पुरखे अपने पूरे कुनबे के साथ वर्त्तमान इलाके में बसने, खेती शुरू करने और क्रमशः लगान देने के एवज में मुद्राएँ लिए होंगे। पर वे नही जानते थे कि इसका करें क्या, सो भविष्य के लिए जमीन में गाड़ दिया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मुद्रा का चलन ही न था। शहरी अर्थव्यवस्था 1947 तक पूरे देश मे कुछ दहाई में थे, 3000 साल पहले की बात ही छोड़ दीजिए।

तो ये कहानियाँ कि देश मे 1000 साल पहले, 7000 साल(वैदिक विद्वानों की माने तो लाखों करोड़ों साल पहले, जब मनुष्य इस धरती पर आया नही था, तब से) पहले राजा होते थे, उनकी प्रजा होती थी, सैनिक होते थे, नगर थे, बनावटी प्रतीत होते हैं। मुद्रा के इतिहास की बात करेंगे तो फिर धातु के निष्कर्षण, परिष्करण के इतिहास की भी बात आएगी और फिर किस काल मे किस क्षेत्र में निष्कर्षण शुरू हुआ? आखिर एक राजा, अपने क्षेत्र के धातु को किसी दूसरे राज्य को उन धातुओं को वैसे ही तो देगा नही, तो फिर वह transaction किस चीज में करता होगा? पूरे भारत मे उन धातुओं के वितरण का साधन क्या होगा और उस की हरेक राज्य में कीमत का आधार क्या इस्तेमाल कर रहा होगा? कोई केंद्रीय अथॉरिटी तो थी नही। फिर उन मुद्राओं को खपाने के लिए देश मे या ज्यादा सही रूप से किसी राज्य में बाजार व्यवस्था का इतिहास क्या है? किराना दुकान तो था नही। ले देकर मेला एक व्यापार का साधन था, जो अँग्रेजों ने शुरू किया। जिसमें मुख्य बिक्री के सामान मुख्यतः दक्षिणी पूर्वी देशों से आयातित मसाले, नारियल, अगरबत्ती, कपूर, सुपारी, सूखे मेवे, श्रृंगार के साधन जैसे सिंदूर, रोड़ी और लोहे के सामान जैसे कृषि के या भाला, तलवार, गड़ासी आदि थे। उससे पहले मुगलों ने मीना बाजार शुरू किया था वो भी केवल ट्रेड रूट के साथ साथ, जो  चकलाघर ज्यादा था, सामान्य वस्तुओं का व्यापार कम। मुख्यतः चटगाँव से दिल्ली का रास्ता जीटी रोड (NH2, अब शायद बदल गया है) और सूरत से दिल्ली का रास्ता NH1 के व्यापारियों के लिए लड़कियों के खरीद फरोख्त का अड्डा था। यह मीना बाजार सराय के आसपास हुआ करता था। जहाँ व्यापारी अपने माल के साथ कुछ समय के लिए रुक सकता था। उसके पहले कौन सी बाजार व्यवस्था थी?

आप नीचे Journey of Indian bureau of Mines का रिपोर्ट देख सकते हैं। साथ मे लगा Indian Journal of History of Science में प्रकाशित History of Mining in India पर आर्टिकल भी देख सकते हैं। जिसमे 1400-1800 AD के बीच भी माइनिंग के शुरू होने में conjecture का ही सहारा लेना पड़ रहा है और कहा गया है कि इनका कोई रेफरेन्स नही है। एक जगह सोने के सिक्के मिलने को सोना के उत्खनन के सबूत के रूप में लिया जा रहा है। लेखकों के कॉमन सेंस की कमी मानी जायेगी कि वह इतना सोच नही पाए कि सिक्के व्यापारियों के माध्यम से यहाँ आ सकते हैं और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में छिटपुट ही मिले हैं। मतलब इतने सारे राज्यों की मुद्रा की जरूरत पूरी करने के करीब होने की बात छोड़ दीजिए, 500 साल से शुरू केवल ट्रेड रूट के व्यापारियों की भी जरूरत पूरी करने लायक नही हैं।


बहे हुओं को छोड़ दें तो हमारे देश के इतिहासकार आपको कुछ भी अंट शंट बताते रहे हैं। ये उस गेंदबाज की तरह हैं, जो ऐसा फेंकता है कि किसी को तो क्या, बल्लेबाज को भी दिखाई नही पड़ता। केवल फेंकने का एक्शन दिखाई पड़ता है। पर, ताली सभी को पीटना है। वाह! क्या फेंका है! क्या फेंका है! हमलोगों की विशेषज्ञता कोई इतिहास तो है नही, तो हमलोग उनके कमअक्ली को ही विद्वता मानने के लिए मजबूर रहे हैं, पर, अब नही!

~राहुल पटेल

Monday, September 2, 2024

उर शब्द

 #आदिकिसान #adikisan #समाज 

बच्चे की बरही के अगले दिन यानी आज मैं पत्नी के साइड से फुआ को उनके गाँव छोड़ने की तैयारी कर रहा था। पत्नी के बहन की बच्ची मेरे पास ही रहती है। मैंने उससे कहा कि "ननियाउर चलबिस?" बोलने के बाद मेरा दो तीन बातों पर ध्यान गया। 


खैर उधर से ही ससुराल भी चला गया। ससुर से इसी बारे में बात हो रही थी। ननियाउर, ददियाउर आदि। अब ये शब्द चलन में नगण्य है। शायद अब कुछ पुरनिया हो बोलते हों। चलन में सबसे ज्यादा नानी गाँव  तथा धीरे धीरे पूर्णतः किताबी शब्द ननिहाल(हिंदी) आ रहा है। 


1. ससुर ने कहा कि रामायण में भी राम के 'ननिहाल' का जिक्र है। आप क्या समझे? (Hint - राम का भौगोलिक क्षेत्र और भाषा थोपना)


2. उर क्या होता है? आज भी दक्षिण भारत मे उर शब्द का प्रचलन पूरे जोरो पर है। उर का मतलब गाँव! यह गाँव शब्द कहाँ का है?


3. हमलोगों से दक्षिण भारत के किन समूहों का संबंध है? 


4. यह कौन सी भाषा है?


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