#समाज
आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर किया गया है, वैसे कारण जिनसे केंद्र/राज्य के अधीन सेवाओं या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में किसी जाति या वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो। यहाँ पिछड़ेपन के व्यक्ति आधारित आकलन के बजाय जातिगत या समूह आधारित इसलिए है कि ऐतिहासिक रूप से ऐसे समूह कुछ अपवादों के बावजूद सरकार के तीनों अंगों में हाशिये पर रहे हैं या फिर हैं ही नहीं। उचित प्रतिनिधत्व की यह कमी एक लोकतांत्रिक सरकार की परिकल्पना से बाहर की चीज है।
इस प्रावधान में आर्थिक आधार को क्यों नही शामिल किया गया या केवल आर्थिक आधार ही क्यों नही रखा गया, तो, सामाजिक या/और शैक्षणिक रूप से मजबूत जन समूहों की जातिगत सामाजिक पूँजी अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है, जिसके आर्थिक पूँजी में बदलने की संभावना ज्यादा रहती है। मसलन, ऐसे लोगों की नौकरी लगना, इनके उद्यम को आसानी से ट्रैक्शन/traction मिलना आदि। सामाजिक पूँजी व्यक्तिगत सामाजिक नेटवर्क को भी बढ़ाता है, जिससे किसी अटके हुए काम के आसानी से होने और उसमें कम खर्च होने की संभावना ज्यादा रहती है। इससे ऐसे समूह के सदस्यों पर आर्थिक बोझ कम पड़ता है। सरकार के हरेक अंग में इनका अनुचित रूप से ज्यादा हिस्सेदारी सरकार के नीति निर्माण में इनके दृष्टिकोण की स्पष्ट छाप के रूप में दिखता है, जो, पुनः इनके आर्थिक स्थिति को मजबूत करता है। इस तरह से जातिगत सामाजिक पूँजी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है और किसी जन समूह की सामाजिक तथा शैक्षणिक स्थिति उसके जातिगत सामाजिक पूँजी को प्रभावित करता है।
तो, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त जन समूह की आर्थिक स्थिति कभी भी ठीक होने की प्रायिकता अशक्त जन समूहों के अपेक्षा ज्यादा है। इसके उल्टा, किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति व्यक्तिगत स्तर पर कभी भी खराब हो सकती है। पर, उसकी जातिगत सामाजिक स्थिति या शैक्षणिक स्थिति में बदलाव सैकड़ों साल में आ सकती है। अतः तार्किक आधार पर, कुल मिलाकर किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को केंद्र/राज्य द्वारा affirmative action के तहत आरक्षण का आधार नही बनाया जा सकता, केवल सामाजिक और शैक्षणिक स्तर को ही आधार बनाया जा सकता है।
फिर भी EWS को "आर्थिक आधार पर आरक्षण" की तरह सरकार, विशेषज्ञों और पक्ष-प्रतिपक्ष नेताओं द्वारा प्रचारित किया गया। उपेंद्र कुशवाहा(कोइरी) जैसे बिहार के अग्रणी नेता ने जब EWS को केवल सवर्णों के लिए बताया तो जदयू नेता जयकुमार सिंह(राजपूत) ने उपेंद्र कुशवाहा को फटकारते हुए इसे सभी जातियों के गरीबों के लिए बता दिया। उपेंद्र कुशवाहा को अपनी बात से पीछे हटना पड़ा। यह घटना मीडिया में प्रकाशित समाचारों के आधार पर है। https://www.google.com/amp/s/www.bhaskar.com/amp/local/bihar/patna/news/jdu-vs-jdu-on-upper-caste-reservation-130617489.html
"आर्थिक आधार पर कमजोर वर्गों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के मसले पर बड़ा बयान देते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि पचास फीसद की सीमा इस आरक्षण से टूट गई है। उन्होंने आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग करते हुए कहा कि अभी तक मात्र 10 प्रतिशत आरक्षण ही जातीय आधार पर दिया गया है। उन्होंने कहा कि इसमें सबको शामिल किया जाता, ऐसा नहीं है।"
https://navbharattimes.indiatimes.com/state/bihar/patna/bihar-differences-in-jdu-over-10-ews-quota/articleshow/95872274.cms
ज्ञात हो कि दोनों नीति निर्धारक रह चुके हैं। तब भी जयकुमार सिंह ने यह भ्रम फैलाया है और उपेंद्र कुशवाहा ने उस भ्रामक बयान पर पीछे हटकर सही होने का ठप्पा लगाया है।
यदि आप भी EWS आरक्षण को आर्थिक आधार पर समझते हैं तो क्या यह सभी आर्थिक रूप से गरीब नागरिकों के लिए (जाति और धर्म से इतर) है? यदि यह कुछ ही जातियों के गरीबों के लिए है तो इसे "आर्थिक आधार" जैसा व्यापक शब्दावली से संबोधित नही किया जा सकता। बल्कि EWS के लिए "जाति आधारित" शब्दावली सर्वथा उपयुक्त है।
आरक्षण का मूल तर्क यदि यह है कि वैसे जनसमूह जो केंद्र/राज्य के अधीन सेवाओं या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नही पाए है उनको आरक्षण दिया जाए। क्या EWS आरक्षण का लाभ पाने वाले सवर्णों के बारे में प्रतिनिधित्व नही होने की बात कही जा सकती है? निश्चित रूप से नही! या आय सीमा 8 लाख रु से कम अर्जन करने वाले सवर्ण सरकारी नौकरियों या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में उचित रूप से हिस्सेदारी नही पाए हैं? अनौपचारिक रूप से वे अनुचित रूप से ज्यादा ही हिस्सेदारी पाए हैं, वैसे सरकारों के पास ऐसा कोई आँकड़ा नही है। तो, फिर किस आधार पर ऐसे आरक्षण को सहमति दी गयी या जातीय जनगणना के अभाव में किस आधार पर आरक्षण की 10% संख्या तय की गई? वास्तविकता यह है कि सवर्णों की कुल आबादी ही 10% के आसपास है। यह एकमात्र आधार मालूम पड़ता है।
अब जब इसे संविधान में जगह दे ही दी गयी है तो सवाल उठता है कि कई केंद्र/राज्य सेवाओं और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पदों को भरते समय इस प्रावधान के समझ मे अंतर क्यों आ रहा है? संविधान के अनुच्छेद 16 के कुछ खंड जो EWS आरक्षण से संबंधित हैं, इसप्रकार हैं:-
"16(6): इस अनुच्छेद की कोई बात, राज्य को वर्तमान आरक्षण के अतिरिक्त तथा प्रत्येक प्रवर्ग में पदों के अधिकतम दस प्रतिशत के अध्याधीन, खंड (4) में उल्लिखित वर्गों से भिन्न नागरिकों में से आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई भी उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी”
"16(4): इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े वर्ग के नागरिको के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदो के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।“
“16(4A): इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओ में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओ में आरक्षण [प्रोन्नति के मामलो में, किसी स्तर या स्तरों के पदो पर, पारिणामिक ज्येष्ठता सहित] के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।“
इन्हीं तीनों प्रावधानों के आधार पर उच्च न्यायालय, मध्य प्रदेश ने यह आदेश पारित किया है कि
- EWS OBC, SC, ST समूहों के लिए नही है और
- इसे किसी भी रिक्तयों के अनारक्षित सीटों का ही 10% दिया जा सकता है।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का EWS पर आदेश हिंदी में
https://t.me/c/1197024698/2145/2893
Order of MP High Court on EWS in English
https://t.me/c/1197024698/2145/2894
उपरोक्त प्रावधान के इस समझ के इतर कोई दूसरा समझ संविधान सम्मत नही है, इसलिए गैर कानूनी और दंडनीय है।
पर, बात यही खत्म नही हुई है। जब बात आरक्षण की हुई है तो उसको लागू करने के तरीकों के परिणामों के अंतर पर भी गौर कीजिए।
- एक तरीका यह हुआ कि उम्मीदवार किस वर्ग से है, इसकी परवाह किये बिना पहले अनारक्षित श्रेणी के सीटों को मेरिट के आधार पर भरा जाए। इसके बाद ही आरक्षित सीटों को भरा जाए।
- दूसरा तरीका यह है कि आरक्षण वाली जातियों के लोगों द्वारा जाति का सर्टिफिकेट लगाने पर मेरिट की परवाह किये बिना केवल आरक्षित श्रेणी में ही विचार किया जाए। इस तरह से 10% जनसंख्या वाली सामान्य श्रेणी की जातियों के लिए स्वतः ही 50% आरक्षण मिल जाएगा और आरक्षण कहलायेगा भी नही। पर, यह राज्य सेवाओं और उच्च शिक्षण संस्थाओं में मेरिट को जगह देने और सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध होगा।
ज्यादातर मामलों में सरकारों द्वारा दूसरा तरीका अपनाया जाता रहा है। यह इतना सर्वव्यापी है कि उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
"Quota candidates getting more marks entitled to General category seats: SC"
https://www.business-standard.com/article/current-affairs/quota-candidates-getting-more-marks-entitled-to-general-category-seats-sc-122042801199_1.html
सरकारी सेवाओं और उच्च शिक्षा में सीटों की यह लूट EWS से भी भयंकर है। अतः यह आशय स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद में शामिल होना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय के साथ मेरिट वाली व्यवस्था इस लोकतांत्रिक देश मे बन सके।
~राहुल पटेल
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