Thursday, December 7, 2023

सभी शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षा विभाग के लिए समर्पित शिक्षा के क्षेत्र में मेरे अनुभव

 #समाज #नीतीश_कुमार #शिक्षा #बिहार 

अपनी #LDP(Leadership Development Programme) में शिक्षा के कार्यक्रम के तहत 4 दिसंबर, 2023 को मैंने एक सरकारी मध्य विद्यालय में कक्षा 6, 7 एवं 8 के विद्यार्थियों को तीन महीना विज्ञान विषय पढ़ाने के बाद नए शिक्षक के आ जाने के कारण छोड़ा। हेडमास्टर के मेरे बने रहने के आग्रह के लिए यह कहने पर कि आप रहिएगा तो मुझे आराम रहेगा, मैंने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया। पूर्ववर्ती हेडमास्टर बड़े भाई थे। उनके आग्रह पर मैंने उनके समय मे विद्यार्थियों को सवा 3 महीने नवोदय की तैयारी करवाई थी। चूँकि वे विज्ञान पढ़ाते थे तो उनके बाद विज्ञान के शिक्षक का पद खाली हो गया था। 

सिलेबस बहुत पीछे चल रहा था। मैंने जब जिम्मा लिया तो मैं अवाक था कि जब एक महीने में एक या दो ही पाठ पढ़ाना है तो कैसे सिलेबस पीछे हो गया। यदि बच्चे और शिक्षक दोनों तैयार रहे तो एक महीने में 3-4 पाठ भी समाप्त किया जा सकता था। आखिर बिहार सरकार का सिलेबस निजी विद्यालयों की तुलना में अत्यंत कटा छटा, बहुत कम प्रॉब्लम सॉल्विंग, ज्यादा सैद्धांतिक, समझ पर ज्यादा जोर देनेवाला था। निजी विद्यालयों में इसके ठीक उल्टा गैर जरूरी सिलेबस, एकदम कम सैद्धांतिक, समझ पर जोर से कहीं ज्यादा जोर प्रॉब्लम सॉल्विंग (competitive oriented) पर रहता है। हेडमास्टर को मुझसे आशा थी कि सब कुछ एक महीने में ट्रैक पर आ जायेगा।

पर एक महीना बीता और मैं कक्षा 7 और 8 को एक पाठ भी पूरा नही पढ़ा सका। कोई चीज पढ़ाने चलता था तो उसके लिए जरूरी पीछे की जानकारियों का भी उतना ही अभाव था, जितना वर्त्तमान विषय वस्तु का। 8वीं के कुछ छात्रों ने बढ़िया पढ़ाई नही होने की भी हेडमास्टर से शिकायत की। हेडमास्टर और दो अन्य युवा शिक्षकों का सलाह था कि बस सिलेबस पूरा करवा दीजिये, सरकार का दबाव है। मैंने प्रतिवाद किया कि सरकार का यह भी दबाव होगा कि विद्यार्थियों की विषय की अच्छी समझ हो। दिए हुए परिस्थिति में यह दोनों एकसाथ संभव नही था। पूरे महीने मैंने बहुत कड़ाई से होमवर्क बनाकर लाने, घर पर कम से कम दो  घंटे पढ़ने, पूछने पर बताने का निर्देश देता रहे, पर, लगभग सभी मेरा मुँह ताकते थे। यह तीनों कक्षाओं की स्थिति थी। वास्तव में तीनों महीने कुछ मामूली सुधार के साथ यही हुआ। पहले महीने सितंबर में मैंने तीनों कक्षाओं के विद्यार्थियों की पिटाई की। ऐसा एक दिन भी नही जाता था कि एकाध विद्यार्थी छोड़कर सभी की पिटाई न होती हो, पर, उनपर कोई असर नही था। समझाने बुझाने का भी असर नही था। अक्टूबर से तंग आकर मैंने उन्हें मारना छोड़ दिया। बाकी उपाय जारी रहे, कोई असर नही था। दोनों नौजवान शिक्षकों ने भी अपने अनुभव बताए। उनका कहना था कि सर माथा फोड़वाने से कोई फायदा नही है। इनको छोड़ दीजिए। एक ही चीज को कितना भी बताने पर, क्रियाकलाप से समझाने पर, लिखवाने पर, वर्ग में ही पूछने और पुनः बताने पर अगले दिन सब शून्य मिलता था। सभी केवल मेरा मुँह ताकते थे।

बिहार सरकार के निर्देशानुसार मुझे महीने के अंत मे टेस्ट लेना था। अर्धवार्षिक में मैंने उनका हाल देखा था। खुलेआम चोरी थी। उनके मूल्यांकन का, फर्स्ट, सेकंड, थर्ड आदि का कोई मतलब नही था। चूँकि उनको अलग अलग नही बैठाया जा सकता था, तो चोरी भी नही रोकी जा सकती थी। मैंने एक उपाय निकाला। 30-40 प्रश्नों का सेट बनाया और उनमें से randomly 5 प्रश्न सभी को इसतरह से दिए कि किसी भी अगल बगल वाले विद्यार्थी का प्रश्न आपस मे मिलते नही थे। समय भी 20 मिनट का सीमित कर दिया। अब अपना ही प्रश्न न आ रहा हो तो दूसरों को कोई क्या चोरी करवाये। सामान्यतः अलग अलग प्रश्नों पर विद्यार्थियों की आपस में तुलनात्मक बेंचमार्किंग नही की जा सकती है। पर मासिक परीक्षाओं का उद्देश्य प्रोग्रेस जानना है, जो नकल के माहौल में नही जानी जा सकती। वैसे भी विद्यार्थी से अपेक्षा है कि पाठ में कहीं से भी पूछा जाए, उन्हें आना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि अधिकांश को शून्य या एकाध नंबर मिले। 7वीं में एक भी पास नही हुए। 8वीं में दो पास हुए। दोनों में सिर्फ 60% लोग शून्य से ज्यादा ला सके, बाकी 40% को शून्य से संतोष करना पड़ा या सही कहिए तो उन्होंने कोई प्रयास ही नही किया। सीधे मुझे कॉपी थमा दिए। छठा पहले भी तुलनात्मक रूप से ठीक था, क्योंकि उन्हीं में से कुछ पिछली बार नवोदय में मेरे साथ थे। तो, उन्हें मेरे पढ़ाने और मेरी उनसे अपेक्षाएँ यानी स्वयं पढ़ने के ढंग/culture के बारे में अनुमान था। इसलिए 5 विद्यार्थी पास हुए थे। हालाँकि इसमे 65% विद्यार्थी शून्य पाए। फिर भी तुलनात्मक रूप से ठीक कहने के पीछे यह समझ है कि आप सब को बराबर नही कर सकते। इसलिए अच्छा करने वालों का प्रतिशत बढ़ाने पर जोर होना चाहिए। स्पष्ट था कि पढ़ने का कल्चर 6वीं में सबसे कम था, पर पढ़ने वाले विद्यार्थी ऊपर की कक्षाओं के पढ़ने वाले विद्यार्थियों की तुलना में ज्यादा अच्छे थे। सिलेबस ट्रैक पर या उससे आगे ही था। अबतक बाकी शिक्षकों ने भी मुझे सलाह देना छोड़ दिया था।

मैंने बच्चों से उनके इस उदासीनता का कारण जानने की सोची। 8वीं के छात्रों का कहना था कि वे केवल मेरा होमवर्क नही करते हैं। बाकी सभी विषयों का करते हैं। पास में खड़े गणित के शिक्षक ने उनकी पोल खोल दी। शिक्षक के जाने के बाद मैंने विद्यार्थियों को याद दिलाया कि अभी कुछ ही दिन पहले गणित के शिक्षक से उन्होंने कितनी मार खाई थी। हुआ यूँ था कि विज्ञान के संख्यात्मक प्रश्नों का एकदम साधारण गणित उनसे हो नही पता था तो मैंने गणित के शिक्षक को यह बात बताई और उनसे विद्यार्थियों का स्तर उठाने का आग्रह किया। उन्होंने सफाई दिया कि अभी कुछ ही दिन पहले और कई बार पहले भी यह सब विद्यार्थियों को उन्होंने बताया था, पर ये लोग घर पर कुछ भी मेहनत करे तब तो। इसके तुरंत बाद उन्होंने बोर्ड पर मुझसे प्रश्न देने के लिए कहा और तेज समझे जाने वाले विद्यार्थियों को एक एक कर बुलाकर हल करने के लिए कहते। कोई कर नही पा रहा था। वे गुस्सा से घम्म घम्म मारे जा रहे थे। मुझे और प्रश्न देने के लिए कहते, मैं तरस खाकर और हल्का प्रश्न देता, लेकिन विद्यार्थियों का उस दिन भाग्य खराब था। खैर यह घटना याद दिलाने पर सभी विद्यार्थी चुप हो गए। लेकिन कोई मानने को तैयार नही था कि वे बाकी विषयों में भी घर पर कुछ भी नही करते। मैंने पूछा कि तुम लोग ही बता दो कि मैं किस विषय का टेस्ट लूँ, जिसे तुम सब आसान समझते हो। सबने एकमत से हिंदी कहा। शायद उनको भावार्थ जैसी चीजों का कोई अंदाजा नही था। वे सोच रहे थे कि अभ्यास में जो सीधे सीधे प्रश्न दिए रहते हैं, वह जानना काफी था। सिर्फ एक पाठ तय हुआ। मैंने हिदायत दी कि पढ़ कर आईयेगा। अगले दिन मेरा पहला प्रश्न था कि क्या आपलोगों ने उस पाठ को पढ़ा? सबका जवाब हमेशा की तरह केवल मेरा मुँह ताकना था। एक भी पढ़ कर नही आया था। मैंने दस सवाल पूछे। पूरे क्लास में एक ने बस एक सवाल का आधा अधूरा जवाब दिया। स्पष्ट था कि छात्रों के मन मे विषयों के प्रति उदासीनता में कोई भेदभाव नही था।

तीसरा महीना नवम्बर आया। मैं परेशान था। पिछले दो महीनों में पूर्व हेडमास्टर और शिक्षकों के साथ काफी चर्चाएँ भी हुई थी। सुझाव आये थे, लेकिन कोई फायदा नही हुआ था। मैं अब कक्षा में ही होमवर्क करवाने लगा, इससे सिलेबस के ट्रैक पर आने की आशा धूमिल होती गयी। कक्षा में स्वयं से लिखने का समय देने और फिर न आने पर लिखवाने, हरेक का कॉपी चेक करने लगा। सुनकर लिखने की क्षमता 50% में नही थी।  बाकी लिखने वालों में भी ऐसे इक्के दुक्के ही थे कि थोड़े कम अशुद्ध लिखते थे। एक वाक्य में चार पाँच गलतियाँ मिल जाती थीं। यह कक्षा के होनहार समझे जाने वाले विद्यार्थियों का हाल था। होमवर्क मैं पहले भी चेक करता था। पर, इसका भार नगण्य था। एकाध ही होमवर्क बनाते थे। इनलोगों को जवाब लिखने का तरीका नही मालूम, वाक्य विन्यास का पता नही, व्याकरण का पता नही, क्या प्रश्न कह रहा है और क्या जवाब दे रहे हैं यानी comprehend ही नही कर पा रहे हैं, विज्ञान के विषय वस्तु की बात ही छोड़िए। मतलब हर स्तर पर संघर्ष ही था। इसी तरह गिरते पड़ते 7वीं और 8 वीं में धीरे धीरे कोर्स आगे बढ़ता रहा। मैं विद्यार्थियों को लताड़ता, सराहता, हिदायत देता रहा। इस महीने में छठ और दीवाली की संयुक्त छुट्टी काफी लंबी थी। स्कूल की पढ़ाई तो बंद ही थी, पढ़ने वाले चंद विद्यार्थियों की भी पढ़ाई लगभग बंद रही। टेस्ट का समय आया। विद्यार्थियों के पढ़ने की संभावना में 6वीं में 33%, 7वीं में 8% और 8वीं में 10% का सुधार हुआ। यह पहले से ज्यादा विद्यार्थियों के होमवर्क करने, पठन पाठन में हिस्सा लेने आदि के रूप में भी दिखने लगा था। 

मुझे पूरा विश्वास है कि इस momentum को बरकरार रखकर एक turn around प्राप्त किया जा सकता था। पर, मेरी रुचि राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधारात्मक पहलों और इससे संबंधित नीतियों में है। मैं आगे के संवाद में अपने अनुभवों को शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों के लिए दिशा निर्देश और सरकार के लिए व्यवस्थागत तथा नीतिगत सुझाव के रूप में रखूँगा।


~राहुल पटेल


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