Sunday, December 10, 2023

मौखिक से ज्यादा लिखित और चिरस्थाई विचार

रोडमैप 3

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मैंने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्थाओं से हर तरह के क्षुब्ध लोग देखे हैं। इनमें से अधिकांश मुखर हैं। ये बदलाव चाहते हैं। ये दुनिया के सामने सच्चाई रख देना चाहते हैं। पर, इनकी शिकायत है कि लोग सुन नही रहे, पर, वही लोग उनकी क्यों सुन रहे हैं, जिनसे ये क्षुब्ध लोग बचाना चाहते हैं?

मतलब लोग सुनने को तैयार हैं।

अब दूसरे छोर से इस समस्या को देखिए। जिन लोगों की सुनी जाती है, वे अपनी बातों को हवाला किताबों से देते हैं। लोग किताबों में लिखी बातों को अकाट्य सच मानते हैं। उन्हें लेखकों के prejudice का, बकलोली का, धूर्त्तता का, 99% मामलों में एक दूसरे की नकल का(same narrative copied over and over again) कोई अंदाजा नही है। अब किताब में लिखा है तो लेखक ने खोजबीन करके ही लिखा होगा। मतलब आप सीधे सच्चे हैं तो अगला भी होगा और क्षुब्ध लोगों के audience वाकई में भोले सीधे सच्चे हैं। जिनको कुछ विद्वान अनाड़ी कहते हैं।

जिन लोगों की सुनी जाती है, उनका नैरेटिव देश मे साक्षरता दर के साथ बढ़ता गया। आपने कई लोगों को यह शिकायत करते सुना होगा कि समाज मे धार्मिकता, पाखंडवाद, शूद्रवाद, उपभोक्तावाद, साहब नौकर वाद आदि आदि पढ़े लिखे लोगों या कबिलाव चलाने वाले लोगों का लाया हुआ है। अब आप जानते हैं कि उनकी शिकायत अकारण नही है।

जिन लोगों की सुनी जाती है वे यह मैकेनिज्म समझते हैं। भाजपा, आरएसएस, वर्ण व्यवस्था वाले लोग इतिहास में बदलाव चाहते हैं। यह लंबी पारी का गेम है। इसे क्षुब्ध लोगों में भी समझने वाले कम हैं और भोले लोगों की तो बात ही क्या? इस मामले में ज्यादातर विरोध सिर्फ प्रतिक्रियावादी है। लेकिन आप गौर से देखेंगे तो एक से ज्यादा लोगों का समूह इतिहास बदलना चाहते हैं।  इसमे दो समूह प्रमुख हैं, एक बुद्धिष्ट लोगों का कुछ समूह (सारे नही, अधिकांश सुधारवादी और भ्रमित हैं) तथा दूसरा आदिकिसान वाले। ये दोनों समूह और कुछ स्वतंत्र विचारक यह जानते हैं कि इतिहास में बदलाव, वास्तव में बदलाव नही है, थोड़ा बहुत selective फेरबदल है। यह वर्णवादी/हिंदुत्ववादी एजेंडा की पकड़ को और मजबूत करने के लिए है। यदि किताबों में यह बात डाल दिया जाए कि वास्तव में हिन्दू, वैदिक युग, ब्राम्हण, राजा महाराजा, क्षत्रिय, शुद्र हमेशा से यहीं के हैं तो कुछ पीढ़ी तक विरोध होगा पर धीरे धीरे सब सामान्य हो जाएगा और बाद कि पीढ़ियाँ किताबों में लिखी बातों को अकाट्य सत्य मानेंगी। cultural colonialism और मजबूती से जड़ पकड़ेगा और उसका प्रतिफल सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था में दिखेगी, पिछले 200 सालों से दिख ही रही है। यह सब उत्तरोत्तर बढ़ा है। लेकिन इसबार इस प्रक्रिया में तेजी आएगी।

विद्वान राजीव पटेल जी के 17 दिसंबर के डिहरी में उद्बोधन के लिए मैं पास के एक गाँव समरडीहा के रामभरत सिंह मुखिया के यहाँ उन्हें निमंत्रित करने गया था। हमेशा की तरह उन्होंने मुझे किताबें पढ़ने का सलाह दिया। वे सीपीआई के हैं तो हर बार मिलने पर कार्ल मार्क्स, राहुल सांकृत्यायन आदि को पढ़ने के लिए सलाह देते हैं। इस बार इरफान हबीब, रामशरण शर्मा और रोमिला थापर की किताबों को विश्व स्तर का इतिहास बताया और पढ़ने की सलाह दी। मैंने राजीव पटेल जी द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों का हवाला दिया और उन्हें फ़ोन से बात करने का अवसर भी दिया। पर हम दोनों के वार्त्तालाप में किताबों का हवाला स्पष्ट रूप से था।

तो, अब आप भी मैकेनिज्म समझते हैं। बहुत मुखर होने के साथ साथ लिखने को भी उतना ही महत्व दीजिये। सोशल मीडिया पर लिखिए, इससे ज्यादा ब्लॉगपोस्ट या अपने वेबसाइट पर लिखिए। वीडियो बनाइये। सभी सोशल मीडिया में लिखे की एक्सपायरी डेट अत्यंत कम है। वेबसाइट पर पीढ़ी दर पीढ़ी चल सकता है। पर, सबसे उत्तम है, किताब के रूप में प्रकाशन। लोग आपकी किताबों का हवाला देकर कहेंगे कि फलाने जगह लिखा है। विश्वसनीयता बढ़ती है। आपके मौखिक बातों का एक्सपायरी डेट तो एकदम कम है, कम पहुँच वाला है, लोग प्रतिवाद कर देंगे। विचारों को ज्यादा से ज्यादा लिखित रूप दीजिये और लोगों को अपने वालों का, दूसरे वालों का खूब हवाला दीजिये। यह social capital का निर्माण करता है। सबसे महत्वपूर्ण है कि इसमे समय का पहलू है।

~ राहुल पटेल



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