यदि आपको लगता है कि राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव लाने से चीजें ठीक हो जायेंगी, इसलिये ज्यादा से ज्यादा अपने समाज से विधायक, सांसद पैदा किया जाए। आखिर व्यवस्थापिका का ही तो काम है व्यवस्था चलाना। तो इसको लागू करने के लिए इसकी कुछ रणनीतियाँ अपनायी जा रही हैं, हर पार्टी में हमारे आदमी हों, अपनी पार्टी अलग बनाई जाए, पार्टी सभी के लिए हो, पर नियंत्रण अपना हो आदि। अपनी पार्टी बनाइये, वह राज्य स्तर या राष्ट्र स्तर पर आ ही नही पा रही। राज्य स्तर पर आ भी जाये तो उसमें वर्ण व्यवस्था वालों के दीमक लग जा रहे हैं। पूर्व स्थापित पार्टियाँ सब एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं। बाहरी आवरण अलग हो सकता है, पर, नीतियाँ, सोच, झुकाव वही हैं। सभी पार्टियों में अपने लोग हैं भी तो वे केवल पिछलग्गू बनकर रह जा रहे हैं। इसतरह से यह समझ काम नही कर रहा।
इसके विकल्प में अब कुछ लोग यह सोच रहे हैं कि कार्यपालिका(मुख्यतः आईएएस अधिकारी) भारत का स्टील फ्रेम है। जबतक इसमे बदलाव नही होगा तबतक कुछ नही होगा। विधायक, सांसद, मंत्री लोग तो बस पुतला हैं। सचिव लोग जो नीति व्यवस्था बनाकर देते हैं, जनप्रतिनिधि लोग बस उसपर मुहर लगाते हैं। जनप्रतिनिधियों के बस का कुछ नही। लेकिन कैसे कुछ जनप्रतिनिधियों की चलती है, कुछ की नही? जवाब है सामाजिक पूँजी/social capital। व्यवस्थापिका में जिनकी चलती है और उनको मानने वाले जो लोग कार्यपालिका में है, ये दोनों लोग एक ही है या अलग अलग हैं? इसके जवाब में लोग मति बना रहे हैं कि अपने बच्चों को आईएएस बनाओ, प्रशासन में भेजो। लेकिन बहुत से लोग अब यह मानने लगे हैं कि 'हैं तो हमारे लोग भी आईएएस या प्रशासन में, कहाँ कुछ हो रहा है?' ये भी जाते हैं तो उन्हीं में से एक हो जाते हैं। वर्णव्यवस्था वालों की तरह ये खुलकर नही आ पाते, मजबूरियाँ गिना देते हैं। दूसरी ओर, चलती वाले जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक पदाधिकारियों से कुछ भी करा लेते हैं। यानी प्रशासन में घुसना भी काम नही कर रहा। अब लोगों को क्या मालूम कि पद, पैसा ही सब कुछ नही है कि आप कोई इक्छित कार्य कर लेंगे, इसकी सीमा है। जिनके पास पर्याप्त जातिगत या बड़े स्तर की सामाजिक पूँजी/social capital है, सिर्फ वही मनचाहे कार्य कर सकते हैं या करके भी बेदाग बचे रह सकते हैं या उल्टा पुरस्कृत हो सकते हैं।
इसके विकल्प में न्यायपालिका भी कमजोर सही पर वह भी एक उम्मीदवार है कि उसमें प्रवेश पा जायेंगे तो सब कुछ सही हो जाएगा। मीडिया भी एक उम्मीदवार है।
अच्छा इनमें से एक या अधिक में आना भी बायें हाथ का खेल नही है। कन्हैया कुमार, प्रशांत किशोर, अरविंद केजरीवाल का चमकना जितना आसान है, उतना आसान आपके किसी बंदे के लिए नही है। प्रशासन में उच्च पदों पर जाने के लिए लोगों को कितनी कठिनाईयाँ होती है, कितने निजी स्तर से और व्यवस्थागत अड़ंगे लगाए जाते हैं, ये आपने कईयों के मुँह से सुना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य महँगा किया जा रहा है। किसी क्षेत्र में सफल होने के लिए पहले से ज्यादा पापड़ बेलने होंगे। वर्ण व्यवस्था वालों ने अँग्रेजों के साथ रहकर इतनी जातिगत/सामूहिक स्तर की सामाजिक पूँजी/social capital का निर्माण कर लिया है कि वे आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था पर छाए हुए है। उनकी नई पीढ़ियों के लिए यह एक आसान अवसर देता है, आसानी से मार्ग प्रशस्त करता है। उपाय है, आप अपने जातिगत/सामूहिक स्तर का सोशल कैपिटल बढ़ाये और वर्ण व्यवस्था वालों का घटाए। आप पहले से व्यक्तिगत स्तर का यथासंभव सोशल कैपिटल का निर्माण कर रहे हैं। पर, इसकी एक सीमा है, जिसके ऊपर आपके लाख चाहने पर भी आप चीजों को नही पा सकते हैं। आपको जातिगत/सामूहिक स्तर का सोशल कैपिटल बनाना होगा और वर्ण व्यवस्था वालों के सोशल कैपिटल पर प्रहार करना होगा
इसके तरीके:-
1. उपकार कीजिये, उपकृत होइए
2. वर्ण व्यवस्था वालों को समय से वंचित करें, ताकि वे जिंदगी की चक्की / daily grind of life में फँसे
3. वर्ण व्यवस्था वालों के लिए समूहवाचक संज्ञा जैसे पंडीजी, गोड़ लागssतानी बाबा, बाबू साहब आदि इस्तेमाल करने के बजाय व्यक्तिवाचक संज्ञा इस्तेमाल करें
4. उपभोक्तावादी संस्कृति से बचें, यह वर्ण व्यवस्था वालों को मजबूत करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उपभोक्तावाद को समझें। कुल मिलाकर रुपये की अर्थव्यवस्था से दूरी बनाइये
5 बौद्ध भिक्षुओं और उनकी संगीति के कार्यकलाप की तरह ही समस्यायों के मूल को पकडने वाले विद्वतजनों को आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक प्रश्रय दें, समूह में उन्हें सुनने के लिए बुलाये। ऐसे विद्वतजनों को एक दूसरे को जानना चाहिए और नेटवर्क बनाना चाहिए
6. किसी विषयवस्तु के एक से ज्यादा दृष्टिकोण को जाने बिना अपनी मति न बनायेें। यह खासकर धार्मिक भावनाओं, भारतीय इतिहास और संस्कृति के बारे में लागू होता है। सबसे ज्यादा व्यक्ति का गलत इस्तेमाल इन्हीं चीजों को माध्यम बनाकर होता है। याद रखें आप वर्ण व्यवस्था के नही है और वर्ण व्यायवस्था वाले आपके दोस्त नही है, न आर्थिक, न राजनीतिक, न सामाजिक रूप से। ये बाहरी हैं।
7. वर्णव्यवस्था वालों के प्रोपेगैंडा को पहचाने और अपने प्रोपेगैंडा नेटवर्क को मजबूत करें
8. लिखित परंपरा को बढ़ावा दें
कुल मिलाकर आप देख सकते हैं कि कोई एक समाधान नही है कि यह कर लीजिएगा तो सब ठीक हो जाएगा। अनेकों छोटे उपायों का समूह समाधान है।
~ई0 राहुल पटेल, IITR
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