Tuesday, December 17, 2024

भारत मे चल रहे अंतहीन मुद्दों का अंत सांस्कृतिक बदलाव से

#समाज #आदिकिसान #पोल_खोल

कल एक बौद्धिक व्हाट्सएप्प ग्रुप में चर्चा शुरू हुई कुछ सदस्यों द्वारा कुछ अन्य सदस्यों के धार्मिक पोस्टों पर आपत्ति से। एक सदस्य ने तंज कसा कि इस ग्रुप का सारा ऊर्जा धर्म, पाखंड के विरोध में लगता है। उनकी शिकायत थी कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सम्मान के मुद्दों पर बात होनी चाहिए।

ऊपर से यह बात जँचती है, सो, एक अन्य सदस्य ने चर्चा पर तंज कस दिया कि इस ग्रुप में "कौन ज्यादा बुद्धिजीवी है" की होड़ मची रहती है। इस सदस्य ने तुरंत ही संसद में one nation one election का बिल पास होने पर दुख जताया कि देखिए हमलोग धर्म, पाखंड पर चर्चा कर रहे हैं और उधर यह क्या हो गया।

कुछ  ही देर में BPSC अभ्यर्थियों द्वारा कुछ सच्चाई रखने की बात की। कल रात में DM रोहतास ने msp गारंटी कानून तथा सोन नदी पर कदवन जलाशय की माँग कर रहे किसानों का टेंट उखड़वा दिया। दिल्ली बॉर्डर पर पिछले किसान आंदोलन को वादा कर तुड़वाने में सफल भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन फिर से तेजी पकड़ रहा है। आज सुबह एक बड़े भाई पेंशनर समाज के कल के बैठक की बात बताने लगे कि कैसे बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट के पेंशन से संबंधित आदेश को लागू नही कर रही है। उनके पहले, मोबाइल पर न्यूज़ देखते समय मैंने पढ़ा कि देश मे ओबीसी स्कॉलरशिप कैसे साल साल भर से लटका है और ओबीसी विद्यार्थी इससे कितना प्रभावित हैं। ओबीसी बैकलॉग वैकेन्सी, ews, ओबीसी एससी एसटी का आरक्षण, चुनावी धांधली, उद्योगपतियों का अरबों का कर्जा माफी, सरकारी विभागों में घूस, काम का न होना, सुप्रीम कोर्ट का फैसला कि मस्जिद में जय श्री राम का जयकारा लगाने में कोई बुराई नही, मस्जिदों की खुदाई, पुरातत्व विभाग द्वारा पत्थरों की भी कार्बन डेटिंग, विभिन्न सरकारी पदों पर केवल मिश्रा, तिवारी, राजपूत, बनिया की भर्त्ती, लेटरल एंट्री मतलब मुद्दों का न तो ठिकाना है, न नए मुद्दों के खड़ा होने की दर कम हो रही है।

ध्यान देने की बात यह है कि इन विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाले ओबीसी, एससी एसटी लोगों/संगठनों को अनेकों लोग पैसा दे रहे हैं, अनेकों लोग लाठियाँ खा रहे हैं, अनेकों की जाने जा रही हैं, समय और श्रम तो जा ही रहा है, अनेकों प्लेटफार्म से रात दिन चर्चा होती है, खूब कोसा जाता है, पर मुद्दों का अंत नही हो रहा है। सौ में से एक का हल निकल नही रहा, तबतक सौ और नए पैदा हो रहे हैं। वे अंतहीन हैं, अंतहीन रूप से लगातार पैदा हो रहे हैं, किये जा रहे हैं। यानी तू डाल डाल, सरकार और व्यवस्था पात पात। इन दोनो पर पूर्ण नियंत्रण कुछ ही जातियों का है।

स्पष्ट है ये मुद्दे बाकियों के हित मे हैं, केवल ओबीसी, एससी, एसटी के लिए परेशानी हैं। तो, हर मुद्दों के पीछे भागने के बजाय यह बताईये कि ये पैदा ही क्यों हो रहे हैं? जवाब है, संस्कृति। जबतक आप स्वयं को हिन्दू/सनातनी/ब्राम्हणी संस्कृति का समझेंगे तबतक आप उनको चुनते रहेंगे, उनको पैसा देते रहेंगे, उनकी बात मानते रहेंगे, स्वाभाविक रूप से उनके द्वारा अपने हित मे बनाये गए नीतियों,नियमों को कोसते रहेंगे, विरोधों में अपने संसाधन लुटाते रहेंगे, लेकिन घुमाफिराकर उसी संस्कृति को ढोते रहेंगे। अतः जरूरत है सांस्कृतिक परिवर्त्तन की। आप समूह मे या अकेले स्वयं को गैर हिन्दू घोषित करना शुरू कीजिए। उनके लिखे किताबों, इतिहासों, न्यूज़ को देखना सुनना बंद कीजिए। उनसे उपकृत होना और उपकार करना बंद कीजिए।

~राहुल पटेल

Tuesday, September 17, 2024

सदी के महान विभूति लोक संस्कृति के संरक्षक, कविराज, किसान भूषण आदरणीय पद्मश्री बाबूलाल दाहिया सर

 #लाइक_शेयर_और_सब्सक्राइब_ज़रूर_करें  #समाज #ppsmission

देश के जीती जागती, सदी के महान विभूति लोक संस्कृति के संरक्षक, कविराज, किसान भूषण आदरणीय पद्मश्री बाबूलाल दाहिया सर का जीवनवृत/biography; पुरोहिती, ईश्वर की अवधारणा, सही इतिहास के समझ की जरूरत पर जबरदस्त विश्लेषण के साथ बेबाक टिप्पणी
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पूरा पढ़िए, शेयर कीजिये
1. सतना जिला मुख्यालय, मप्र0 से 18 किलोमीटर दूर उचेहरा तहसील के अंतर्गत छोटे से गांव पिथौराबाद में रहने वाले 81 वर्षीय(वर्ष 2024 तक) किसान पद्मश्री बाबूलाल दाहिया लोगों के लिए एक मिसाल हैं
देश के जीती जागती, सदी के महान विभूति लोक संस्कृति के संरक्षक, कविराज, किसान भूषण आदरणीय पद्मश्री बाबूलाल दाहिया सर का जीवनवृत/Biography:-
बाबूलाल दाहिया
ग्राम - पो. पिथौराबाद
जिला- सतना  (मप्र), भारत

विभिन्न शासकीय एवं अशासकीय संस्थानों से सम्बद्धता -
1- छः वर्षो तक आकाश वाणी रीवा के सलाहकार समिति सदस्य
2- तीन वर्ष तक आदिवासी लोककला परिषद भोपाल के सदस्य
3- तीन वर्ष तक मध्य प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड के सलाहकार समिति सदस्य
4- बसामन मामा चयन समिति सदस्य
5-  माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल के परामर्श सदस्य
6- कृषि विद्यान केंद्र मझगवां जिला सतना के सलाहकार समिति सदस्य
7- तीन वर्ष तक प्रलेस सतना के महा सचिव
8- दो वर्ष तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन सतना इकाई के अध्यक्ष

प्रकाशित पुस्तकें -
1- विन्ध्य केर माटी ( बघेली काब्य संकलन)
2- पसीना हमरे बद है (  बघेली काब्य संकलन)
3- सयानन केर थाती ( बघेली मुहावरे ,लोकोक्तियों, पहेलियों एवं कहावतों का संयुक्त संकलन)
4- जनपदीय लोक कथाए
5- जनपदीय संस्कार गीत
6- जनपदीय खेल गीत
7- जनपदीय पहेलियाँ
8- जनपदीय आख्यान
9- जनपदीय मुहावरे एवं लोकोक्तियां
10- बघेली कविता के जेष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि
11- मैं और मेरा गांव
12- बगरो बसंत है  (निबंध संग्रह)

प्रकाशनाधीन -
1- बघेली शब्दकोष
2- बघेलखण्ड के व्यंजन
3- कृषि आश्रित समाज के भूले बिसरे उपकरण
4- हमारे परम्परागत देसी अनाज
5- कोल जनजाति का विविध सांस्कृतिक सर्वेक्षण
6- खैरवार जन जाति का विविध  सांस्कृतिक सर्वेक्षण
7- दाहिया के दोहे

इसके अतिरिक्त -
- आकाश वाणी दूर दर्शन से कविताएं कहानियां एवं वार्ताएं प्रसारित
- Aps विश्वविद्यालय रीवा के बी .ए. फाइनल कोर्स में बघेली कविताएं सम्लित।
- अनेक राष्ट्रीय मंचों में काब्य पाठ।
- अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित।
- 10 वर्षों तक ( का कही का, न कही ) देशबन्धु समाचार पत्र में बघेली स्तम्भ लेखन

साहित्य क्षेत्र में पुरस्कार एवं सम्मान -
1- मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन (युवा कहानी लेखन पुरस्कार)
2- मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ( युवा नाटक लेखन पुरस्कार)
3- प्रगतिशील लेखक संघ सतना  का प्रथम (कहानी लेखन पुरस्कार)
4- लोक भाषा बिकास परिषद तिवनी रीवा का श्री बैजनाथ पाण्डेय बैजू सम्मान
5- मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन जिला इकाई सतना का (सैफू सम्मान)
6- मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल का (साहित्यकार सम्मान)
7- बघेली लोकभाषा बिकास परिषद रीवा का (शम्भु द्विवेदी काकू सम्मान)

साहित्य क्षेत्र से अलग सम्मान एवं पुरस्कार -
1- महाराष्ट्र सरकार का (कृषि वसंत सम्मान)
2- मध्यप्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड भोपाल का (जैव विविधता पुरस्कार)
3- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण चेन्नई का (राष्ट्रीय जैव विविधता पुरस्कार)
4- भारत सरकार का (पद्मश्री पुरस्कार)

पद्मश्री बाबूलाल दाहिया के देश समाज को योगदान:-
  a. 200 प्रकार की धानों के साथ अनेक प्रकार के अन्य अनाजों के बीजों का बीज बैंक में संरक्षण
  b. हर वर्ष छोटे छोटे भूखण्डों में संरक्षण हेतु 200 प्रकार की धान, 20 प्रकार के गेहूँ तथा मोटे अनाजों की खेती
  c. वृक्षारोपण अभियान और पर्यावरणविद
  d. बघेली साहित्य और संस्कृति के संरक्षक, कवि, भाषाविद
  e. कृषि आश्रित समाज के भूले विसरे उपकरणों का संग्रहालय जिसमें 300 के आसपास कृषि उपकरण, बर्तन आदि संग्रहीत
जैसे:- झउआ,गोबरहा झउआ, छन्नी टोपरिया, ढोलिया, टुकनी, ढेरइया, बंसा, घोटा,झांपी, झपलइया, दौरी,छिटबा, बेलहरा, बिजना, कुड़वारा, झलिया, झाला
मिट्टी: हडिय़ा, तेलइया,पइना, मरका, मरकी,डहर, घड़ा, घइला, तरछी, डबुला दोहनी, मेटिया, ताई, नाद, दपकी,दिया, चुकड़ी, कलसा, तेलहड़ा, डबलुइया, करब,नगडिय़ा की कूड़, चिलम, हुक्का और गुल्लक
काष्ठ: हल, जुआ, बैैलगाड़ी, नाडी, खटिया, मचिया, मचबा, मचेड़ी, कोनइता की पारी, चकिया की पारी, चकरिया, चकिया के बेट, चौकी, पीढ़ा, ढोलकी के बारंग, बेलना, घर का छप्पर, तखत, कुआं की ढिकुरी, थामहा, केमार, दरवाजे का चउकठ, खूंटी, खुरपी का बेंट, कुदारी का बेंट, फरुहा का बेंट, कुल्हाड़ी का बेंट, हंसिया का बेंट, पाटी, बोड़की, परछी के खम्भे, पांचा, खरिया की कोइली, मोगरी, कठउता, कठउती, कुरुआ, पइला, कुरई, मूसल, ढेरा, कुरइली
लौह: हंसिया, खुरपी, कुदारी, फरुहा, सबरी, सब्बल, कुल्हाड़ी, कुल्हाड़ा, कुंडा, ताला- चाबी, बसूला, रोखना, करछुली, चिमटा, डोल, कराही, हल की कुसिया, कील, कांटा, झंझरिया, छन्ना, तवा, गड़ास, गड़ासा, बरछी-भाला, तलवार, खुरपा, बल्लम, पासु, अमकटना, सरोता, बड़ा सरोत, पलउहा हंसिया, मूसल की साम, कजरउटा, अखइनी, रोखना, बसूला, रमदा, गिरमिट, रांपी, फरहा एवं परी
पत्थर: लोढिय़ा, कांडी, जेतबा, कुडिय़ा, चकिया, पथरी, लोढ़बा, चौकी, खल, होड़सा, कठौती
धातु: लोटा, थाली, कटोरा-कटोरी, बंटुआ, गिलास, हांडा, परात, भुजंगी, कलसा, तबेलिया, पीतल का लोटा, गंजा, पीतल की छोटी डोलची, घण्टी, कोपरी, पीकदान, कांसे का एक लैंप भी, फूलदान, पईना, पानदान, पील की बड़ी डोलची (डोंगा), फूल के खोरवा, बटलोह, पीतल के गघरा, पीतल के दौरी
चमड़ा : बैल की घण्टी व घुघ, जुएं में बैल के नधने के लिए जोतावर, बीज बोने के लिए ढोलिया की चर्म पट्टी, खेती से जुड़े कार्य हेतु लोहार की धौकनी, किसानों के केश कर्तक, नाई के छुरा की धार परताने के लिए चर्म पट्टिका, चर्म चरण पादुका, मसक, छोटे-छोटे बछड़े के गले में बांधने वाली ताबीज, चमौधी
सन अम्बारी एवं बैलों के बाल से बनी सामग्री: मुस्का, गोफना, खरिया, रस्सी नारा, गेरमा, तरसा का रस्सा, भारकस, मोहरा, गडाइन, कांस की सुमडेरी
महिलाओं द्वारा निर्मित: कुठला, कुठली, कुठुलिया, पेउला, गोरसी, सइरी
(सामग्रियों के नाम बघेलखण्ड की आम बोलचाल में प्रचलन के आधार पर हैं) 

2. उन साहित्यों में तरह तरह के अन्नों आदि का जिक्र आने से इनके मन मे उनके बीजों के तथा बाद में कृषि से जुड़े उपकरणों के संग्रह और संरक्षण की भावना भी आई
3. किसान विरोधी तत्कालीन मप्र0 सरकार के सम्मान को बाबू लाल दाहिया ने ठुकरा दिया था
4. रीवा विश्वविद्यालय, मप्र0 के BA फाइनल के कोर्स में इनकी बघेली कविताएँ चलती हैं
5. जनजातीय संग्रहालय बोली विकास एकेडमी, भोपाल, मप्र0 ने बघेली मुहावरे, लोकोक्तियाँ, कहावतें, लोकगीत, लोककथाएँ आदि के संकलन का इनको जिम्मेवारी दिया
6. अधिकांश कहावतें, लोककथाएँ परम्परागत अनाजों पर हैं
7. 70 के दशक में भारत मे आये हरित क्रांति ने परम्परागत अनाजों को खत्म कर दिया
8. परम्परागत अनाजों में अनुकूलन से पानी की आवश्यकता कम होती है और बुवाई में देरी के बावजूद समय पर पकता है
9. सात शिल्पकार जातियों वाला गाँव आत्मनिर्भर था। पुरानी कृषि में गाँव के सात उद्यमियों का बड़ा योगदान रहा है। ये हैं लोहार, बढ़ई, शिल्पकार, वंशकार, चर्मकार, कुंभकार और महिला। इनके द्वारा ही कृषि उपयोग की कई चीजें बनाई जाती थी
10. प्राकृतिक रूप से कोई भी जन्तु विकट स्थिति आने पर डटकर सामना करेगा, पर किसी भगवान का सुमिरन नही करेगा। स्पष्टतः मनुष्य ने खुद भगवान बना लिया है या यों कहें कि मनुष्यों के बीच से कुछ समुदायों या लोगों ने ऐसा किया है और बाकी बस उलझे हुए हैं
11. ईश्वर की अवधारणा का होना और पुरोहितवाद अलग अलग चीजें हैं। यह हो सकता है कि ईश्वर की अवधारणा वाली भावना को भुनाने के लिए कुछ खास प्रकार के लोग ईश्वर को खुश करने का ठेका ले लिए। या यह हो सकता है कि ये खास प्रकार के लोग अपने गढ़े ईश्वर को दूसरों को थमा उनका दोहन करने लगे। पुरोहितवाद स्पष्टतः सांस्कृतिक, उससे सामाजिक और अंततः आर्थिक शोषण का जरिया है, जबकि केवल ईश्वर की अवधारणा में ऐसी समस्या नही है। वर्त्तमान सामाजिक परिस्थिति में एकमात्र हल है, समाज को अपने बीच से #PPSM प्रशिक्षित पुरोहित देना
12. अलग अलग क्षेत्रों में विकसित धर्म और पूजा पद्धति वहाँ के भौगोलिक क्षेत्रों, स्थानीय संसाधनों के अनुसार हैं। यहाँ आप यह ध्यान दे सकते हैं, आप स्वयं को जिस धर्म का मानते हैं, क्या उसमे यह समस्या है? कहीं वह बाहर की थोपी हुई तो नही?
13. धर्म रूपी संगठन कहने के लिए तो सबके लिए है, पर ये संगठन भी अनेकों हैं और अपना अपना प्रभुत्व जमाना चाहते हैं। यही नही, एक ही संगठन के अंदर भी सब कुछ ठीक ठाक नही है। किसी धर्म के सदस्यों के कुछ समूह बाकी सदस्यों के हित के बिना पर सामाजिक, आर्थिक लाभ पाते हैं, जो शोषण है और सामाजिक विकृतियाँ पैदा करता है। इनमे से एक भी समस्या आदिवासियों के ईश्वर की अवधारणा में नही है, न उनका धर्म जैसा कोई संगठन है। ऐसे संगठन सदा कुछ खास लोगों को ही लाभान्वित करते हैं और इनका चोला उतारकर फेंक देना चाहिए
14. पौराणिक कथाएँ सबूतों पर नही, मान्यता पर टिकी हुई हैं और मिथ्या हैं
15. वेद, पुराण, महाभारत, रामायण की कहानियाँ तर्क की कसौटी पर नही कसी जा सकती। इनमे चमत्कार भरे पड़े हैं और किसी व्यक्ति के सम्यक विकास में बाधक काव्यात्मक भावनाओं से भरे पड़े हैं
16. हमको किसी क्षेत्र के प्रस्तावित इतिहास के झूठा या सत्य होने का प्रमाण उसमे वर्णित भूगोल, वनस्पति, जानवर, रीतिरिवाज, पहनावा, भाषा के स्थानीय या बाहरी होने से भी मिलता है
17. पुरोहितगिरी के पहले सत्य इतिहास को जानना भी जरूरी है
18. आदरणीय बाबूलाल दाहिया सर का परिवार 3 पीढ़ियों से पूजा पाठ, ईश्वर की अवधारणा से मुक्त है
19. पर बाहर से आई बहुएँ पूजा पाठ, व्रत, ईश्वर की सामान्य अवधारणा से बाहर नही हैं तो हमलोग उन्हें करने देते हैं। यह सामाजिक संरचना की समझ है
20. एक वो भगवान हैं जो कहते हैं कि मुझको न मानो, पहले अपने बुद्धि के कसौटी पर कसो, तब मानो। एक दूसरे भगवान है जो कहते हैं, जो है, मैं ही हूँ। मुझ को ही मानो। अहम से भरे पड़े हैं
21. हमारे पुरोहितों को सही इतिहास जानने की जरूरत है
22. एक ही घटना पर एक भाग्यवादी/ईश्वरवादी/अध्यात्मवादी और एक भौतिकवादी का नजरिया

*देखिए* https://youtu.be/wn_urhIWI54?si=pkpzaSV_Pyl1F9LE


*यूट्यूब पर पिछले बैठकों में विचारकों, समाजसुधारकों और संस्कारकों के उद्बोधन सुनने के लिए क्लिक करें* https://youtube.com/@ppsmission?si=U302DJ0rZ5zotmNZ

Friday, September 13, 2024

भ्रामक इतिहास में मुद्रा की व्यवस्था

#आदिकिसान #adikisan #समाज  #पोलखोल
1975 में सासाराम, बिहार में लकड़ी की चौकी(पलंग की ही तरह लेकिन बिना डिज़ाइन के लकड़ी के पटरा से बना) 50/- में मिलती थी। मेरे यहाँ 70/-की आयी तो देखनिहार आते थे, कैसी चौकी है भाई!

समझ सकते हैं कि लोगों के पास मुद्रा कितनी थी। पर, हमारे इतिहासकार लिखते हैं कि 200 साल या उससे पहले राजा होते थे, जो लाखों की संख्या में सैनिक रखते थे(कृष्ण के पास तो अक्षौहिणी सेना यानी 18 लाख की सेना थी) और वे अपने सैनिकों को सोने चाँदी की मुद्रा में वेतन देते थे। और फिर उनके हथियार, कवच, जानवर आदि के लिए जो पूरी अर्थव्यवस्था बनी होगी तो उनको भी मुद्रा में भुगतान करना होता होगा। देश की आबादी ही दहाई करोड़ से कम थी। उसमे भी किसी एक राजा के राज्य में कुछ दहाई लाख या इकाई करोड़ में जनसंख्या होती होगी। उसमें भी एक सैनिक या अन्य सेवा देने वाले के परिवार में उस समय के संयुक्त परिवार के हिसाब से 10 लोग और वर्त्तमान के एकल परिवार के हिसाब से 4 लोग मान लें तो पूरे देश मे इकाई करोड़ के आसपास परिवार थे या एक राज्य में लाख या कम ही परिवार थे और सबके पास उस समय के हिसाब से भी अत्यंत महँगे धातु की मुद्राएँ होतीं थीं।

दूसरे सबूतों को भी देखें तो कुछ कुछ परिवारों(अत्यंत ही नगण्य संख्या में) में आपको धातु की मुद्राएँ खासकर चाँदी की विक्टोरियन मुद्राएँ एक या ज्यादा घड़े में मिलती थी। मेरे यहाँ भी दो घड़े थे। ये दो पीढ़ी पहले तक जमीन में दबी मिलती थीं। क्यों? बस एक ही कारण है, मुद्राएँ पुरखों ने मुगलों, अँग्रेजों के कारिंदों यानी राजा, महाराजा, जमींदार आदि से किसी एवज में स्वीकारी थीं। मेरे पुरखे अपने पूरे कुनबे के साथ वर्त्तमान इलाके में बसने, खेती शुरू करने और क्रमशः लगान देने के एवज में मुद्राएँ लिए होंगे। पर वे नही जानते थे कि इसका करें क्या, सो भविष्य के लिए जमीन में गाड़ दिया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मुद्रा का चलन ही न था। शहरी अर्थव्यवस्था 1947 तक पूरे देश मे कुछ दहाई में थे, 3000 साल पहले की बात ही छोड़ दीजिए।

तो ये कहानियाँ कि देश मे 1000 साल पहले, 7000 साल(वैदिक विद्वानों की माने तो लाखों करोड़ों साल पहले, जब मनुष्य इस धरती पर आया नही था, तब से) पहले राजा होते थे, उनकी प्रजा होती थी, सैनिक होते थे, नगर थे, बनावटी प्रतीत होते हैं। मुद्रा के इतिहास की बात करेंगे तो फिर धातु के निष्कर्षण, परिष्करण के इतिहास की भी बात आएगी और फिर किस काल मे किस क्षेत्र में निष्कर्षण शुरू हुआ? आखिर एक राजा, अपने क्षेत्र के धातु को किसी दूसरे राज्य को उन धातुओं को वैसे ही तो देगा नही, तो फिर वह transaction किस चीज में करता होगा? पूरे भारत मे उन धातुओं के वितरण का साधन क्या होगा और उस की हरेक राज्य में कीमत का आधार क्या इस्तेमाल कर रहा होगा? कोई केंद्रीय अथॉरिटी तो थी नही। फिर उन मुद्राओं को खपाने के लिए देश मे या ज्यादा सही रूप से किसी राज्य में बाजार व्यवस्था का इतिहास क्या है? किराना दुकान तो था नही। ले देकर मेला एक व्यापार का साधन था, जो अँग्रेजों ने शुरू किया। जिसमें मुख्य बिक्री के सामान मुख्यतः दक्षिणी पूर्वी देशों से आयातित मसाले, नारियल, अगरबत्ती, कपूर, सुपारी, सूखे मेवे, श्रृंगार के साधन जैसे सिंदूर, रोड़ी और लोहे के सामान जैसे कृषि के या भाला, तलवार, गड़ासी आदि थे। उससे पहले मुगलों ने मीना बाजार शुरू किया था वो भी केवल ट्रेड रूट के साथ साथ, जो  चकलाघर ज्यादा था, सामान्य वस्तुओं का व्यापार कम। मुख्यतः चटगाँव से दिल्ली का रास्ता जीटी रोड (NH2, अब शायद बदल गया है) और सूरत से दिल्ली का रास्ता NH1 के व्यापारियों के लिए लड़कियों के खरीद फरोख्त का अड्डा था। यह मीना बाजार सराय के आसपास हुआ करता था। जहाँ व्यापारी अपने माल के साथ कुछ समय के लिए रुक सकता था। उसके पहले कौन सी बाजार व्यवस्था थी?

आप नीचे Journey of Indian bureau of Mines का रिपोर्ट देख सकते हैं। साथ मे लगा Indian Journal of History of Science में प्रकाशित History of Mining in India पर आर्टिकल भी देख सकते हैं। जिसमे 1400-1800 AD के बीच भी माइनिंग के शुरू होने में conjecture का ही सहारा लेना पड़ रहा है और कहा गया है कि इनका कोई रेफरेन्स नही है। एक जगह सोने के सिक्के मिलने को सोना के उत्खनन के सबूत के रूप में लिया जा रहा है। लेखकों के कॉमन सेंस की कमी मानी जायेगी कि वह इतना सोच नही पाए कि सिक्के व्यापारियों के माध्यम से यहाँ आ सकते हैं और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में छिटपुट ही मिले हैं। मतलब इतने सारे राज्यों की मुद्रा की जरूरत पूरी करने के करीब होने की बात छोड़ दीजिए, 500 साल से शुरू केवल ट्रेड रूट के व्यापारियों की भी जरूरत पूरी करने लायक नही हैं।


बहे हुओं को छोड़ दें तो हमारे देश के इतिहासकार आपको कुछ भी अंट शंट बताते रहे हैं। ये उस गेंदबाज की तरह हैं, जो ऐसा फेंकता है कि किसी को तो क्या, बल्लेबाज को भी दिखाई नही पड़ता। केवल फेंकने का एक्शन दिखाई पड़ता है। पर, ताली सभी को पीटना है। वाह! क्या फेंका है! क्या फेंका है! हमलोगों की विशेषज्ञता कोई इतिहास तो है नही, तो हमलोग उनके कमअक्ली को ही विद्वता मानने के लिए मजबूर रहे हैं, पर, अब नही!

~राहुल पटेल

Monday, September 2, 2024

उर शब्द

 #आदिकिसान #adikisan #समाज 

बच्चे की बरही के अगले दिन यानी आज मैं पत्नी के साइड से फुआ को उनके गाँव छोड़ने की तैयारी कर रहा था। पत्नी के बहन की बच्ची मेरे पास ही रहती है। मैंने उससे कहा कि "ननियाउर चलबिस?" बोलने के बाद मेरा दो तीन बातों पर ध्यान गया। 


खैर उधर से ही ससुराल भी चला गया। ससुर से इसी बारे में बात हो रही थी। ननियाउर, ददियाउर आदि। अब ये शब्द चलन में नगण्य है। शायद अब कुछ पुरनिया हो बोलते हों। चलन में सबसे ज्यादा नानी गाँव  तथा धीरे धीरे पूर्णतः किताबी शब्द ननिहाल(हिंदी) आ रहा है। 


1. ससुर ने कहा कि रामायण में भी राम के 'ननिहाल' का जिक्र है। आप क्या समझे? (Hint - राम का भौगोलिक क्षेत्र और भाषा थोपना)


2. उर क्या होता है? आज भी दक्षिण भारत मे उर शब्द का प्रचलन पूरे जोरो पर है। उर का मतलब गाँव! यह गाँव शब्द कहाँ का है?


3. हमलोगों से दक्षिण भारत के किन समूहों का संबंध है? 


4. यह कौन सी भाषा है?


https://www.facebook.com/share/p/BVWmacj8GVKe8Phx/?mibextid=oFDknk

Friday, August 9, 2024

बुरे और अच्छे Nudge के अनेकों उदाहरण

 #लाइक_शेयर_और_सब्सक्राइब_ज़रूर_करें  #समाज #ppsm

नज अत्यंत महत्वपूर्ण कांसेप्ट है। आपलोग  इसे कई बार सुने, शेयर करें, गूगल से लेख खोज कर पढ़ें। खासकर dark nudges के बारे में तो जरूर ही जानें। जिस चीज के खिलाफ आप लड़ाई लड़ रहे हैं, उन सभी मे यह छुपे रुप में मिलेगा। हमारे पुरोहितों, किसी भी क्षेत्र में नेताओं, समाजसुधारकों, समाजिक कार्यकर्त्ताओं, किसी भी क्षेत्र में प्रोफेशनल्स आदि को नज को कला के रूप में विकसित करना चाहिए

1. जहाँ जरूरत पड़े, कृपया वीडियो रोककर पढ़िए। Nudge को समझना हरेक व्यक्ति की जरूरत है और बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है कि इस कांसेप्ट को ज्यादा से ज्यादा आम जनमानस में ले जायें

2. हमलोग अपनी जिंदगी में बहुत सारी चीजों का जाने अनजाने अनुभव करते हैं, जिनको किसी कांसेप्ट का रूप दिया जा सकता है। उनको नाम देना या उनको सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित करना हममें उसके प्रति सजगता लाता है और फिर सभी चीजों में हम इस नवचेतन को ढूँढने का प्रयास करते हैं या यूँ कहें कि चीजों को देखने का हमारा नजरिया बदल जाता है। ऐसा ही एक कांसेप्ट है - Nudge/नज

3. Nudge - नज - व्यक्तिगत या सामाजिक तौर पर किसी के आचरण में खास बदलाव, खास भावना उकेरने, खास सोच पैदा करने, खास तरीके अपनाने के लिए उसको/उनको बिना किसी जबरदस्ती के या बिना परोक्ष रूप से कुछ किये या कहे (क्योंकि यह विपरीत प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है) केवल सुझावों या संकेतो से या अवसर के अनुरूप स्थायी या अस्थायी रूप से संसाधन उपलब्ध कराकर प्रोत्साहित करना नज है

4. Nudge के कुछ प्रकार-

1. Anchoring and Adjustment 2. Availability 3. Representativeness 4. Optimism/over-confidence 5. Loss aversion 6. Status quo bias and inertia 7. Framing 8. Temptation 9. Mindlessness 10. Self-control strategies 11. Conforming 12. Spotlight effect 13. Priming 14. Language and signage design 15. Feedback 16. Positioning 17. Limiting 18. Sympathy 19. Accessibility 20. Likeability 21. Relevance 22. Mood-changers 23. Fear 24. Facilitation 25. Sensory

5. Priming - ब्राम्हणवाद से संबंधित चर्चाओं में लोगों को पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन की जानकारी दे सकते हैं। यह एक नज है

6. Availability, Accessibility, Conforming, Facilitation, Framing - इंदिरा गाँधी के समय जनसंख्या नियंत्रण के लिए हम दो हमारे दो का कैंपेन एक नज था

7. Anchoring, Conforming, Representativeness, Feedback - अँग्रेजों के जमाने से सरकारी फॉर्म में धर्म का कॉलम और अब कुछ लोगों द्वारा इसको आपके किसी एक धर्म के होने के सबूत के रूप में पेश करना नज है

8. नज आपके आसपास रोज इस्तेमाल किया जाता है। आप भी करते हैं। पर, इसके बारे में सचेत होकर इसका सही  इस्तेमाल करना या गलत नज को पहचानना दूसरी बात है। गलत नज को पहचानना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि ज्यादातर समय(90%) सरकारों, नीति निर्धारकों, न्यायपालिका, कंपनियों, धार्मिक आध्यात्मिक संस्थाओं, खास उद्देश्य वाले समूहों जैसे आरएसएस, विवेकानंद फाउंडेशन, गीता प्रेस, कुछ जाति समूहों के आईटी सेल, इतिहासकारों, साहित्यकारों, हर तरह के मीडिया समूहों आदि द्वारा आपको खास प्रकार से अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए उत्प्रेरित किया जाता है, जो अंततोगत्वा आपके अहित में होता है।

जब हम इसके प्रति सचेत हो जाते है और कोई छुपे हुए तरीके से हमारा अहित करना चाहता है तो हमारे द्वारा उसकी चालाकी पकड़े जाने और प्रतिकार करने की संभावना ज्यादा रहती है। हालाँकि ऐसा सभी कॉन्सेप्ट्स के बारे में है

9. पूरी प्रचार इंडस्ट्री नज करने में लगी हुई है। हरेक प्रकार का प्रोपेगंडा नज है। आपका टीवी देखना नज करने वालों के हित मे है। आपको लगता होगा कि आप न्यूज़ देख रहे हैं, गाने सुन रहे हैं, फ़िल्म देख रहे हैं, माताजी कोई सीरियल देखकर टाइम पास कर रही हैं और वैसे तो आप नही जानते कि आप नज किये जा रहे हैं, पर जब इसके बारे में आप सचेत हो जायेंगे तो आपको इन चीजों में सड़न दिखाई देने लगेगा। आप देखेंगे कि कैसे language and signage design, availability आदि का इस्तेमाल करके प्रोपेगंडा चलाया जा रहा है। और आप टीवी देखना छोड़ने का विचार करने लगेंगे। आप सोचिए जरा कि आपको हर तरह के न्यूज़ जानने की क्या जरूरत है? वैसे भी किसी चीज के घटित होने के बाद ही आपको न्यूज़ मिलता है। तो किसी खास क्षेत्र में काम कर रहे एक्टिविस्ट द्वारा कोई न्यूज़ इकट्ठा किया जाए और उसके द्वारा आपको और अनेकों अन्य लोगों को sensitize किया जाए तो आपके ऊपर से कितना बड़ा बोझ समाप्त हो जाये। पर, आपको किसी न्यूज़ के छूट जाने का डर (Fear) है। ऐसा नही है कि उन सारे न्यूज़ को जानकर आप बतकही के अलावा कुछ कर सकते है और वो भी उनके नजरिये वाला बतकही। आपका अपना विश्लेषण सतही या नगण्य ही रहेगा। तो, अब आप ही बताईये कि आप टीवी देखने के फेरे में पड़े ही कैसे? आपको इसके लिए भी नज किया जाता है

10. जब आप कोई बात छेड़ते हैं तो अधिकांशतः लोग प्रतिक्रिया स्वरूप जरूर अपनी बात रखते हैं। भाषा की खूबी यह है कि इसका इस्तेमाल आप किसी चीज को जनमानस में ले आने या जनमानस से गायब करने में या अन्य किसी भी स्वार्थसिद्धि के लिए अपने अनुसार कर सकते हैं। यह मनोविज्ञान की बात बदलावकर्त्ता के लिए समझना जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही बाकियों के लिए भी। क्योंकि अधिकांशतः इसका उपयोग आपको गलत दिशा में ले जाने के लिए होता है। पर, इसका उपयोग सही दिशा में अपने लोगों को ले जाने के लिए भी किया जा सकता है। यह भी नज का ही एक रूप है

11. Availability - स्मृति चिन्ह, कैलेंडर नज के ही प्रयास हैं

12. पुष्पा मूवी के डायलॉग्स आम जनमानस में पहुँचना मीडिया के reach/avaiability और लोगों के conforming behaviour को दर्शाता है

13. नज के साथ साथ लक्षित संसाधनों को उपलब्ध कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसके अभाव में नज प्रभावहीन हो जाएगा या जगहँसाई/निराशा का कारण भी बन सकता है।

14. किसी दूसरों की संस्कृति को अपना समझना नज का ही परिणाम है।  वास्तव में आज हमलोग सांस्कृतिक उपनिवेशवाद में जी रहे हैं और ऐसा लिखित किताबों के माध्यम से हुआ। यदि उनमे वर्णित शब्दों के उत्पत्ति और इतिहास को खंगाला जाए तो आप उनमे निहित गलत नज/dark nudges को पकड़ सकते हैं


*देखिए*  https://youtu.be/rmYf5itnRUw?si=8K7Ebfg5kSsvZYvc



*यूट्यूब पर पिछले बैठकों में विचारकों, समाजसुधारकों और संस्कारकों के उद्बोधन सुनने के लिए क्लिक करें* https://youtube.com/@ppsmission?si=U302DJ0rZ5zotmNZ

Friday, July 19, 2024

सोचने के कुछ तरीके

 #आदिकिसान #समाज #concepts 

कुछ दिनों के लिए मुझे इतिहासकारों(शिक्षा या प्रोफेशन से नही, पर उनमे से कुछ लोग इतिहास पर एक से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं) के एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में रहने का मौका मिला। ग्रुप का उद्देश्य था कि इतिहास को नए सिरे से लिखना। 


नही! यह सनातनियों का ग्रुप नही था। जिसके वो सदस्य, जिनका काम केवल गंदे नाली से बॉल निकालने भर का रहता है, सबसे ज्यादा हल्ला करते हैं, कभी कभी क्रिमिनालिटी के हद तक।


ग्रुप अभी नया नया बना था। मैं सब भूतकाल में लिख रहा हूँ, क्योंकि ग्रुप से बाहर आ गया हूँ। ग्रुप अभी है और उम्मीद है कि यह एकाध सदी तक रहेगा।


*उस ग्रुप के मेरे अनुभवों के माध्यम से मैं सोचने के कुछ तरीको पर प्रकाश डालना चाहता हूँ:-*


1. एक सदस्य(शायद अध्यक्ष या संचालक या संयोजक घोषित किये गए थे, मुझे ठीक से याद नही। मैं इस लेख के प्रसंग में संयोजक कह लेता हूँ) ने समय को कालखण्ड में बाँटकर इतिहास लिखने का ब्लूप्रिंट तैयार किया। जिनमे से से कुछ राजा लोगों के कालखण्ड भी शामिल थे। मैंने वेबिनार में आपत्ति जताई कि जब इतिहास में क्या हुआ है, क्या नही, यह हमलोग नए सिरे से खोजने निकले हैं तो ग्रुप में यह आप अपनी तरफ से पूर्वाग्रह क्यों डाल रहे हैं? आपके ऐसा करने से बाकी सदस्य निश्चित रूप से इसी दिशा में सोचना शुरू कर देंगे। उचित यह होता कि पहले ऐसे ही विमर्श हो और जो इतिहास की नई तस्वीर उभर कर आये, उसको कालखण्ड में बाँटा जाए या जैसे करना हो किया जाए। पर, वे पूरे ग्रुप को वेबिनार में भी और बाद में व्हाट्सएप्प ग्रुप में भी एक से ज्यादा बार समझाते रहे कि कितनी मेहनत से उन्होंने यह कालखण्ड तैयार किया है और यह ब्लूप्रिंट कोई थोपा नही जा रहा है। इसको बदला जा सकता है। 


मैं अपनी बात रख रहा था कि ऐसा नही होता है। जब एकबार आप एक खाका खींच देंगे तो ऐसा तभी होगा कि कोई कुछ अलग सोच पाये, जब कोई विषय वस्तु पर एकदम 180० अलग नजरिया रखता हो। अधिकांशतः उसी में थोड़ा बहुत आगे पीछे करके समूह उसी दिशा में आगे बढ़ेगा। खैर बात बनी नही।


यह अत्यंत स्वाभाविक है कि किसी समस्या का समाधान करने के लिए हमलोग एक मानसिक सीमा(mental boundary) तय करते हैं(यहीं से thinking out of the box आया है), क्योंकि बिना इसके चीजें लिक्विड स्टेट में रहती हैं, जो असहजता और भटकाव पैदा करती हैं। यह बात अलग है कि समस्या सीमा से बाहर हो या आंशिक रूप से ही अंदर हो तो समाधान के सही होने पर ग्रहण लग जाता है। यह भी स्वाभाविक है कि दुर्लभ अपवाद के साथ अधिकांश लोग किसी चीज के मौलिक पड़ताल में आलसी होते हैं। यदि कोई जानकारी उन्हें कहीं से मिलती हो तो उसे लेना आसान है, बनिस्पत कि स्वयं ही पहल किया जाए। इन दोनों स्वभाव के चलते इसकी संभावना अत्यंत कम हो जाती है कि सुझाये गए ब्लूप्रिंट से कुछ अलग हो। यह Nudge करना हुआ। आखिर संयोजक महोदय पर वर्गीकरण का compulsion तो नही था। वे चाहते तो ऐसा नही भी कर सकते थे। एक अन्य सदस्य ने महज सुझाव ही तो दिया था(Nudge किया था) और वे स्वयं को इस हद तक समय के कालखण्ड तय करने के लिए जिम्मेवार मानने लगें कि बजाय यह सोचने के कि इसकी जरूरत थी भी कि नही, वे अपने महती प्रयास को समूह के सामने बार बार लाते रहे। यह वही Nudge है, जब देश की जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम के लिए संजय गाँधी के उपाय बदनाम होने लगे तो WHO ने भारत सरकार को ऐसे हिटलरी उपायों के बजाय लोगों को उस दिशा में Nudge करने के लिए सर्वव्यापी 'हम दो, हमारे दो' का नारा, अखबारों, tv चैनेलों पर इसपर विचार विमर्श के कार्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया, जिसका अत्यंत व्यापक प्रभाव पड़ा। लोगों ने सहजता से स्वीकार भी किया। भारत के स्थानीय जनता को चाहे वो कोई भी रीति रिवाज,संस्कृति अपनाते हो, उनको स्वयं को हिन्दू के खाँचे में वर्गीकृत करने के लिए अँग्रेजों के समय से आजतक Nudge ही किया जा रहा है। नतीजा हम सबके सामने है अब हमारी वाली पीढ़ी यह तर्क देती है कि तुम यदि हिन्दू नही हो तो फार्म में धर्म वाले कॉलम में क्या भरते हो? वे यह सोचते ही नही कि यह कॉलम ही Nudge है। वे यह नोटिस नही करते कि यह अनिवार्य कॉलम नही होता और न ही इस सूचना को सरकार कहीं रिकॉर्ड करती है। पूरा बहुजनवाद इसी Nudge पर खड़ा है कि तुम जब ब्राम्हण, वैश्य, क्षत्रिय नही हो तो तुम क्या हो? तुम शुद्र हो। गोया स्वयं को एक काल्पनिक वर्ण के खाँचे में रखना जरूरी है, क्योंकि यह हिंदुओं के धार्मिक किताबों में है। स्पष्ट है कि बहुजनवाद के प्रवर्तक स्वयं हिंदुओं के ठेकेदार हैं और किसान कामगार जातियों को, जो पिछले 100-200 सालों से ही हिन्दू बने हैं, शुद्र या क्षत्रिय के झमेले में डालकर उससे बाहर सोचने से रोक रहे हैं। हर तरह का प्रोपेगंडा Nudge है। यह आपके जीवन मे सर्वव्यापी है। इसे पहचानने की जरूरत है। 


इसप्रकार से संयोजक महोदय जाने अनजाने समूह को Nudge कर रहे थे। जोकि भारत मे राजा सैनिक वाले कथानक/narrative को पहले से ही होना मानकर चलना है। यह पूर्वाग्रह है। पूर्वाग्रह क्या होता है और यह कैसे सोच को प्रभावित करता है। यह अपने आप मे ही विशद विषय है। इसके अलावा यह comprehension की भी समस्या थी


2. वेबिनार के अगले दिन, ग्रुप में इसी संदर्भ में एक सदस्य ने इसपर टिप्पणी की कि ब्लूप्रिंट पर आपत्ति करनेवाला यदि अपना ब्लूप्रिंट नही देता तो वह अपरिपक्व और अव्यवहारिक व्यक्ति है, जो कि मैं था। वे वेबिनार में शामिल नही थे। इसलिए वे यह नही जानते थे कि मैंने यह कहा था कि अभी कुछ समय तक ऐसे ही विमर्श चलने दीजिये और कालांतर में जो समझ उभरेगी तो हमलोग कोई खाँचा पर काम करेंगे। यही वैकल्पिक ब्लूप्रिंट था। यह सब न जानते हुए भी उन्होंने टिप्पणी की। यह एक स्वाभाविक चीज है जो हम सभी गाहे बगाहे स्वयं करते हैं या इसका सामना करते हैं। यदि कोई बात रखी जायेगी और श्रोता को मौका मिले तो वह अपनी समझ जरूर प्रस्तुत करेगा। वह इसका compulsion महसूस करता है। जबकि बिना संदर्भ के उस बात को सही से समझने की संभावना नही भी हो सकती है। आपका कोई दोस्त कुछ समस्या बताये तो आप  प्रतिक्रिया जरूर देते हैं। जबकि प्रतिक्रिया के pre-mature होने की संभावना है। ब्याही बेटी यदि माँ से अपने परिवार की कोई बात कहे तो माँ उसको जरूर कोई उपाय सुझाएगी, जो कि बहुत बार उटपटांग हो जाता है और नए परिवार में केतु अनुभव पैदा करता है। शिकायत करने वाला तो मामले को अपने तरीके से बताएगा ही। पूरा न्यायतंत्र इसी पर कायम है कि दोनों पक्षो को सुना जाए और बातों को तौल कर न्याय किया जाए। यही प्रतिक्रिया है कि 'बिना माँगे सलाह' या किसी बीमारी का नुस्खा या वैसे भी किसी समस्या का समाधान पूरी दुनिया मे आसानी से उपलब्ध है। यह परिस्थिति के अनुसार सही गलत हो सकता है। इसे पहचानने की जरूरत है


3. इस वाकये से भी मजेदार बात यह थी कि कुछ दूसरे सदस्य जो वेबिनार में शामिल थे वे भी मुझसे वैकल्पिक ब्लूप्रिंट की माँग कर रहे थे अन्यथा विवाद न बढ़ाने का सलाह दे रहे थे। मेरे स्पष्ट रूप से विकल्प देने के बावजूद उनके मन मे ब्लूप्रिंट की जो छवि बनी हुई थी, मेरा विकल्प उसके अनुरूप न होने के कारण वे इसको comprehend नही कर पाए। यह selective approach पूर्वाग्रहों के कारण आता है। जहाँ आपको सामने लिखी/कही बात भी सुनाई नही पड़ती। मेरे एक बड़े भाई सेवानिवृत प्रधानाध्यापक हैं। मैंने कई बार यह नोटिस किया था कि कुछ पढ़ना हो तो कुछ शब्दों को miss कर देते थे और कुछ शब्दों के जगह अपने शब्द लगाकर पढ़ते थे। एकदिन मैंने उनको यह बात बताई तो वे नाराज हो गए और कहने लगे कि नजर कमजोर होने के कारण ऐसा हो रहा है। मैंने उन्हें समझाया कि अगर ऐसा होता तो उन्हें सभी शब्दों में कठिनाईयाँ होतीं। selective क्यों? वे खासकर संबंधवाचक शब्दों में ज्यादा गलतियाँ करते थे। मेरा कहना था कि बात दरअसल यह है कि वाक्य पढ़ते समय आपके दिमाग मे है कि आगे ऐसा शब्द आएगा(अपेक्षा, पूर्वाग्रह) और वहाँ पर कुछ दूसरा शब्द आने के बावजूद आप अपनी reality गढ़ रहे हैं। इसपर वे और नाराज हो गए। तो, पूर्वाग्रह के कारण comprehension में selective approach से समस्या को पहचानने की जरूरत है


4. क्रमशः ग्रुप में एक सदस्य ने समसवारों पर एक लेख लिखा। जिसमे उन्होंने खत्तीय, राजा सैनिक, कुर्मियों के नदी किनारे ही बसना आदि 11 शब्द/शब्दावली प्रयोग किये, जिसको मैंने उद्धरित करते हुए लिखा कि इन सभी पर विमर्श करना चाहूँगा, लेकिन अनेकों दिन लग सकते हैं। मैंने यह भी कहा कि हमलोगों को सुनी सुनाई बातों/साहित्य या इतिहास की किताबों, जो कि 99% मामलों में महज मूल किताब की नकल रहती हैं, से सीधे सीधे quote करने के बजाय अनेकों भिन्न स्रोतों से पड़ताल करने चाहिए। क्या सही हो सकता है और किस चीज के मनगढ़ंत होने की संभावना है, इसपर विचार कर ही शब्दों/कथानकों को अपनाना चाहिए। उन स्रोतों का सहारा लेने की मजबूरी यह है कि हमलोग समय मे पीछे नही लौट सकते।


मेरा मानना है कि हरेक गैर सामान्य शब्द/शब्दावली का महत्व है। वह किसी कथानक को ध्वस्त कर सकता है या आगे बढ़ा सकता है तो नए सिरे से इतिहास लिखने वाले ऐसे ग्रुप में इस चीज का महत्व और भी बढ़ जाता है कि आप हर गैर सामान्य शब्द को नाप तौल कर लिखें और challange किये जाने पर उनको साक्ष्यों से प्रमाणित करें। होना यह चाहिए।


पर, मेरी बात पर ये सदस्य अत्यंत ही क्रोधित हुए। उनका कहना था कि उनका लेख उनके अपने विचार थे। कहीं किसी किताब से  नही लिया गया था। मैं उनकी मौलिकता पर सवाल खड़ा कर रहा हूँ और मुझे माफी माँगनी चाहिए और भी अन्य क्रोधित बातें।


विमर्श को दिशा देने के लिए मैंने खत्तीय, जिसका अर्थ वे खेत का मालिक बता रहे थे, पर उनके मौलिक विचार जानने चाहे। वे और क्रोधित हुए। तो मैंने चंद वाक्यों में अपना विचार रखा कि खत्तीय क्षत्रिय से कैसे आया है और दिखाया कि इसीतरह से वे भी अपने मौलिक विचार रख सकते थे। पर अब इतना ही बता दें कि खत्तीय पर आपके विचार मौलिक थे या नही। मेरा अभिप्राय स्पष्ट था कि सभी किसी न किसी स्रोत/स्रोतों से ही जानकारियाँ इकट्ठा करते हैं। पर, उसके बाद केवल अच्छा लगने या नवीनता के आधार पर शब्द को अपनाया गया या उसपर विचार किया गया कि कही गयी बात असत्य भी हो सकती है? यह परिस्थिति पहचानने की जरूरत है।


ये सदस्य भी एक बार कहे कि आप कहाँ 11 बिंदुओं पर विमर्श कर रहे हैं। जबकि मैंने कहा था कि इसमें कईएक दिन लगेंगे(comprehension की समस्या)। मेरे  मौलिकता वाले बात का जवाब उन्होंने कहीं से खत्तीय का पाली में परिभाषा उठाकर दिया, जिसमें 2 परिभाषा थे और दोनों खत्तीय को क्षत्रिय बता रहे थे। स्पष्ट रूप से उन्होंने खत्तीय का अर्थ खेत का मालिक कहीं और से लिया था और अब हड़बड़ी में कुछ अलग प्रमाण दिखा रहे थे। यहाँ पर उन्हें यह सहजता से स्वीकारना चाहिए था की उनके द्वारा ग्यारहों शब्द/शब्दावली कहीं से उठाए गए थे, जिससे वे किसी तरह से सहमत तो थे, पर, उन्होनें उसके सही गलत का कोई चिंतन नही किया था। ये बात वे कभी नही स्वीकारेंगे और सामान्यतः कोई नही स्वीकारेगा।  हर बात पर अपना चिंतन न होना सामान्यतः स्वीकार्य भी है। यदि हर चीज को संदेह के घेरे में लेकर चला जाये तो हरबार शून्य से शुरू करना पड़ेगा और मनुष्य primitive stage में चला जाएगा। पर, यह एक sweeping statement है। जब ग्रुप इतिहास को नए सिरे से लिखना चाहता है तो इस criticality की अति आवश्यकता है। यह इतिहास के वर्त्तमान कथानकों में insight दे सकता है। हरेक संज्ञा, विशेषण आदि की पड़ताल इतिहास की समझ मे एक नया ट्विस्ट ला सकता है। इन दोनों को भी पहचानने की जरूरत है


5. अब तक मैं अपने प्रति ग्रुप में लोगों की असहजता महसूस करने लगा था। कुछ लोग स्थिति को सँभालने के लिए प्रयास करने लगे थे। एक सदस्य ने कहा कि ग्रुप के बजाय जब आमने सामने बैठक होगी तो विमर्श करना ज्यादा अच्छा होगा। written से verbal communication ज्यादा अच्छा होता है। मैंने कहा कि ऐसा नही है। दोनों के अपने pros cons हैं। verbal में कम समय मे ज्यादा बात रख सकते हैं, पर कौन कौन सी बात कही गयी, जिनपर प्रतिक्रिया देनी है, याद नही रखा जा सकता। जब बात हर शब्द/शब्दावली को तौलने की है तो written ज्यादा बेहतर है। यह पहचानने की जरूरत है।


खैर मेरी यह बात ग्रुप में बन गए माहौल को सुधारने में कहीं से भी उपयोगी नही था, क्योंकि एक और सदस्य की बात काट दी गयी थी। यहाँ पर आप यह देख सकते हैं कि मैं भी प्रतिक्रिया देने वाले सामान्य प्रवृति का शिकार था। मैं यह समझ रहा था और मुझे अलग से फ़ोन करके समझाया भी जा रहा था। पर मैं गलत या सही इस बात पर अड़ गया था कि इस बार जो इतिहास लिखा जाए तो वह अत्यंत ही competitive हो और उसमें शब्दों को हल्के में न इस्तेमाल किया जाए। सदस्य भी इतने competitive हों कि कही गयी बात को साक्ष्यों से corroborate करें, सहजता से challange स्वीकार करें


5. एक अन्य सदस्य बीच बीच मे अगड़ा पिछड़ा की मानसिकता का रोना रो रहे थे कि पिछड़ों की मण्डली में ऐसा ही होता है। आपस मे ही लड़ने लगते हैं। मैंने लिखा कि तथाकथित अगड़े अँग्रेजों से नजदीकी के कारण जमीन जायदाद, सोच और सामाजिक पूँजी में समृद्ध है। पर, यह विरासत धूमिल हो रही है। जैसे जैसे तथाकथित पिछड़े इन सभी मामलों में समृद्ध हो रहे हैं, अगड़ों के मेरिट की पोल पट्टी खुल रही है। ews आरक्षण ने तो स्थिति एकदम स्पष्ट कर दिया है। इनमे यदि काबिलियत होती तो भारत ही नही विश्व मे अनेकों क्षेत्रों में इनका डंक बज रहा होता। भारतीय समाज मे जो बकलोली है, इन्हीं के द्वारा फैलाई गयी है। यह इनका षड्यंत्र नही है, बल्कि ये इतना ही सोच सकते हैं। 


यदि किसी को लगता है कि हमारे अगड़ा पिछड़ा का कारण materialistic न होकर हमारी सोच-विचार की अक्षमता है तो फिर हमें पिछड़ा रहना ही चाहिए। यह पहचानने की जरूरत है


6. इसके कुछ समय बाद एक सदस्य ने ग्रुप में लिखा कि 0 ad से 1000 ad (या शायद 1100 ad) तक कोई commercial खेती नही थी। लोग अपने लिए उपजाते थे। उसके बाद राजा सैनिकों का समय आया और वे लोगों से कर वसूलने लगे। इसपर मैंने लिखा कि आप एकदम सही बोल रहे हैं। आखिर सिंचाई के साधन तो थे नही कि व्यापक पैमाने पर खेती किया जाए। चारों ओर जंगल थे। लोगों की आवश्यकताएँ अत्यंत सीमित थीं। अपने लिए उपजाते थे। बेचते किसको। कोई बाजार भी नही था। हरेक गाँव/ कबीलाई समूह अपने आप मे स्वतंत्र आर्थिक इकाई था। पर 1850 के लगभग जब अँग्रेजों ने सिंचाई के लिए नहरो की उपयोगिता देखी और ग्राहक वे स्वयं थे तो जंगल साफ होने लगे, लोगों का समूह परिवार सहित नए क्षेत्रों में जाने लगा। 


फिर राजा, प्रजा और सैनिक का अस्तित्व आप सैनिकों को दिए जाने वाले वेतन, मुद्रा, मुद्रा की धातु, उसका निष्कर्षण, परिष्करण, मुद्रा को खर्च करने के लिए बाजार, स्वयं को राजा कहें कि महाराजा कि जमींदार यह सब तय कैसे होता था या कौन करता था (और बातें भूल गया हूँ) आदि के आधार पर समझाइए।


इसके जवाब में उन्होंने कहा कि 15वीं शताब्दी से राजा, सैनिक, कर वसूलने वाली बात शुरू हुई। मैं ठीक से पढ़ा नही कि उन्होंने अपने दोनों मैसेज delete कर दिए। साथ मे उन्होंने यह कहा कि मैं दोनो मैसेज हटा रहा हूँ, आमने सामने के बैठक में देखेंगे।  ये पाँचवें व्यक्ति थे।


निश्चित रूप से अब सिर के ऊपर से पानी गुजर रहा होगा तभी संयोजक महोदय ने यह कहा कि इस ग्रुप में कुछ सदस्य ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। यह अपमानजनक मालूम पड़ा। हालाँकि इस ग्रुप में ऐसा करने वाले ये तीसरे ऐसे व्यक्ति थें। मैंने पाया कि अधिकांश सदस्यों की समझ stable हो गयी है और मुझे इसे unstable नही बनाना चाहिए। इसलिए 2 सप्ताह की इन वार्ताओं के अंदर ही मैंने विदा ले लिया।


~राहुल पटेल


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Tuesday, May 14, 2024

प्रिंटिंग प्रेस की भारतीय कहानी और उसका पोस्टमार्टम

 #समाज #आदिकिसान 

व्हाट्सएप्प पर आरएसएस का "गर्व करो" एजेंडा के तहत लिखा फॉरवर्डेड लेख(प्रिंटिंग प्रेस की कहानी) और उसका पोस्टमार्टम:

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*भारत का पहला प्रिंटिंग प्रेस कब और कहाँ पर खुला?*

1674–75 में देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस गोवा में खोला गया था जिसमे केवल बाइबिल की पुस्तक छपती थी।

भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस कहां स्थापित हुई थी?

भारत में प्रिंटिंग प्रेस का प्रचलन करने वाला प्रथम व्यक्ति कौन था?

पहला प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने क्या था?

प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया?

15 वीं सदी में यूरोप में शब्द जब मुद्रित हुआ तो उसने मनुष्य की दुनिया को हमेशा के लिये बदल दिया। एक नए समय ने जन्म लिया। सामान्य जन तक पुस्तकों का प्रसार, स्वतंत्रता का बोध और लोकतांत्रिक चेतना का उदय। रोमन सम्राज्य में जर्मन जोहन्स गुटेनबर्ग ने 1440 में प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया था और उसी के साथ यूरोपियन रेनेसां और आधुनिक युग का उदय हुआ था।

भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस

चकित कर देता है यह जानना कि हमारे इस बम्बई शहर में भी पहला प्रिंटिंग प्रेस 17वीं सदी में ही स्थापित हो गया था और वह भी एक भारतीय द्वारा। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी का कारोबार अभी यहां ठीक से फैला नहीं था। इस शहर में बीते समय के किस्से बिखरे पड़े हैं लगभग रहस्य कथाओं की तरह।

बम्बई में यह प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक व्यापारी ने लगाया था। सूरत निवासी भीमजी पारिख के भीतर एक नये युग का सपना था और एक अद्भुत जुनून। उनकी यह कहानी खासी दिलचस्प है। यह सच है कि बम्बई में इस प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना से पहले 16वीं सदी में भारत के तटीय इलाकों में ईसाई धर्म प्रचारकों के मार्फत मुद्रण टेक्नोलॉजी का प्रवेश हो चुका था पर उनके उद्देश्य दूसरे थे। ये ईसाई धर्म प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिये बाइबिल की छपी हुई प्रतियां लेकर यहां आते थे। गोवा में उन्होंने देश का पहला प्रिंटिंग प्रेस जरूर खोला पर केवल बाइबिल की प्रतियां छापने के लिये। भीमजी पारेख ने बम्बई में 1674-75 में जब अपना प्रिंटिंग प्रेस खोला तो उनका वह प्रेस अपनी परंपरा की स्मृति और सामूहिक बोध के प्रसार के लिये एक नए युग की वास्तविक शुरुआत थी। यह उल्लेखनीय है कि अभी किताबें छपनी शुरू नहीं हुई थीं। भारत में किसी समाचार पत्र की शुरुआत भी अभी नहीं हुई थी।

भीमजी पारेख ने अपनी छापेखाने की यह मशीन यूरोप से आयात की थी। वे उसे सूरत में लगाना चाहते थे। इतिहासकार मकरंद मेहता अपनी पुस्तक 'इंडियन मर्चेंट ऐंड इंटर्प्रिनर्स इन हिस्टोरिकल पर्सपेक्टिव' में लिखते हैं कि 'भीमजी पारेख ईस्ट इंडिया कंपनी के लिये एक कमीशन एजेंट थे और सिक्कों के विनिमय का कारोबार करते थे। कंपनी ने उनकी सेवाओं से प्रभावित होकर उन्हें एक मैडल और सोने के चेन भी प्रदान किए थे, जिसकी कीमत 1683 में 150 शिलिंग थी।'

ईस्ट इंडिया कंपनी का हेड क्वार्टर तब सूरत में था। सूरत मुगल शासन के अधीन था और ओरंगजेब द्वारा गैर-मुस्लिमों पर लगाये गए जजिया कर से सूरत के व्यापारी परेशान थे। 1674 में भीमजी पारेख 800 हिंदू और जैन बनियों के एक दल को लेकर सूरत छोड़कर बम्बई चले आए। उन्हीं दिनों गेराल्ड औंगियार को ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1675 में सूरत की फेक्टरी का अध्यक्ष और बम्बई का गवर्नर नियुक्त किया था। उसी दौर में बम्बई का टापू एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हो रहा था। औंगियार ने सूरत के व्यापारियों और कुशल कारीगरों को धंधे-व्यापार के लिये बम्बई आकर बसने का न्यौता दिया था। परिणामस्वरूप बहुत सारे पारसी, अर्मेनियन, बोहरा, यहूदी, गुजराती और जैन बनिये और ब्राह्मण सूरत और दीव से बम्बई चले आये थे। बम्बई का एक बहु सांस्कृतिक स्वरूप उभरने लगा था। अंग्रेज गवर्नर ने डोंगरी से लेकर मेंढम्स पॉइंट (वर्तमान में लॉयन गेट) तक के इलाके को एक दीवार से घेरने की विस्तृत योजना बनाई। भारत में यह आधुनिक नगरीकरण का पहला प्रयास था। इसी के साथ इस शहर में बड़े भवन बनने लगे। बंदरगाह विकसित हुआ। 1670 में औंगियार के प्रयासों से ही पहली बार बम्बई में टकसाल स्थापित हुई।

जे. बी. प्रिमरोज 'ए लडंन प्रिंटर्स विजिट टू इंडिया इन सेवेन्टींथ सेंचुरी' में लिखते हैं कि भीमजी पारेख ने बम्बई प्रांत के तत्कालीन गवर्नर गेराल्ड औंगियर से यह अनुरोध किया था कि वे छपाई की मशीन के साथ एक ऐसा विशेषज्ञ भी यहां बुलाना चाहते हैं जो ब्राह्मी लिपि (आधुनिक देवनागरी) के मैटर को छाप सके और वे इसके लिये उस विशेषज्ञ को तीन वर्षों तक सालाना 50 पाउंड का पारिश्रमिक देने को तैयार हैं।'

भीमजी के अनुरोध पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने हेनरी हिल्स नामक एक मुद्रण विशेषज्ञ को यहां बुला भेजा। ब्राह्मी लिपि के लिये टाइप अक्षरों को गढ़ने का काम शुरू हुआ। हालांकि हेनरी विल्स के पास भारतीय लिपि में टाइप फॉन्ट काटने की पूरी निपुणता नहीं थी। भीमजी ने इसके लिये कंपनी से अक्षरों की कास्टिंग करने वाले टाइप फाउंडर को मंगवाने का अनुरोध किया। वे ब्राह्मी लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, पांडुलिपियों को ताड़पत्रों की कैद से निकालकर कागज की दुनिया में उतारना चाहते थे। इधर कंपनी को यह लगता रहा था कि भीमजी बाइबिल की प्रतियों को अपने यहां देवनागरी में छापेंगे और ईसाई धर्म के प्रचार मे मदद देंगे। बम्बई में यह दो सांस्कृतिक परिवेशों का पहला टकराव था। एक विवाद पैदा हो गया। हेनरी हिल्स काम अधूरा छोड़ कर लौट गया। भीमजी पारेख ने करारनामा तोड़ने के आरोप में उस पर कानूनी मुकदमा दायर कर दिया। कंपनी ने उसकी जगह दूसरे किसी विशेषज्ञ को बुलाने का कोई इंतजाम नहीं किया। इंग्लैंड से अक्षरों की कास्टिंग करने वाला कोई टाइप फाउंडर यहां नहीं आया। भीमजी ने स्थानीय लोगों से यह काम करवाने की कोशिशें कीं पर परिणाम संतोषजनक नहीं थे। इन लोगों को इस काम का कोई अनुभव नहीं था। पारेख मृत्यु पर्यंत देवनागरी में छपाई शुरू करने के इस अभियान में लगे रहे। तरह-तरह के अवरोधों से लड़ते रहे। उन्होंने अपना बहुत सारा धन भी इस पर खर्च कर दिया था पर उनका वह सपना पूरा नहीं हुआ। मकरंद मेहता अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि योरोपीय लोग यहां स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित करना ही नहीं चाहते थे। वे जानते थे कि यदि ऐसा करेंगे तो उन्हें देसी प्रतिभा से स्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ब्राह्मी लिपि में भारतीय ग्रंथों को छापने का भीमजी का वह सपना उनके जीवन काल में अधूरा रह गया। अलबत्ता रोमन लिपि में बहुत सारी चीजें इस प्रेस में मुद्रित होती रहीं।

1680 में भीमजी मेहता के निधन के कई वर्ष बाद अंग्रेजी के टाइपोग्राफर और भारतविद चार्ल्स विल्किन्स ने देवनागरी के फॉन्ट बनाये और 1805 में जो पहली पुस्तक देवनागरी में मुद्रित हुई वह 'भगवत गीता' थी। आज हम एक डिजिटल युग में हैं। साइबर संस्कृति और पेपरलैस कामकाज के इस जमाने में आज की युवा पीढ़ी को छापेखाने और टाइपसेट फाउंड्री की वह संस्कृति, उसके लिये किया गया संघर्ष और मुद्रित शब्द का वह पुराना दौर शायद एक मिथकीय समय लगे। लेकिन आरम्भिक वुडब्लॉक प्रिंटिंग से लेकर मेटल टाइप, रोटरी प्रेस, लिथोग्राफी, ऑफसेट प्रिंटिंग, स्क्रीन प्रिंटिंग, लेजर प्रिंटिंग तक होते हुए आज डिजिटल प्रिंटिंग और थ्री-डाइमेंशन प्रिंटिंग तक पहुंची हमारी यह यात्रा सभ्यता, नगरों के विकास, संस्कृतियों के बदलाव और कार्य शैलियों में उलटफेर की यात्रा भी है। भीमजी पारेख की तरह की कितनी ही गाथाएं इसमें छिपी हुई हैं।


पोस्टमार्टम:-

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यह अपने कहाँ से उठा लिया है। अधिकांश वाक्य केवल दम भरने वाले और विरोधभाषी है।

जैसे

  1. शुरू में कुछ देर तक लेख दावा कर रहा है कि पहला प्रिंटिंग प्रेस 1674-75 में एक भारतीय ने खोला, पर छठे पैराग्राफ में कह रहा है कि "यह सच है कि......"। ज्ञात हो कि भारत मे पहला प्रिंटिंग प्रेस लगभग 500 साल पहले सन 1500 में आ चुका था
  2. इस लेख में भीमजी पारेख के नए युग का सपना, अद्भुत जुनून, परंपरा की स्मृति, सामूहिक बोध का प्रसार आदि खूब गैस भरा है। लेकिन जब भारत के इतिहास के रचयिता ही अँग्रेज थे तो कौन सा इतिहास, कौन सी परम्परा और उन्हें पढ़ते कौन लोग, 1870 में साक्षरता दर ही 3% थी। यह भी की ये 3% भी फ़ारसी उर्दू वाले ही थे। हिंदी अभी बनी नही थी, संस्कृत इस देश मे आयी नही थी। 50 साल पहले तक तो उर्दू जानने, पढ़ने, लिखने वालों खासकर कायस्थों(बस अँग्रेजों, मुगलों के साथ आये लोग, बाकी 98% जनता को कोई मतलब नही था) की बहुत पूछ थी, क्योंकि उर्दू के पहले भारत मे भाषाएँ तो थी, कोई स्क्रिप्ट ही नही था (ब्राम्ही, देवनागरी कुछ नही, लिखने पढ़ने का कोई चलन ही नही था)
  3. कृपया ब्राम्ही लिपि में लिखे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पोथियों, ताड़पत्र वाले पांडुलिपियों के भारत मे कहीं मिलने के सबूत पेश कीजिये
  4. दो सांस्कृतिक परिवेशों का टकराव अच्छी सनातनी भावना जगाता है और पारेख जी को सावरकर की तरह देशभक्त साबित करता है। करारनामा के विवाद का टकराव संस्कृति का टकराव हो गया!
  5. पारेख मृत्युपरांत देवनागरी में छपाई में लगे रहे, uhhh! लेखक को लिखते समय थोड़ा विवेक बरतना चाहिए। यदि यह typo मान भी लिया जाए तो प्रेस शुरू करने में ही पारेख जी को तकनीकी दिक्कत आ रही थी, लेकिन वे देवनागरी(1796 में बनी) में छपाई शुरू कर दिए
  6. यदि यूरोपियन लोग स्थानीय लोगों को किसी भी नई कला में प्रशिक्षित नही करना चाहते तो वे पारेख को प्रेस बैठाने में इतना जद्दोजहद ही नही करते। देशी प्रतिभा से यूरोपियन लोगों को प्रतिस्पर्धा का डर था, एक दम हास्यास्पद बात है। 
  7. रोमन लिपि में उनके प्रेस से बहुत सारी चीजें मुद्रित हुईं। ज्ञात हो कि उनके प्रेस से किसी भी लिपि में छपी एक भी पुस्तक का कहीं कोई रिकॉर्ड नही है

कुछ और बातें! यहाँ हिन्दू लोग कौन हैं, अच्छा विवरण दिया है।

जॉन गिलक्रिस्ट ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम्स में बैठकर 1796 में अपने supervision में देवनागरी बनवाया। तब जाकर 1805 में अंग्रेजों द्वारा बैठाए गए प्रेस "गीता प्रेस" से गीता छपी और अँग्रेजों तथा भारत सरकार के अथक प्रयास और अरबों खरबों रुपया बहाने के बाद भी 200 साल के बाद 2011 की जनगणना के अनुसार मात्र 26.11% लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करते हैं।

पूरा लेख आरएसएस का "गर्व करो" एजेंडा के तहत लिखा गया लगता है।

~राहुल पटेल

Wednesday, May 8, 2024

EWS और 10% सामान्य श्रेणी वाले उम्मीदवारों के लिए 50% आरक्षण को समझिए

 #समाज

आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर किया गया है, वैसे कारण जिनसे केंद्र/राज्य के अधीन सेवाओं या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में किसी जाति या वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो। यहाँ पिछड़ेपन के व्यक्ति आधारित आकलन के बजाय जातिगत या समूह आधारित इसलिए है कि ऐतिहासिक रूप से ऐसे समूह कुछ अपवादों के बावजूद सरकार के तीनों अंगों में हाशिये पर रहे हैं या फिर हैं ही नहीं। उचित प्रतिनिधत्व की यह कमी एक लोकतांत्रिक सरकार की परिकल्पना से बाहर की चीज है।

इस प्रावधान में आर्थिक आधार को क्यों नही शामिल किया गया या केवल आर्थिक आधार ही क्यों नही रखा गया, तो, सामाजिक या/और शैक्षणिक रूप से मजबूत जन समूहों की जातिगत सामाजिक पूँजी अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है, जिसके आर्थिक पूँजी में बदलने की संभावना ज्यादा रहती है। मसलन, ऐसे लोगों की नौकरी लगना, इनके उद्यम को आसानी से ट्रैक्शन/traction मिलना आदि। सामाजिक पूँजी व्यक्तिगत सामाजिक नेटवर्क को भी बढ़ाता है, जिससे किसी अटके हुए काम के आसानी से होने और उसमें कम खर्च होने की संभावना ज्यादा रहती है। इससे ऐसे समूह के सदस्यों पर आर्थिक बोझ कम पड़ता है। सरकार के हरेक अंग में इनका अनुचित रूप से ज्यादा हिस्सेदारी सरकार के नीति निर्माण में इनके दृष्टिकोण की स्पष्ट छाप के रूप में दिखता है, जो, पुनः इनके आर्थिक स्थिति को मजबूत करता है। इस तरह से जातिगत सामाजिक पूँजी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है और किसी जन समूह की सामाजिक तथा शैक्षणिक स्थिति उसके जातिगत सामाजिक पूँजी को प्रभावित करता है। 

तो, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त जन समूह की आर्थिक स्थिति कभी भी ठीक होने की प्रायिकता अशक्त जन समूहों के अपेक्षा ज्यादा है। इसके उल्टा, किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति व्यक्तिगत स्तर पर कभी भी खराब हो सकती है। पर, उसकी जातिगत सामाजिक स्थिति या शैक्षणिक स्थिति में बदलाव सैकड़ों साल में आ सकती है। अतः तार्किक आधार पर, कुल मिलाकर किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को केंद्र/राज्य द्वारा affirmative action के तहत आरक्षण का आधार नही बनाया जा सकता, केवल सामाजिक और शैक्षणिक स्तर को ही आधार बनाया जा सकता है।

फिर भी EWS को "आर्थिक आधार पर आरक्षण" की तरह सरकार, विशेषज्ञों और पक्ष-प्रतिपक्ष नेताओं द्वारा प्रचारित किया गया। उपेंद्र कुशवाहा(कोइरी) जैसे बिहार के अग्रणी नेता ने जब EWS को केवल सवर्णों के लिए बताया तो जदयू नेता जयकुमार सिंह(राजपूत) ने उपेंद्र कुशवाहा को फटकारते हुए इसे सभी जातियों के गरीबों के लिए बता दिया। उपेंद्र कुशवाहा को अपनी बात से पीछे हटना पड़ा। यह घटना मीडिया में प्रकाशित समाचारों के आधार पर है। https://www.google.com/amp/s/www.bhaskar.com/amp/local/bihar/patna/news/jdu-vs-jdu-on-upper-caste-reservation-130617489.html
"आर्थिक आधार पर कमजोर वर्गों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के मसले पर बड़ा बयान देते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि पचास फीसद की सीमा इस आरक्षण से टूट गई है। उन्होंने आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग करते हुए कहा कि अभी तक मात्र 10 प्रतिशत आरक्षण ही जातीय आधार पर दिया गया है। उन्होंने कहा कि इसमें सबको शामिल किया जाता, ऐसा नहीं है।"
https://navbharattimes.indiatimes.com/state/bihar/patna/bihar-differences-in-jdu-over-10-ews-quota/articleshow/95872274.cms

ज्ञात हो कि दोनों नीति निर्धारक रह चुके हैं। तब भी जयकुमार सिंह ने यह भ्रम फैलाया है और उपेंद्र कुशवाहा ने उस भ्रामक बयान पर पीछे हटकर सही होने का ठप्पा लगाया है।

यदि आप भी EWS आरक्षण को आर्थिक आधार पर समझते हैं तो क्या यह सभी आर्थिक रूप से गरीब नागरिकों के लिए (जाति और धर्म से इतर) है? यदि यह कुछ ही जातियों के गरीबों के लिए है तो इसे "आर्थिक आधार" जैसा व्यापक शब्दावली से संबोधित नही किया जा सकता। बल्कि EWS के लिए "जाति आधारित" शब्दावली सर्वथा उपयुक्त है।

आरक्षण का मूल तर्क यदि यह है कि वैसे जनसमूह जो केंद्र/राज्य के अधीन सेवाओं या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नही पाए है उनको आरक्षण दिया जाए। क्या EWS आरक्षण का लाभ पाने वाले सवर्णों के बारे में प्रतिनिधित्व नही होने की बात कही जा सकती है? निश्चित रूप से नही! या आय सीमा 8 लाख रु से कम अर्जन करने वाले सवर्ण सरकारी नौकरियों या उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में उचित रूप से हिस्सेदारी नही पाए हैं? अनौपचारिक रूप से वे अनुचित रूप से ज्यादा ही हिस्सेदारी पाए हैं, वैसे सरकारों के पास ऐसा कोई आँकड़ा नही है। तो, फिर किस आधार पर ऐसे आरक्षण को सहमति दी गयी या जातीय जनगणना के अभाव में किस आधार पर आरक्षण की 10% संख्या तय की गई? वास्तविकता यह है कि सवर्णों की कुल आबादी ही 10% के आसपास है। यह एकमात्र आधार मालूम पड़ता है।

अब जब इसे संविधान में जगह दे ही दी गयी है तो सवाल उठता है कि कई केंद्र/राज्य सेवाओं और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पदों को भरते समय इस प्रावधान के समझ मे अंतर क्यों आ रहा है?  संविधान के अनुच्छेद 16 के कुछ खंड जो EWS आरक्षण से संबंधित हैं, इसप्रकार हैं:-
"16(6): इस अनुच्छेद की कोई बात, राज्य को वर्तमान आरक्षण के अतिरिक्त तथा प्रत्येक प्रवर्ग में पदों के अधिकतम दस प्रतिशत के अध्याधीन, खंड (4) में उल्लिखित वर्गों से भिन्न नागरिकों में से आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई भी उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी”

"16(4): इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े वर्ग के नागरिको के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदो के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।“

16(4A): इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओ में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओ में आरक्षण [प्रोन्नति के मामलो में, किसी स्तर या स्तरों के पदो पर, पारिणामिक ज्येष्ठता सहित] के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।“
इन्हीं तीनों प्रावधानों के आधार पर उच्च न्यायालय, मध्य प्रदेश ने यह आदेश पारित किया है कि
- EWS OBC, SC, ST समूहों के लिए नही है और
- इसे किसी भी रिक्तयों के अनारक्षित सीटों का ही 10% दिया जा सकता है।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का EWS पर आदेश हिंदी में
https://t.me/c/1197024698/2145/2893
Order of MP High Court on EWS in English
https://t.me/c/1197024698/2145/2894

उपरोक्त प्रावधान के इस समझ के इतर कोई दूसरा समझ संविधान सम्मत नही है, इसलिए गैर कानूनी और दंडनीय है।

पर, बात यही खत्म नही हुई है। जब बात आरक्षण की हुई है तो उसको लागू करने के तरीकों के परिणामों के अंतर पर भी गौर कीजिए।

  • एक तरीका यह हुआ कि उम्मीदवार किस वर्ग से है, इसकी परवाह किये बिना पहले अनारक्षित श्रेणी के सीटों को मेरिट के आधार पर भरा जाए। इसके बाद ही आरक्षित सीटों को भरा जाए।
  • दूसरा तरीका यह है कि आरक्षण वाली जातियों के लोगों द्वारा जाति का सर्टिफिकेट लगाने पर मेरिट की परवाह किये बिना केवल आरक्षित श्रेणी में ही विचार किया जाए। इस तरह से 10% जनसंख्या वाली सामान्य श्रेणी की जातियों के लिए स्वतः ही 50% आरक्षण मिल जाएगा और आरक्षण कहलायेगा भी नही। पर, यह राज्य सेवाओं और उच्च शिक्षण संस्थाओं में मेरिट को जगह देने और सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध होगा।
याद रखिये आरक्षण सरकार द्वारा एक affirmative action है, सामाजिक संरचना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए मेरिट की भावना के विरुद्ध नही माना जायेगा।

ज्यादातर मामलों में सरकारों द्वारा दूसरा तरीका अपनाया जाता रहा है। यह इतना सर्वव्यापी है कि उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है।


"Quota candidates getting more marks entitled to General category seats: SC"


https://www.business-standard.com/article/current-affairs/quota-candidates-getting-more-marks-entitled-to-general-category-seats-sc-122042801199_1.html

सरकारी सेवाओं और उच्च शिक्षा में सीटों की यह लूट EWS से भी भयंकर है। अतः यह आशय स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद में शामिल होना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय के साथ मेरिट वाली व्यवस्था इस लोकतांत्रिक देश मे बन सके।


~राहुल पटेल

Wednesday, May 1, 2024

कोविशिल्ड के सबसे कम ध्यान जाने वाले दुष्प्रभाव पर एक नजर तथा संस्थाओं की विश्वसनीयता

 #समाज #स्वास्थ्य

https://www.facebook.com/share/v/sPPwGofu8NzPiHWB/?mibextid=xfxF2i


आपने भी अबतक covid19 का वैक्सीन बनाने वाली अस्ट्रोजेनेका कंपनी के स्वीकारोक्ति को पढ़ लिया होगा, जहाँ उन्होंने कोविशिल्ड (भारत मे 80% लोगों ने लिया है, हो सकता है कि आप भी हों) से

- खून के थक्का बनने

- खून में निम्न प्लेटलेट्स

- टीटीएस 

जैसे शारीरिक समस्या का उत्पन्न होना स्वीकारा है और अब उनपर यूके उच्च न्यायालय में हर्जाना के दावे ठोके जा रहे हैं। ये हर्जाना कंपनी नही देगी, सरकार देगी। सरकार भरपाई कैसे करेगी तो टैक्स बढ़ाकर। सीधा मतलब है चीजों का दाम बढ़ाकर कंपनी की गलतियों का हर्जाना भरा जाएगा। 

https://www.bmj.com/content/380/bmj.p725


महत्वपूर्ण यह भी है कि उस वैक्सीन को विकसित करने में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्त्ताओं का भी हाथ था। शोध की गुणवत्ता बरकरार रखना केवल ऑक्सफ़ोर्ड की जिम्मेवारी तो है नही। इसलिए वैक्सीन के निर्माण और वितरण के पहले ही ब्रिटिश सरकार ने निर्माताओं को हर जवाबदेही से मुक्त कर दिया था। भारत ठहरा विश्व गुरु।  मोदी सरकार ने वैक्सीन के भारत मे निर्माण होने (अस्ट्रोजेनेका का माल सीरम संस्थान में बनता था) का पूरा डंका पिटवाया। जब विश्व गुरु के भी गुरु की तरफ से सब ओके है तो भला विश्व गुरु की क्या औकात कि वैक्सीन पर सवाल खड़ा करे!


भारत मे मोदी सरकार ने न्यायालय में यह पहले ही हलफनामा दायर कर दिया है कि कोविड वैक्सीन वैकल्पिक था। लोग स्वयं कूद कूद कर वैक्सीन लेने जाते थे। किसी ने उन्हें सरकारी सुविधाओं जैसे राशन कार्ड से नाम काटने या सरकारी कार्यालयों, पब्लिक परिवहनों में आने जाने के लिए वैक्सीन सर्टिफिकेट का भय नही दिखाया था। ग्रामीण जनता को वैक्सीन सेंटर तक पहुँचाने में मास मीडिया का सरकार ने कोई इस्तेमाल नही किया था।


भारत मे 2022 में 56,653 अचानक मौतें दर्ज की गई थीं। दर्ज नही किये जाने वाले केस अनुमान की बात है। हार्ट अटैक से मरने वालों की संख्या में 2021 की तुलना में 2022 में 12.5% का उछाल आया। 2023 का आँकड़ा मिला नही। https://theprint.in/health/marked-rise-in-sudden-deaths-heart-attacks-in-2022-shows-ncrb-data/1873004/


अकेले गुजरात मे 2022 की तुलना में 2023 में बढ़ती जनसंख्या को अध्ययन में शामिल करने के बाद भी 29% का उछाल आया।

https://timesofindia.indiatimes.com/city/ahmedabad/gujarat-cardiac-crisis-at-record-high-emri-got-1-call-every-7-5-minutes-in-2023/amp_articleshow/106500114.cms


केवल 6 महीने के अंदर जुलाई से दिसंबर के बीच मे गुजरात में हुई हार्ट अटैक से 1052 अचानक मौतों में 80% लोग 11-25 साल की उम्र के थे। https://www.google.com/amp/s/www.thehindu.com/news/national/other-states/over-1000-died-of-heart-attack-in-six-months-gujarat-minister/article67597167.ece/amp/


47 tertiary सुविधा वाले अस्पतालों से 18-45 साल के एकदम स्वस्थ, पर कोविड वैक्सीन लिए 29,171 व्यक्तियों के अचानक अकारण मृत्यु वाले दर्ज केसों का अध्ययन कर ICMR ने यह पाया कि ये लोग कोविड वैक्सीन के चलते नही बल्कि दारू, अधिक कसरत, उनके घरों में ऐसी मौतों के पहले होने(शायद अचानक मरने की जेनेटिक आदत की ओर इशारा हो) आदि के कारण हो सकते हैं। गनीमत है कि कारणों में खुशी से अचानक मृत्यु को नही गिनाया गया। ब्रिटेन को उच्च न्यायालय में अपना केस लड़ने के लिए ICMR जैसे किसी तीसरी दुनिया के देश के संस्थान की रिपोर्ट इस्तेमाल करनी चाहिए। https://factly.in/review-what-did-the-icmr-study-on-factors-associated-with-unexplained-sudden-deaths-among-adults-in-india-find/


अब कोविशिल्ड के साइड इफ़ेक्ट के पूरे प्रकरण को यह मोड़ दिया जा रहा है कि इससे अत्यंत दुर्लभ रोग TTS हो सकता है, लेकिन कोविशिल्ड के दूसरे साइड इफ़ेक्ट यानी खून में निम्न प्लेटलेट्स स्तर का भारत का आँकड़ा यदि किसी के पास उपलब्ध हो तो जरूर दें। मैंने अपने छोटे से शहर सासाराम बिहार में पिछले 2-3 साल में इसमें जबरदस्त उछाल देखा है। टेस्ट में टाइफाइड के लक्षण आ रहे हैं। 2023 में भारत मे टाइफाइड के मामलों में 30% का उछाल आया है। सभी मामलों में अत्यंत कम प्लेटलेट्स की समस्या है। इलाज किया जा रहा है टाइफाइड का। 


आपका ध्यान मैं इस ओर बटाना चाहता हूँ कि कोविशिल्ड से उत्पन्न इस समस्या से जूझते करोड़ो भारतीयों का 3-5000/- लुढ़कना खरबों रुपये का आर्थिक बोझ है, जिसे आम भारतीय अपने ऊपर झेल रहा है। लेकिन मोदी सरकार हो या ICMR, सब चंगा सी! 


कम प्लेटलेट्स की समस्या पूरी दुनिया मे मौजूद हो सकती है ओर इसका कारण कोविशिल्ड हो सकता है। इसकी भरपाई कौन करेगा? इस प्रभाव की व्यापकता पर शोध कौन करेगा? अभी कोवैक्सीन के दुष्परिणाम पर शोध बाकी है।

~ राहुल पटेल

भारत मे कोविशिल्ड भाजपा संबंधित समस्यायों के आइसबर्ग का टिप

 #समाज #स्वास्थ्य

कोविशिल्ड के कारण भारत मे हो रही अचानक मौतों और सबसे व्यापक स्तर पर प्लेटलेट्स कम होने की शिकायतों के संदर्भ में मोदी सरकार की सबसे जबरदस्त हिट स्कीम "पीएम मोदी #चंदा_दो_धंधा_लो स्कीम" के तहत कुछ वैसी दवा कंपनियाँ, जिनकी वे दवाईयाँ जो ड्रग टेस्ट फैल कर चुकी हैं, जो आपका तथाकथित रूप से  बीपी, हार्ट अटैक, खून पतला करना, वायरस, फंगस आदि रोकने का काम कर रही है, बड़े मजे से भाजपा को चंदा देकर पाक साफ हो जा रही है। 35 दवा कंपनियों ने भाजपा को कुल 1000 करोड़ का चुनावी चंदा दिया है। इन कंपनियों की ऊर्जा दवाओं की गुणवत्ता बरकरार रखने की बजाय मोदी और भाजपा को सत्ता में लाने में ज्यादा जा रही हैं। भाजपा की नजर में आपके जान की कीमत आपके वोट तक ही है।


https://amp.scroll.in/article/1065318/seven-firms-that-failed-drug-quality-test-gave-money-to-political-parties-through-electoral-bonds


1. हेटेरो लैब्स और हेटेरो हेल्थकेयर ने 60 करोड़ का भाजपा से चुनावी बांड खरीदा। इसकी तीन रेमडेजीवीर की दवाईयाँ(एन्टी वायरस की दवाईयाँ) जो कोविड 19 के उपचार में, itbor कैप्सूल (एन्टी फंगल दवाई) तथा मोनोसेफ (एन्टी बैक्टीरियल दवाई) ड्रग टेस्ट फेल हो चुकी हैं, पर, मार्केट में इनपर कोई रोकटोक नही है


2. टोरेंट फार्मा ने 77.5 करोड़ का भाजपा को चुनावी चंदा दिया। इसकी खून के थक्का जमने(जो अचानक अकारण हार्ट अटैक के मुख्य कारक के रूप में सामने आए हैं) से रोकने वाली दवाई Deplatt 150, BP कम करने की दवाई Losar H, हृदय के रोगों की दवाई Nicoran LV, डायरिया की दवा Lopamide मॉलिक्यूल्स की दवा ड्रग टेस्ट फेल होने के बावजूद मार्केट में उपलब्ध हैं


3. Zydus हेल्थकेयर ने 29 करोड़ का चंदा दिया। इसकी कोविड 19 की दवा रेमडीजीवीर दवाईयाँ ड्रग टेस्ट फेल कर चुकी हैं, पर, मार्केट में उपलब्ध हैं


4. Glenmark ने 9.75 करोड़ चंदा दिया है। इसका BP, हार्ट अटैक की दवा telma ड्रग टेस्ट फेल है, मार्केट में उपलब्ध है


5. Cipla ने 39.2 करोड़ भाजपा को चंदा दिया है। इसका RC कफ सिरप तथा रेमडीजीवीर की दवा Cipremi ड्रग टेस्ट फेल हैं, पर, मार्केट में हैं


6. IPCA LABORARTIES ने 13.5 करोड़ का चुनावी चंदा दिया है। इसका एन्टी parasitic दवा Lariago ड्रग टेस्ट फेल है, पर, मार्केट में बिक रहा है


7. Intas फार्मास्यूटिकल ने 20 करोड़ दिया और इसका दवा BP, हार्ट अटैक की दवा Enapril-5 ड्रग टेस्ट फेल है, बिक रहा है।


इससे भी खतरनाक यह बात है कि ये कंपनियाँ मोदी सरकार की मेडिकल पालिसी निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं यानी भेड़ियों को, पैसा लेकर, भेड़ों को किस तरह से काटा जाए, का कानून बनाने की भूमिका दी जा रही है।


यह मत समझियेगा या पालिसी निर्धारण में पैसा लेकर निजी कंपनियों को भूमिका देना केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में है। यह शिक्षा, श्रम, कृषि, माइनिंग आदि सभी क्षेत्रों में है। इसे कहते हैं धनतंत्र/plutocracy। अंतर सिर्फ इतना है कि पैसा अपरोक्ष रूप से आप ही का है। है, न , मजेदार बात!

~राहुल पटेल

Thursday, April 25, 2024

जेनेरिक दवायें....जनहित में जारी

 #समाज #स्वास्थ्य 

1. जेनेरिक दवायें क्या होती है?

उ0- लगभग 20 साल के पेटेंट की समाप्ति के बाद, आगे कुछ भी खर्च किए बिना, जेनेरिक नाम रखने की शर्त पर, ब्रांडेड दवा के फार्मूले की ही दवा, कोई भी कंपनी बना सकती है।

           तो ब्रांडेड और जेनेरिक दवा के फार्मूले में कोई अंतर नहीं होता। उनके प्रभाव, डोज, साइड इफेक्ट में कोई अंतर नहीं होता। इनको बनाने में सरकार से लाइसेंस, गुणवत्ता जांच, Essential Drug Criteria आदि से ब्रांडेड दवाओं की तरह ही इनको गुजरना पड़ता है।


2. जेनेरिक दवायें इतनी सस्ती क्यों होती हैं?

उ0- एक नई ब्रांडेड दवा को बनाने में रिसर्च और कई साल के अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है। उसको मार्केट में चलाने में डॉक्टर, MR, दवा विक्रेता आदि का भारी कमीशन सेट करना पड़ता है। इन सब खर्चों को रिकवर करने के लिए, सरकार पेटेंट के रूप में, कंपनी को उत्पादन वितरण का एकाधिकार का 20 साल का समय देती है। 

          इसके ऊपर कंपनी भारी मुनाफा कमाना चाहती है। यदि दवा अपनी तरह का अकेला है तब तो कंपनी मनचाहा दाम रखती है। 

        ब्रांडेड दवा के उत्पादन और वितरण पर 20 साल का यह एकाधिकार उनके महँगा होने का मूल कारण है। इस समयावधि के बाद जेनेरिक नाम से यही दवाईयाँ केवल लागत खर्चे पर बिकती हैं। मार्केट बना बनाया मिल जाता है। वितरण भी अनेकों कंपनियों का संयुक्त रूप से होता है। मार्जिन अत्यंत कम रहता है। इसलिए ये दवाईयाँ अत्यंत सस्ती रहती हैं।


जैसे-

- ब्रांडेड B काम्प्लेक्स दवा 2-35/-, जेनेरिक 10 पैसा

- ब्रांडेड पेरासिटामोल 500 2.50/-, जेनेरिक 10 पैसा

- ब्रांडेड सेटरीजिन 5/-, जेनेरिक 20 पैसा

- ब्रांडेड सिप्रोफ्लॉकसेसिन 7-12/-, जेनेरिक 1.50/-


3. जेनेरिक दवाईयाँ डॉक्टर नही लिखते, बहुत कम दवा विक्रेता ये दवायें रखते हैं, ऐसा क्यों?

उ0- अत्यंत कम मार्जिन होने के कारण दवा विक्रेता इनको बेचने में लाभ नही देखते। डॉक्टर को कोई कमीशन नही मिलता। 

      पर, आप अपने डॉक्टर को जेनेरिक दवायें लिखने या कॉम्बिनेशन लिखने के लिए कह सकते हैं, जिसको आप जेनेरिक दवा के प्रमाणिक विक्रेता से अत्यंत सस्ते दाम पर प्राप्त कर सकते हैं।

4. जेनेरिक दवाओं के बारे में काफी शिकायत भी है। ऐसा क्यों?

उ0- जेनेरिक दवाओं के नाम पर कुछ unceritified और unregulated कंपनियाँ भी दवाईयाँ बनाती हैं। अनेकों दवा विक्रेता ज्यादा मार्जिन के लिए इन कंपनियों का भी माल बेचते हैं।

इसके अलावा जेनेरिक दवाओं पर एमआरपी ब्रांडेड दवाओं की तरह लिखा रहता है, पर, ये 80% तक के छूट के इरादे से मार्केट में उतारी जाती हैं। इस कारण से दवा विक्रेता(खासकर ग्रामीण क्षेत्र में) को 10-80% के बीच कुछ भी छूट पर बेचने का मौका मिल जाता है। जानकारी के अभाव में ग्राहक कभी 30%, कभी 50% भी छूट पाकर दुकानदार को धन्यवाद ही देता है। जबकि 80% तक छूट मिल सकता था। इससे इन दवाओं की विश्वसनीयता में कमी आती है। यही कारण है कि zeelab जैसी कंपनियाँ अब दाम कम करके ही प्रिंट करती है।

इसके उल्टा जेनेरिक दवायें भारत सरकार स्वयं पीएम जन औषधालयों से बेचती है। टाटा कंपनी इस क्षेत्र में है। WHO के अनुसार अभी जेनेरिक दवाओं का मार्केट मात्र 10-12% है। इनका उपयोग कर दवाओं पर वैश्विक रूप से 70% खर्च कम किया जा सकता है। WHO स्वयं इनकी अनुशंसा करता है। 

      जरूरत है, सही दवा विक्रेता के पहचान की। ये दवा विक्रेता जेनेरिक के नाम पर किसी भी कंपनी का माल नही बेचते हैं, बल्कि केवल सर्टिफाइड कंपनियों का ही माल बेचते हैं।

~राहुल पटेल



धूर्तों का मनोबल तोड़िये

 #समाज 

किसी भी क्षेत्र में, किसी भी विषय पर 4 सही बातों के चाशनी में 6 गलत बात की हामी भरवा लेना धूर्तों का सबसे पसन्दीदा तरीका है। वे मुखर हैं। आत्मविश्वास से लबालब भरे झूठ उनके दाँतों से झाँकती है। यह केवल आदत नही, कई बार उनकी राजनीति है। 

हो सके तो गलत बात को वहीं पर छेड़िये, रोकिए। सकुचाईये नही। यह आपकी आदत और राजनीति होनी चाहिए। 

लोगों का न टोकना उनका मनोबल बढ़ा रहा है।

~राहुल पटेल

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Sunday, April 21, 2024

धर्म, पाखण्ड में उलझाना नही, उसके माध्यम से सामान और सेवा बेचना लक्ष्य

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#समाज 

समस्या की सही व्याख्या सही समाधान सुनिश्चित करता है।


किसी धर्म को उसके निश्चित विधि विधान, पण्डित की आवश्यकता, पूजा पाठ के खास सामानों की आवश्यकता, tenets आदि से परिभाषित किया जाता है। बाकी लोकाचार, लोगों की जीवन शैली, बोल चाल, सामाजिक समझ पहले भी थी, हमेशा रहेगी। इनमे धर्म का कोई योगदान नही है। स्पष्टतः लोगों पर ट्रेड रूट की कहानियाँ थोपकर स्थानीय संस्कृति को हाइजैक किया गया है तथा अलग अलग धर्मों का नाम दिया गया है। यह विभिन्न ट्रेड रूट में पड़ने वाले सभी देशों के साथ किया गया है। 


वर्त्तमान स्थिति यह है कि लोग समझते हैं और धर्मगुरु उन्हें समझाते हैं कि लोकाचार, जीवन शैली आदि उन्हें धर्म ने दिया। सुधारवादी लोग अपने अपने धर्म के सामाजिक दुष्प्रभाव से तंग आकर धार्मिक ग्रंथों, उसके tenets, विधि विधान में सुधार चाहते हैं या विरोध करते हैं। स्पष्टतः ये लोग उस धर्म के सीमा के अंदर रहकर ही सोच पाते हैं। उन्हें यह दिखना चाहिए कि जो चीज शुरू से ही नही थी और उसके होने से समस्या हो रही है तो उसमें आप सुधार क्यों चाहते हैं? उसको सिरे से त्यागने की जरूरत है।


जैसे रामचरितमानस का शुद्र वाला वर्णन। उसके विरोध का मतलब है कि आप मानते हैं कि राम था, रामचरितमानस आपका इतिहास है, आप शुद्र थे और अब स्वयं को इस विशेषण से दुखी पाते हैं तो रामचरितमानस का विरोध कर रहे हैं। मजेदार बात है कि स्वयं को शुद्र कहना छोड़ भी नही रहे हैं। क्योंकि इससे आपके शोषित होने का प्रमाण समाप्त हो जाएगा, जो कि कभी आप थे ही नही। इसका यह भी मतलब है कि वर्ण व्यवस्था को आप तथ्य मानते हैं और बाकी तीन वर्णों को शुद्र से ऊपर मानते हैं। तो फिर आपके साथ शुद्रोचित व्यवहार होना ही चाहिए। 


दूसरा उदाहरण है कि यदि आप मुस्लिम नही है तो क्या आप उस धर्म मे गलतियाँ निकालने के लिए कुरान पढ़ते हैं? उसमें यदि गैर मुस्लिमों को किसी गलत शब्द से नवाजा गया हो तो आप उसपर चर्चा चलाते फिरते हैं? यदि नही तो फिर इस मामले में अपनी ऊर्जा बेकार की चीज पर लगाने का क्या मतलब है?


लोग अनेकों प्लेटफार्म से पाखण्ड, पंडित के फीस, विधि विधान बनाकर विधिवत पूजा कराने के नाम पर पूजा पाठ के सामानों पर किये गए खर्च आदि का विरोध करते हैं। पर, कुछ अन्य लोग यह तर्क रखते हैं कि आप एक प्रयोजन में इन चीजों पर कुल खर्च का 10% खर्च करते हैं। बाकी 90% खर्च DJ, रिसोर्ट, वीडियोग्राफी, ब्यूटी पार्लर आदि दिखावे पर करते हैं, जिससे कोई लाभ नही है, तो दोष इस 10% को क्यों देना है? यह बात सही भी है, तो गड़बड़ कहाँ पर है?


गौर से देखा जाए तो पहले पाखण्ड, पंडित के फीस, पूजा पाठ के सामानों पर खर्च आदि ही मुख्य खर्चे थे, बाकी कोई खर्च नही था और ये खर्च ही लोगों पर भारी पड़ते थे। अब वर्त्तमान में दूसरे प्रकार के खर्चे हावी हो गए हैं। दोनो में समानता यही है कि आपको उपभोक्ता बनाया जाता रहा है। व्यापारियों ब्राम्हणों का गठजोड़ पहले भी आपके पॉकेट से पैसे निकालने का उपाय सोचता था, आज भी यही कर रहा है। ध्यान देने की बात है कि ये दोनों लोग परजीवी हैं। इस तरह से विधि विधानों में सुधार, किसी दूसरे विधा जैसे अर्जक संघ को अपना लेना आदि बहुत प्रभावकारी सिद्ध नही हो रहा है। क्योंकि समस्या की जड़ आपकी यह समझ कीआपको धर्म मे उलझाना नही है, बल्कि धर्म के नाम पर आपको सामान और पण्डित के रूप में अपनी सेवा बेचना है। धर्म की सारी कहानी विधानों, इनको जोड़ने वाली कड़ियों आदि के इर्द गिर्द घूमती हैं। फिर इसके समाजिक राजनीतिक फायदे भी हैं, जो अंततः उनके आर्थिक फायदे का पॉजिटिव फीड बनता है।


तो धर्म और उस पर आधारित सामानों के हमलोग इतने बड़े उपभोक्ता बने कैसे? क्या यह षड्यंत्र था या कमी हमीलोगों में है? क्या हमलोगों में ही उपभोक्तावादी संस्कृति कूट कूट कर भरी है? 


तो नही! 

पहला यह कि ब्राम्हण व्यापारियों के गठजोड़ की एकदम सपाट रणनीति यह रही है कि चीजों को आसानी से सर्वत्र, सर्वव्यापी रूप से उपलब्ध कराई जाए, आपकी आसान पहुँच में हों। यह षड्यंत्र नही है, यह अपनी चीजों को बेचने की अदम्य लालसा है। यह उद्यमिता नही है। अर्थव्यवस्था का प्राइमरी सेक्टर उद्यमिता हैं, बाकी पके पकाए पूड़ी को जोड़ियाना है।


दूसरा यह कि कोई भी आसानी से हो सकने वाला काम करेगा, जिसमे अपना मेहनत बचता हो। आप आसानी से पैसा कमाना चाहते हैं तो mycircle, ludo, शेयर मार्केट, ऑनलाइन लाटरी आदि फलफूल रहे हैं। आप आसानी से खाना चाहते हैं तो lays, कुरकुरे, आटा, तेल, चीनी, मसाले, मिक्सी, ग्राइंडर आदि की बिक्री बढ़ रही है। खेतों में फ़र्टिलाइज़र, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर; घरों में फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर; स्वर्ग जाने के उपाय; कार्यालयों में घूस, पैरवी आदि इसी आसान मानसिकता (easy mentality) के परिचायक हैं। आपका काम आसानी से हो जाये, पहले हो जाये, बाकियों से अच्छा हो जाये, उपभोक्तावाद के अलावा यह सब होड़ पैदा करता है। पर यह होड़ कालिदास की तरह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, क्योंकि व्यक्तिगत स्तर पर आप भले जीतते हुए दिखते हैं,  सामूहिक स्तर पर आप एक लंबे समयांतराल में हारते हैं। आपकी हर तरह की पूँजी उन परजीवियों की ओर धीरे धीरे खिसकती है। किसानों की दुर्दशा यही है। कभी दक्षिणा देने वाला, कई तरह के परजीवियों को पनाह देने वाला, अनाज से सोना खरीदने वाला किसान आज 5 किलो राशन, आरक्षण, जातीय जनगणना, व्यवस्थागत भेदभाव की लड़ाई उन्हीं शरणार्थियों से लड़ता है, माँगता है। परजीवियों की पूँजी कभी किसानों की ही थी। एकतरह से हम यह भी कह सकते हैं कि किसान इन परजीवियों के लिए मुफ्त या बहुत सस्ते श्रम में अनजाने तौर पर काम कर रहा है। अतः इस आसान मानसिकता, इस होड़ पर रोक लगनी चाहिए। उपरोक्त बहुत सी चीजों को आप इस्तेमाल करना जारी रख सकते हैं, पर आपको रुपये की अर्थव्यवस्था समझनी चाहिए और यथासंभव दूरी बनानी चाहिए। #avoidpapermoney पर किसी दूसरे पोस्ट में।

~राहुल पटेल

Tuesday, March 26, 2024

'दिल का विषय है'

 #समाज #आदिकिसान

मेरी समझ से साधारणतः इसका मतलब होता है कि किसी कार्य को करने का तरीका reproducible नही है, मान्यता आधारित है, एक ही व्यक्ति का हरबार और व्यक्ति व्यक्ति का भी तरीका अलग हो सकता है, परिणाम बदल सकता है। यह एक तरह से अँधेरे में काम करने जैसा है, जहाँ आप एक आशा से कोई चीज करते हैं, पर लक्ष्य की संभावना तय नही है। इसे आप ज्यादातर पॉजिटिव सोच के रूप में परिभाषित करते हैं। पर, यह उसी तरह से है कि रास्ते मे चलने पर सोना गिरा हुआ मिल सकता है तो आप अब रोज पैदल 40 km इस आशा में चलते हैं कि शायद किसी दिन सोना मिल जाये। यह ज्यादातर मामलों में बेवकूफी है।


इसका उल्टा है प्लानिंग करके कोई काम करना। संभावना तय करना। इसमे कार्य को करने के लिए जरूरी घटकों का आप मोटा मोटी अनुमान लगा लेते हैं।

दिल के विषयों में आप कोई अनुमान नही लगाते हैं। चीजें सामने आती जाती हैं, आप अव्यवस्थित तरीके से समाधान का प्रयास करते जाते हैं।

दोनो विधियों का अपना अपना महत्व है। कुछ अवसरों पर प्लानिंग संभव नही होता है। पर, यह तय है कि दिल के विषयों में प्लानिंग की अपेक्षा असफलता की संभावना ज्यादा रहती है। कटु अनुभव भी ज्यादा होते हैं।

पोस्ट लिखने के लगभग आधे घंटे के बाद fb पर 'दिल का विषय है' के एकदम फिट केस मिले।

जरा Balendu Goswami का दुखड़ा पढ़िए.....

"मेरे मित्र Girijesh Tiwari जी ने मेरी दस साल पुरानी एक पोस्ट शेयर करी. जिसके कि कुछ अंश अब असत्य साबित हो चुके हैं. (वह पोस्ट मैं नीचे कमेंट में पेस्ट करूँगा)

कल्पना करें, कैसा लगता होगा जब अपने ही दावे गलत साबित हो जाएँ और मिथ्या गर्व टूट जाएँ! मैं भी आजकल अक्सर कुछ ऐसा ही महसूस करता हूँ.

मैंने गिरिजेश जी को ये जवाब दिया:

आदरणीय गिरिजेश जी, इस पोस्ट को शेयर करने के लिए धन्यवाद। परन्तु दस साल पहले लिखी मेरी इस पोस्ट की कुछ बातें असत्य साबित हो चुकीं हैं.

बाप और भाई द्वारा विश्वासघात के बारे में ......

यहाँ एक बात और भी मैं जोड़ना चाहुंगा कि मैंने जर्मनी स्थित हमारी चैरिटी संस्था से भी इस्तीफ़ा दे दिया था क्यों कि वहाँ बच्चों के लिए भेजे जाने वाले दान के पैसे का दुरूपयोग हो रहा था. मेरा कोई कंट्रोल नहीं रहा मुझे चैरिटी की कोई रिपोर्ट नहीं मिल रही थी इसलिए मैं कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था उस दान के पैसे की जो पूरी दुनिया से मेरे सहृदय मित्र बच्चों के नाम पर पैसा भेजते थे. इसके उलट मेरे कुछ दानदाता दोस्त जब यहाँ से हमारे वृन्दावन के आश्रम में गए तो उन्होंने जो खबर दी वह चौंकाने वाली थी. उन्होंने बताया कि कैसे उनका दिया हुआ दान का पैसा आश्रम में शराब, जुआ और अय्याशियों में खर्च हो रहा है.

दोस्तों मैंने सार्वजनिक रूप यह सब लिखने का निर्णय इसलिए किया क्यों कि भारत में अब कोई भी ऐसा नहीं रहा जिसे मैं अपना कह सकूँ। मुझे बहुत प्यार मिला है यहाँ आपका और अब मुझे आपका नैतिक सहयोग चाहिए।

फिर से बाप और भाई द्वारा विश्वासघात के बारे में ......
"

इस केस में धार्मिक भावना को इन्होंने मानवीय भावना समझ कर अपने छवि को बरकरार रखने के लिए वृंदावन के किसी आश्रम को दान दिया और दिलवाया। पर, ऐसे लाखों कवियों को अंत मे केवल कड़वा अनुभव ही हासिल होता है।

इसलिए ज्यादातर परिस्थितियों में हमलोगों को दोनो का मिक्स अपनाना चाहिए। प्लानिंग थोड़ा ज्यादा, दिल का विषय थोड़ा कम।

समता, बंधुता, न्याय की बात आज 70 वर्षों के बाद भी इसीलिए हो रही है कि यह प्लानिंग के बजाए दिल का विषय बना हुआ है। यह लगभग हर क्षेत्र में हमारे विकास में बाधक है। यह काव्यात्मक भावना है। ऐसे लोगों को manipulate करना आसान है। धूर्त्त लोग ऐसे लोगों का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं। जब धोखाधड़ी का पता चलता है, तो ऐसे लोग शोषण और भेदभाव का रोना रोते हैं, पर अगला कदम फिर से दिल का विषय बना लेते हैं।

इसपर हमसभी को गौर करना चाहिए।

~ राहुल पटेल
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Monday, March 18, 2024

सिंदूर खेला

 #आदिकिसान #लुक_ईस्ट #समाज #adikisan #lookeast

हिंदुओं की शादी बिना सिंदूर के नही मानी जायेगी। तो, सिंदूर अति प्राचीन होना चाहिए। मनुस्मृति, अथर्ववेद, महाभारत, मेहरगढ़ की खुदाई, आदि शंकराचार्य के साहित्य, रसजलनिधि, गर्ग संहिता, सुश्रुत संहिता, चरकसंहिता, पुराणों में जैसे विष्णुधर्मोत्तर पुराण, गरुण पुराण, पद्म पुराण, अग्नि पुराण, स्कन्द पुराण, देवी भागवत पुराण, लिंग पुराण आदि में इनका वर्णन है।

https://www.wisdomlib.org/index.php?type=search&division=text&input=Sindura%2C+Sind%C5%ABra%2C+Simdura%2C+Si%E1%B9%83d%C5%ABra%2C+Si%E1%B9%83dura%2C+Sind%C5%ABram%2C+Sind%C5%ABra%E1%B9%83%2C+Sind%C5%ABra%E1%B8%A5%2C+Sinduras%2C+Sind%C5%ABras%2C+Simduras%2C+Si%E1%B9%83d%C5%ABras%2C+Si%E1%B9%83duras




तो, बताईये कि आज केमिकल वाले सिंदूर के पहले सिंदूर किस चीज का था? 


इसपर कुछ लोग सिंदूर के पेड़ की बात करते हैं, जिसका भारत मे फैलाव नगण्य है। दक्षिणी अमेरिकी मूल का यह पौधा Bixe Ornella स्पैनिश व्यापारियों द्वारा 17वीं शताब्दी में वहाँ से दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों में लाया गया था, जहाँ यह आज भी कमर्शियल स्तर पर उगाया जाता है। पूरे दुनिया मे इसका इस्तेमाल सिंदूर के रूप में नही हुआ। तो, भारत मे यह सिंदूर पाउडर के रूप में आया हो, संभव नही है। चूँकि भारत मे यह पेड़ पाया ही नही जाता तो इससे सिंदूर उत्पादन की भी कोई संभावना नही है। इसे हर घर मे व्यक्तिगत स्तर पर लगाकर इस्तेमाल की बात भी संभव नही है। ऐसा होता तो भारत भर में यह पाया जाता और सिंदूर आजतक के इतिहास में लोगों ने मेलों से खरीदकर ही लगाया है यानी यह व्यापार के माध्यम से ही इस देश मे आता रहा है।


ज्ञात हो कि पहले किराना दुकान और सड़कें नही थीं। व्यापार का एकमात्र तरीका मेला था। फिर इन मेलों में किन चीजों के सिंदूर बिकते थे?





सिनेबार/Cinnabar/HgS



यह खनिज पत्थरों के रूप में ओलेमिक सभ्यता, चीन के लगभग 1500 BCE से तथा स्पेन में रोमनों के समय से किया जाता रहा है। यह चित्रकारी, पॉटरी (मुख्यतः चीन), कपड़ा रँगने में लाल पिगमेंट्स के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, पर, सिंदूर के रूप में पति के दीर्घायु कामना वाली मान्यता पूर्णतः भारतीय उपमहाद्वीप का ईजाद है। इस धरती पर सिंदूर को खपाने(चटगाँव से पेशावर वाला व्यापारिक रास्ता यूरोपियन व्यापर का सबसे अंतिम फेज था) के लिए इसे बजाय किसी धार्मिकता से जोड़ने के(अभी धर्मों का जोर भारत मे पकड़ा न था) पति के दीर्घायु कामना वाली भावना से जोड़ा गया। किसने जोड़ा के पहले प्रश्न है, किसने लाकर माल भारत मे खपाना चाहा तो उत्तर है अँग्रेज व्यापारियों ने। स्वाभाविक है कि सबसे पहले उनके साथ आये सेवकों ने इसका सेवन किया। कालांतर में धर्म से सिंदूर का जुड़ाव इतना ही हो सका कि देवियों को भी सिंदूर लगाया जाने लगा। यह मजेदार भी है, क्योंकि देवी जो मनुष्यों से बहुत ऊपर की चीज होनी चाहिए थीं, उनके पतियों यानी देवताओं के दीर्घायु कामना के लिए सवर्ण औरतों ने देवियों पर(मूर्त्तियों पर) सिंदूर लगाना या चढ़ाना शुरू किया क्योंकि उनके अपने हाथ कार्यरत तो है नही। यह अत्यंत हास्यास्पद है।

















भारत मे 1978 के रिपोर्ट में जियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने यह कहा है कि भारत मे यह नही पाया जाता। इसके चीन और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आने का उल्लेख वाग्भट्टाचार्य के पुस्तक रसरत्नसामुख्य में है। इसके पाकिस्तान के दर्दीस्तान से भी आयातित होने का उल्लेख है। पर, इसको भारत मे कहीं भी दरद नाम से नही जाना जाता है। पूरे भारत मे यह सिंदूर, उसके cognate और वरमिलन(शायद ही) नाम के अलावा किसी दूसरे नाम से नही जाना जाता है। भारत मे सिंदूर खेला या सिंदूर का फैलाव आप बंगाल से पाते हैं। भारत मे यूरोपियन व्यापारियों के साथ यह बंगाल की तरफ से 200 साल पहले यानी 19वीं शताब्दी में प्रवेश किया। यानी वाग्भट्टाचार्य के नाम से समय मे पीछे जाकर यह सब गपोड लिखा गया है। इसतरह से भारत मे अपने शुरुआती दौर से ही सिंदूर पारा/mercury के रासायनिक रूप में इस्तेमाल हुआ है। बंगाल में भी इसका प्रभाव सबसे ज्यादा वर्ण व्यवस्था वाली जातियों यानी हिंदुओं तथा लूँगी वाले मुस्लिमों(लूँगी इंडोनेशिया का पहनावा है) में देखा जा सकता है, जो इन दोनों के बाहरी होने का सबूत है। बंगाल और पूर्वी समुद्र तटीय क्षेत्रों से जैसे जैसे आप दूर जाते हैं, सिंदूर का प्रयोग आप कम या नही देखते हैं। आजकल यह भखरा सिंदूर के नाम से बिकता है। बाकी सिंदूर अब HgS न होकर महज लाल pigment हैं।








सासाराम, बिहार के हिंदी के प्रो0 राजेन्द्र प्रसाद इसी विषय पर बताते हैं कि सिंदूर का इतिहास भारत मे अति प्राचीन है। देखिए https://youtu.be/6mclAOcJfTI?si=3sjPzWoJ4caFyCrU 

इसके पक्ष में वे कहते हैं कि पूरे भारत मे इस पदार्थ के लिए सभी भाषाओं में सिंदूर शब्द का ही इस्तेमाल होता है। भाषाविद के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहे राजेन्द्र बाबू का यह कथन उनके भाषाविद की तरह सोचने पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। सभी भाषाओं में स्थानीय चीजों के लिए अपने शब्द होते हैं। यदि कोई चीज व्यापारियों द्वारा एक बड़े भूभाग में फैलाई गई हैं तो उसका नाम उस पूरे क्षेत्र में व्यापारियों द्वारा दिया गया नाम होगा। जैसे सिंदूर की ही तरह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का मूल 'लेमो'/lemon इस देश मे मुगल और अँग्रेज व्यापारियों द्वारा लाया गया है और लेमो के cognate लेम्बो, लिम्बु, निम्बू, ए'लेमु'कायी, 'निमा'कायी(कायी का मतलब हरी सब्जी/फल)आदि नामों से जाना जाता है। यही नही अँग्रेजी में भी lemon लेमो का ही cognate है। अनेकों महाद्वीपों के अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में lemon को लेमो के cognate से ही पुकारा जाता है। ऐसा इसलिए कि यूरोपियन व्यापारियों के माध्यम से यह दुनिया के अनेकों कोनों में पहुँचा और इसलिए नाम भी हर जगह समान है।


चाय के साथ भी यही बात है।


स्पष्ट है कि सिंदूर शब्द के समरूपता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत मे यह अपेक्षाकृत अत्यंत नई चीज है। संस्कृत और पाली जैसी नई भाषाओं का तो कहना ही क्या, जिनका अपना कोई बोली क्षेत्र ही नही है और इसलिए इनके भाषा कहे जाने पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह है, इनमे इनको सिंदूर क्यों नही कहा जायेगा?

आगे राजेन्द्र बाबू किसी थाइलैंडी भोलानाथ तिवारी की इलाहाबाद से अँग्रेजों के समय मे छपी शब्दकोश 'वृहत पर्यायवाची कोष' का हवाला देते हुए कहते हैं कि सिंदूर के अनेकों पर्यायवाचियों में नाग शब्द जुड़ा हुआ है। यह इसकी भारत भूमि पर प्राचीनता का एक और सबूत है।





उक्त कोष की पर्यायवचियाँ- अरुण, अरुणपराग, गणेशभूषण, नागगर्भ, नागज, नागरक्त, नागरेणु, नागसम्भव, भालदर्शन, रंगज, रक्त, रक्तचुर्ण, रक्तबालुक, रक्तबालुका, रक्तशासन, वीर, वीररज, शिव, शोण, संध्यारुण, श्रृंगारभूषण, सिंदूर, सेंदुर, सोमंतक, सीसज, सीसोपधातु, सींदुर, सेनुर, सोहाग, सौभाग्य, सौभाग्यचिन्ह

आप देख सकते हैं कि इनमे से सिंदूर, सेनुर जैसे cognate को छोड़कर किसी भी दूसरे शब्दल का इस्तेमाल इस पदार्थ के लिए पूरे भारत मे कहीं नही होता। अरुण, अरुणपराग, रंगज, रक्त, रक्तचूर्ण, रक्तबालुक, रक्तबालुका, वीर, वीररज, रक्तशासन, संध्यारुण तो स्पष्टतः लेखक की अपनी कल्पना मालूम पड़ती है। शिव, सोहाग, सौभाग्यचिन्ह, सौभाग्य आदि tounge in cheek वाली बात है, काव्यात्मक भावनाएँ हैं। सीसज और सीसोपधातु(सीसा/लेड/lead) इस वास्तविकता को बयां करता है कि लेखक को यह पता था कि यह हमेशा से रासायनिक रूप में इस्तेमाल होता रहा है। पर, लेखक को लेड और मरकरी में अंतर नही पता होना यह बयां करता है कि ये दोनों पर्यायवाची मनगढ़ंत हैं। ऊपर, भारत मे इसके वनस्पति से न आने से तथा भारत मे इस रसायन के सन 1978 तक न मिलने का साक्ष्य दिया जा चुका है। रह गयी बात इसके पर्यायवाचियों में नाग शब्द जुड़े होने की, तो, ये सारे पर्यायवाची भोलानाथ के दिमाग की कल्पना में इसलिए संभव हुआ कि उसकी प्रजाति दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से ही भारत मे अँग्रेजों और मुगलों के साथ सेवक के रूप में प्रवेश की है। नागवंशीय लोग मूलतः ऑस्ट्रोनेशियन लोग हैं, जिनका उद्गम ताइवान माना जाता है। इसलिए उसे लगा होगा कि सिंदूर नागों की देन है तो नागज, नागगर्भ। जो कि चीन से आयात के क्रम में नागों के हाथ लगी और बहुत बाद में भारत मे आयी। लेखक की कपोल कल्पना का सबसे बड़ा सबूत है कि उसे दक्षिण भारतीय भाषाओं में वरमिलन भी कहते हैं का अंदाजा ही नही है, नही तो वह उन्हें भी पर्यायवाचियों के लिस्ट में शामिल जरूर करता।

राजेन्द्र बाबू को ये नाग वाले पर्यायवाची ही क्यों लुभाते हैं, अन्य पर्यायवाचियों की उन्होंने क्यों कोई बात नही की तो उनके अब तक के सारे कथन, लेखनी देखिए। उनके दिमाग मे यह कहीं से भर गया है कि नागवंशीय मूलतः भारतीय हैं। पूरा मूलनिवासी समाज नागवंशीय है। नागवंशीय लोग पूरे भारत मे हैं। ये मोहनजोदड़ो में भी थे, हड़प्पा में भी थे। मतलब नाग ही नाग, जो कि सच्चाई से कोसो दूर है। 

सिनेबार/मरक्यूरिक सल्फाइड चीन से पहले दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में आया है और सबसे अंत मे भारत मे आया है। मरक्यूरिक सल्फाइड के चीनी नाम चेनशा/शेनशा(शा - sand, धूल, धुर) से ही सेंधुर, सेंदुर, सेनुर, सिंदूर cognate आये हैं और यूरोपियन शब्द सिनेबार आया है।


https://www.zo.uni-heidelberg.de/sinologie/research/mining-sw/minerals/mercury_cinnabar.htm

अलकेमिस्ट/कीमियागर(नाम हिंदी लग सकता है, लेकिन कीमिया, केमिस्ट, केमिकल, केमिस्ट्री के chemia एक ही हैं। इसका हिंदी नाम 'रसायन' chin-yeh के yeh यानि हर्बल जूस से गढ़ा हुआ है) की शुरुवात चीन से हुई है और सिनेबार को दवा के रूप में(खासकर सोना के साथ मिलाकर 'chin-tan') दिर्घायु और बाद में अमरता के लिए प्रयोग में लाया जाता था। खून को जीवनदायिनी समझने के कारण सिनेबार के लाल रंग से इसको खून बढ़ाने वाला समझा गया।  chin-yeh फुकीन भाषा में कीमिया हो गया। जो ईरान के लाल रंग के जीवनदायिनी कीमिया खजूरों के नाम का स्रोत है। और, फिर ग्रीक में 200 BC में  kimia/chemia(Alchemy) हुआ। इसतरह से  Alchemy का जन्मस्थल चीन है। सिनेबार के बारे में इजिप्ट अनजान था। यहाँ सोना को आयु बढ़ाने वाले दवा के रूप में कभी प्रयोग नहीं किया गया। दीर्घायु वाली किसी दवा का कोई कांसेप्ट न था और न ही कोई साधु सन्यासी का, जो ऐसे किसी दवा के फेरे में होते। अतः alchemy के जन्मस्थल के रूप में इजिप्ट के दावे में कोई दम नही है। विस्तृत विवरण 1987 मे  छपे Indian Journal of History of Sciences,` 22(1) : 63-70 (1987) के लेख "History of Cinnabar as drug, The natural substance and the synthetic product" शोध पत्र में देखा जा सकता है। दीर्घायु वाले इस कांसेप्ट को आगे बढ़ाते हुए chin-tan भारत मे मकरध्वज के रूप में जाना गया। मकर (एक मगरमच्छ सह मछली) दीर्घायु और वंश बढ़ाने वाला इन्डोनेशियाई देवता है। यानी मकरध्वज शब्द भी ऑस्ट्रोनेशियन है। आप चीन से नागों की धरती दक्षिण पूर्वी एशियाई देश और वहाँ से भारत में सिनेबार को आया देख सकते हैं। साथ ही यह भी देख सकते हैं कि इसके प्रयोगकर्त्ता भी नागों की धरती से भारत मे आये। समयकाल मे अंतर हो सकता है।


https://www.thefreelibrary.com/Chinese+cinnabar.-a0128330233

चीन में सिनेबार के और भी उपयोगों के दुर्लभ सबूत मिले हैं। 



"Researchers found the remains of a woman over 2,000 years old in northwest China with red-dyed teeth thanks to the use of cinnabar, a mineral composed of mercury sulfide. This is the first documented case in history where this material has been used to pigment teeth, leading experts to nickname the woman the Red Princess of the Silk Road.

The discovery was made in the Shengjindian cemetery, located in the Turpan Basin, a key region along the Silk Road. The young woman, aged between 20 and 25, was buried alongside three other individuals in a tomb dating from the period between 202 BC and 8 AD, during the Han Dynasty.

......

One of the most intriguing aspects of the discovery is the origin of the cinnabar. The Turpan Basin is not rich in this mineral, suggesting it must have been imported from other regions. In ancient times, the main sources of cinnabar were located in the southwest of China, in provinces such as Hunan and Sichuan, as well as in Europe, particularly in the famous Almadén mine in Spain....."

https://www.labrujulaverde.com/en/2025/02/the-red-princess-of-the-silk-road-the-only-person-in-ancient-times-with-teeth-dyed-with-cinnabar/

तो, भारत मे सिंदूर के इस 200 साल के अति प्राचीन इतिहास से आप हिन्दू धर्म और उसके ग्रंथों के अति प्राचीनता का अनुमान लगा सकते हैं। 

आप यह भी देख सकते हैं कि सिंदूर किस प्रकार चीनी और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के माल यूरोप ले जाने के क्रम में कुछ हिस्सा भारत मे खपाने की ओर इशारा करता है। अन्य माल थे, सूखा नारियल, मसाले, सूखा मेवा, अगरबत्ती, धूप, धार्मिक किताबें, कंठी माला, सुपारी, चंदन, लोहे के बने सामान आदि। ये माल मेला के माध्यम से खपाया जाता था, जो कालांतर में किरण के दुकान के रूप में उभरा है। आप यह भी देख सकते हैं कि क्यों हिन्दू धर्म ईसाई, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, सिख की तरह नही है, जिनमे एक प्रवर्त्तक या गुरुओं की श्रृंखला पाई जाती है। बल्कि ये set of practices हैं, जो व्यापारियों ने माल खपाने के लिए, आमजन में ब्राम्हण वर्ग की मदद से शतकों में अनेकानेक नए नए धार्मिक सामाजिक परंपराएं गढ़ीं। इन set of practices को हिन्दू धर्म की संज्ञा देकर जनमानस की भावनाओं को हाइजैक कर लिया गया है। 

तो, अब उपाय यह है कि:-

1. स्वयं को हिन्दू कहना मानना छोड़ दें और हिन्दू का मतलब केवल बाभन, मारवाड़ी, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ से लगाये

2. आपकी भावनाओं का केन्द्रीकरण कैसे किया जा रहा है, इसपर चर्चा करें

2. उन सारे धार्मिक सामाजिक set of practices को पहचाने, जिनमे उपयोग होने वाले सामान आपके स्थानीय क्षेत्र की है हैं नही और उनके बारे में आपस मे चर्चा करें कि कैसे व्यापारी अपने लाभ के लिए आपको गैर जरूरी चीजें आजतक बेचते आये हैं।


~ राहुल पटेल

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