Thursday, January 16, 2025

योगासन का इतिहास

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योगासन एक प्रकार के तन्यता अभ्यास/stretching excercises हैं, जो अन्य शारीरिक व्यायामों से इस प्रकार अलग हैं कि इनमें माँसपेशियों के मजबूत उभार पर बल न होकर साँस और अंगों के चालन के एकीकृत अभ्यास से शरीर को स्वस्थ रखा जाता है। ये शरीर को लचीला, फुर्तीला और स्वस्थ बनाए रखते हैं। जबकि योग ध्यान साधना का एक तरीका है। योग या योगासन किसी धर्म से जुड़ा नही है और विभिन्न सभ्यताओं में विभिन्न नामों से प्रचलन में है। सही पूछे तो इस्लाम के नमाज पढ़ने में या चीन, जापान आदि के अनेकों मार्शल आर्ट्स जैसे कराटे, जूजूत्सु, कुंगफू आदि में अनेकों आसन छुपे हुए हैं। किसी भी नाम से योग या योगासन से जुड़े मिथक इसके भारतीय मूल का होने, अति प्राचीन होने, हजारों साल पुराना होने, सांस्कृतिक विरासत होने, ऋग्वेद में इसका वर्णन होने, 5000 साल पुराना होने आदि का दावा करते हैं। 5000 साल वाले दावा का एकमात्र आधार मोहनजोदड़ो में मिले सील पर ध्यान की मुद्रा में बैठे एक व्यक्ति के कारण है, जिसको पशुपतिनाथ कहने का एक दूसरा मिथक है। 


हालाँकि, यह बादलों में हाथी, शिव, हनुमान देखने जैसी बात भी हो सकती है। मोहनजोदड़ो सभ्यता के बारे में जब अभी तक कुछ खास पढ़ा नही जा सका है, तो, निश्चित तौर पर उसे योगासन का नाम भी नही दिया जाना चाहिए। भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में नगरीय सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता की ओर जाने का वृतांत भी संदेहास्पद है। लगभग 2500 साल के अंधकार के बाद हिन्दू दावे में एक दूसरी तिथि लगभग 2500 साल यानी 300 ईसापूर्व (BCE) की दी जाती है। कथा उपनिषद में योग शब्द का मात्र उल्लेख है। लगभग उसी समय काल मे श्वेताश्वतार उपनिषद में साँसों के माध्यम से दिमाग को नियंत्रित करने का वर्णन है। बाद में लिखे मैत्री उपनिषद में योग के माध्यम से साँस नियंत्रण, ध्यान, समाधि आदि की 6 विधियों का वर्णन है। इनमें दो और विधि मिलाकर 200 BCE के लगभग पातंजलि का आठ विधि वाला योगसूत्र का वर्णन है। इसमे आसन शब्द का उल्लेख तो है, पर, वह ध्यान लगाने के संदर्भ में है, न कि एक व्यायाम के रूप में। हालाँकि पातंजलि का समय काल कुछ विद्वानों के अनुसार 300 CE है। गीता में ध्यान साधना के लिए तीन योगों का वर्णन है- भक्ति योग, कर्म योग और ज्ञान योग। जो कहीं से भी आसनों के बारे में नही है। बाद में विवेकानंद और शिवानंद ने इनमें राजयोग जोड़ा। जिसका, फिर से योगासनों से कोई लेना देना नही है। इस प्रकार एक बार फिर से 200 BCE से सीधे 19वीं शताब्दी तक यानी 2000 साल तक योग का कहीं कोई वर्णन नही है। यह अंधकार नोट करने वाली बात है, क्योंकि कोई रिवाज अचानक प्रकट या गायब नही होती। हठयोग 19वीं शताब्दी के पहले देखने को मिलता है, जो बजाय ध्यान साधना वाले कोमल स्वरूप के शारीरिक कष्ट से ईश्वर/ज्ञान/सत्मार्ग की प्राप्ति का साधन रहा है। । पर, कुल मिलाकर 19वीं शताब्दी तक आज के योगासनों का कहीं किसी प्रकार का कोई उल्लेख नही है। वैसे गीता, पुराण, उपनिषद की प्राचीनता पर ही बड़ा सा प्रश्नवाचक चिन्ह है, इसलिए भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में ध्यान साधना वाले योग(योगासन/yogic excercises नहीं) की भी प्राचीनता संदिग्ध है। इन ग्रंथों की लिखित रूप में किताबें यूरोपियन लेखकों द्वारा अनुवादित किये जाने के नाम से तो हैं, जिनका बाद में पुनः संस्कृत और हिंदी में अनुवाद किया गया। पर, यूरोपियन लेखकों द्वारा स्रोत के रूप में इस्तेमाल की गई पाण्डुलिपियों का या किसी अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों का कहीं कोई अस्तित्व नही है। वैसे भी भारत मे कागज हाल की चीज है। ताड़पत्रों या छालों पर लिखने का पुरातात्विक सबूत भी आजतक भारत मे नही मिला है। भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलुरु ने 1974 में ही यह साबित किया था कि वैमानिकी शास्त्र 1900-1920 के बीच लिखा गया है।

 
इसी प्रकार की ध्यान साधना बुद्धिज़्म में भी है। जो 3000 साल या 500 BCE पुरानी मानी जा सकती है।
 
यदि हिंदुओं के दावे को सही मान लिया जाए तो इजिप्ट के केमेट/kemet लोगों के मंदिरों में मिले चित्रलेखों/hieroglyphics के अनुसार 1994 में डॉ मुआता अशबी (Muata Ashby) के लिखे किताबों(Egyptian Yoga postures of the Gods and Goddesses) में पहली बार उजागर विभिन्न योगासन जैसे दिखने वाले शारीरिक स्थितियों(body postures) के आधार पर योग इजिप्ट में 10000 साल से प्रचलन में है।


इस्लाम के प्रार्थना के तरीके में शामिल बहुत सारे योगासनों के अंश के स्रोत इजिप्ट के मूल में हो सकते हैं। यही नही, खासकर जब तरह तरह के आसनों और ध्यान मुद्रा की बात हो रही हो तो भारतीय दावों के सबूतों से कहीं ज्यादा संख्या में और ज्यादा विश्वसनीय रिकॉर्ड उत्तरी अफ्रीका/केमेट के हैं।

 
तो हमने देखा कि योग का सबसे पुराने होने के दावे में उत्तरी अफ्रीका या इजिप्ट का दावा सबसे पुराना हो सकता है। योग और योगासन के दावे में चीन का दावा भारतीय दावे से ज्यादा विश्वसनीय और पुराना है। चीन में दाओयिन/daoyin या daoyintu नाम से कम से कम 200 ईसापूर्व(BCE) से है। नीचे शोध पत्र(Yoga and Daoyin: History, Worldview, and Techniques -Livia Kohn) के कुछ अंश देख सकते हैं। वस्तुतः योग सिल्क ट्रेड रूट के व्यापारियों और साधुओं(monks) के माध्यम से भारत मे आया हुआ हो सकता है। Alchemy/कीमियागर/रसायन शास्त्र की शुरुवात चीन से हुई है। यह शुरू में केवल दीर्घायु करने के तरीकों तक सीमित था। इनमें से एक सिंदूर/HgS का सेवन भी था, जो हमलोग सिंदूर का खेला पोस्ट(https://freshperspectivebyiitian.blogspot.com/2024/03/blog-post_18.html) में देख चुके हैं। योगासन का चीनी संस्करण दाओयिन (दाओ – दिशा देना, मार्ग बताना /to guide, यहाँ ची/सोच/मन को दिशा देने की बात हो रही है + यिन - तन्यता/to stretch, यहाँ शरीर को तानने की बात हो रही है)। भी दीर्घायु के उद्देश्य से ही है। आप जानते हैं कि योगासन भी इसी के बारे में है।



सिल्क पर बना मवांगदुई/Mawangdui का अभिलेख 200BCE का है। जो तन्यता अभ्यासों/Daoyin tu 導引圖 (Exercise Chart) के बारे में एक चार्ट के रूप में मौजूद है। हालाँकि इस पर कुछ खास लिखा हुआ नही है। लिखित रूप में दो अभिलेखों में एक बाँस पर यिंशु के अभिलेख(bamboo tablets of the Yinshu 引書 (Stretch Book)) 186 BCE के मिले हैं। इनमें स्पष्ट रूप से शरीर को तंदरुस्त रखने के लिए शारीरिक अभ्यासों की जरूरत बताई गई है और उनका वर्णन है।

इसके उलट भारत मे ये योगासन महज 100 साल पुराने हैं। इनके प्रचलित होने में टी. कृष्णामाचारी का सबसे बड़ा योगदान है। सूर्यनमस्कार और कुछ अन्य योगासन तो 1930 में बने। इन योगासनों के बनने मे अँग्रेजों और प्रचार प्रसार में उनके करीब रहे भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है। इसका सबूत मार्क सिंगलटन की किताब Yoga Body: The Origins of Modern Posture में देखा जा सकता है। यह जोसेफ आल्टर की किताब Yoga in Modern India: The Body Between Science and Philosophy में भी वर्णित है।
 
तन्यता अभ्यासों/gymnastic के दावों में सबसे पुराना होने का दावा प्राचीन ग्रीक का है। कम से कम रोमनों द्वारा ग्रीस को 146 BCE में जीतने के बाद अपनी सेना में इनको शामिल करने का वर्णन है। ऊपर चीन में मिले अभिलेखों से स्पष्ट है कि उनके यहाँ ये शारीरिक अभ्यास केवल समाज के उच्च वर्ग तक सीमित था, भारतीय ग्रंथ जिस भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हों, उस क्षेत्र और इजिप्ट में भी ऐसा ही था। ग्रीस तथा रोम में उच्च वर्ग और सैनिकों तक सीमित था। ये दूसरे नामों से यूरोप में आमजन में 100 साल पहले ही प्रचलित हुए और वहाँ से भारत और बाकी दुनिया मे फैले।

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