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व्हाट्सएप्प पर आरएसएस का "गर्व करो" एजेंडा के तहत लिखा फॉरवर्डेड लेख(प्रिंटिंग प्रेस की कहानी) और उसका पोस्टमार्टम:
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*भारत का पहला प्रिंटिंग प्रेस कब और कहाँ पर खुला?*
1674–75 में देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस गोवा में खोला गया था जिसमे केवल बाइबिल की पुस्तक छपती थी।
भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस कहां स्थापित हुई थी?
भारत में प्रिंटिंग प्रेस का प्रचलन करने वाला प्रथम व्यक्ति कौन था?
पहला प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने क्या था?
प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया?
15 वीं सदी में यूरोप में शब्द जब मुद्रित हुआ तो उसने मनुष्य की दुनिया को हमेशा के लिये बदल दिया। एक नए समय ने जन्म लिया। सामान्य जन तक पुस्तकों का प्रसार, स्वतंत्रता का बोध और लोकतांत्रिक चेतना का उदय। रोमन सम्राज्य में जर्मन जोहन्स गुटेनबर्ग ने 1440 में प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया था और उसी के साथ यूरोपियन रेनेसां और आधुनिक युग का उदय हुआ था।
भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस
चकित कर देता है यह जानना कि हमारे इस बम्बई शहर में भी पहला प्रिंटिंग प्रेस 17वीं सदी में ही स्थापित हो गया था और वह भी एक भारतीय द्वारा। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी का कारोबार अभी यहां ठीक से फैला नहीं था। इस शहर में बीते समय के किस्से बिखरे पड़े हैं लगभग रहस्य कथाओं की तरह।
बम्बई में यह प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक व्यापारी ने लगाया था। सूरत निवासी भीमजी पारिख के भीतर एक नये युग का सपना था और एक अद्भुत जुनून। उनकी यह कहानी खासी दिलचस्प है। यह सच है कि बम्बई में इस प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना से पहले 16वीं सदी में भारत के तटीय इलाकों में ईसाई धर्म प्रचारकों के मार्फत मुद्रण टेक्नोलॉजी का प्रवेश हो चुका था पर उनके उद्देश्य दूसरे थे। ये ईसाई धर्म प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिये बाइबिल की छपी हुई प्रतियां लेकर यहां आते थे। गोवा में उन्होंने देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस जरूर खोला पर केवल बाइबिल की प्रतियां छापने के लिये। भीमजी पारेख ने बम्बई में 1674-75 में जब अपना प्रिंटिंग प्रेस खोला तो उनका वह प्रेस अपनी परंपरा की स्मृति और सामूहिक बोध के प्रसार के लिये एक नए युग की वास्तविक शुरुआत थी। यह उल्लेखनीय है कि अभी किताबें छपनी शुरू नहीं हुई थीं। भारत में किसी समाचार पत्र की शुरुआत भी अभी नहीं हुई थी।
भीमजी पारेख ने अपनी छापेखाने की यह मशीन यूरोप से आयात की थी। वे उसे सूरत में लगाना चाहते थे। इतिहासकार मकरंद मेहता अपनी पुस्तक 'इंडियन मर्चेंट ऐंड इंटर्प्रिनर्स इन हिस्टोरिकल पर्सपेक्टिव' में लिखते हैं कि 'भीमजी पारेख ईस्ट इंडिया कंपनी के लिये एक कमीशन एजेंट थे और सिक्कों के विनिमय का कारोबार करते थे। कंपनी ने उनकी सेवाओं से प्रभावित होकर उन्हें एक मैडल और सोने के चेन भी प्रदान किए थे, जिसकी कीमत 1683 में 150 शिलिंग थी।'
ईस्ट इंडिया कंपनी का हेड क्वार्टर तब सूरत में था। सूरत मुगल शासन के अधीन था और ओरंगजेब द्वारा गैर-मुस्लिमों पर लगाये गए जजिया कर से सूरत के व्यापारी परेशान थे। 1674 में भीमजी पारेख 800 हिंदू और जैन बनियों के एक दल को लेकर सूरत छोड़कर बम्बई चले आए। उन्हीं दिनों गेराल्ड औंगियार को ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1675 में सूरत की फेक्टरी का अध्यक्ष और बम्बई का गवर्नर नियुक्त किया था। उसी दौर में बम्बई का टापू एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हो रहा था। औंगियार ने सूरत के व्यापारियों और कुशल कारीगरों को धंधे-व्यापार के लिये बम्बई आकर बसने का न्यौता दिया था। परिणामस्वरूप बहुत सारे पारसी, अर्मेनियन, बोहरा, यहूदी, गुजराती और जैन बनिये और ब्राह्मण सूरत और दीव से बम्बई चले आये थे। बम्बई का एक बहु सांस्कृतिक स्वरूप उभरने लगा था। अंग्रेज गवर्नर ने डोंगरी से लेकर मेंढम्स पॉइंट (वर्तमान में लॉयन गेट) तक के इलाके को एक दीवार से घेरने की विस्तृत योजना बनाई। भारत में यह आधुनिक नगरीकरण का पहला प्रयास था। इसी के साथ इस शहर में बड़े भवन बनने लगे। बंदरगाह विकसित हुआ। 1670 में औंगियार के प्रयासों से ही पहली बार बम्बई में टकसाल स्थापित हुई।
जे. बी. प्रिमरोज 'ए लडंन प्रिंटर्स विजिट टू इंडिया इन सेवेन्टींथ सेंचुरी' में लिखते हैं कि भीमजी पारेख ने बम्बई प्रांत के तत्कालीन गवर्नर गेराल्ड औंगियर से यह अनुरोध किया था कि वे छपाई की मशीन के साथ एक ऐसा विशेषज्ञ भी यहां बुलाना चाहते हैं जो ब्राह्मी लिपि (आधुनिक देवनागरी) के मैटर को छाप सके और वे इसके लिये उस विशेषज्ञ को तीन वर्षों तक सालाना 50 पाउंड का पारिश्रमिक देने को तैयार हैं।'
भीमजी के अनुरोध पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने हेनरी हिल्स नामक एक मुद्रण विशेषज्ञ को यहां बुला भेजा। ब्राह्मी लिपि के लिये टाइप अक्षरों को गढ़ने का काम शुरू हुआ। हालांकि हेनरी विल्स के पास भारतीय लिपि में टाइप फॉन्ट काटने की पूरी निपुणता नहीं थी। भीमजी ने इसके लिये कंपनी से अक्षरों की कास्टिंग करने वाले टाइप फाउंडर को मंगवाने का अनुरोध किया। वे ब्राह्मी लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, पांडुलिपियों को ताड़पत्रों की कैद से निकालकर कागज की दुनिया में उतारना चाहते थे। इधर कंपनी को यह लगता रहा था कि भीमजी बाइबिल की प्रतियों को अपने यहां देवनागरी में छापेंगे और ईसाई धर्म के प्रचार मे मदद देंगे। बम्बई में यह दो सांस्कृतिक परिवेशों का पहला टकराव था। एक विवाद पैदा हो गया। हेनरी हिल्स काम अधूरा छोड़ कर लौट गया। भीमजी पारेख ने करारनामा तोड़ने के आरोप में उस पर कानूनी मुकदमा दायर कर दिया। कंपनी ने उसकी जगह दूसरे किसी विशेषज्ञ को बुलाने का कोई इंतजाम नहीं किया। इंग्लैंड से अक्षरों की कास्टिंग करने वाला कोई टाइप फाउंडर यहां नहीं आया। भीमजी ने स्थानीय लोगों से यह काम करवाने की कोशिशें कीं पर परिणाम संतोषजनक नहीं थे। इन लोगों को इस काम का कोई अनुभव नहीं था। पारेख मृत्यु पर्यंत देवनागरी में छपाई शुरू करने के इस अभियान में लगे रहे। तरह-तरह के अवरोधों से लड़ते रहे। उन्होंने अपना बहुत सारा धन भी इस पर खर्च कर दिया था पर उनका वह सपना पूरा नहीं हुआ। मकरंद मेहता अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि योरोपीय लोग यहां स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित करना ही नहीं चाहते थे। वे जानते थे कि यदि ऐसा करेंगे तो उन्हें देसी प्रतिभा से स्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ब्राह्मी लिपि में भारतीय ग्रंथों को छापने का भीमजी का वह सपना उनके जीवन काल में अधूरा रह गया। अलबत्ता रोमन लिपि में बहुत सारी चीजें इस प्रेस में मुद्रित होती रहीं।
1680 में भीमजी मेहता के निधन के कई वर्ष बाद अंग्रेजी के टाइपोग्राफर और भारतविद चार्ल्स विल्किन्स ने देवनागरी के फॉन्ट बनाये और 1805 में जो पहली पुस्तक देवनागरी में मुद्रित हुई वह 'भगवत गीता' थी। आज हम एक डिजिटल युग में हैं। साइबर संस्कृति और पेपरलैस कामकाज के इस जमाने में आज की युवा पीढ़ी को छापेखाने और टाइपसेट फाउंड्री की वह संस्कृति, उसके लिये किया गया संघर्ष और मुद्रित शब्द का वह पुराना दौर शायद एक मिथकीय समय लगे। लेकिन आरम्भिक वुडब्लॉक प्रिंटिंग से लेकर मेटल टाइप, रोटरी प्रेस, लिथोग्राफी, ऑफसेट प्रिंटिंग, स्क्रीन प्रिंटिंग, लेजर प्रिंटिंग तक होते हुए आज डिजिटल प्रिंटिंग और थ्री-डाइमेंशन प्रिंटिंग तक पहुंची हमारी यह यात्रा सभ्यता, नगरों के विकास, संस्कृतियों के बदलाव और कार्य शैलियों में उलटफेर की यात्रा भी है। भीमजी पारेख की तरह की कितनी ही गाथाएं इसमें छिपी हुई हैं।
पोस्टमार्टम:-
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यह अपने कहाँ से उठा लिया है। अधिकांश वाक्य केवल दम भरने वाले और विरोधभाषी है।
जैसे
- शुरू में कुछ देर तक लेख दावा कर रहा है कि पहला प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक भारतीय ने खोला, पर छठे पैराग्राफ में कह रहा है कि "यह सच है कि......"। ज्ञात हो कि भारत मे पहला प्रिंटिंग प्रेस लगभग 500 साल पहले सन 1500 में आ चुका था
- इस लेख में भीमजी पारेख के नए युग का सपना, अद्भुत जुनून, परंपरा की स्मृति, सामूहिक बोध का प्रसार आदि खूब गैस भरा है। लेकिन जब भारत के इतिहास के रचयिता ही अँग्रेज थे तो कौन सा इतिहास, कौन सी परम्परा और उन्हें पढ़ते कौन लोग, 1870 में साक्षरता दर ही 3% थी। यह भी की ये 3% भी फ़ारसी उर्दू वाले ही थे। हिंदी अभी बनी नही थी, संस्कृत इस देश मे आयी नही थी। 50 साल पहले तक तो उर्दू जानने, पढ़ने, लिखने वालों खासकर कायस्थों(बस अँग्रेजों, मुगलों के साथ आये लोग, बाकी 98% जनता को कोई मतलब नही था) की बहुत पूछ थी, क्योंकि उर्दू के पहले भारत मे भाषाएँ तो थी, कोई स्क्रिप्ट ही नही था (ब्राम्ही, देवनागरी कुछ नही, लिखने पढ़ने का कोई चलन ही नही था)
- कृपया ब्राम्ही लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, ताड़पत्र वाले पांडुलिपियों के भारत मे कहीं मिलने के सबूत पेश कीजिये
- दो सांस्कृतिक परिवेशों का टकराव अच्छी सनातनी भावना जगाता है और पारेख जी को सावरकर की तरह देशभक्त साबित करता है। करारनामा के विवाद का टकराव संस्कृति का टकराव हो गया!
- पारेख मृत्युपरांत देवनागरी में छपाई में लगे रहे, uhhh! लेखक को लिखते समय थोड़ा विवेक बरतना चाहिए। यदि यह typo मान भी लिया जाए तो प्रेस शुरू करने में ही पारेख जी को तकनीकी दिक्कत आ रही थी, लेकिन वे देवनागरी(1796 में बनी) में छपाई शुरू कर दिए
- यदि यूरोपियन लोग स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित नही करना चाहते तो वे पारेख को प्रेस बैठाने में इतना जद्दोजहद ही नही करते। देशी प्रतिभा से यूरोपियन लोगों को प्रतिस्पर्धा का डर था, एक दम हास्यास्पद बात है।
- रोमन लिपि में उनके प्रेस से बहुत सारी चीजें मुद्रित हुईं। ज्ञात हो कि उनके प्रेस से किसी भी लिपि में छपी एक भी पुस्तक का कहीं कोई रिकॉर्ड नही है
कुछ और बातें! यहाँ हिन्दू लोग कौन हैं, अच्छा विवरण दिया है।
जॉन गिलक्रिस्ट ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम्स में बैठकर 1796 में अपने supervision में देवनागरी बनवाया। तब जाकर 1805 में अंग्रेजों द्वारा बैठाए गए प्रेस "गीता प्रेस" से गीता छपी और अँग्रेजों तथा भारत सरकार के अथक प्रयास और अरबों खरबों रुपया बहाने के बाद भी 200 साल के बाद 2011 की जनगणना के अनुसार मात्र 26.11% लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करते हैं।
पूरा लेख आरएसएस का "गर्व करो" एजेंडा के तहत लिखा गया लगता है।
~राहुल पटेल