Tuesday, September 9, 2025

किचन गार्डन का भारतीय संस्कृति में कांसेप्ट और इसका आर्थिक महत्व

झारखण्ड जाने के क्रम में वासुदेव उर्फ चेतलाल महतो, मैं और कृष्णा महतो। ये दोनों कुड़मी हैं। साथ में एक मुंडा भी थे। पता चला कि कृष्णा जी विंग कमांडर ज्ञानेंद्र सिंह के गाँव के हैं और एच. एन. सिंह को भी दोनों जानते हैं और JLKM पार्टी से जुड़े हैं। बात जनजातियों के रीति रिवाज पर उभरी। चेतलाल महतो ने कुड़मियों के किचन गार्डन के कांसेप्ट को समझाया। उनके अनुसार प्रत्येक कुड़मी परिवार में एक छोटा सा प्लाट रहेगा, जिसमें मुनगा/सहजन/drumstick, कुंदरू का लत्तर, प्याज, लहसुन, बकरी, मुर्गियाँ आदि जरूर रहेंगे। अन्य शाक सब्जी भी मौसम के अनुसार उगाए जाते हैं। कुँवा भी रहता है। यह सालों भर उनकी जरूरतों को पूरा करता है। वस्तुतः यह बिहार में भी कुर्मियों के खड़ के रूप में रहता था। कृष्णा जी ने बताया कि उनकी मैडम को 30 सालों से इन चीजों के लिए बाजार नहीं जाना पड़ा। पर, ये चीजें बिहार में बँटवारों के कारण समाप्त हो रही हैं। खेतों में मुख्यतः धान और गेहूँ उपजाया जाता है। जिससे बाकी सारी चीजें जैसे दाल, मसाला, तोरी, तीसी, प्याज, लहसुन, माँस, दूध सब खरीदना पड़ रहा है। यदि आप नेट क्रेता और नेट विक्रेता के नफे नुकसान को समझते हैं तो आप समझ सकते हैं कि कैसे किसान जातियाँ धीरे धीरे नुकसान में जा रही हैं। जो शादी, इलाज या पढ़ाई के दैरान खेत बेचने के रूप में दिखाई पड़ता है। खेती में यंत्रों की मदद लेना भी किसानों को नेट क्रेता हीं बनाता है। सरकार द्वारा लाये गए मुख्यतः इन दोनों फसलों के उन्नत बीज, खाद, कीटनाशक से अधिक उपज यानी हरित क्रांति की देन है किसान जातियाँ इन दोनों फसलों के चक्कर मे पड़ीं। किसानों के लिए ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर मे पड़ना इन्हीं दोनों फसलों को अपनाना हुआ। इनकी अधिकता ने इनके मार्किट prices क्रैश कराए। दलहन तेलहन से हाथ खींचने के पीछे कुछ हाथ वन्य जीवों का रहा। यह सरकारी नीतियों का परिणाम था। उपरोक्त दोनों फसलों का मार्किट में दाम एमएसपी द्वारा निर्धारित होना सरकारी नीतियों का परिणाम है। 6% फसलों का एमएसपी पर सरकारी खरीद एक क्रिमिनालिटी है। जब सरकार स्वयं कहती है कि एमएसपी वह मूल्य है, जिसके नीचे फसलों की खरीद घाटे का सौदा है तो सरकार न केवल 6%  फसलों को बिना लाभ दिए किसानों से खरीद रही है, वरन बाकी 94% फसलों के लिए मार्किट रेट तय कर रही है, जो एमएसपी से लगभग मामलों में नीचे ही रहती है।

आप समझ सकते हैं कि किसानी घाटे का सौदा क्यों है? और किचन गार्डन का कांसेप्ट किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्यों है? आपके पास जमीन नहीं है, छत पर उगाईये। हर वो उपाय कीजिये जिससे बाजार पर आपकी निर्भरता कम होती हो या कम से कम लेन देन में बीच में मुद्रा न आती हो। मुद्रा की पिवोटिंग हमलोगों के लिए अभिशाप है।



Friday, August 22, 2025

प्लिनी द एल्डर के भारतीय विवरण की विसंगतियाँ

Book 6, chap 19 (17) ― The nation's of Scythia and the countries on the eastern ocean 

"He adds also, that under the direction of Pompey, it was ascertained that it is seven days' journey from India to the river Icarus, in the country of the Bactri, which discharges itself into the Oxus, and that the merchandize of India being conveyed from it through the Caspian Sea into the Cyrus, may be brought by land to Phasis in Pontus, in five days at most. There are numerous islands throughout the whole of the Caspian sea: the only one that is well known is that of Tazata."


Analysis:-

1. "The question of finding a route between the Oxus valley and India has been of concern historically. A direct route crosses extremely high mountain passes in the Hindu Kush and isolated areas like Kafiristan. Some in Britain feared that the Empire of Russia, which at the time wielded great influence over the Oxus area, would overcome these obstacles and find a suitable route through which to invade British India – but this never came to pass.[29]"

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Amu_Darya

2. "A direct trade route from Kashmir through the historical region of Bactria (modern-day northern Afghanistan and surrounding areas) did not exist in the way one might imagine, as Kashmir's primary connections to Central Asia were over high Himalayan passes, notably via the <Karakoram and <Zoji La passes to Ladakh and then towards Yarkand, not directly through the geographical region of Bactria. However, Kashmir was a key node on the larger Silk Road network, which extended into Central Asia and regions beyond, including areas that were once part of Bactria. Goods from Central Asia, such as Bukharan silks and Russian-made cottons, would enter Kashmiri markets via this extended network, while Kashmiri goods like textiles were sent eastwards along the Silk Road."

The only tributary on left bank is Panj. River Icarus is unknown. From above two, it shall be clear that it is not possible even now to cross merchandise from india to river oxus, forget about it being done in 7 days.


Tuesday, August 12, 2025

भारत में गाय का इतिहास

 #समाज #आदिकिसान #गाय

गाय हमारी माता है, हमको कुछ नही आता है



कूड़ा कचरा, गू खाने वाला अधीर, ढीढ़ार, अविवेकी जानवर भी, हम अवर्णों (जाति व्यवस्था वाले लोग) द्वारा पूजा जाता है


जावा मूल के इस जानवर का मूत भी, हिंदुओं (वर्ण व्यवस्था वाले लोग) द्वारा माथे लगाया जाता है


बैल जिनका बाप है, मूल उनका थाईलैंड के पास है


हम अवर्णों के लिए, गाय एक जानवर मात्र है।


~कवि अंजान


"However, little is known about Asian cattle, which are predominantly Bos indicus. Recently, a worldwide study of bovines including Asian Bos indicus breeds from India, Pakistan, China and Indonesia showed evidence of Bos javanicus ancestry that contributes to Asian bovine diversity (Decker et al., 2014). However, no one has yet investigated the ancestry of Thai cattle, and the domestication of bovine in Southeast Asia is poorly understood (Larson & Fuller, 2014). Therefore, to address this question, further study of Asian Bos indicus breeds is needed.


Cattle native to Thailand (excluding recently introduced European breeds) have Bos indicus traits, including the distinctive dorsal hump."


https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4627918/


पहली बार 4 मई, 2023 में फेसबुक पर प्रकाशित

https://www.facebook.com/share/p/17Apicdiaw/


वस्तुतः गाय अफ्रीकी मूल की हैं। विश्व व्यापार के 6 ईस्ट और 6 वेस्ट इंडिया कंपनियों के अभियानों के दौरान यूरोपियन कोलोनियल शक्तियों ने अपनी भूख मिटाने के लिए गाय को सबसे सुलभ और पौष्टिक संसाधन के रूप में अपनाया। देश में गाय इन कोलोनियल शक्तियों की देन हैं। इनका इतिहास भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में इतना ही पुराना है। पर, यूरोपियन के साथ साथ घूम रहे ब्राह्मणों की ब्राह्मणी संस्कृति की देन है कि हमारे लोग इसे पूज्यनीय, इसके लिए जान देने, गौसेवा जैसी भावनाओं से ओतप्रोत हैं। इसमें देवी देवताओं का वास (ऊँटों, हाथियों में भी अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों में) सिल्क ट्रेड रूट की कहानियाँ हैं और धर्म-धंधा के साँठ गाँठ की द्योतक हैं।

~ राहुल पटेल

Monday, August 4, 2025

भारत में मूर्त्ति बनाने वाले लोग कौन?

#आदिकिसान #lookeast #adikisan

पुराने मंदिरों या किसी ऐतिहासिक स्थलों पर मूर्त्तियों का पाया जाना, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में मूर्त्तियों का सर्वथा अभाव और मूर्त्ति बनाने वालों का सर्वथा अभाव यह बताता है कि मूर्त्ति वाले लोग दूसरे लोग थे। जो भी धार्मिकता है, लोग पहले मिट्टी के पिंड या प्राकृतिक रूप से मिले गोल मटोल पत्थरों और पिछले 50 वर्षों में तस्वीरों से ही काम चलाते रहे हैं। यही कारण है कि आपको शोखा बाबा या ऐसे ही कोई कुल या ग्राम देवता हर गाँव, हर घर में मिल जाएंगे। बाद में बहुतायत में शिव, हनुमान का पूजन शुरू हुआ। 'बाद में' का सबूत ग्राम देवताओं की अपेक्षा इनकी संख्या में काफी कमी है। शिव का प्रचलन बौद्धों के मनौती स्तूपों से आई है। हनुमान का प्रचलन भी बौद्ध कथाओं के किसी पात्र से आई है। लेकिन आपको आज भी राम, श्याम, विष्णु, सीता, पपीता की मूर्त्ति या मंदिर 50 km के दायरे में भी कम ही दिखते हैं। पिछले कुछ सौ सालों में इनके बारे में लोगों ने केवल रामलीला, भजन, पोथियों, बाद में टीवी धारावाहिकों आदि के माध्यम से ही सुना और बोलना सीखा। जो सीधा सबूत है कि ये पिछले कुछ सौ वर्षों में भारतीय भौगोलिक क्षेत्रों में आये।

यहाँ दो चीजें ध्यान देने लायक है-
1. मूर्त्ति की संस्कृति का अभाव
2. किसी देवी देवता के पूजा स्थल की सर्वव्यापकता

~राहुल पटेल

Wednesday, July 30, 2025

भारत में पंडित कहाँ से?

#adikisan #lookeast #आदिकिसान 

दर्ज़ी का काम एक बहुत बड़ा आर्ट है। 

भारत में इस आर्ट को मुसलमानों ने अपने उरूज पर पहुँचाया।  'सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा...' लिखने वाले कवि अल्लामा इक़बाल जो कश्मीरी पंडित थे, उनके वालिद भी दर्ज़ी का काम किया करते थे।

काश्मीर में पंडित कहाँ से आये? 'सारे जहाँ से अच्छा...' कविता में इक़बाल लिखते हैं:-

"ऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ को

उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा"

ये लोग चटगाँव पोर्ट से आने वाले पूरबिया लोग थे। इंडोनेशिया आपकी नजर में मुस्लिम देश होगा, पर, वे गणेश, रामायण आदि को अपनी संस्कृति मानते हैं। हिन्दू मुस्लिम आप जैसे 200 साल पुराने हिंदुओं के लिए भावनात्मक बातें होंगी, उनके लिए इन दोनों में तारतम्यता है। ये पंडित बंगाल से चलकर कश्मीर तक कैसे चले गए? द ग्रेट त्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे के दौरान भारतीय भौगोलिक क्षेत्रों में अँग्रेजों को वैसे लोगों की जरूरत थी जो स्वयं ही रूटलेस हों। अँग्रेज ऐसे लोगों को स्थानीय जासूस, कुली, नौकर, खानसामा, कर्मचारी यानी हर तरह से रोजगार देते थे। स्थानीय कबीले अँग्रेजों के मनमाफिक नहीं थे। इसतरह से दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आये ये लोग अँग्रेजों के साथ पूरे भारत में फैले। जो जाति समूह पूरे देश में हर जगह हर गाँव में मिलते हैं, वे सभी दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आये लोग हैं। अन्य कबीलाई बिरादरियाँ पॉकेट्स में मिलती है।

काश्मीर से पंडितों को भगाए जाने, इनको केन्द्र सरकार द्वारा वापस काश्मीर में बसने का विकल्प देने पर भी इनका वहाँ वापस न जाना इनके वहाँ के बाशिंदा नहीं होने की ओर इशारा करता है। इन्हें रुपया से मतलब है। काश्मीर से भागकर आने के बाद पंडितों द्वारा चालित सरकार ने इन्हें दिल्ली में शरणार्थी के तौर पर बसाया। तर्क यह था कि ये लोग काश्मीर वापस चले जायेंगे। लेकिन दिल्ली से बाकी लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाकर वापस भेजा जा रहा है, वैसा बर्त्ताव काश्मीरी पंडितों के साथ नहीं किया जा सकता। ये दामाद हैं। ये जिस तरह से दिल्ली के जमीन और व्यवसाय पर काबिज हो गए हैं, छोड़कर वापस काश्मीर वापस भी नहीं जायेंगे। अब तो सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए काश्मीर के रियल एस्टेट में भी इनका हिस्सा है।

खैर आपका ध्यान काश्मीरी पंडितों की ओर दिलाना नहीं था, पंडितों के मूल देश की ओर दिलाना था। हाँ, इनमें हर रंग रूप, कद काठी के लोग मिलना यह बताता है कि जब एक समूह दूसरे समूह(अँग्रेज) के साथ पराश्रित की तरह रहता आया हो तो डिक्शनरी चाइल्ड वाली परिस्थिति पैदा होना लाजिमी है।


~ राहुल पटेल

Saturday, July 5, 2025

बढ़ता खीझ

भतीजा की बाइक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। बनारस में मैं साथ में तीन दिन था। मैं अपनी माँ के साथ भैया के यहाँ उसीके दसही पर जा रहा था। ट्रेन 7:40 पर सुबह में था। मैंने माँ को पहले ही घर से भेज दिया। स्वयं मैं कुछ कर रहा था, सो पीछे से झटपट काम निपटा के मैं भी निकल गया। मेरे घर से स्टेशन तेज चलने पर 12 मिनट के रास्ते पर था। माँ 25 मिनट पहले निकली थीं। मैं 20 मिनट पहले निकला था। रास्ते में कुछ दूसरी गलियों में भी ढूँढा कि अभी यहीं तो नहीं है। फोन उठा नहीं रहीं थीं। कुछ मिनट बर्बाद करने के बाद सड़क पर खड़े एक परिचित दिख गए। उन्होंने बताया कि आपकी माँ आगे निकल गयी हैं। मैं स्टेशन तेजी से पहुँचा। सामने ट्रेन अब खुलने के लिए हॉर्न मार रही थी। मैं इधर उधर देखा, माँ कहीं नजर न आ रहीं थीं। दुबारा फ़ोन किया तो उन्होंने इसबार उठा लिया। बात करते हुए मैंने नजर उठा कर देखा वो अभी आ रहीं थीं। अंदर से मुझे खीझ होने लगी। मैं उनकी ओर लपका। अभी भी 100 m दूर थीं। सीढ़ी चढ़ना और उतरना था और उसके बाद भी 50 m चलना था। उनके पास पहुँचते ही ट्रेन दूसरी बार हॉर्न दी और चल दी। 

इतने पर मैं अपनी माँ पर झल्लाने लगा। 'आपको घर से आने में आधे घंटे लग गए। आपको छोड़ दिया जाए तो आप तो एक घंटा ले लेंगी। बताईये! आपके चलते ट्रेन छूट गया। अब क्या किया जाए? ऐसे कहीं जाना हो तो फटाक से चली जायेंगी। जब जल्दी चलना था तो टूँगुर टूँगुर चल रहीं हैं। अब बस से जाना पड़ेगा। अगला ट्रेन 10:15 बजे है। बताईये! कितना भाड़ा लग जायेगा। चलिए अब घर चलिए।' 

मैं आपे से बाहर हो रहा था। माँ ने कहा, 'अब इतना ही चला जा रहा है तो मैं क्या करूँ!' 

मैं थोड़ा झिझका। लेकिन खीझ बना हुआ था। मैंने पूछा, 'आप फ़ोन क्यों नहीं उठा रही थीं?'

उन्होंने कहा, 'थैली के अंदर था तो नहीं सुनाई पड़ा।' निश्चित रूप से भीड़ भाड़ वाले इलाके में नहीं सुनाई पड़ा होगा, क्योंकि स्टेशन रोड में उन्होंने फ़ोन उठाया था।

कुछ दूर घर की तरफ चलने के बाद मैं फिर से उबल पड़ा। 'छोड़िए! अब घर नहीं जायेंगे। आप आने जाने में ही एक-डेढ़ घंटा लगा दीजियेगा। कोई फायदा नहीं है। चलिए प्लेटफार्म पर ही बैठ के हमलोग अगले ट्रेन का इन्तजार करेंगे।' 

स्पष्ट रूप से बस का महँगा किराया मेरे दिमाग में नाच रहा था और माँ को मजा चखाने की भी इक्छा थी। सो, हमदोनों बतौर सजा स्टेशन पर चले आये और ढ़ाई घंटे इन्तजार किये। उस इन्तजार के अंतिम क्षणों में जब मैंने अपने कमर दर्द की शिकायत की तो माँ ने धीरे से कहा कि उनको भी चोट लगे कमर के हिस्से में दर्द हो रहा है। 

खैर ट्रेन आयी और हमलोग अपने गंतव्य पर चले गए।

मैं जानता हूँ कि ऐसा आपके साथ भी होता है। कई बार अक्सर! परिस्थिति और लोग अलग हो सकते हैं। जैसे कि आपके घर में कोई अतिथि आ जाये और उसे ठहरने की आवश्यकता पड़े, जिससे आपके दैनिक गतिविधि में लगातार खलल पड़ता हो या आपके परिवार में अचानक कोई बीमार पड़ जाए या कोई अन्य परिस्थिति पैदा हो जाये और उसी समय आप ऑफिस या किसी काम से घर से निकल रहे हों और पहले से ही टेंशन में हों या अपने/किसी बच्चे को, किसी कस्टमर को, किसी परिजन आदि को कुछ समझाने की

 लगातार कोशिश कर रहे हों, पर, वो नहीं समझ पा रहा हो आदि आदि। 

इन सभी में एक बात यह रहती है कि हम सामने वाले के दृष्टिकोण को समझे बिना अपने दृष्टिकोण को थोपने की कोशिश करते हैं, जिसकी असफलता खीझ पैदा करती है। यहीं अँग्रेजी कहावत एकदम फिट बैठती है, 'Putting oneself into other's shoes.' हालाँकि यह अस्वाभाविक बात है। आखिर दूसरों की समझ, दृष्टिकोण को परखने में प्रयास लगाना पड़ता है और हमलोग चीजों को सहजता से करने के लिए या सहज बनाने के लिए बने हैं। स्वभावतः कोई भी अपने तरीके से ही सोचेगा और करेगा या करवाएगा। यह 'ease of doing' हमारे दैनिक जीवन में सर्वव्यापी है। इतना ज्यादा कि इसका इस्तेमाल कर हमारा आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक शोषण किया जाता है, यह बात हमारे समझ में नहीं आ पाती। पर, मैंने अपनी माँ के ढलती उम्र के चलते उनके स्टेशन पहुँचने में देरी लगने के बारे में सोचने के बजाय स्वयं के द्वारा लगने वाले समय के बारे में सोचा था और थोड़ा अतिरिक्त समय दिया था। पर, उतने समय में भी माँ के स्टेशन न पहुँच पाने के कारण मैं गुस्से में था। यानी माँ मेरी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरी थीं। तो दूसरी बात यह रहती है कि हमलोग जो दूसरों से अपेक्षाएँ पाल लेते हैं, उनका पूरा नहीं होना खीझ का कारण बनता है। हर मामले में हमारी अपेक्षाएँ गलत हों, ऐसा नहीं है। जैसे बच्चे को गलत राह से हटाने की कोशिश का आशातीत परिणाम गलत नहीं है। पर अपेक्षा पूरी न होने की असफलता खीझ तो पैदा करती है। यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि हमें उनसे यह अपेक्षा नहीं पालना चाहिए। पर, यह समझ पैदा करना कि सामने वाला हमारी अपेक्षाओं पर खरा नहीं भी उतर सकता है और कोई दूसरा तीसरा उपाय किया जाए या परिस्थिति को यूँ ही छोड़ दिया जाए, काफी राहत भरा हो सकता है। यह अपेक्षा पूरी न होने की असफलता को सम्मानित रूप से स्वीकार करने का एक अवसर देता है। तीसरी बात यह रहती है कि सामने वाले से कोई बात किये बिना हमलोग स्वयं से कुछ मान लेते हैं, assume कर लेते हैं और बाद में स्वयं के गलत साबित होने पर खीझ होता है। सामने वाला पर इसके लिए गुस्सा केवल अपनी गलती

ये दोनों बातें हमलोग अमल में लाते हों या न लाते हों, पर, सामान्य रूप से हम सभी जानते हैं। लेकिन मैं यह भी सोच रहा था कि मेरे दिमाग में थोड़ी सी देर होने के कारण ट्रेन के छूट जाने यानी समय के हाथ से फिसल जाने की बात जो मूलतः मेरे गुस्सा का कारण बनी, ये कहाँ से आई? हमारे यहाँ किसी अतिथि के ठहर जाने या आने की वजह से हमारे दिनचर्या की तारतम्यता टूटने पर समय खराब होने की सोच, 

Wednesday, April 9, 2025

चीन vs अमेरिका और allied देशों का ट्रेड वॉर

#आदिकिसान #समाज #विश्वव्यापार

यह economic times में छपा लेख चीन के एक्सपोर्ट में सुनामी की बात कर रहा है। इसके कुछ समय पहले से डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किए ट्रेड वॉर (टैरिफ बैरियर) के बारे में सुना होगा। लगातार न्यूज़ यह है कि अमेरिका के ट्रेड डेफिसिट की भरपाई के लिए ट्रम्प ने DOGE का गठन किया, जिसने अनेकों उपायों में टैरिफ बैरियर भी सुझाया। आपने यह भी सुना होगा कि कैसे एलोन मस्क DOGE की अतितिक्त जिम्मेदारी से परेशान हैं और यह भी सुना होगा कि कैसे यूरोपियन देश और कनाडा यानी अमेरिका के ally भी इस ट्रेड वॉर से परेशान हैं। 


पर, आप ध्यान दीजियेगा तो चीन के साथ ट्रेड वॉर के पैंतरेबाजी के न्यूज़ में allied देशों की पैंतरेबाजी उस स्तर की नही है। या फिर यों कहिए कि allied देशों की परेशानी पुतला/scarecrow ज्यादा लग रहा है।


ये सब देखते हुए, मेरा निष्कर्ष यह है कि विकसित देशों को चीन के मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में इजाफा के बारे में पहले से जानकारी हो चुकी थी, न्यूज़ भले ट्रेड वॉर के बाद पब्लिक किया जा रहा है। चीन के इस बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका और allied देशों की ट्रेड वॉर एक आर्थिक रणनीति है। आखिर इसके पहले भी ट्रेड डेफिसिट अमेरिका के लिए मुद्दा रहा है, पर, वहाँ के अर्थशास्त्री इसमे कुछ भी परेशानी नही देखते हैं। तो अब क्या हुआ था, जो अमेरिका ने अकेले पानी मे हलचल मचाना शुरू किया। एकबात स्पष्ट है कि अमेरिका के इस पहलकदमी का नतीजा यह हुआ है कि दुनिया के बाकी देश (अमेरिका और allied देशों के अलावा) भी इन टैरिफ बैरियर के प्रति सजग हुए हैं और अपनी अपनी व्यापारिक नीतियों में फेरबदल करने लगे हैं। भले इन देशों के प्रयास अभी अमेरिका केंद्रित है, लेकिन कल गए चीन के मालों से अपने उत्पादन इकाईयों को बचाने के लिए इस टैरिफ बैरियर को एक उपाय के रूप में सोच सकते हैं। यदि अमेरिका ऐसा न करता तो सारे देश इस मामले को व्यक्तिगत स्तर से हैंडल करते और कमोबेश चीन के सामने घुटने टेकने ही नतीजा होता, लेकिन अमेरिका के इस प्रयास ने टैरिफ को उपाय के रूप में इस्तेमाल की एक सामूहिक चेतना लायी है, जो चीन के लिए अत्यंत अहितकारी साबित हो सकती है, जो अंततः अमेरिका को दुनिया के टॉप पर बनाये रखने में मददगार होगा। इसका सबसे बड़ा फायदा डॉलर की प्रभुता है। इसके ठीक पहले रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान डॉलर के समानांतर रूस, चीन, ईरान ब्लॉक ने एक नई करेंसी व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश की थी, जो नाकाम कर दिया गया। यह सर्वविदित है कि रुपये की इस अर्थव्यवस्था का मायाजाल का तोता डॉलर की वैश्विक प्रभुता है। 


कुल मिलाकर यदि बात ऐसी ही है तो निश्चित रूप से चीन ने ऐसी परिस्थिति की कल्पना पहले से की होगी और हमलोगों को और भी दोनों तरफ से पैंतरे देखने को मिलेंगे। जिसमे चीन की तरफ से मुख्यतः विकासशील देशों जैसे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अनेकों अफ्रीकन, लैटिन अमेरिकन देशों के बाजार में अपनी पकड़ बढ़ाई जाएगी और ट्रेड वॉर का मैदान अमेरिका या चीन के बजाय उपरोक्त देशों के बाजार होंगे। हालाँकि ऐसा नही है कि ऐसा न्यूज़ नही आ रहा है कि कैसे दुनिया के अनेकों देशों में चीन बहुत बड़े स्तर का सड़कों, खदानों, विमान-जहाज पत्तनों(ports), सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर आदि में पूँजी तथा तकनीकी निवेश कर रहा है और अमेरिका और allied देश इसका कूटनीति स्तर पर विरोध कर रहे हैं। शायद उस विरोध का असर न दिखाई देने के कारण तथा चीन के प्रयासों में बढ़ोत्तरी होते जाने के कारण अगला कदम टैरिफ बैरियर हो और यदि यह भी अप्रभावकारी सिद्ध हुआ तो हाल ही में एक वीडियो सामने आया है, जिसमे एक अमेरिकन अन्य देशों में चीन के बढ़ते बाजार के प्रभाव को अमेरिका के अन्य देशों में 500+ ठिकानों के सामने कुछ नही बता रहा है। उसका तात्पर्य यह था कि चीन को जितना कूदना है, कूदने दीजिये, हम जब चाहेंगे सैन्य ताकत से उसे समेट देंगे। अमेरिकी रणनीतिकारों का मत बहुत भिन्न नही भी हो सकता है। वे किसी देश मे लोकतंत्र और उस देश के हितों की चीन से रक्षा के नाम पर युद्ध भी छेड़ सकते हैं। आखिर उन्होंने ऐसा पहली बार नही किया है।


दुर्भाग्यवश ऐसे विकासशील पिछड़े देशों की श्रेणी में भारत भी है और इस ट्रेड वॉर का परिणाम भारत मे भले युद्ध के रूप में न दिखाई दे, वस्तुओं के दामों के रूप में जरूर दिखाई दे सकता है।


~राहुल पटेल


https://m.economictimes.com/small-biz/trade/exports/insights/the-tsunami-is-coming-chinas-global-exports-are-just-getting-started/amp_articleshow/120082999.cms


https://www.facebook.com/share/p/1DqvpJckth/

Thursday, January 16, 2025

योगासन का इतिहास

 #आदिकिसान #समाज #पोल_खोल

योगासन एक प्रकार के तन्यता अभ्यास/stretching excercises हैं, जो अन्य शारीरिक व्यायामों से इस प्रकार अलग हैं कि इनमें माँसपेशियों के मजबूत उभार पर बल न होकर साँस और अंगों के चालन के एकीकृत अभ्यास से शरीर को स्वस्थ रखा जाता है। ये शरीर को लचीला, फुर्तीला और स्वस्थ बनाए रखते हैं। जबकि योग ध्यान साधना का एक तरीका है। योग या योगासन किसी धर्म से जुड़ा नही है और विभिन्न सभ्यताओं में विभिन्न नामों से प्रचलन में है। सही पूछे तो इस्लाम के नमाज पढ़ने में या चीन, जापान आदि के अनेकों मार्शल आर्ट्स जैसे कराटे, जूजूत्सु, कुंगफू आदि में अनेकों आसन छुपे हुए हैं। किसी भी नाम से योग या योगासन से जुड़े मिथक इसके भारतीय मूल का होने, अति प्राचीन होने, हजारों साल पुराना होने, सांस्कृतिक विरासत होने, ऋग्वेद में इसका वर्णन होने, 5000 साल पुराना होने आदि का दावा करते हैं। 5000 साल वाले दावा का एकमात्र आधार मोहनजोदड़ो में मिले सील पर ध्यान की मुद्रा में बैठे एक व्यक्ति के कारण है, जिसको पशुपतिनाथ कहने का एक दूसरा मिथक है। 


हालाँकि, यह बादलों में हाथी, शिव, हनुमान देखने जैसी बात भी हो सकती है। मोहनजोदड़ो सभ्यता के बारे में जब अभी तक कुछ खास पढ़ा नही जा सका है, तो, निश्चित तौर पर उसे योगासन का नाम भी नही दिया जाना चाहिए। भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में नगरीय सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता की ओर जाने का वृतांत भी संदेहास्पद है। लगभग 2500 साल के अंधकार के बाद हिन्दू दावे में एक दूसरी तिथि लगभग 2500 साल यानी 300 ईसापूर्व (BCE) की दी जाती है। कथा उपनिषद में योग शब्द का मात्र उल्लेख है। लगभग उसी समय काल मे श्वेताश्वतार उपनिषद में साँसों के माध्यम से दिमाग को नियंत्रित करने का वर्णन है। बाद में लिखे मैत्री उपनिषद में योग के माध्यम से साँस नियंत्रण, ध्यान, समाधि आदि की 6 विधियों का वर्णन है। इनमें दो और विधि मिलाकर 200 BCE के लगभग पातंजलि का आठ विधि वाला योगसूत्र का वर्णन है। इसमे आसन शब्द का उल्लेख तो है, पर, वह ध्यान लगाने के संदर्भ में है, न कि एक व्यायाम के रूप में। हालाँकि पातंजलि का समय काल कुछ विद्वानों के अनुसार 300 CE है। गीता में ध्यान साधना के लिए तीन योगों का वर्णन है- भक्ति योग, कर्म योग और ज्ञान योग। जो कहीं से भी आसनों के बारे में नही है। बाद में विवेकानंद और शिवानंद ने इनमें राजयोग जोड़ा। जिसका, फिर से योगासनों से कोई लेना देना नही है। इस प्रकार एक बार फिर से 200 BCE से सीधे 19वीं शताब्दी तक यानी 2000 साल तक योग का कहीं कोई वर्णन नही है। यह अंधकार नोट करने वाली बात है, क्योंकि कोई रिवाज अचानक प्रकट या गायब नही होती। हठयोग 19वीं शताब्दी के पहले देखने को मिलता है, जो बजाय ध्यान साधना वाले कोमल स्वरूप के शारीरिक कष्ट से ईश्वर/ज्ञान/सत्मार्ग की प्राप्ति का साधन रहा है। । पर, कुल मिलाकर 19वीं शताब्दी तक आज के योगासनों का कहीं किसी प्रकार का कोई उल्लेख नही है। वैसे गीता, पुराण, उपनिषद की प्राचीनता पर ही बड़ा सा प्रश्नवाचक चिन्ह है, इसलिए भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में ध्यान साधना वाले योग(योगासन/yogic excercises नहीं) की भी प्राचीनता संदिग्ध है। इन ग्रंथों की लिखित रूप में किताबें यूरोपियन लेखकों द्वारा अनुवादित किये जाने के नाम से तो हैं, जिनका बाद में पुनः संस्कृत और हिंदी में अनुवाद किया गया। पर, यूरोपियन लेखकों द्वारा स्रोत के रूप में इस्तेमाल की गई पाण्डुलिपियों का या किसी अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों का कहीं कोई अस्तित्व नही है। वैसे भी भारत मे कागज हाल की चीज है। ताड़पत्रों या छालों पर लिखने का पुरातात्विक सबूत भी आजतक भारत मे नही मिला है। भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलुरु ने 1974 में ही यह साबित किया था कि वैमानिकी शास्त्र 1900-1920 के बीच लिखा गया है।

 
इसी प्रकार की ध्यान साधना बुद्धिज़्म में भी है। जो 3000 साल या 500 BCE पुरानी मानी जा सकती है।
 
यदि हिंदुओं के दावे को सही मान लिया जाए तो इजिप्ट के केमेट/kemet लोगों के मंदिरों में मिले चित्रलेखों/hieroglyphics के अनुसार 1994 में डॉ मुआता अशबी (Muata Ashby) के लिखे किताबों(Egyptian Yoga postures of the Gods and Goddesses) में पहली बार उजागर विभिन्न योगासन जैसे दिखने वाले शारीरिक स्थितियों(body postures) के आधार पर योग इजिप्ट में 10000 साल से प्रचलन में है।


इस्लाम के प्रार्थना के तरीके में शामिल बहुत सारे योगासनों के अंश के स्रोत इजिप्ट के मूल में हो सकते हैं। यही नही, खासकर जब तरह तरह के आसनों और ध्यान मुद्रा की बात हो रही हो तो भारतीय दावों के सबूतों से कहीं ज्यादा संख्या में और ज्यादा विश्वसनीय रिकॉर्ड उत्तरी अफ्रीका/केमेट के हैं।

 
तो हमने देखा कि योग का सबसे पुराने होने के दावे में उत्तरी अफ्रीका या इजिप्ट का दावा सबसे पुराना हो सकता है। योग और योगासन के दावे में चीन का दावा भारतीय दावे से ज्यादा विश्वसनीय और पुराना है। चीन में दाओयिन/daoyin या daoyintu नाम से कम से कम 200 ईसापूर्व(BCE) से है। नीचे शोध पत्र(Yoga and Daoyin: History, Worldview, and Techniques -Livia Kohn) के कुछ अंश देख सकते हैं। वस्तुतः योग सिल्क ट्रेड रूट के व्यापारियों और साधुओं(monks) के माध्यम से भारत मे आया हुआ हो सकता है। Alchemy/कीमियागर/रसायन शास्त्र की शुरुवात चीन से हुई है। यह शुरू में केवल दीर्घायु करने के तरीकों तक सीमित था। इनमें से एक सिंदूर/HgS का सेवन भी था, जो हमलोग सिंदूर का खेला पोस्ट(https://freshperspectivebyiitian.blogspot.com/2024/03/blog-post_18.html) में देख चुके हैं। योगासन का चीनी संस्करण दाओयिन (दाओ – दिशा देना, मार्ग बताना /to guide, यहाँ ची/सोच/मन को दिशा देने की बात हो रही है + यिन - तन्यता/to stretch, यहाँ शरीर को तानने की बात हो रही है)। भी दीर्घायु के उद्देश्य से ही है। आप जानते हैं कि योगासन भी इसी के बारे में है।



सिल्क पर बना मवांगदुई/Mawangdui का अभिलेख 200BCE का है। जो तन्यता अभ्यासों/Daoyin tu 導引圖 (Exercise Chart) के बारे में एक चार्ट के रूप में मौजूद है। हालाँकि इस पर कुछ खास लिखा हुआ नही है। लिखित रूप में दो अभिलेखों में एक बाँस पर यिंशु के अभिलेख(bamboo tablets of the Yinshu 引書 (Stretch Book)) 186 BCE के मिले हैं। इनमें स्पष्ट रूप से शरीर को तंदरुस्त रखने के लिए शारीरिक अभ्यासों की जरूरत बताई गई है और उनका वर्णन है।

इसके उलट भारत मे ये योगासन महज 100 साल पुराने हैं। इनके प्रचलित होने में टी. कृष्णामाचारी का सबसे बड़ा योगदान है। सूर्यनमस्कार और कुछ अन्य योगासन तो 1930 में बने। इन योगासनों के बनने मे अँग्रेजों और प्रचार प्रसार में उनके करीब रहे भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है। इसका सबूत मार्क सिंगलटन की किताब Yoga Body: The Origins of Modern Posture में देखा जा सकता है। यह जोसेफ आल्टर की किताब Yoga in Modern India: The Body Between Science and Philosophy में भी वर्णित है।
 
तन्यता अभ्यासों/gymnastic के दावों में सबसे पुराना होने का दावा प्राचीन ग्रीक का है। कम से कम रोमनों द्वारा ग्रीस को 146 BCE में जीतने के बाद अपनी सेना में इनको शामिल करने का वर्णन है। ऊपर चीन में मिले अभिलेखों से स्पष्ट है कि उनके यहाँ ये शारीरिक अभ्यास केवल समाज के उच्च वर्ग तक सीमित था, भारतीय ग्रंथ जिस भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हों, उस क्षेत्र और इजिप्ट में भी ऐसा ही था। ग्रीस तथा रोम में उच्च वर्ग और सैनिकों तक सीमित था। ये दूसरे नामों से यूरोप में आमजन में 100 साल पहले ही प्रचलित हुए और वहाँ से भारत और बाकी दुनिया मे फैले।

Wednesday, January 8, 2025

मरीच से भारतीय इतिहास का फर्जीवाड़ा

भारतीय इतिहास में पढ़ाया जाता रहा है कि अरब, अफ्रीका तथा यूरोप भारत से मसाले ले जाते रहे हैं। यूरोप बदले में सोना की मुद्रा में भुगतान करता रहा है, इसलिए भारत कभी सोने की चिड़िया था। विश्वगुरु भारत में मसालों के कारोबार के लिए दुनिया भर के व्यापारी आते थे। केरल के मालाबार तट को इस व्यापार का केंद्र बताया जाता है। हम देखेंगे कि भारत मे पिछले 5000 सालों में ये कितना फैले, यूरोपियन व्यापारियों का इंडिया कौन सा है, वृतांतों के आधार पर इनका मूल स्थान, उपयोग के आधार पर मूल स्थान तथा नाम के आधार पर मूल स्थान।





भारत मे इन मसालों का मिलना

3000 BC यानी लगभग 5000 साल पहले से व्यापार की यह सामग्री आज तक पूरे भारतीय भौगोलिक क्षेत्र की वनस्पति होने के बजाए केवल केरल, तमिलनाडु आदि कुछ सीमित क्षेत्रों में उगता है। आज किराना दुकानों के माध्यम से भले यह पूरे भारत मे मिल जाता है। लेकिन इसके पहले की बाजार व्यवस्था मेला था, जो अँग्रेजों ने व्यापारिक माल खपाने के लिए शुरू करवाया था। तो 95% भारत को ये सिर्फ मेला से ही उपलब्ध हो पाते थे। अँग्रेजों से पहले यानी मुगलों और उनके पहले तो भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में कोई बाजार व्यवस्था ही नही थी। तिब्बत के निकट से गुजरने वाले सिल्क ट्रेड रूट के हिस्से यानी उत्तर से वैकल्पिक थल ट्रेड रूट की खोज में भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में उतरने वाले मुगलों ने चटगाँव से दिल्ली और सूरत से दिल्ली व्यापारिक मार्ग बनाये थे, जो आगे यूरोप तक चला जाता था। चटगाँव से इंग्लैंड तक तो बस भी चलती थी। इन व्यापारिक मार्गों पर ये मसाले छिटपुट मिलते रहे होंगे। इन रास्तों में बने किलों, जो कि वास्तव में ट्रेड रूट की लंबी दूरियों के पड़ाव सह मालगोदाम थे, के पास मंडी व्यवस्था के सबूत मिलते हैं। 1850 के आसपास अँग्रेजों द्वारा नहरों के जाल बिछाए जाने की शुरुवात करने तक भारत चारों ओर अत्यंत घने जंगलों से आच्छादित था। कृषि अपने वर्त्तमान रूप में नही थी। subsistence खेती, जंगलों से फल, माँस मुख्य आहार स्रोत थे। स्वाभाविक तौर पर पड़ावों की आवश्यकता थी क्योंकि रास्ते एक दिन में तय नही किये जा सकते थे। मुगलों के पहले पड़ाव/किले भी नही थे। क्योंकि, भारत के सारे किले मुगल शैली में बने मिलते हैं। उसी तरह के परकोटे, कमल के फूल, जालियाँ, यहूदी निशानी डेविड स्टार, नक्काशियाँ, गुम्बद, मीनार, ऊपर से पत्थरों के टाइल्स और अंदर चुना सुर्खी से बने दीवाल आदि। गौर कीजिए कि बाजार व्यवस्था का अभाव भारत मे किसी राजा, प्रजा, सैनिक की व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है, क्योंकि सैनिकों को वेतन यदि मुद्रा में दिया जाता था तो मुद्रा का इस्तेमाल करने के लिए बाजार व्यवस्था कहाँ थी तथा मुद्रा के धातु के निष्कर्षण और परिष्करण का भारत मे इतिहास क्या है, जैसा प्रश्न खड़ा हो जाता है। बाजार व्यवस्था के अभाव का ही देन था कि सरोख वाले लोग किसी एवज में मिले चाँदी के विक्टोरियन सिक्के घड़ों में डालकर मिट्टी में दबा देते थे, जिनका जमीन से मिलना गाहे बगाहे न्यूज़ में आता रहता है। 3000 BC इसलिए कि इजिप्ट के पिरामिड में मृत शरीरों में मसाले लपेटकर ममी बनाने तथा रामसेस 2 के नाक में काली मरीच मिलने से यह साबित होता है कि मसालों का व्यापार तब भी था। यह 3000 BC पुरानी इजिप्शियन सभ्यता के प्राचीनता से भी ज्यादा मसालों के क्षेत्र के प्राचीनता की ओर इशारा करता है। हालाँकि ये मसालों के क्षेत्र कहाँ थे, यह अभी देखना बाकी है।





यूरोपियन व्यापारियों का इंडिया 

अनेकों यूरोपियन के लेखनी में इंडिया शब्द आया है, जहाँ से वे मसाले ले जाते रहे हैं। यही तथ्य पहली बार भारतीय इतिहास लिखने वाले यूरोपियन और फिर उन्हीं बातों को घूमा फिराकर रखने वाले शत प्रतिशत भारतीय इतिहासकारों के दावों का आधार है। हालाँकि मौलिकता का अभाव केवल भारत के मामले में ही नही है। यदा कदा यात्रा वृतांतों को छोड़ दें तो अधिकांश तीसरी दुनिया के देशों का इतिहास पहली बार यूरोपियन लोगों ने ही लिखा। इसलिए उनके लेखनी में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है, चाहे वह लेखनी जमीनी हकीकत से पूरी तरह मेल खाती हो या नही। 

अब देखिए, Materia Medica of Dioscorides (c. 40 AD to 90 AD) के अनुसार india(भारत नही) से औषधियों का व्यापार होता था, जिनमे pippali(काली मिर्च), sringabera(अदरक), kardama(इलायची), tila(तिल), nardas(जटामांसी), melabathrum(दालचीनी), kastas(निर्गुन्डी) आदि शामिल थे। 

यदि आपको भारतीय संविधान में वर्णित "india that is bharat" का india नाम अद्वितीय लगता है तो जान लीजिए कि भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का नाम india होने से पहले 6 ईस्ट इंडिया कंपनी थीं और इतनी ही वेस्ट इंडिया कंपनी थीं। 

अमेरिका के रेड इंडियंस, इंडोनेशिया, ब्राजील के इंडियंस आदि शब्दावलियों से यूरोपियन व्यापारियों का मतलब होता था, indigenous(indi+genous) people/उस क्षेत्र के मूल लोग। हालाँकि भारत या हिन्दुतान नाम भी उन्हीं का दिया हुआ है। inde/इंड से हिन्द बनने की संभावना प्रबल है। जो लोग हिन्दू शब्द को ईरानी ट्विस्ट देना चाहते हैं, वे फ़ारसी को फारही कहें। वास्तव में देश का कांसेप्ट ही नया है और यूरोपियन लोगों का बनाया हुआ है। जम्बूद्वीप नाम इंडोनेशिया के जम्बू फल की बहुतायत वाले द्वीप का है। यह फल भारत मे नही पाया जाता। यदि यूरोपियन व्यापारियों के पुराने नक्शे देखिएगा तो भारतीय भौगोलिक क्षेत्र और पूरा दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को एकसाथ inde कहा जाता था। 


भारत inde intra था और पूरा दक्षिण पूर्वी एशियाई देश, तिब्बत, हिमालय के ऊपर वाला सारा इलाका inde extra था। आपको दो गंगा/gangem भी दिखाई पड़ेंगी। एक तो आप जानते ही हैं, दूसरा दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में mekong/मेकाँग/माय कोंगे/माँ गंगा नाम से जाना जाता है। आपको दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में दिल्ली, सूरत, पटना, वैशाली, मगध, कुरुक्षेत्र, अयोध्या, बनारस, कलिंग, उड़ीसा, मलयज शीतलां वाला मलय, अयोध्या वाला सरयू, जयपुर आदि नाम ही नही बल्कि विष्णुलोक, इंद्रलोक, महेंद्र पर्वत, मेरु पर्वत आदि नाम भी मिल जायेंगे, जो भारत के मिथकों में केवल वर्णित मात्र हैं। भारत के अयोध्या के सरयू का तो फर्जीवाड़ा यह है कि केवल अयोध्या में उस नदी का नाम सरयू है। इसके पहले भी और बाद में भी वह घग्घर कहलाता है। यह अयोध्या के उत्तर से बहता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि राम अयोध्या के महल से निकलकर सरयू पार करता तो उत्तर में नेपाल पहुँच जाता। 'हो सकता है' वाले कह सकते हैं कि हो सकता है उस समय घग्घर अयोध्या के दक्षिण से बहता हो। उनका ध्यान दिला दूँ कि हो सकता है घग्घर उस क्षेत्र से ही न बहता हो। कालांतर में मार्ग परिवर्त्तन कर आज अयोध्या के उत्तर से बह रहा हो। आजकल यह न्यूज़ में है कि हिन्दू लोग पूरे घग्घर का नाम सरयू करना चाहते हैं। जगहों के नाम रखना या बदलना इनका कोई नया धंधा नही है। गली, मुहल्लों, चौक, चौराहों, संस्थानों, जगहों के नाम ये लोग आज भी आपसे पहले रखने की कोशिश करते हैं। नक्शे से स्पष्ट है कि यूरोपियन भारत की तुलना में दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के भूगोल से ज्यादा परिचित थे, खासकर नदियों से। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि नदियाँ इन पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन की या लैंडमार्क की एकमात्र पहचान थी। भारत/inde intra की अपेक्षा अरेबियन, अफ्रीकन तथा यूरोपियन लोग इस inde extra में पहले पहुँच चुके थे। सिल्क ट्रेड रूट से भी और स्पाइस ट्रेड रूट से भी। आज भी indochina भारत और चीन के बॉर्डर को नही कहा जाता, बल्कि दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को कहा जाता है।



12वीं सदी में एक स्पैनिश मुस्लिम के वृतांत से भी यह बात सामने आती है कि इंडिया किसको कहा जाता था। उसने लिखा, "zanj(पूर्वी अफ्रीका का जंजीबार) के लोगों के पास अपने जहाज नही थे। वे ओमान और अन्य जगहों के जहाज पर इंडिया के zabaj द्वीप पर आते थे।" यह वर्तमान इंडोनेशिया के जावा द्वीप के बारे में था। अल इदरीसी ने इसे इंडिया का बताया। इदरीसी ने जंजीबार के लोगों के अपने जहाज न होने का उल्लेख किया। स्पष्ट है कि जावा के लोगों के पास जहाज थे। यह एक स्थापित तथ्य है कि ऑस्ट्रोनेशियन्स/नाग लोग अज्ञात काल से नाव बनाने और मुर्त्तिकारी में माहिर लोग थे। भारत मे केरल, तमिलनाडु में बसे यही नाग लोग थोड़ा बहुत नाव बनाते थे। अधिकांश भारत ने तो 5000 साल बाद भी समुद्र केवल टीवी में ही देखा है। यहाँ तक कि नदियों में भी नाव की संस्कृति अत्यल्प है। "जंजीबार के ठीक सामने जावा के द्वीप पड़ते थे, जो कि अनेकों और विशाल थे।" इंडोनेशिया अनेक छोटे बड़े द्वीपों का समूह है। विश्व का नक्शा देखिएगा तो समझ मे आएगा कि कैसे ये दोनो तट आमने सामने थे और भारत आने की कोई आवश्यकता ही न थी। वस्तुतः पहला पुर्तगाली वास्को डी गामा 1498 में यानी 15वीं सदी में भारत के सूरत की ओर आया। जबकि मसालों का व्यापार अफ्रीका और इंडोनेशिया में 3000 BC से यानी 4500 साल पहले से कमोबेश चल रहा था। इदरीसी ने जावा द्वीपों में उगने वाले कपूर, ईख, मसालों आदि का भी उल्लेख किया है। आज भी कपूर उन्हीं क्षेत्रों से आता है।





यानी Dioscorides, इदरीसी या अन्य लोग जब अपने लेखनियों मे इंडिया की बात करते हैं तो वे वस्तुतः दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की बात करते हैं। यदि आपको लगता है कि कभी भारत पर किसी यूनानी एलेग्जेंडर ने हमला किया था तो यूनान नाम की जगह आप बताईये कि कहाँ हैं। आपको किताबों में बताया जाता है कि ग्रीस को ही यूनान कहा जाता था। यूरोपियन लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात होगी या हो सकता है धूर्त्तता से क्रेडिट लेने की कोशिश करें। पर, inde extra के ठीक सटे उत्तर yunnan/यूनान है, जो अब चीन का हिस्सा है। इधर से ही थाई, मंगोलियन आदि अनेकों बार indochina/inde extra क्षेत्र पर आक्रमण किया करते थे। यूनानी चिकित्सा पद्धति चीनी क्षेत्र से आई है।


आपने देखा कि पुराने दस्तावेजों का इंडिया वस्तुतः indochina है, न कि वर्त्तमान इंडिया। और अब जितने भी कथानक, इतिहास की किताबें, लेख लिखी जा रही हैं, वे सब इंडिया शब्द से वर्त्तमान इंडिया समझ कर कॉपी पेस्ट की जा रही हैं। यह हिंदुओं के लिए सांस्कृतिक और इसलिए मानसिक लाभ/advantage है।


विभिन्न रिसर्च पेपरों के आधार पर मरीच का मूल स्थान

ऊपर वर्णित सभी मसालों का मूल स्थान दक्षिण पूर्वी एशियाई देश हैं, खासकर कंबोडिया और इंडोनेशिया। कुछ श्रीलंका और चीन से आता रहा है। यूनेस्को कहता है कि अधिकांश मसाले moluccas, जो इंडोनेशिया का क्षेत्र है, से आता था। इनका व्यापार इंडोनेशिया से दक्षिण और मध्य एशिया में फैला। जहाँ से यह अरब तथा और उत्तर गया। हालाँकि यूनेस्को ने काल का कोई वर्णन नही किया है, पर वास्तविकता यह है कि भारत मे इन मसालों का प्रवेश सबसे अंत मे हुआ है। जीटी रोड और सूरत से दिल्ली का रूट वैश्विक ट्रेड रूट के एकदम अंतिम काल मे यूरोपियन व्यापारियों द्वारा खोजे और विकसित किये गए। मसालों का आम भारतीयों द्वारा प्रयोग तो अँग्रेजों के समय से शुरू हुआ।




आप अपेक्षाकृत आधुनिक(मुगलों के समय तक का) स्पाइस ट्रेड रूट यहाँ देख सकते हैं। जब कुछ हद तक भारतीय तट कुछ मसालों के व्यापार में भी आये और calling port का काम भी करने लगे। दो दो सालों की ये पुरानी समुद्री यात्राएँ आज 6 महीने से कम समय मे तय कर ली जाती हैं। पर, उस समय ये यात्राएँ अत्यंत दुर्दांत थीं और जरूरत के अनुसार calling port की खोज स्वाभाविक थी। calling port वो तटीय जगह होते हैं, जहाँ समुद्री जहाज कुछ समय के लिए रुककर रसद पानी का इंतेजाम कर लेते हो और कुछ व्यापार भी कर लेते हों। पर, वे अंतिम लक्ष्य /destination नही होते।


अनेकों मसालों में फिलहाल मैं काली मरीच पर ही अपना ध्यान केंद्रित करूँगा। इसका कारण यह है कि कुछ समय पहले युनान, चीन का एक वीडियो मेरे सामने आया, जिसमे कच्चे माँस को लंबे समय के लिए संरक्षित करने के लिए काली और हरी मरीच के उपयोग का तरीका दिखाया गया है। जिसे देखकर मुझे ये लेख लिखने का विचार आया। Piperaceae family दक्षिण पूर्वी एशियाई मूल के हैं। पान का पत्ता भी इसी फैमिली में आता है। Piper genus की वर्त्तमान 1500 प्रजातियों में 600 तो सिर्फ दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से ही आते हैं, जबकि भारत के दक्षिणी, उत्तर पूर्वी इलाकों और अंडमान निकोबार द्वीपों में पाए जाने वाली कुल मिलाकर मात्र 21 प्रजातियाँ हैं। ये सब की सब काली मरीच ही नही हैं। भारत, कनाडा के नए संयुक्त अध्ययन में यह सामने आया है कि ये गिनी चुनी प्रजातियाँ भी भारत मे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से ही कभी आयी हैं।






काली मरीच के उत्पादन में आज भी कंबोडिया, इंडोनेशिया, चीन आदि ही आगे हैं। ग्रीन pepper का 45.5% चीन उगाता है। मेक्सिको और इंडोनेशिया क्रमशः दूसरे और तीसरे नंबर पर है। काली मरीच में वियतनाम (216k टन), इंडोनेशिया (82k टन), भारत (55k टन), ब्राज़ील (54k टन) आदि आगे हैं। स्वाभाविक रूप से मसालों के व्यापार में लाभ ने कई गैर परंपरागत देशों को इसके उत्पादन के लिए प्रेरित किया है।



उपयोग और रिवाज के आधार पर काली मरीच का मूल स्थान

आज भले इन मसालों का खाना बनाने में इस्तेमाल होता है, पर, पहले ये ज्यादातर औषधीय रूप में इस्तेमाल होते थे।


इजिप्ट के लिए मृत शरीर को मसाले लपेटकर संरक्षित करने की विधि भले नई होगी, पर, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में माँस को संरक्षित करने के लिए काली मिर्च का उपयोग अज्ञात काल से किया जाता रहा है। हालाँकि कुछ पिरामिड इन देशों में भी मिल जायेंगे, पर, वे इनका इस्तेमाल सीधा ही अपने पूर्वजों पर करते और उनको अपने घरों में सालों तक अपने साथ रखते हैं। यह रिवाज आज भी है।








क्या भारत मे इनके कुछ ऐसे इस्तेमाल हैं? भारत मे आज भी न तो माँस और न मृत शरीर को संरक्षित करने का कोई रिवाज है। भोजन में इस्तेमाल के भी कोई पुरातात्विक साक्ष्य नही मिले हैं, जबकि कंबोडिया में मिले हैं। अगरबत्ती या अन्य सुगंधित सामग्रियों का इस्तेमाल भी इन्हीं देशों की देन हैं। तो अरब, अफ्रीका और यूरोप में इनके किन चीजों में उपयोग होने थे, यह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से गया है, न कि भारत से। यह भी भारतीय इतिहासकारों के खोखले दावों के स्पष्ट सबूत है।


नाम के आधार पर मरीच का मूल स्थान

मसालों के रूप में लंबी मरीच और गोल मरीच दो प्रकार के pepper प्रचलित हैं। सवाल है कि मरीच और pepper नाम कहाँ से आये?आपको यह जानना चाहिए कि किसी चीज का नाम यदि एक से ज्यादा संस्कृति और बोली भाषा वाले भौगोलिक क्षेत्र में लगभग एक ही हो तो निश्चित रूप से वह चीज उन क्षेत्रों में एतिहासिक रूप से व्यापारियों द्वारा फैलाई गई है। पूरी दुनिया मे दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को छोड़कर दोनो प्रकारों को pepper नाम से ही जाना जाता है। 


लंबी वाली मरीच को pepper long जैसा कुछ नाम दे दिया जाता है। लंबे वाले को अनेकों भारतीय भाषाओं में पिपरी जैसा ही बोलते हैं। खमेर में लंबे वाले pepper को ដីប្លី dei-phlei, थाई में ดีปลี deebplee, इंडोनेशियन भाषा मे cabai या अब cabai jawa कहते हैं।


भारत के लगभग सभी भाषाओं में इस लंबे वाले pepper को पिपरी जैसे शब्द से ही पुकारते हैं। पर, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के अलावा इसमे गोल वाले मरीच से अंतर दिखाने के लिए long नाम जोड़ा जाता है।

ASSAMESE: Pipoli.
BENGALI: Pipool, Choi, Chab.
CAMBODIAN: Dei-phlei.
CHINESE: Jia bi bo, Bi ba, Zhao wa chang guo hu jiao.
CZECH: Pepř Dlouhý.
DUTCH: Javaanse Lange Peper, Langwerpige Peper.
ESTONIAN: Pikk Pipar.
FRENCH: Poivre long de Java.
GERMAN: Balinesischer Pfeffer, Bengalischer Pfeffer, Jaborandi-Pfeffer, Langer Pfeffer, Stangenpfeffer
GREEK: Makropiperi.
HINDI: Chab, Chavi, Pipal, Pipar, Pipli.
HUNGARIAN: Bali bors, Bengáli Bors.
INDIA: Gajapipali, Chevuyam.
JAPANESE: Indonaga-Kosho, Ishigaki jima.
KHMER: Morech Ansai.
KOREAN: Pil-Bal, Pilbal.
LAO: I Lo, Sa Li Pi
MALAY: Lada panjang, Lada sulah, Cabé jawa (Indonesia), Cabé panjang (Indonesia).
MALAYALAM: Thippali.
MARATHI: Pimpali.
POLISH: Pieprz długi.
PUNJABI: Darfilfil, Magha.
RUSSIAN: Dlinnyj perec, Dlinnyj Perets.
SANSKRIT: Chanchala, Kana, Magandhi, Pippali, Ushana.
SINHALESE: Thippli.
SLOVAK: Dlhé Korenie, Piepor Dlhý.
SLOVENIAN: Podolgovati Poper.
SWEDISH: Långpeppar.
TAMIL: Tippali, Vanapippili.
THAI: Dee Plee, Deebplee, Dipli, Dipli-chuak, Dok dipli, Phrik-hang.
TURKISH: Dar Fulful†, Dari Fülfül†, Uzun Biber.
URDU: Pipul

हिंदी में पिप्पली और चाबई दोनो नाम है। यदि अपने सुना हो तो! भारत मे बहुतों ने तो ये वाला मसाला देखा भी नही होगा। जापान में इसका नाम indonaga-kosho मजेदार है। जो इसके नागों/ऑस्ट्रोनेशियन्स के क्षेत्र से आने तथा उस क्षेत्र के इंडो नाम से जाना जाने की ओर इशारा करता है। 

जबकि गोल मरीच को सभी भारतीय और इन्डोनेशियाई भाषाओं में लगभग मरीच ही कहा जाता है। हालाँकि खमेर भाषा मे लंबे वाले को Morech Ansai/ लंबा मरीच भी कहते हैं। कारण, उसका स्थानीय होना नही है और इंडोनेशिया से वह ज्यादा दूर नही है, इसलिए pepper के बजाए मरीच। पर, भारत मे उसे लंबा मरीच के नाम से कोई नही जानता। बाकी पूरी दुनिया मे गोल मरीच को pepper जैसे शब्द से ही जाना जाता है। इसका कारण है, कंबोडियाई dei-phlei का अरब और अफ्रीका मे मरीच से पहले पहुँचना। जब यूरोपियन व्यापारी इसके खोज में दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में आये तो पहले इंडोनेशिया पहुँचे और उन्हें गोल वाला मरीच मिला। इसतरह से pepper नाम ही रह गया। नतीजतन बाद में उन्हें लंबे वाले मरीच के साथ long जोड़ना पड़ा।

European Languages
Albanian piper
Basque         piperra
Belarusian перац [pierac]
Bosnian         biber
Bulgarian пипер [piper]
Catalan         pebre
Corsican pepite
Croatian papar
Czech         pepř
Danish         peber
Dutch         peper
Estonian pipar
Finnish         pippuri
French         poivre
Frisian         piper
Galician         pementa
German         Pfeffer
Greek         πιπέρι [pipéri]
Hungarian bors
Icelandic Pipar
Irish         piobar
Italian         Pepe
Latvian         pipari
Lithuanian pipirų
Luxembourgish Peffer
Macedonian бибер [biber]
Maltese         bżar
Norwegian pepper
Polish         pieprz
Portuguese Pimenta
Romanian piper
Russian         перец [perets]
Scots Gaelic piobar
Serbian         бибер [biber]
Slovak         korenie
Slovenian poper
Spanish         pimienta
Swedish         peppar
Tatar         борыч
Ukrainian перець [peretsʹ]
Welsh         pupur
Yiddish         פעפער [fefer]
Esperanto pipro
Haitian Creole pwav
Latin         piper

Middle Eastern Languages
Arabic          الفلفل [alfilfil]
Hebrew          פלפל [pilpel]
Kurdish (Kurmanji) îsota reş
Persian          فلفل 

African Languages
Afrikaans  peper
Amharic  በርበሬ [beriberē]
Chichewa  tsabola
Hausa          barkono
Igbo          ose
Kenya rwanda urusenda
Sesotho          pepere
Shona          mhiripiri
Somali          basbaas
Swahili          pilipili
Xhosa          ipelepele
Yoruba          Ata
Zulu          upelepele

दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में ज्यादातर ऑस्ट्रोनेशियन्स लोग हैं। मरीच का मूल स्थान ये ही देश हैं। लेकिन क्या ये इन सारे देशों में होते हैं या पूरे क्षेत्र में समान रूप से उगते हैं? तो नही!  ये देश ज्यादातर द्वीप हैं और पुराने समय मे स्वाभाविक रूप से संचार के मामले में एक दूसरे से कटे हुए थे। तो जहाँ यह पौधा नही उगता, व्यापारियों के द्वारा पहुँचाया गया। उनको pepper नाम के पैटर्न से पहचान सकते हैं। बाकी स्थानों पर lada, sakay और merica/मरीचा तथा mrico/मरीचो आदि नाम मे विविधता है। स्थानीय क्षेत्रों में नाम की विविधता स्वाभाविक है। यह बात नोट करने लायक है। देखिए-

Austronesian Languages
Cebuano paminta
Filipino         paminta
Hawaiian pepa
Indonesian merica
Javanese mrico
Malagasy sakay
Malay         lada
Maori         pepa
Samoan         pepa
Sundanese lada

भारतीय उपमहाद्वीप में सभी जगह मरीच के नाम से ही जाना जाता है। दो अपवाद हैं तमिल और मलयालम। क्या आप बता सकते हैं, ऐसा अंतर क्यों? गौर से देखिएगा तो पाइयेगा कि उन दोनों क्षेत्रों में काली मिर्च इंडोनेशिया के moluccas/मालुकु क्षेत्र से आया। तो उसके नाम पर ही इसका नाम मूलक पड़ गया। गूगल सर्च में moluccas सर्च कर लीजिए। 

मलयाली कुरु/കുരു का अँग्रेजी में मतलब
यानी शब्दशः കുരുമുളക് [kurumulak] का अर्थ है, मूलक देश से आने वाला बीज। स्पष्ट है, जब भी इसका इन दोनों क्षेत्रों के पोर्ट से व्यापार शुरू हुआ हो, ये महज पोर्ट एरिया तक ही सीमित थे, इंडोनेशिया से आते थे, न कि स्थानीय रूप से इन्हें खरीदा जाता था, वर्ना इनका स्थानीय नाम होता। यह भी स्पष्ट है कि मालाबार, केरल के बाद ही तमिलनाडु के किसी पोर्ट पर यह आया है। इसतरह से केरल के मालाबार तट का मसालों के विश्व व्यापार के केंद्रबिंदु होने का दावा हवा हो जाता है। शब्दों के उत्पत्ति के आधार पर, यह है तरीका, मसालों के लंबरदार विषगुरु सोने की चिड़िया भारत के इतिहास के फर्जीवाड़ा के पोलखोल का। शेष भारत मे इसका नाम इन्डोनेशियाई मरीचा के नाम पर पड़ा, जो बाद में अँग्रेज व्यापारियों द्वारा खपत के लिए ले आने का संकेत है। इससे प्राचीन समय मे भारत के वैश्विक व्यापार का अहम और सक्रिय हिस्सा होने का भी कलई खोलता है। सबसे हास्यास्पद है संस्कृत वालों का उसके अति प्राचीन होने का दावा, जो दोनो प्रकार के मरीचों को पिप्पली या पिप्पल नाम से पुकारते है। इनका वेद, पुराणों, आयुर्वेद में उल्लेख मिलना बताते है।
Indian Languages
Punjabi         ਮਿਰਚ [miraca]
Sindhi         مرچ
Sinhala         ගම්මිරිස් [gammiris]
Tamil         மிளகு [miḷaku]
Telugu         మిరియాలు [miriyālu]
Urdu         کالی مرچ
Kannada ಮೆಣಸು [meṇasu]
Gujarati         મરી [marī]
Hindi         मिर्च [kaalee mirch]
Bengali         মরিচ [marica]
Malayalam കുരുമുളക് [kurumulak]
Marathi         मिरपूड [mirapūḍa]
Nepali         काली मिर्च [kālī mirca]
Odia         ହଳଦୀ
Pashto         تور مرچ

जबकि अन्य एशियाई देशों में, जो सिल्क ट्रेड रूट पर भी पड़ते थे, यह pepper पैटर्न पर ही पुकारा जाता है।
Other Asian Languages
Armenian պղպեղ [pghpegh]
Azerbaijani bibər
Chinese Simplified 胡椒 [hújiāo]
Chinese Traditional 胡椒 [hújiāo]
Georgian წიწაკა [ts’its’ak’a]
Hmong         kua txob
Japanese コショウ
Kazakh         бұрыш [burış]
Khmer         ម្រេច
Tajik         филфил
Thai         พริกไทย
Turkish         biber
Turkmen burç
Uyghur         قىزىلمۇچ
Uzbek         qalapmir
Vietnamese hạt tiêu
Korean         후추 [huchu]
Kyrgyz         калемпир [kalempir]
Lao                 ພິກໄທ [ phikthai]
Mongolian чинжүү [chinjüü]
Myanmar (Burmese) ငရုတ်ကောင်း [ngarotekaungg]

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~राहुल पटेल