Friday, September 13, 2024

भ्रामक इतिहास में मुद्रा की व्यवस्था

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1975 में सासाराम, बिहार में लकड़ी की चौकी(पलंग की ही तरह लेकिन बिना डिज़ाइन के लकड़ी के पटरा से बना) 50/- में मिलती थी। मेरे यहाँ 70/-की आयी तो देखनिहार आते थे, कैसी चौकी है भाई!

समझ सकते हैं कि लोगों के पास मुद्रा कितनी थी। पर, हमारे इतिहासकार लिखते हैं कि 200 साल या उससे पहले राजा होते थे, जो लाखों की संख्या में सैनिक रखते थे(कृष्ण के पास तो अक्षौहिणी सेना यानी 18 लाख की सेना थी) और वे अपने सैनिकों को सोने चाँदी की मुद्रा में वेतन देते थे। और फिर उनके हथियार, कवच, जानवर आदि के लिए जो पूरी अर्थव्यवस्था बनी होगी तो उनको भी मुद्रा में भुगतान करना होता होगा। देश की आबादी ही दहाई करोड़ से कम थी। उसमे भी किसी एक राजा के राज्य में कुछ दहाई लाख या इकाई करोड़ में जनसंख्या होती होगी। उसमें भी एक सैनिक या अन्य सेवा देने वाले के परिवार में उस समय के संयुक्त परिवार के हिसाब से 10 लोग और वर्त्तमान के एकल परिवार के हिसाब से 4 लोग मान लें तो पूरे देश मे इकाई करोड़ के आसपास परिवार थे या एक राज्य में लाख या कम ही परिवार थे और सबके पास उस समय के हिसाब से भी अत्यंत महँगे धातु की मुद्राएँ होतीं थीं।

दूसरे सबूतों को भी देखें तो कुछ कुछ परिवारों(अत्यंत ही नगण्य संख्या में) में आपको धातु की मुद्राएँ खासकर चाँदी की विक्टोरियन मुद्राएँ एक या ज्यादा घड़े में मिलती थी। मेरे यहाँ भी दो घड़े थे। ये दो पीढ़ी पहले तक जमीन में दबी मिलती थीं। क्यों? बस एक ही कारण है, मुद्राएँ पुरखों ने मुगलों, अँग्रेजों के कारिंदों यानी राजा, महाराजा, जमींदार आदि से किसी एवज में स्वीकारी थीं। मेरे पुरखे अपने पूरे कुनबे के साथ वर्त्तमान इलाके में बसने, खेती शुरू करने और क्रमशः लगान देने के एवज में मुद्राएँ लिए होंगे। पर वे नही जानते थे कि इसका करें क्या, सो भविष्य के लिए जमीन में गाड़ दिया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मुद्रा का चलन ही न था। शहरी अर्थव्यवस्था 1947 तक पूरे देश मे कुछ दहाई में थे, 3000 साल पहले की बात ही छोड़ दीजिए।

तो ये कहानियाँ कि देश मे 1000 साल पहले, 7000 साल(वैदिक विद्वानों की माने तो लाखों करोड़ों साल पहले, जब मनुष्य इस धरती पर आया नही था, तब से) पहले राजा होते थे, उनकी प्रजा होती थी, सैनिक होते थे, नगर थे, बनावटी प्रतीत होते हैं। मुद्रा के इतिहास की बात करेंगे तो फिर धातु के निष्कर्षण, परिष्करण के इतिहास की भी बात आएगी और फिर किस काल मे किस क्षेत्र में निष्कर्षण शुरू हुआ? आखिर एक राजा, अपने क्षेत्र के धातु को किसी दूसरे राज्य को उन धातुओं को वैसे ही तो देगा नही, तो फिर वह transaction किस चीज में करता होगा? पूरे भारत मे उन धातुओं के वितरण का साधन क्या होगा और उस की हरेक राज्य में कीमत का आधार क्या इस्तेमाल कर रहा होगा? कोई केंद्रीय अथॉरिटी तो थी नही। फिर उन मुद्राओं को खपाने के लिए देश मे या ज्यादा सही रूप से किसी राज्य में बाजार व्यवस्था का इतिहास क्या है? किराना दुकान तो था नही। ले देकर मेला एक व्यापार का साधन था, जो अँग्रेजों ने शुरू किया। जिसमें मुख्य बिक्री के सामान मुख्यतः दक्षिणी पूर्वी देशों से आयातित मसाले, नारियल, अगरबत्ती, कपूर, सुपारी, सूखे मेवे, श्रृंगार के साधन जैसे सिंदूर, रोड़ी और लोहे के सामान जैसे कृषि के या भाला, तलवार, गड़ासी आदि थे। उससे पहले मुगलों ने मीना बाजार शुरू किया था वो भी केवल ट्रेड रूट के साथ साथ, जो  चकलाघर ज्यादा था, सामान्य वस्तुओं का व्यापार कम। मुख्यतः चटगाँव से दिल्ली का रास्ता जीटी रोड (NH2, अब शायद बदल गया है) और सूरत से दिल्ली का रास्ता NH1 के व्यापारियों के लिए लड़कियों के खरीद फरोख्त का अड्डा था। यह मीना बाजार सराय के आसपास हुआ करता था। जहाँ व्यापारी अपने माल के साथ कुछ समय के लिए रुक सकता था। उसके पहले कौन सी बाजार व्यवस्था थी?

आप नीचे Journey of Indian bureau of Mines का रिपोर्ट देख सकते हैं। साथ मे लगा Indian Journal of History of Science में प्रकाशित History of Mining in India पर आर्टिकल भी देख सकते हैं। जिसमे 1400-1800 AD के बीच भी माइनिंग के शुरू होने में conjecture का ही सहारा लेना पड़ रहा है और कहा गया है कि इनका कोई रेफरेन्स नही है। एक जगह सोने के सिक्के मिलने को सोना के उत्खनन के सबूत के रूप में लिया जा रहा है। लेखकों के कॉमन सेंस की कमी मानी जायेगी कि वह इतना सोच नही पाए कि सिक्के व्यापारियों के माध्यम से यहाँ आ सकते हैं और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में छिटपुट ही मिले हैं। मतलब इतने सारे राज्यों की मुद्रा की जरूरत पूरी करने के करीब होने की बात छोड़ दीजिए, 500 साल से शुरू केवल ट्रेड रूट के व्यापारियों की भी जरूरत पूरी करने लायक नही हैं।


बहे हुओं को छोड़ दें तो हमारे देश के इतिहासकार आपको कुछ भी अंट शंट बताते रहे हैं। ये उस गेंदबाज की तरह हैं, जो ऐसा फेंकता है कि किसी को तो क्या, बल्लेबाज को भी दिखाई नही पड़ता। केवल फेंकने का एक्शन दिखाई पड़ता है। पर, ताली सभी को पीटना है। वाह! क्या फेंका है! क्या फेंका है! हमलोगों की विशेषज्ञता कोई इतिहास तो है नही, तो हमलोग उनके कमअक्ली को ही विद्वता मानने के लिए मजबूर रहे हैं, पर, अब नही!

~राहुल पटेल

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