भारतीय इतिहास में पढ़ाया जाता रहा है कि अरब, अफ्रीका तथा यूरोप भारत से मसाले ले जाते रहे हैं। यूरोप बदले में सोना की मुद्रा में भुगतान करता रहा है, इसलिए भारत कभी सोने की चिड़िया था। विश्वगुरु भारत में मसालों के कारोबार के लिए दुनिया भर के व्यापारी आते थे। केरल के मालाबार तट को इस व्यापार का केंद्र बताया जाता है। हम देखेंगे कि भारत मे पिछले 5000 सालों में ये कितना फैले, यूरोपियन व्यापारियों का इंडिया कौन सा है, वृतांतों के आधार पर इनका मूल स्थान, उपयोग के आधार पर मूल स्थान तथा नाम के आधार पर मूल स्थान।
भारत मे इन मसालों का मिलना
3000 BC यानी लगभग 5000 साल पहले से व्यापार की यह सामग्री आज तक पूरे भारतीय भौगोलिक क्षेत्र की वनस्पति होने के बजाए केवल केरल, तमिलनाडु आदि कुछ सीमित क्षेत्रों में उगता है। आज किराना दुकानों के माध्यम से भले यह पूरे भारत मे मिल जाता है। लेकिन इसके पहले की बाजार व्यवस्था मेला था, जो अँग्रेजों ने व्यापारिक माल खपाने के लिए शुरू करवाया था। तो 95% भारत को ये सिर्फ मेला से ही उपलब्ध हो पाते थे। अँग्रेजों से पहले यानी मुगलों और उनके पहले तो भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में कोई बाजार व्यवस्था ही नही थी। तिब्बत के निकट से गुजरने वाले सिल्क ट्रेड रूट के हिस्से यानी उत्तर से वैकल्पिक थल ट्रेड रूट की खोज में भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में उतरने वाले मुगलों ने चटगाँव से दिल्ली और सूरत से दिल्ली व्यापारिक मार्ग बनाये थे, जो आगे यूरोप तक चला जाता था। चटगाँव से इंग्लैंड तक तो बस भी चलती थी। इन व्यापारिक मार्गों पर ये मसाले छिटपुट मिलते रहे होंगे। इन रास्तों में बने किलों, जो कि वास्तव में ट्रेड रूट की लंबी दूरियों के पड़ाव सह मालगोदाम थे, के पास मंडी व्यवस्था के सबूत मिलते हैं। 1850 के आसपास अँग्रेजों द्वारा नहरों के जाल बिछाए जाने की शुरुवात करने तक भारत चारों ओर अत्यंत घने जंगलों से आच्छादित था। कृषि अपने वर्त्तमान रूप में नही थी। subsistence खेती, जंगलों से फल, माँस मुख्य आहार स्रोत थे। स्वाभाविक तौर पर पड़ावों की आवश्यकता थी क्योंकि रास्ते एक दिन में तय नही किये जा सकते थे। मुगलों के पहले पड़ाव/किले भी नही थे। क्योंकि, भारत के सारे किले मुगल शैली में बने मिलते हैं। उसी तरह के परकोटे, कमल के फूल, जालियाँ, यहूदी निशानी डेविड स्टार, नक्काशियाँ, गुम्बद, मीनार, ऊपर से पत्थरों के टाइल्स और अंदर चुना सुर्खी से बने दीवाल आदि। गौर कीजिए कि बाजार व्यवस्था का अभाव भारत मे किसी राजा, प्रजा, सैनिक की व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है, क्योंकि सैनिकों को वेतन यदि मुद्रा में दिया जाता था तो मुद्रा का इस्तेमाल करने के लिए बाजार व्यवस्था कहाँ थी तथा मुद्रा के धातु के निष्कर्षण और परिष्करण का भारत मे इतिहास क्या है, जैसा प्रश्न खड़ा हो जाता है। बाजार व्यवस्था के अभाव का ही देन था कि सरोख वाले लोग किसी एवज में मिले चाँदी के विक्टोरियन सिक्के घड़ों में डालकर मिट्टी में दबा देते थे, जिनका जमीन से मिलना गाहे बगाहे न्यूज़ में आता रहता है। 3000 BC इसलिए कि इजिप्ट के पिरामिड में मृत शरीरों में मसाले लपेटकर ममी बनाने तथा रामसेस 2 के नाक में काली मरीच मिलने से यह साबित होता है कि मसालों का व्यापार तब भी था। यह 3000 BC पुरानी इजिप्शियन सभ्यता के प्राचीनता से भी ज्यादा मसालों के क्षेत्र के प्राचीनता की ओर इशारा करता है। हालाँकि ये मसालों के क्षेत्र कहाँ थे, यह अभी देखना बाकी है।
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यूरोपियन व्यापारियों का इंडिया
अनेकों यूरोपियन के लेखनी में इंडिया शब्द आया है, जहाँ से वे मसाले ले जाते रहे हैं। यही तथ्य पहली बार भारतीय इतिहास लिखने वाले यूरोपियन और फिर उन्हीं बातों को घूमा फिराकर रखने वाले शत प्रतिशत भारतीय इतिहासकारों के दावों का आधार है। हालाँकि मौलिकता का अभाव केवल भारत के मामले में ही नही है। यदा कदा यात्रा वृतांतों को छोड़ दें तो अधिकांश तीसरी दुनिया के देशों का इतिहास पहली बार यूरोपियन लोगों ने ही लिखा। इसलिए उनके लेखनी में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है, चाहे वह लेखनी जमीनी हकीकत से पूरी तरह मेल खाती हो या नही।
अब देखिए, Materia Medica of Dioscorides (c. 40 AD to 90 AD) के अनुसार india(भारत नही) से औषधियों का व्यापार होता था, जिनमे pippali(काली मिर्च), sringabera(अदरक), kardama(इलायची), tila(तिल), nardas(जटामांसी), melabathrum(दालचीनी), kastas(निर्गुन्डी) आदि शामिल थे।
यदि आपको भारतीय संविधान में वर्णित "india that is bharat" का india नाम अद्वितीय लगता है तो जान लीजिए कि भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का नाम india होने से पहले 6 ईस्ट इंडिया कंपनी थीं और इतनी ही वेस्ट इंडिया कंपनी थीं।
अमेरिका के रेड इंडियंस, इंडोनेशिया, ब्राजील के इंडियंस आदि शब्दावलियों से यूरोपियन व्यापारियों का मतलब होता था, indigenous(indi+genous) people/उस क्षेत्र के मूल लोग। हालाँकि भारत या हिन्दुतान नाम भी उन्हीं का दिया हुआ है। inde/इंड से हिन्द बनने की संभावना प्रबल है। जो लोग हिन्दू शब्द को ईरानी ट्विस्ट देना चाहते हैं, वे फ़ारसी को फारही कहें। वास्तव में देश का कांसेप्ट ही नया है और यूरोपियन लोगों का बनाया हुआ है। जम्बूद्वीप नाम इंडोनेशिया के जम्बू फल की बहुतायत वाले द्वीप का है। यह फल भारत मे नही पाया जाता। यदि यूरोपियन व्यापारियों के पुराने नक्शे देखिएगा तो भारतीय भौगोलिक क्षेत्र और पूरा दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को एकसाथ inde कहा जाता था।

भारत inde intra था और पूरा दक्षिण पूर्वी एशियाई देश, तिब्बत, हिमालय के ऊपर वाला सारा इलाका inde extra था। आपको दो गंगा/gangem भी दिखाई पड़ेंगी। एक तो आप जानते ही हैं, दूसरा दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में mekong/मेकाँग/माय कोंगे/माँ गंगा नाम से जाना जाता है। आपको दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में दिल्ली, सूरत, पटना, वैशाली, मगध, कुरुक्षेत्र, अयोध्या, बनारस, कलिंग, उड़ीसा, मलयज शीतलां वाला मलय, अयोध्या वाला सरयू, जयपुर आदि नाम ही नही बल्कि विष्णुलोक, इंद्रलोक, महेंद्र पर्वत, मेरु पर्वत आदि नाम भी मिल जायेंगे, जो भारत के मिथकों में केवल वर्णित मात्र हैं। भारत के अयोध्या के सरयू का तो फर्जीवाड़ा यह है कि केवल अयोध्या में उस नदी का नाम सरयू है। इसके पहले भी और बाद में भी वह घग्घर कहलाता है। यह अयोध्या के उत्तर से बहता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि राम अयोध्या के महल से निकलकर सरयू पार करता तो उत्तर में नेपाल पहुँच जाता। 'हो सकता है' वाले कह सकते हैं कि हो सकता है उस समय घग्घर अयोध्या के दक्षिण से बहता हो। उनका ध्यान दिला दूँ कि हो सकता है घग्घर उस क्षेत्र से ही न बहता हो। कालांतर में मार्ग परिवर्त्तन कर आज अयोध्या के उत्तर से बह रहा हो। आजकल यह न्यूज़ में है कि हिन्दू लोग पूरे घग्घर का नाम सरयू करना चाहते हैं। जगहों के नाम रखना या बदलना इनका कोई नया धंधा नही है। गली, मुहल्लों, चौक, चौराहों, संस्थानों, जगहों के नाम ये लोग आज भी आपसे पहले रखने की कोशिश करते हैं। नक्शे से स्पष्ट है कि यूरोपियन भारत की तुलना में दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के भूगोल से ज्यादा परिचित थे, खासकर नदियों से। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि नदियाँ इन पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन की या लैंडमार्क की एकमात्र पहचान थी। भारत/inde intra की अपेक्षा अरेबियन, अफ्रीकन तथा यूरोपियन लोग इस inde extra में पहले पहुँच चुके थे। सिल्क ट्रेड रूट से भी और स्पाइस ट्रेड रूट से भी। आज भी indochina भारत और चीन के बॉर्डर को नही कहा जाता, बल्कि दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को कहा जाता है।


12वीं सदी में एक स्पैनिश मुस्लिम के वृतांत से भी यह बात सामने आती है कि इंडिया किसको कहा जाता था। उसने लिखा, "zanj(पूर्वी अफ्रीका का जंजीबार) के लोगों के पास अपने जहाज नही थे। वे ओमान और अन्य जगहों के जहाज पर इंडिया के zabaj द्वीप पर आते थे।" यह वर्तमान इंडोनेशिया के जावा द्वीप के बारे में था। अल इदरीसी ने इसे इंडिया का बताया। इदरीसी ने जंजीबार के लोगों के अपने जहाज न होने का उल्लेख किया। स्पष्ट है कि जावा के लोगों के पास जहाज थे। यह एक स्थापित तथ्य है कि ऑस्ट्रोनेशियन्स/नाग लोग अज्ञात काल से नाव बनाने और मुर्त्तिकारी में माहिर लोग थे। भारत मे केरल, तमिलनाडु में बसे यही नाग लोग थोड़ा बहुत नाव बनाते थे। अधिकांश भारत ने तो 5000 साल बाद भी समुद्र केवल टीवी में ही देखा है। यहाँ तक कि नदियों में भी नाव की संस्कृति अत्यल्प है। "जंजीबार के ठीक सामने जावा के द्वीप पड़ते थे, जो कि अनेकों और विशाल थे।" इंडोनेशिया अनेक छोटे बड़े द्वीपों का समूह है। विश्व का नक्शा देखिएगा तो समझ मे आएगा कि कैसे ये दोनो तट आमने सामने थे और भारत आने की कोई आवश्यकता ही न थी। वस्तुतः पहला पुर्तगाली वास्को डी गामा 1498 में यानी 15वीं सदी में भारत के सूरत की ओर आया। जबकि मसालों का व्यापार अफ्रीका और इंडोनेशिया में 3000 BC से यानी 4500 साल पहले से कमोबेश चल रहा था। इदरीसी ने जावा द्वीपों में उगने वाले कपूर, ईख, मसालों आदि का भी उल्लेख किया है। आज भी कपूर उन्हीं क्षेत्रों से आता है।

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यानी Dioscorides, इदरीसी या अन्य लोग जब अपने लेखनियों मे इंडिया की बात करते हैं तो वे वस्तुतः दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की बात करते हैं। यदि आपको लगता है कि कभी भारत पर किसी यूनानी एलेग्जेंडर ने हमला किया था तो यूनान नाम की जगह आप बताईये कि कहाँ हैं। आपको किताबों में बताया जाता है कि ग्रीस को ही यूनान कहा जाता था। यूरोपियन लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात होगी या हो सकता है धूर्त्तता से क्रेडिट लेने की कोशिश करें। पर, inde extra के ठीक सटे उत्तर yunnan/यूनान है, जो अब चीन का हिस्सा है। इधर से ही थाई, मंगोलियन आदि अनेकों बार indochina/inde extra क्षेत्र पर आक्रमण किया करते थे। यूनानी चिकित्सा पद्धति चीनी क्षेत्र से आई है।
आपने देखा कि पुराने दस्तावेजों का इंडिया वस्तुतः indochina है, न कि वर्त्तमान इंडिया। और अब जितने भी कथानक, इतिहास की किताबें, लेख लिखी जा रही हैं, वे सब इंडिया शब्द से वर्त्तमान इंडिया समझ कर कॉपी पेस्ट की जा रही हैं। यह हिंदुओं के लिए सांस्कृतिक और इसलिए मानसिक लाभ/advantage है।
विभिन्न रिसर्च पेपरों के आधार पर मरीच का मूल स्थान
ऊपर वर्णित सभी मसालों का मूल स्थान दक्षिण पूर्वी एशियाई देश हैं, खासकर कंबोडिया और इंडोनेशिया। कुछ श्रीलंका और चीन से आता रहा है। यूनेस्को कहता है कि अधिकांश मसाले moluccas, जो इंडोनेशिया का क्षेत्र है, से आता था। इनका व्यापार इंडोनेशिया से दक्षिण और मध्य एशिया में फैला। जहाँ से यह अरब तथा और उत्तर गया। हालाँकि यूनेस्को ने काल का कोई वर्णन नही किया है, पर वास्तविकता यह है कि भारत मे इन मसालों का प्रवेश सबसे अंत मे हुआ है। जीटी रोड और सूरत से दिल्ली का रूट वैश्विक ट्रेड रूट के एकदम अंतिम काल मे यूरोपियन व्यापारियों द्वारा खोजे और विकसित किये गए। मसालों का आम भारतीयों द्वारा प्रयोग तो अँग्रेजों के समय से शुरू हुआ।


आप अपेक्षाकृत आधुनिक(मुगलों के समय तक का) स्पाइस ट्रेड रूट यहाँ देख सकते हैं। जब कुछ हद तक भारतीय तट कुछ मसालों के व्यापार में भी आये और calling port का काम भी करने लगे। दो दो सालों की ये पुरानी समुद्री यात्राएँ आज 6 महीने से कम समय मे तय कर ली जाती हैं। पर, उस समय ये यात्राएँ अत्यंत दुर्दांत थीं और जरूरत के अनुसार calling port की खोज स्वाभाविक थी। calling port वो तटीय जगह होते हैं, जहाँ समुद्री जहाज कुछ समय के लिए रुककर रसद पानी का इंतेजाम कर लेते हो और कुछ व्यापार भी कर लेते हों। पर, वे अंतिम लक्ष्य /destination नही होते।

अनेकों मसालों में फिलहाल मैं काली मरीच पर ही अपना ध्यान केंद्रित करूँगा। इसका कारण यह है कि कुछ समय पहले युनान, चीन का एक वीडियो मेरे सामने आया, जिसमे कच्चे माँस को लंबे समय के लिए संरक्षित करने के लिए काली और हरी मरीच के उपयोग का तरीका दिखाया गया है। जिसे देखकर मुझे ये लेख लिखने का विचार आया। Piperaceae family दक्षिण पूर्वी एशियाई मूल के हैं। पान का पत्ता भी इसी फैमिली में आता है। Piper genus की वर्त्तमान 1500 प्रजातियों में 600 तो सिर्फ दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से ही आते हैं, जबकि भारत के दक्षिणी, उत्तर पूर्वी इलाकों और अंडमान निकोबार द्वीपों में पाए जाने वाली कुल मिलाकर मात्र 21 प्रजातियाँ हैं। ये सब की सब काली मरीच ही नही हैं। भारत, कनाडा के नए संयुक्त अध्ययन में यह सामने आया है कि ये गिनी चुनी प्रजातियाँ भी भारत मे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से ही कभी आयी हैं।






काली मरीच के उत्पादन में आज भी कंबोडिया, इंडोनेशिया, चीन आदि ही आगे हैं। ग्रीन pepper का 45.5% चीन उगाता है। मेक्सिको और इंडोनेशिया क्रमशः दूसरे और तीसरे नंबर पर है। काली मरीच में वियतनाम (216k टन), इंडोनेशिया (82k टन), भारत (55k टन), ब्राज़ील (54k टन) आदि आगे हैं। स्वाभाविक रूप से मसालों के व्यापार में लाभ ने कई गैर परंपरागत देशों को इसके उत्पादन के लिए प्रेरित किया है।
उपयोग और रिवाज के आधार पर काली मरीच का मूल स्थान
आज भले इन मसालों का खाना बनाने में इस्तेमाल होता है, पर, पहले ये ज्यादातर औषधीय रूप में इस्तेमाल होते थे।
इजिप्ट के लिए मृत शरीर को मसाले लपेटकर संरक्षित करने की विधि भले नई होगी, पर, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में माँस को संरक्षित करने के लिए काली मिर्च का उपयोग अज्ञात काल से किया जाता रहा है। हालाँकि कुछ पिरामिड इन देशों में भी मिल जायेंगे, पर, वे इनका इस्तेमाल सीधा ही अपने पूर्वजों पर करते और उनको अपने घरों में सालों तक अपने साथ रखते हैं। यह रिवाज आज भी है।
क्या भारत मे इनके कुछ ऐसे इस्तेमाल हैं? भारत मे आज भी न तो माँस और न मृत शरीर को संरक्षित करने का कोई रिवाज है। भोजन में इस्तेमाल के भी कोई पुरातात्विक साक्ष्य नही मिले हैं, जबकि कंबोडिया में मिले हैं। अगरबत्ती या अन्य सुगंधित सामग्रियों का इस्तेमाल भी इन्हीं देशों की देन हैं। तो अरब, अफ्रीका और यूरोप में इनके किन चीजों में उपयोग होने थे, यह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से गया है, न कि भारत से। यह भी भारतीय इतिहासकारों के खोखले दावों के स्पष्ट सबूत है।
नाम के आधार पर मरीच का मूल स्थान
मसालों के रूप में लंबी मरीच और गोल मरीच दो प्रकार के pepper प्रचलित हैं। सवाल है कि मरीच और pepper नाम कहाँ से आये?आपको यह जानना चाहिए कि किसी चीज का नाम यदि एक से ज्यादा संस्कृति और बोली भाषा वाले भौगोलिक क्षेत्र में लगभग एक ही हो तो निश्चित रूप से वह चीज उन क्षेत्रों में एतिहासिक रूप से व्यापारियों द्वारा फैलाई गई है। पूरी दुनिया मे दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को छोड़कर दोनो प्रकारों को pepper नाम से ही जाना जाता है।
लंबी वाली मरीच को pepper long जैसा कुछ नाम दे दिया जाता है। लंबे वाले को अनेकों भारतीय भाषाओं में पिपरी जैसा ही बोलते हैं। खमेर में लंबे वाले pepper को ដីប្លី dei-phlei, थाई में ดีปลี deebplee, इंडोनेशियन भाषा मे cabai या अब cabai jawa कहते हैं।
भारत के लगभग सभी भाषाओं में इस लंबे वाले pepper को पिपरी जैसे शब्द से ही पुकारते हैं। पर, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के अलावा इसमे गोल वाले मरीच से अंतर दिखाने के लिए long नाम जोड़ा जाता है।ASSAMESE: Pipoli.
BENGALI: Pipool, Choi, Chab.
CAMBODIAN: Dei-phlei.
CHINESE: Jia bi bo, Bi ba, Zhao wa chang guo hu jiao.
CZECH: Pepř Dlouhý.
DUTCH: Javaanse Lange Peper, Langwerpige Peper.
ESTONIAN: Pikk Pipar.
FRENCH: Poivre long de Java.
GERMAN: Balinesischer Pfeffer, Bengalischer Pfeffer, Jaborandi-Pfeffer, Langer Pfeffer, Stangenpfeffer
GREEK: Makropiperi.
HINDI: Chab, Chavi, Pipal, Pipar, Pipli.
HUNGARIAN: Bali bors, Bengáli Bors.
INDIA: Gajapipali, Chevuyam.
JAPANESE: Indonaga-Kosho, Ishigaki jima.
KHMER: Morech Ansai.
KOREAN: Pil-Bal, Pilbal.
LAO: I Lo, Sa Li Pi
MALAY: Lada panjang, Lada sulah, Cabé jawa (Indonesia), Cabé panjang (Indonesia).
MALAYALAM: Thippali.
MARATHI: Pimpali.
POLISH: Pieprz długi.
PUNJABI: Darfilfil, Magha.
RUSSIAN: Dlinnyj perec, Dlinnyj Perets.
SANSKRIT: Chanchala, Kana, Magandhi, Pippali, Ushana.
SINHALESE: Thippli.
SLOVAK: Dlhé Korenie, Piepor Dlhý.
SLOVENIAN: Podolgovati Poper.
SWEDISH: Långpeppar.
TAMIL: Tippali, Vanapippili.
THAI: Dee Plee, Deebplee, Dipli, Dipli-chuak, Dok dipli, Phrik-hang.
TURKISH: Dar Fulful†, Dari Fülfül†, Uzun Biber.
URDU: Pipul
हिंदी में पिप्पली और चाबई दोनो नाम है। यदि अपने सुना हो तो! भारत मे बहुतों ने तो ये वाला मसाला देखा भी नही होगा। जापान में इसका नाम indonaga-kosho मजेदार है। जो इसके नागों/ऑस्ट्रोनेशियन्स के क्षेत्र से आने तथा उस क्षेत्र के इंडो नाम से जाना जाने की ओर इशारा करता है।
जबकि गोल मरीच को सभी भारतीय और इन्डोनेशियाई भाषाओं में लगभग मरीच ही कहा जाता है। हालाँकि खमेर भाषा मे लंबे वाले को Morech Ansai/ लंबा मरीच भी कहते हैं। कारण, उसका स्थानीय होना नही है और इंडोनेशिया से वह ज्यादा दूर नही है, इसलिए pepper के बजाए मरीच। पर, भारत मे उसे लंबा मरीच के नाम से कोई नही जानता। बाकी पूरी दुनिया मे गोल मरीच को pepper जैसे शब्द से ही जाना जाता है। इसका कारण है, कंबोडियाई dei-phlei का अरब और अफ्रीका मे मरीच से पहले पहुँचना। जब यूरोपियन व्यापारी इसके खोज में दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में आये तो पहले इंडोनेशिया पहुँचे और उन्हें गोल वाला मरीच मिला। इसतरह से pepper नाम ही रह गया। नतीजतन बाद में उन्हें लंबे वाले मरीच के साथ long जोड़ना पड़ा।
European Languages
Albanian piper
Basque piperra
Belarusian перац [pierac]
Bosnian biber
Bulgarian пипер [piper]
Catalan pebre
Corsican pepite
Croatian papar
Czech pepř
Danish peber
Dutch peper
Estonian pipar
Finnish pippuri
French poivre
Frisian piper
Galician pementa
German Pfeffer
Greek πιπέρι [pipéri]
Hungarian bors
Icelandic Pipar
Irish piobar
Italian Pepe
Latvian pipari
Lithuanian pipirų
Luxembourgish Peffer
Macedonian бибер [biber]
Maltese bżar
Norwegian pepper
Polish pieprz
Portuguese Pimenta
Romanian piper
Russian перец [perets]
Scots Gaelic piobar
Serbian бибер [biber]
Slovak korenie
Slovenian poper
Spanish pimienta
Swedish peppar
Tatar борыч
Ukrainian перець [peretsʹ]
Welsh pupur
Yiddish פעפער [fefer]
Esperanto pipro
Haitian Creole pwav
Latin piper
Middle Eastern Languages
Arabic الفلفل [alfilfil]
Hebrew פלפל [pilpel]
Kurdish (Kurmanji) îsota reş
Persian فلفل
African Languages
Afrikaans peper
Amharic በርበሬ [beriberē]
Chichewa tsabola
Hausa barkono
Igbo ose
Kenya rwanda urusenda
Sesotho pepere
Shona mhiripiri
Somali basbaas
Swahili pilipili
Xhosa ipelepele
Yoruba Ata
Zulu upelepele
दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में ज्यादातर ऑस्ट्रोनेशियन्स लोग हैं। मरीच का मूल स्थान ये ही देश हैं। लेकिन क्या ये इन सारे देशों में होते हैं या पूरे क्षेत्र में समान रूप से उगते हैं? तो नही! ये देश ज्यादातर द्वीप हैं और पुराने समय मे स्वाभाविक रूप से संचार के मामले में एक दूसरे से कटे हुए थे। तो जहाँ यह पौधा नही उगता, व्यापारियों के द्वारा पहुँचाया गया। उनको pepper नाम के पैटर्न से पहचान सकते हैं। बाकी स्थानों पर lada, sakay और merica/मरीचा तथा mrico/मरीचो आदि नाम मे विविधता है। स्थानीय क्षेत्रों में नाम की विविधता स्वाभाविक है। यह बात नोट करने लायक है। देखिए-
Austronesian Languages
Cebuano paminta
Filipino paminta
Hawaiian pepa
Indonesian merica
Javanese mrico
Malagasy sakay
Malay lada
Maori pepa
Samoan pepa
Sundanese lada
भारतीय उपमहाद्वीप में सभी जगह मरीच के नाम से ही जाना जाता है। दो अपवाद हैं तमिल और मलयालम। क्या आप बता सकते हैं, ऐसा अंतर क्यों? गौर से देखिएगा तो पाइयेगा कि उन दोनों क्षेत्रों में काली मिर्च इंडोनेशिया के moluccas/मालुकु क्षेत्र से आया। तो उसके नाम पर ही इसका नाम मूलक पड़ गया। गूगल सर्च में moluccas सर्च कर लीजिए।
मलयाली कुरु/കുരു का अँग्रेजी में मतलब

यानी शब्दशः കുരുമുളക് [kurumulak] का अर्थ है, मूलक देश से आने वाला बीज। स्पष्ट है, जब भी इसका इन दोनों क्षेत्रों के पोर्ट से व्यापार शुरू हुआ हो, ये महज पोर्ट एरिया तक ही सीमित थे, इंडोनेशिया से आते थे, न कि स्थानीय रूप से इन्हें खरीदा जाता था, वर्ना इनका स्थानीय नाम होता। यह भी स्पष्ट है कि मालाबार, केरल के बाद ही तमिलनाडु के किसी पोर्ट पर यह आया है। इसतरह से केरल के मालाबार तट का मसालों के विश्व व्यापार के केंद्रबिंदु होने का दावा हवा हो जाता है। शब्दों के उत्पत्ति के आधार पर, यह है तरीका, मसालों के लंबरदार विषगुरु सोने की चिड़िया भारत के इतिहास के फर्जीवाड़ा के पोलखोल का। शेष भारत मे इसका नाम इन्डोनेशियाई मरीचा के नाम पर पड़ा, जो बाद में अँग्रेज व्यापारियों द्वारा खपत के लिए ले आने का संकेत है। इससे प्राचीन समय मे भारत के वैश्विक व्यापार का अहम और सक्रिय हिस्सा होने का भी कलई खोलता है। सबसे हास्यास्पद है संस्कृत वालों का उसके अति प्राचीन होने का दावा, जो दोनो प्रकार के मरीचों को पिप्पली या पिप्पल नाम से पुकारते है। इनका वेद, पुराणों, आयुर्वेद में उल्लेख मिलना बताते है।
Indian Languages
Punjabi ਮਿਰਚ [miraca]
Sindhi مرچ
Sinhala ගම්මිරිස් [gammiris]
Tamil மிளகு [miḷaku]
Telugu మిరియాలు [miriyālu]
Urdu کالی مرچ
Kannada ಮೆಣಸು [meṇasu]
Gujarati મરી [marī]
Hindi मिर्च [kaalee mirch]
Bengali মরিচ [marica]
Malayalam കുരുമുളക് [kurumulak]
Marathi मिरपूड [mirapūḍa]
Nepali काली मिर्च [kālī mirca]
Odia ହଳଦୀ
Pashto تور مرچ
जबकि अन्य एशियाई देशों में, जो सिल्क ट्रेड रूट पर भी पड़ते थे, यह pepper पैटर्न पर ही पुकारा जाता है।
Other Asian Languages
Armenian պղպեղ [pghpegh]
Azerbaijani bibər
Chinese Simplified 胡椒 [hújiāo]
Chinese Traditional 胡椒 [hújiāo]
Georgian წიწაკა [ts’its’ak’a]
Hmong kua txob
Japanese コショウ
Kazakh бұрыш [burış]
Khmer ម្រេច
Tajik филфил
Thai พริกไทย
Turkish biber
Turkmen burç
Uyghur قىزىلمۇچ
Uzbek qalapmir
Vietnamese hạt tiêu
Korean 후추 [huchu]
Kyrgyz калемпир [kalempir]
Lao ພິກໄທ [ phikthai]
Mongolian чинжүү [chinjüü]
Myanmar (Burmese) ငရုတ်ကောင်း [ngarotekaungg]
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~राहुल पटेल