Tuesday, May 14, 2024

प्रिंटिंग प्रेस की भारतीय कहानी और उसका पोस्टमार्टम

 #समाज #आदिकिसान 

व्हाट्सएप्प पर आरएसएस का "गर्व करो" एजेंडा के तहत लिखा फॉरवर्डेड लेख(प्रिंटिंग प्रेस की कहानी) और उसका पोस्टमार्टम:

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*भारत का पहला प्रिंटिंग प्रेस कब और कहाँ पर खुला?*

1674–75 में देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस गोवा में खोला गया था जिसमे केवल बाइबिल की पुस्तक छपती थी।

भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस कहां स्थापित हुई थी?

भारत में प्रिंटिंग प्रेस का प्रचलन करने वाला प्रथम व्यक्ति कौन था?

पहला प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने क्या था?

प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया?

15 वीं सदी में यूरोप में शब्द जब मुद्रित हुआ तो उसने मनुष्य की दुनिया को हमेशा के लिये बदल दिया। एक नए समय ने जन्म लिया। सामान्य जन तक पुस्तकों का प्रसार, स्वतंत्रता का बोध और लोकतांत्रिक चेतना का उदय। रोमन सम्राज्य में जर्मन जोहन्स गुटेनबर्ग ने 1440 में प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया था और उसी के साथ यूरोपियन रेनेसां और आधुनिक युग का उदय हुआ था।

भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस

चकित कर देता है यह जानना कि हमारे इस बम्बई शहर में भी पहला प्रिंटिंग प्रेस 17वीं सदी में ही स्थापित हो गया था और वह भी एक भारतीय द्वारा। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी का कारोबार अभी यहां ठीक से फैला नहीं था। इस शहर में बीते समय के किस्से बिखरे पड़े हैं लगभग रहस्य कथाओं की तरह।

बम्बई में यह प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक व्यापारी ने लगाया था। सूरत निवासी भीमजी पारिख के भीतर एक नये युग का सपना था और एक अद्भुत जुनून। उनकी यह कहानी खासी दिलचस्प है। यह सच है कि बम्बई में इस प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना से पहले 16वीं सदी में भारत के तटीय इलाकों में ईसाई धर्म प्रचारकों के मार्फत मुद्रण टेक्नोलॉजी का प्रवेश हो चुका था पर उनके उद्देश्य दूसरे थे। ये ईसाई धर्म प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिये बाइबिल की छपी हुई प्रतियां लेकर यहां आते थे। गोवा में उन्होंने देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस जरूर खोला पर केवल बाइबिल की प्रतियां छापने के लिये। भीमजी पारेख ने बम्बई में 1674-75 में जब अपना प्रिंटिंग प्रेस खोला तो उनका वह प्रेस अपनी परंपरा की स्मृति और सामूहिक बोध के प्रसार के लिये एक नए युग की वास्तविक शुरुआत थी। यह उल्लेखनीय है कि अभी किताबें छपनी शुरू नहीं हुई थीं। भारत में किसी समाचार पत्र की शुरुआत भी अभी नहीं हुई थी।

भीमजी पारेख ने अपनी छापेखाने की यह मशीन यूरोप से आयात की थी। वे उसे सूरत में लगाना चाहते थे। इतिहासकार मकरंद मेहता अपनी पुस्तक 'इंडियन मर्चेंट ऐंड इंटर्प्रिनर्स इन हिस्टोरिकल पर्सपेक्टिव' में लिखते हैं कि 'भीमजी पारेख ईस्ट इंडिया कंपनी के लिये एक कमीशन एजेंट थे और सिक्कों के विनिमय का कारोबार करते थे। कंपनी ने उनकी सेवाओं से प्रभावित होकर उन्हें एक मैडल और सोने के चेन भी प्रदान किए थे, जिसकी कीमत 1683 में 150 शिलिंग थी।'

ईस्ट इंडिया कंपनी का हेड क्वार्टर तब सूरत में था। सूरत मुगल शासन के अधीन था और ओरंगजेब द्वारा गैर-मुस्लिमों पर लगाये गए जजिया कर से सूरत के व्यापारी परेशान थे। 1674 में भीमजी पारेख 800 हिंदू और जैन बनियों के एक दल को लेकर सूरत छोड़कर बम्बई चले आए। उन्हीं दिनों गेराल्ड औंगियार को ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1675 में सूरत की फेक्टरी का अध्यक्ष और बम्बई का गवर्नर नियुक्त किया था। उसी दौर में बम्बई का टापू एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हो रहा था। औंगियार ने सूरत के व्यापारियों और कुशल कारीगरों को धंधे-व्यापार के लिये बम्बई आकर बसने का न्यौता दिया था। परिणामस्वरूप बहुत सारे पारसी, अर्मेनियन, बोहरा, यहूदी, गुजराती और जैन बनिये और ब्राह्मण सूरत और दीव से बम्बई चले आये थे। बम्बई का एक बहु सांस्कृतिक स्वरूप उभरने लगा था। अंग्रेज गवर्नर ने डोंगरी से लेकर मेंढम्स पॉइंट (वर्तमान में लॉयन गेट) तक के इलाके को एक दीवार से घेरने की विस्तृत योजना बनाई। भारत में यह आधुनिक नगरीकरण का पहला प्रयास था। इसी के साथ इस शहर में बड़े भवन बनने लगे। बंदरगाह विकसित हुआ। 1670 में औंगियार के प्रयासों से ही पहली बार बम्बई में टकसाल स्थापित हुई।

जे. बी. प्रिमरोज 'ए लडंन प्रिंटर्स विजिट टू इंडिया इन सेवेन्टींथ सेंचुरी' में लिखते हैं कि भीमजी पारेख ने बम्बई प्रांत के तत्कालीन गवर्नर गेराल्ड औंगियर से यह अनुरोध किया था कि वे छपाई की मशीन के साथ एक ऐसा विशेषज्ञ भी यहां बुलाना चाहते हैं जो ब्राह्मी लिपि (आधुनिक देवनागरी) के मैटर को छाप सके और वे इसके लिये उस विशेषज्ञ को तीन वर्षों तक सालाना 50 पाउंड का पारिश्रमिक देने को तैयार हैं।'

भीमजी के अनुरोध पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने हेनरी हिल्स नामक एक मुद्रण विशेषज्ञ को यहां बुला भेजा। ब्राह्मी लिपि के लिये टाइप अक्षरों को गढ़ने का काम शुरू हुआ। हालांकि हेनरी विल्स के पास भारतीय लिपि में टाइप फॉन्ट काटने की पूरी निपुणता नहीं थी। भीमजी ने इसके लिये कंपनी से अक्षरों की कास्टिंग करने वाले टाइप फाउंडर को मंगवाने का अनुरोध किया। वे ब्राह्मी लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, पांडुलिपियों को ताड़पत्रों की कैद से निकालकर कागज की दुनिया में उतारना चाहते थे। इधर कंपनी को यह लगता रहा था कि भीमजी बाइबिल की प्रतियों को अपने यहां देवनागरी में छापेंगे और ईसाई धर्म के प्रचार मे मदद देंगे। बम्बई में यह दो सांस्कृतिक परिवेशों का पहला टकराव था। एक विवाद पैदा हो गया। हेनरी हिल्स काम अधूरा छोड़ कर लौट गया। भीमजी पारेख ने करारनामा तोड़ने के आरोप में उस पर कानूनी मुकदमा दायर कर दिया। कंपनी ने उसकी जगह दूसरे किसी विशेषज्ञ को बुलाने का कोई इंतजाम नहीं किया। इंग्लैंड से अक्षरों की कास्टिंग करने वाला कोई टाइप फाउंडर यहां नहीं आया। भीमजी ने स्थानीय लोगों से यह काम करवाने की कोशिशें कीं पर परिणाम संतोषजनक नहीं थे। इन लोगों को इस काम का कोई अनुभव नहीं था। पारेख मृत्यु पर्यंत देवनागरी में छपाई शुरू करने के इस अभियान में लगे रहे। तरह-तरह के अवरोधों से लड़ते रहे। उन्होंने अपना बहुत सारा धन भी इस पर खर्च कर दिया था पर उनका वह सपना पूरा नहीं हुआ। मकरंद मेहता अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि योरोपीय लोग यहां स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित करना ही नहीं चाहते थे। वे जानते थे कि यदि ऐसा करेंगे तो उन्हें देसी प्रतिभा से स्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ब्राह्मी लिपि में भारतीय ग्रंथों को छापने का भीमजी का वह सपना उनके जीवन काल में अधूरा रह गया। अलबत्ता रोमन लिपि में बहुत सारी चीजें इस प्रेस में मुद्रित होती रहीं।

1680 में भीमजी मेहता के निधन के कई वर्ष बाद अंग्रेजी के टाइपोग्राफर और भारतविद चार्ल्स विल्किन्स ने देवनागरी के फॉन्ट बनाये और 1805 में जो पहली पुस्तक देवनागरी में मुद्रित हुई वह 'भगवत गीता' थी। आज हम एक डिजिटल युग में हैं। साइबर संस्कृति और पेपरलैस कामकाज के इस जमाने में आज की युवा पीढ़ी को छापेखाने और टाइपसेट फाउंड्री की वह संस्कृति, उसके लिये किया गया संघर्ष और मुद्रित शब्द का वह पुराना दौर शायद एक मिथकीय समय लगे। लेकिन आरम्भिक वुडब्लॉक प्रिंटिंग से लेकर मेटल टाइप, रोटरी प्रेस, लिथोग्राफी, ऑफसेट प्रिंटिंग, स्क्रीन प्रिंटिंग, लेजर प्रिंटिंग तक होते हुए आज डिजिटल प्रिंटिंग और थ्री-डाइमेंशन प्रिंटिंग तक पहुंची हमारी यह यात्रा सभ्यता, नगरों के विकास, संस्कृतियों के बदलाव और कार्य शैलियों में उलटफेर की यात्रा भी है। भीमजी पारेख की तरह की कितनी ही गाथाएं इसमें छिपी हुई हैं।


पोस्टमार्टम:-

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यह अपने कहाँ से उठा लिया है। अधिकांश वाक्य केवल दम भरने वाले और विरोधभाषी है।

जैसे

  1. शुरू में कुछ देर तक लेख दावा कर रहा है कि पहला प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक भारतीय ने खोला, पर छठे पैराग्राफ में कह रहा है कि "यह सच है कि......"। ज्ञात हो कि भारत मे पहला प्रिंटिंग प्रेस लगभग 500 साल पहले सन 1500 में आ चुका था
  2. इस लेख में भीमजी पारेख के नए युग का सपना, अद्भुत जुनून, परंपरा की स्मृति, सामूहिक बोध का प्रसार आदि खूब गैस भरा है। लेकिन जब भारत के इतिहास के रचयिता ही अँग्रेज थे तो कौन सा इतिहास, कौन सी परम्परा और उन्हें पढ़ते कौन लोग, 1870 में साक्षरता दर ही 3% थी। यह भी की ये 3% भी फ़ारसी उर्दू वाले ही थे। हिंदी अभी बनी नही थी, संस्कृत इस देश मे आयी नही थी। 50 साल पहले तक तो उर्दू जानने, पढ़ने, लिखने वालों खासकर कायस्थों(बस अँग्रेजों, मुगलों के साथ आये लोग, बाकी 98% जनता को कोई मतलब नही था) की बहुत पूछ थी, क्योंकि उर्दू के पहले भारत मे भाषाएँ तो थी, कोई स्क्रिप्ट ही नही था (ब्राम्ही, देवनागरी कुछ नही, लिखने पढ़ने का कोई चलन ही नही था)
  3. कृपया ब्राम्ही लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, ताड़पत्र वाले पांडुलिपियों के भारत मे कहीं मिलने के सबूत पेश कीजिये
  4. दो सांस्कृतिक परिवेशों का टकराव अच्छी सनातनी भावना जगाता है और पारेख जी को सावरकर की तरह देशभक्त साबित करता है। करारनामा के विवाद का टकराव संस्कृति का टकराव हो गया!
  5. पारेख मृत्युपरांत देवनागरी में छपाई में लगे रहे, uhhh! लेखक को लिखते समय थोड़ा विवेक बरतना चाहिए। यदि यह typo मान भी लिया जाए तो प्रेस शुरू करने में ही पारेख जी को तकनीकी दिक्कत आ रही थी, लेकिन वे देवनागरी(1796 में बनी) में छपाई शुरू कर दिए
  6. यदि यूरोपियन लोग स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित नही करना चाहते तो वे पारेख को प्रेस बैठाने में इतना जद्दोजहद ही नही करते। देशी प्रतिभा से यूरोपियन लोगों को प्रतिस्पर्धा का डर था, एक दम हास्यास्पद बात है। 
  7. रोमन लिपि में उनके प्रेस से बहुत सारी चीजें मुद्रित हुईं। ज्ञात हो कि उनके प्रेस से किसी भी लिपि में छपी एक भी पुस्तक का कहीं कोई रिकॉर्ड नही है

कुछ और बातें! यहाँ हिन्दू लोग कौन हैं, अच्छा विवरण दिया है।

जॉन गिलक्रिस्ट ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम्स में बैठकर 1796 में अपने supervision में देवनागरी बनवाया। तब जाकर 1805 में अंग्रेजों द्वारा बैठाए गए प्रेस "गीता प्रेस" से गीता छपी और अँग्रेजों तथा भारत सरकार के अथक प्रयास और अरबों खरबों रुपया बहाने के बाद भी 200 साल के बाद 2011 की जनगणना के अनुसार मात्र 26.11% लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करते हैं।

पूरा लेख आरएसएस का "गर्व करो" एजेंडा के तहत लिखा गया लगता है।

~राहुल पटेल

Wednesday, May 8, 2024

EWS और 10% सामान्य श्रेणी वाले उम्मीदवारों के लिए 50% आरक्षण को समझिए

 #समाज

आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर किया गया है, वैसे कारण जिनसे केंद्र/राज्य के अधीन सेवाओं या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में किसी जाति या वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो। यहाँ पिछड़ेपन के व्यक्ति आधारित आकलन के बजाय जातिगत या समूह आधारित इसलिए है कि ऐतिहासिक रूप से ऐसे समूह कुछ अपवादों के बावजूद सरकार के तीनों अंगों में हाशिये पर रहे हैं या फिर हैं ही नहीं। उचित प्रतिनिधत्व की यह कमी एक लोकतांत्रिक सरकार की परिकल्पना से बाहर की चीज है।

इस प्रावधान में आर्थिक आधार को क्यों नही शामिल किया गया या केवल आर्थिक आधार ही क्यों नही रखा गया, तो, सामाजिक या/और शैक्षणिक रूप से मजबूत जन समूहों की जातिगत सामाजिक पूँजी अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है, जिसके आर्थिक पूँजी में बदलने की संभावना ज्यादा रहती है। मसलन, ऐसे लोगों की नौकरी लगना, इनके उद्यम को आसानी से ट्रैक्शन/traction मिलना आदि। सामाजिक पूँजी व्यक्तिगत सामाजिक नेटवर्क को भी बढ़ाता है, जिससे किसी अटके हुए काम के आसानी से होने और उसमें कम खर्च होने की संभावना ज्यादा रहती है। इससे ऐसे समूह के सदस्यों पर आर्थिक बोझ कम पड़ता है। सरकार के हरेक अंग में इनका अनुचित रूप से ज्यादा हिस्सेदारी सरकार के नीति निर्माण में इनके दृष्टिकोण की स्पष्ट छाप के रूप में दिखता है, जो, पुनः इनके आर्थिक स्थिति को मजबूत करता है। इस तरह से जातिगत सामाजिक पूँजी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है और किसी जन समूह की सामाजिक तथा शैक्षणिक स्थिति उसके जातिगत सामाजिक पूँजी को प्रभावित करता है। 

तो, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त जन समूह की आर्थिक स्थिति कभी भी ठीक होने की प्रायिकता अशक्त जन समूहों के अपेक्षा ज्यादा है। इसके उल्टा, किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति व्यक्तिगत स्तर पर कभी भी खराब हो सकती है। पर, उसकी जातिगत सामाजिक स्थिति या शैक्षणिक स्थिति में बदलाव सैकड़ों साल में आ सकती है। अतः तार्किक आधार पर, कुल मिलाकर किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को केंद्र/राज्य द्वारा affirmative action के तहत आरक्षण का आधार नही बनाया जा सकता, केवल सामाजिक और शैक्षणिक स्तर को ही आधार बनाया जा सकता है।

फिर भी EWS को "आर्थिक आधार पर आरक्षण" की तरह सरकार, विशेषज्ञों और पक्ष-प्रतिपक्ष नेताओं द्वारा प्रचारित किया गया। उपेंद्र कुशवाहा(कोइरी) जैसे बिहार के अग्रणी नेता ने जब EWS को केवल सवर्णों के लिए बताया तो जदयू नेता जयकुमार सिंह(राजपूत) ने उपेंद्र कुशवाहा को फटकारते हुए इसे सभी जातियों के गरीबों के लिए बता दिया। उपेंद्र कुशवाहा को अपनी बात से पीछे हटना पड़ा। यह घटना मीडिया में प्रकाशित समाचारों के आधार पर है। https://www.google.com/amp/s/www.bhaskar.com/amp/local/bihar/patna/news/jdu-vs-jdu-on-upper-caste-reservation-130617489.html
"आर्थिक आधार पर कमजोर वर्गों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के मसले पर बड़ा बयान देते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि पचास फीसद की सीमा इस आरक्षण से टूट गई है। उन्होंने आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग करते हुए कहा कि अभी तक मात्र 10 प्रतिशत आरक्षण ही जातीय आधार पर दिया गया है। उन्होंने कहा कि इसमें सबको शामिल किया जाता, ऐसा नहीं है।"
https://navbharattimes.indiatimes.com/state/bihar/patna/bihar-differences-in-jdu-over-10-ews-quota/articleshow/95872274.cms

ज्ञात हो कि दोनों नीति निर्धारक रह चुके हैं। तब भी जयकुमार सिंह ने यह भ्रम फैलाया है और उपेंद्र कुशवाहा ने उस भ्रामक बयान पर पीछे हटकर सही होने का ठप्पा लगाया है।

यदि आप भी EWS आरक्षण को आर्थिक आधार पर समझते हैं तो क्या यह सभी आर्थिक रूप से गरीब नागरिकों के लिए (जाति और धर्म से इतर) है? यदि यह कुछ ही जातियों के गरीबों के लिए है तो इसे "आर्थिक आधार" जैसा व्यापक शब्दावली से संबोधित नही किया जा सकता। बल्कि EWS के लिए "जाति आधारित" शब्दावली सर्वथा उपयुक्त है।

आरक्षण का मूल तर्क यदि यह है कि वैसे जनसमूह जो केंद्र/राज्य के अधीन सेवाओं या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नही पाए है उनको आरक्षण दिया जाए। क्या EWS आरक्षण का लाभ पाने वाले सवर्णों के बारे में प्रतिनिधित्व नही होने की बात कही जा सकती है? निश्चित रूप से नही! या आय सीमा 8 लाख रु से कम अर्जन करने वाले सवर्ण सरकारी नौकरियों या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में उचित रूप से हिस्सेदारी नही पाए हैं? अनौपचारिक रूप से वे अनुचित रूप से ज्यादा ही हिस्सेदारी पाए हैं, वैसे सरकारों के पास ऐसा कोई आँकड़ा नही है। तो, फिर किस आधार पर ऐसे आरक्षण को सहमति दी गयी या जातीय जनगणना के अभाव में किस आधार पर आरक्षण की 10% संख्या तय की गई? वास्तविकता यह है कि सवर्णों की कुल आबादी ही 10% के आसपास है। यह एकमात्र आधार मालूम पड़ता है।

अब जब इसे संविधान में जगह दे ही दी गयी है तो सवाल उठता है कि कई केंद्र/राज्य सेवाओं और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पदों को भरते समय इस प्रावधान के समझ मे अंतर क्यों आ रहा है?  संविधान के अनुच्छेद 16 के कुछ खंड जो EWS आरक्षण से संबंधित हैं, इसप्रकार हैं:-
"16(6): इस अनुच्छेद की कोई बात, राज्य को वर्तमान आरक्षण के अतिरिक्त तथा प्रत्येक प्रवर्ग में पदों के अधिकतम दस प्रतिशत के अध्याधीन, खंड (4) में उल्लिखित वर्गों से भिन्न नागरिकों में से आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई भी उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी”

"16(4): इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े वर्ग के नागरिको के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदो के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।“

16(4A): इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओ में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओ में आरक्षण [प्रोन्नति के मामलो में, किसी स्तर या स्तरों के पदो पर, पारिणामिक ज्येष्ठता सहित] के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।“
इन्हीं तीनों प्रावधानों के आधार पर उच्च न्यायालय, मध्य प्रदेश ने यह आदेश पारित किया है कि
- EWS OBC, SC, ST समूहों के लिए नही है और
- इसे किसी भी रिक्तयों के अनारक्षित सीटों का ही 10% दिया जा सकता है।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का EWS पर आदेश हिंदी में
https://t.me/c/1197024698/2145/2893
Order of MP High Court on EWS in English
https://t.me/c/1197024698/2145/2894

उपरोक्त प्रावधान के इस समझ के इतर कोई दूसरा समझ संविधान सम्मत नही है, इसलिए गैर कानूनी और दंडनीय है।

पर, बात यही खत्म नही हुई है। जब बात आरक्षण की हुई है तो उसको लागू करने के तरीकों के परिणामों के अंतर पर भी गौर कीजिए।

  • एक तरीका यह हुआ कि उम्मीदवार किस वर्ग से है, इसकी परवाह किये बिना पहले अनारक्षित श्रेणी के सीटों को मेरिट के आधार पर भरा जाए। इसके बाद ही आरक्षित सीटों को भरा जाए।
  • दूसरा तरीका यह है कि आरक्षण वाली जातियों के लोगों द्वारा जाति का सर्टिफिकेट लगाने पर मेरिट की परवाह किये बिना केवल आरक्षित श्रेणी में ही विचार किया जाए। इस तरह से 10% जनसंख्या वाली सामान्य श्रेणी की जातियों के लिए स्वतः ही 50% आरक्षण मिल जाएगा और आरक्षण कहलायेगा भी नही। पर, यह राज्य सेवाओं और उच्च शिक्षण संस्थाओं में मेरिट को जगह देने और सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध होगा।
याद रखिये आरक्षण सरकार द्वारा एक affirmative action है, सामाजिक संरचना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए मेरिट की भावना के विरुद्ध नही माना जायेगा।

ज्यादातर मामलों में सरकारों द्वारा दूसरा तरीका अपनाया जाता रहा है। यह इतना सर्वव्यापी है कि उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है।


"Quota candidates getting more marks entitled to General category seats: SC"


https://www.business-standard.com/article/current-affairs/quota-candidates-getting-more-marks-entitled-to-general-category-seats-sc-122042801199_1.html

सरकारी सेवाओं और उच्च शिक्षा में सीटों की यह लूट EWS से भी भयंकर है। अतः यह आशय स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद में शामिल होना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय के साथ मेरिट वाली व्यवस्था इस लोकतांत्रिक देश मे बन सके।


~राहुल पटेल

Wednesday, May 1, 2024

कोविशिल्ड के सबसे कम ध्यान जाने वाले दुष्प्रभाव पर एक नजर तथा संस्थाओं की विश्वसनीयता

 #समाज #स्वास्थ्य

https://www.facebook.com/share/v/sPPwGofu8NzPiHWB/?mibextid=xfxF2i


आपने भी अबतक covid19 का वैक्सीन बनाने वाली अस्ट्रोजेनेका कंपनी के स्वीकारोक्ति को पढ़ लिया होगा, जहाँ उन्होंने कोविशिल्ड (भारत मे 80% लोगों ने लिया है, हो सकता है कि आप भी हों) से

- खून के थक्का बनने

- खून में निम्न प्लेटलेट्स

- टीटीएस 

जैसे शारीरिक समस्या का उत्पन्न होना स्वीकारा है और अब उनपर यूके उच्च न्यायालय में हर्जाना के दावे ठोके जा रहे हैं। ये हर्जाना कंपनी नही देगी, सरकार देगी। सरकार भरपाई कैसे करेगी तो टैक्स बढ़ाकर। सीधा मतलब है चीजों का दाम बढ़ाकर कंपनी की गलतियों का हर्जाना भरा जाएगा। 

https://www.bmj.com/content/380/bmj.p725


महत्वपूर्ण यह भी है कि उस वैक्सीन को विकसित करने में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्त्ताओं का भी हाथ था। शोध की गुणवत्ता बरकरार रखना केवल ऑक्सफ़ोर्ड की जिम्मेवारी तो है नही। इसलिए वैक्सीन के निर्माण और वितरण के पहले ही ब्रिटिश सरकार ने निर्माताओं को हर जवाबदेही से मुक्त कर दिया था। भारत ठहरा विश्व गुरु।  मोदी सरकार ने वैक्सीन के भारत मे निर्माण होने (अस्ट्रोजेनेका का माल सीरम संस्थान में बनता था) का पूरा डंका पिटवाया। जब विश्व गुरु के भी गुरु की तरफ से सब ओके है तो भला विश्व गुरु की क्या औकात कि वैक्सीन पर सवाल खड़ा करे!


भारत मे मोदी सरकार ने न्यायालय में यह पहले ही हलफनामा दायर कर दिया है कि कोविड वैक्सीन वैकल्पिक था। लोग स्वयं कूद कूद कर वैक्सीन लेने जाते थे। किसी ने उन्हें सरकारी सुविधाओं जैसे राशन कार्ड से नाम काटने या सरकारी कार्यालयों, पब्लिक परिवहनों में आने जाने के लिए वैक्सीन सर्टिफिकेट का भय नही दिखाया था। ग्रामीण जनता को वैक्सीन सेंटर तक पहुँचाने में मास मीडिया का सरकार ने कोई इस्तेमाल नही किया था।


भारत मे 2022 में 56,653 अचानक मौतें दर्ज की गई थीं। दर्ज नही किये जाने वाले केस अनुमान की बात है। हार्ट अटैक से मरने वालों की संख्या में 2021 की तुलना में 2022 में 12.5% का उछाल आया। 2023 का आँकड़ा मिला नही। https://theprint.in/health/marked-rise-in-sudden-deaths-heart-attacks-in-2022-shows-ncrb-data/1873004/


अकेले गुजरात मे 2022 की तुलना में 2023 में बढ़ती जनसंख्या को अध्ययन में शामिल करने के बाद भी 29% का उछाल आया।

https://timesofindia.indiatimes.com/city/ahmedabad/gujarat-cardiac-crisis-at-record-high-emri-got-1-call-every-7-5-minutes-in-2023/amp_articleshow/106500114.cms


केवल 6 महीने के अंदर जुलाई से दिसंबर के बीच मे गुजरात में हुई हार्ट अटैक से 1052 अचानक मौतों में 80% लोग 11-25 साल की उम्र के थे। https://www.google.com/amp/s/www.thehindu.com/news/national/other-states/over-1000-died-of-heart-attack-in-six-months-gujarat-minister/article67597167.ece/amp/


47 tertiary सुविधा वाले अस्पतालों से 18-45 साल के एकदम स्वस्थ, पर कोविड वैक्सीन लिए 29,171 व्यक्तियों के अचानक अकारण मृत्यु वाले दर्ज केसों का अध्ययन कर ICMR ने यह पाया कि ये लोग कोविड वैक्सीन के चलते नही बल्कि दारू, अधिक कसरत, उनके घरों में ऐसी मौतों के पहले होने(शायद अचानक मरने की जेनेटिक आदत की ओर इशारा हो) आदि के कारण हो सकते हैं। गनीमत है कि कारणों में खुशी से अचानक मृत्यु को नही गिनाया गया। ब्रिटेन को उच्च न्यायालय में अपना केस लड़ने के लिए ICMR जैसे किसी तीसरी दुनिया के देश के संस्थान की रिपोर्ट इस्तेमाल करनी चाहिए। https://factly.in/review-what-did-the-icmr-study-on-factors-associated-with-unexplained-sudden-deaths-among-adults-in-india-find/


अब कोविशिल्ड के साइड इफ़ेक्ट के पूरे प्रकरण को यह मोड़ दिया जा रहा है कि इससे अत्यंत दुर्लभ रोग TTS हो सकता है, लेकिन कोविशिल्ड के दूसरे साइड इफ़ेक्ट यानी खून में निम्न प्लेटलेट्स स्तर का भारत का आँकड़ा यदि किसी के पास उपलब्ध हो तो जरूर दें। मैंने अपने छोटे से शहर सासाराम बिहार में पिछले 2-3 साल में इसमें जबरदस्त उछाल देखा है। टेस्ट में टाइफाइड के लक्षण आ रहे हैं। 2023 में भारत मे टाइफाइड के मामलों में 30% का उछाल आया है। सभी मामलों में अत्यंत कम प्लेटलेट्स की समस्या है। इलाज किया जा रहा है टाइफाइड का। 


आपका ध्यान मैं इस ओर बटाना चाहता हूँ कि कोविशिल्ड से उत्पन्न इस समस्या से जूझते करोड़ो भारतीयों का 3-5000/- लुढ़कना खरबों रुपये का आर्थिक बोझ है, जिसे आम भारतीय अपने ऊपर झेल रहा है। लेकिन मोदी सरकार हो या ICMR, सब चंगा सी! 


कम प्लेटलेट्स की समस्या पूरी दुनिया मे मौजूद हो सकती है ओर इसका कारण कोविशिल्ड हो सकता है। इसकी भरपाई कौन करेगा? इस प्रभाव की व्यापकता पर शोध कौन करेगा? अभी कोवैक्सीन के दुष्परिणाम पर शोध बाकी है।

~ राहुल पटेल

भारत मे कोविशिल्ड भाजपा संबंधित समस्यायों के आइसबर्ग का टिप

 #समाज #स्वास्थ्य

कोविशिल्ड के कारण भारत मे हो रही अचानक मौतों और सबसे व्यापक स्तर पर प्लेटलेट्स कम होने की शिकायतों के संदर्भ में मोदी सरकार की सबसे जबरदस्त हिट स्कीम "पीएम मोदी #चंदा_दो_धंधा_लो स्कीम" के तहत कुछ वैसी दवा कंपनियाँ, जिनकी वे दवाईयाँ जो ड्रग टेस्ट फैल कर चुकी हैं, जो आपका तथाकथित रूप से  बीपी, हार्ट अटैक, खून पतला करना, वायरस, फंगस आदि रोकने का काम कर रही है, बड़े मजे से भाजपा को चंदा देकर पाक साफ हो जा रही है। 35 दवा कंपनियों ने भाजपा को कुल 1000 करोड़ का चुनावी चंदा दिया है। इन कंपनियों की ऊर्जा दवाओं की गुणवत्ता बरकरार रखने की बजाय मोदी और भाजपा को सत्ता में लाने में ज्यादा जा रही हैं। भाजपा की नजर में आपके जान की कीमत आपके वोट तक ही है।


https://amp.scroll.in/article/1065318/seven-firms-that-failed-drug-quality-test-gave-money-to-political-parties-through-electoral-bonds


1. हेटेरो लैब्स और हेटेरो हेल्थकेयर ने 60 करोड़ का भाजपा से चुनावी बांड खरीदा। इसकी तीन रेमडेजीवीर की दवाईयाँ(एन्टी वायरस की दवाईयाँ) जो कोविड 19 के उपचार में, itbor कैप्सूल (एन्टी फंगल दवाई) तथा मोनोसेफ (एन्टी बैक्टीरियल दवाई) ड्रग टेस्ट फेल हो चुकी हैं, पर, मार्केट में इनपर कोई रोकटोक नही है


2. टोरेंट फार्मा ने 77.5 करोड़ का भाजपा को चुनावी चंदा दिया। इसकी खून के थक्का जमने(जो अचानक अकारण हार्ट अटैक के मुख्य कारक के रूप में सामने आए हैं) से रोकने वाली दवाई Deplatt 150, BP कम करने की दवाई Losar H, हृदय के रोगों की दवाई Nicoran LV, डायरिया की दवा Lopamide मॉलिक्यूल्स की दवा ड्रग टेस्ट फेल होने के बावजूद मार्केट में उपलब्ध हैं


3. Zydus हेल्थकेयर ने 29 करोड़ का चंदा दिया। इसकी कोविड 19 की दवा रेमडीजीवीर दवाईयाँ ड्रग टेस्ट फेल कर चुकी हैं, पर, मार्केट में उपलब्ध हैं


4. Glenmark ने 9.75 करोड़ चंदा दिया है। इसका BP, हार्ट अटैक की दवा telma ड्रग टेस्ट फेल है, मार्केट में उपलब्ध है


5. Cipla ने 39.2 करोड़ भाजपा को चंदा दिया है। इसका RC कफ सिरप तथा रेमडीजीवीर की दवा Cipremi ड्रग टेस्ट फेल हैं, पर, मार्केट में हैं


6. IPCA LABORARTIES ने 13.5 करोड़ का चुनावी चंदा दिया है। इसका एन्टी parasitic दवा Lariago ड्रग टेस्ट फेल है, पर, मार्केट में बिक रहा है


7. Intas फार्मास्यूटिकल ने 20 करोड़ दिया और इसका दवा BP, हार्ट अटैक की दवा Enapril-5 ड्रग टेस्ट फेल है, बिक रहा है।


इससे भी खतरनाक यह बात है कि ये कंपनियाँ मोदी सरकार की मेडिकल पालिसी निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं यानी भेड़ियों को, पैसा लेकर, भेड़ों को किस तरह से काटा जाए, का कानून बनाने की भूमिका दी जा रही है।


यह मत समझियेगा या पालिसी निर्धारण में पैसा लेकर निजी कंपनियों को भूमिका देना केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में है। यह शिक्षा, श्रम, कृषि, माइनिंग आदि सभी क्षेत्रों में है। इसे कहते हैं धनतंत्र/plutocracy। अंतर सिर्फ इतना है कि पैसा अपरोक्ष रूप से आप ही का है। है, न , मजेदार बात!

~राहुल पटेल