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जैन मुनि ही जिन्न हैं जो मनपसंद बच्चियों को अपनी सेवा में रख सकते थे। उनके आवास को जिन्नालाय कहा जाता है। बच्चियों पर यही जिन्न आते थे।
"लुको नाही तss जिन्न ध लीही" बच्चों को डरवाने के लिए पहले गाँवों में बड़े अक्सर कहते थे। उत्तर भारत के लोगों के जेहन में जिन्न भूत प्रेत की श्रेणी में हैं। क्योंकि यहाँ जैनियों, बौद्धों, हिंदुओं किसी का भी जोर नही था। वे उपस्थित ही नही थे, केवल किंवदंतियाँ थीं। जितने भी शोषण की कहानियाँ, ब्राम्हणवाद शूद्रवाद, धर्म का प्रभाव आप देख रहे हैं, वे लगभग 200 साल पुराने हैं। इसीलिए देवदासी प्रथा आप उत्तर भारत मे नही पाते।
ये किंवदंतियाँ किनसे आईं? क्या ये यूरोपियन के साथ आये वर्ण व्यवस्था वाले व्यापारियों के साथ आई? नही! तमिलनाडु और उड़ीसा के तटीय क्षेत्र तथा बंगाल को छोड़कर शेष भारत मे यह मुख्यतः इंडोनेशिया से आये लोगों से आई। ये मुस्लिम, हिन्दू दोनों थे। देश की अधिकांश मुस्लिम आबादी और वर्ण व्यवस्था वाली हिन्दू आबादी इंडोनेशियन है। आज भी देश मे बच्चियों को जिन्न पकड़ने की सबसे ज्यादा शिकायत मुस्लिमों में होती है। कुछ तो अवशेष रह गया है, लेकिन अधिकांश इस आड़ में बच्चियों की अपने शरीर और सेक्स की बढ़ती दिशाहीन समझ और मनोविकारों का शोषण है।
एकबार स्थानीय कुशवाहा भवन में एक रिटायर्ड शिक्षक दिलबर अंसारी सर से उनकी जिन्न, जिन्नात, अल्लाह, अध्यात्म की lofty बातों पर तल्खी हो गयी। मैंने पूछा कि जिन्न शब्द कहाँ से आया है? अब इतना तो वे आध्यात्मिक नही ही थे।
थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया आदि देशों में (Jaina-Archaeology Outside India.pdf - Jainworld https://jainworld.jainworld.com/JWEnglish/Jaina-Archaeology%20Outside%20India.pdf) ये लोग पहली शताब्दी BC से भी पहले से हैं और वहाँ गाँवों में भ्रमण के दौरान कोई सुंदर बच्ची पर मन आ गया तो अपनी सेवा में बुला लेना इनकी प्रैक्टिस रही होगी। जिसका साक्षात सबूत है दक्षिण में देवदासी प्रथा। चूँकि ये जब भारत मे प्रवेश किये तो दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आकर भारत के समुद्र तटीय क्षेत्रों (तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक) में पहले से आकर बसे लोगों पर आसानी से पुराने रिवाज का रौब गांठ सकते थे तो प्रैक्टिस विभिन्न रूपों में, नामों से अनवरत जारी रहा। देवदासी प्रथा इसका साक्षात सबूत है। जैन से बुद्ध और बुद्ध से ब्रजयान और बज्रयान से हिन्दू तक का सफर अलग अलग नही है, बल्कि थोड़ा बहुत फेरबदल के साथ शाखाओं मे बँटे एक ही संस्कृति के एक ही लोग हैं। भारत भूमि के मूल लोग महज सब्सक्राइबर हैं। Paedofile practice कोई नया नही है। मुहम्मद भी थे। सिल्क ट्रेड रूट के सारे देशों में व्यापारियों का यही हाल था। मुहम्मद भी व्यापारी थे। जैनी जिन देशों में थे वहाँ पिरामिड भी हैं। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में भी है। आप देख सकते हैं कि यह व्यापारियों की संस्कृति है, धर्म/सम्प्रदाय है।
~राहुल पटेल
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